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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Friday, December 25, 2015

MAHARAJA CHATRSAL BUNDELA

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास

---बुन्देल केसरी,मुग़लो के काल महाराजा छत्रसाल ---



दिनांक 04 मई 1649 ईस्वी को महाराजा छत्रसाल का जन्म हुआ था।
कम आयु में ही अनाथ हो गए वीर बालक छत्रसाल ने छत्रपति शिवाजी से प्रभावित होकर अपनी छोटी सी सेना बनाई और मुगल बादशाह औरंगजेब से जमकर लोहा लिया और मुग़लो के सबसे ताकतवर काल में उनकी नाक के नीचे एक बड़े भूभाग को जीतकर एक विशाल स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। 

बुन्देलखंड की भूमि प्राकृतिक सुषमा और शौर्य पराक्रम की भूमि है, जो विंध्याचल पर्वत की पहाड़ियों से घिरी है। चंपतराय जिन्होंने बुन्देलखंड में बुन्देला राज्य की आधार शिला रखी थी, महाराज छत्रसाल ने उस बुन्देला राज्य को ना केवल पुनर्स्थापित किया बल्कि उसका विस्तार कर के उसे समृद्धि प्रदान की।

====जीवन परिचय====



महाराजा छत्रसाल का जन्म गहरवार (गहड़वाल) वंश की बुंदेला शाखा के राजपूतो में हुआ था,काशी के गहरवार राजा वीरभद्र के पुत्र हेमकरण जिनका दूसरा नाम पंचम सिंह गहरवार भी था,वो विंध्यवासिनी देवी के अनन्य भक्त थे,जिस कारण उन्हें विन्ध्य्वाला भी कहा जाता था,इस कारण राजा हेमकरण के वंशज विन्ध्य्वाला या बुंदेला कहलाए,हेमकर्ण की वंश परंपरा में सन 1501 में ओरछा में रुद्रप्रताप सिंह राज्यारूढ़ हुए, जिनके पुत्रों में ज्येष्ठ भारतीचंद्र 1539 में ओरछा के राजा बने तब बंटवारे में राव उदयजीत सिंह को महेबा (महोबा नहीं) का जागीरदार बनाया गया, इन्ही की वंश परंपरा में चंपतराय महेबा गद्दी पर आसीन हुए।

चम्पतराय बहुत ही वीर व बहादुर थे। उन्होंने मुग़लो के खिलाफ बगावत करी हुई थी और लगातार युद्धों में व्यस्त रहते थे। चम्पतराय के साथ युद्ध क्षेत्र में रानी लालकुँवरि भी साथ ही रहती थीं और अपने पति को उत्साहित करती रहती थीं। छत्रसाल का जन्म दिनांक 04 मई 1649 ईस्वी को पहाड़ी नामक गाँव में हुआ था। गर्भस्थ शिशु छत्रसाल तलवारों की खनक और युद्ध की भयंकर मारकाट के बीच बड़े हुए। यही युद्ध के प्रभाव उनके जीवन पर असर डालते रहे और माता लालकुँवरि की धर्म व संस्कृति से संबंधित कहानियाँ बालक छत्रसाल को बहादुर बनाती रहीं।

छत्रसाल के पिता चंपतराय जब मुग़ल सेना से घिर गये तो उन्होंने अपनी पत्नी 'रानी लाल कुंवरि' के साथ अपनी ही कटार से प्राण त्याग दिये, किंतु मुग़लों के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
छत्रसाल उस समय चौदह वर्ष की आयु के थे। क्षेत्र में ही उनके पिता के अनेक दुश्मन थे जो उनके खून के प्यासे थे। इनसे बचते हुए और युद्ध की कला सीखते हुए उन्होंने अपना बचपन बिताया। अपने बड़े भाई 'अंगद राय' के साथ वह कुछ दिनों मामा के घर रहे, किंतु उनके मन में सदैव मुग़लों से बदला लेकर पितृ ऋण से मुक्त होने की अभिलाषा थी। बालक छत्रसाल मामा के यहाँ रहता हुआ अस्त्र-शस्त्रों का संचालन और युद्ध कला में पारंगत होता रहा। अपने पिता के वचन को ही पूरा करने के लिए छत्रसाल ने पंवार वंश की कन्या 'देवकुंवरि' से विवाह किया। महारानी देवकुंवरि पंवार के अलावा महाराजा छत्रसाल ने कई विवाह और किये और उनकी अनेक विजातीय दासी रखतें भी थी। उनकी एक मुस्लिम दासी रखत से पुत्री की प्राप्ति हुई जिसका नाम मस्तानी था। 


====छत्रपति शिवाजी से सम्पर्क और ओरंगजेब से संघर्ष=====


दस वर्ष की अवस्था तक छत्रसाल कुशल सैनिक बन गए थे। अंगद राय ने जब सैनिक बनकर राजा जयसिंह के यहाँ कार्य करना चाहा तो छोटे भाई छत्रसाल को यह सहन नहीं हुआ। छत्रसाल ने अपनी माता के कुछ गहने बेचकर एक छोटी सा सैनिक दल तैयार करने का विचार किया। छोटी सी पूंजी से उन्होंने 30 घुड़सवार और 347 पैदल सैनिकों का एक दल बनाया और मुग़लों पर आक्रमण करने की तैयारी की। 22 वर्ष की आयु में छत्रसाल युद्ध भूमि में कूद पड़े। छत्रसाल बहुत दूरदर्शी थे। उन्होंने पहले ऐसे लोगों को हटाया जो मुग़लों की मदद कर रहे थे।

सन 1668 ईस्वी में उन्होंने दक्षिण में छत्रपति शिवाजी से भेट की,शिवाजी ने उनका हौसला बढ़ाते हुए उन्हें वापस बुंदेलखंड जाकर मुगलों से अपनी मात्रभूमि स्वतंत्र कराने का निर्देश दिया,
शिवाजी ने छत्रसाल को उनके उद्देश्यों, गुणों और परिस्थितियों का आभास कराते हुए स्वतंत्र राज्य स्थापना की मंत्रणा दी एवं समर्थ गुरु रामदास के आशीषों सहित 'भवानी’ तलवार भेंट की-

करो देस के राज छतारे
हम तुम तें कबहूं नहीं न्यारे।
दौर देस मुग़लन को मारो
दपटि दिली के दल संहारो।
तुम हो महावीर मरदाने
करि हो भूमि भोग हम जाने।
जो इतही तुमको हम राखें
तो सब सुयस हमारे भाषें।

छत्रसाल ने वापिस अपने गृह क्षेत्र आकर मुग़लो के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत कर दी। इसमें उनको गुरु प्राणनाथ का बहुत साथ मिला। दक्षिण भारत में जो स्थान समर्थगुरु रामदास का है वही स्थान बुन्देलखंड में 'प्राणनाथ' का रहा है, प्राणनाथ छत्रसाल के मार्ग दर्शक, अध्यात्मिक गुरु और विचारक थे.. जिस प्रकार समर्थ गुरु रामदास के कुशल निर्देशन में छत्रपति शिवाजी ने अपने पौरुष, पराक्रम और चातुर्य से मुग़लों के छक्के छुड़ा दिए थे, ठीक उसी प्रकार गुरु प्राणनाथ के मार्गदर्शन में छत्रसाल ने अपनी वीरता से, चातुर्यपूर्ण रणनीति से और कौशल से विदेशियों को परास्त किया। .

छत्रसाल ने पहला युद्ध अपने माता-पिता के साथ विश्वासघात करने वाले सेहरा के धंधेरों से किया हाशिम खां को मार डाला और सिरोंज एवं तिबरा लूट डाले गये लूट की सारी संपत्ति छत्रसाल ने अपने सैनिकों में बाँटकर पूरे क्षेत्र के लोगों को उनकी सेना में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित किया। कुछ ही समय में छत्रसाल की सेना में भारी वृद्धि होने लगी और उन्हेांने धमोनी, मेहर, बाँसा और पवाया आदि जीतकर कब्जे में कर लिए। ग्वालियर-खजाना लूटकर सूबेदार मुनव्वर खां की सेना को पराजित किया, बाद में नरवर भी जीता।
ग्वालियर की लूट से छत्रसाल को सवा करोड़ रुपये प्राप्त हुए पर औरंगजेब इससे छत्रसाल पर टूट-सा पड़ा। उसने सेनपति रुहल्ला खां के नेतृत्व में आठ सवारों सहित तीस हजारी सेना भेजकर गढ़ाकोटा के पास छत्रसाल पर धावा बोल दिया। घमासान युद्ध हुआ पर दणदूल्हा (रुहल्ला खां) न केवल पराजित हुआ वरन भरपूर युद्ध सामग्री छोड़कर जन बचाकर उसे भागना पड़ा।

बार बार युद्ध करने के बाद भी औरंगज़ेब छत्रसाल को पराजित करने में सफल नहीं हो पाया। छत्रसाल को मालूम था कि मुग़ल छलपूर्ण घेराबंदी में सिद्धहस्त है। उनके पिता चंपतराय मुग़लों से धोखा खा चुके थे। छत्रसाल ने मुग़ल सेना से इटावा, खिमलासा, गढ़ाकोटा, धामौनी, रामगढ़, कंजिया, मडियादो, रहली, रानगिरि, शाहगढ़, वांसाकला सहित अनेक स्थानों पर लड़ाई लड़ी और मुग़लों को धूल चटाई। छत्रसाल की शक्ति निरंतर बढ़ती गयी। बन्दी बनाये गये मुग़ल सरदारों से छत्रसाल ने दंड वसूला और उन्हें मुक्त कर दिया। धीरे धीरे बुन्देलखंड से मुग़लों का एकछत्र शासन छत्रसाल ने समाप्त कर दिया।

छत्रसाल के शौर्य और पराक्रम से आहत होकर मुग़ल सरदार तहवर ख़ाँ, अनवर ख़ाँ, सहरूदीन, हमीद बुन्देलखंड से दिल्ली का रुख़ कर चुके थे। बहलोद ख़ाँ छत्रसाल के साथ लड़ाई में मारा गया और मुराद ख़ाँ, दलेह ख़ाँ, सैयद अफगन जैसे सिपहसलार बुन्देला वीरों से पराजित होकर भाग गये थे।


====राज्याभिषेक और राज्य विस्तार====

छत्रसाल के राष्ट्र प्रेम, वीरता और हिन्दूत्व के कारण छत्रसाल को भारी जन समर्थन प्राप्त था। छत्रसाल ने एक विशाल सेना तैयार कर ली जिसमे क्षेत्र के सभी राजपूत वंशो के योद्धा शामिल थे। इसमें 72 प्रमुख सरदार थे। वसिया के युद्ध के बाद मुग़लों ने भी छत्रसाल को 'राजा' की मान्यता प्रदान कर दी थी। उसके बाद महाराजा छत्रसाल ने 'कालिंजर का क़िला' भी जीता और मांधाता चौबे को क़िलेदार घोषित किया। छत्रसाल ने 1678 में पन्ना में अपनी राजधानी स्थापित की और विक्रम संवत 1744 मे योगीराज प्राणनाथ के निर्देशन में छत्रसाल का राज्याभिषेक किया गया।

छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ आजीवन हिन्दू मुस्लिम एकता के संदेश देते रहे। उनके द्वारा दिये गये उपदेश 'कुलजम स्वरूप' में एकत्र किये गये। पन्ना में प्राणनाथ का समाधि स्थल है जो अनुयायियों का तीर्थ स्थल है। प्राणनाथ ने इस अंचल को रत्नगर्भा होने का वरदान दिया था। किंवदन्ती है कि जहाँ तक छत्रसाल के घोड़े की टापों के पदचाप बनी वह धरा धनधान्य, रत्न संपन्न हो गयी। छत्रसाल के विशाल राज्य के विस्तार के बारे में यह पंक्तियाँ गौरव के साथ दोहरायी जाती है- 
'इत यमुना उत नर्मदा इत चंबल उत टोस छत्रसाल सों लरन की रही न काहू हौस।'

बुंदेलखंड की शीर्ष उन्नति इन्हीं के काल में हुई। छत्रसाल के समय में बुंदेलखंड की सीमायें अत्यंत व्यापक हो गई। इस प्रदेश में उत्तर प्रदेश के झाँसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, मध्य प्रदेश के सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, मण्डला, मालवा संघ के शिवपुरी, कटेरा, पिछोर, कोलारस, भिण्ड और मोण्डेर के ज़िले और परगने शामिल थे। छत्रसाल ने लगातार युद्धों और आपस में लूट मार से त्रस्त इस पिछड़े क्षेत्र को एक क्षत्र के निचे लाकर वहॉ शांति स्थापित की जिससे बुंदेलखंड का पहली बार इतना विकास संभव हो सका।

छत्रसाल का राज्य प्रसिद्ध चंदेल महाराजा कीर्तिवर्धन से भी बड़ा था। कई शहर भी इन्होंने ही बसाए जिनमे छतरपुर शामिल है। छत्रसाल तलवार के धनी थे और कुशल शस्त्र संचालक थे। वह शस्त्रों का आदर करते थे। लेकिन साथ ही वह विद्वानों का बहुत सम्मान करते थे और स्वयं भी बहुत विद्वान थे। वह उच्च कोटि के कवि भी थे, जिनकी भक्ति तथा नीति संबंधी कविताएँ ब्रजभाषा में प्राप्त होती हैं। इनके आश्रित दरबारी कवियों में भूषण, लालकवि, हरिकेश, निवाज, ब्रजभूषण आदि मुख्य हैं। भूषण ने आपकी प्रशंसा में जो कविताएँ लिखीं वे 'छत्रसाल दशक' के नाम से प्रसिद्ध हैं। 'छत्रप्रकाश' जैसे चरितकाव्य के प्रणेता गोरेलाल उपनाम 'लाल कवि' आपके ही दरबार में थे। यह ग्रंथ तत्कालीन ऐतिहासिक सूचनाओं से भरा है, साथ ही छत्रसाल की जीवनी के लिए उपयोगी है। उन्होंने कला और संगीत को भी बढ़ावा दिया, बुंदेलखंड में अनेको निर्माण उन्होंने करवाए। छत्रसाल धार्मिक स्वभाव के थे। युद्धभूमि में व शांतिकाल में दैनिक पूजा अर्चना करना छत्रसाल का कार्य रहा। 

====कवि भूषण द्वारा छत्रसाल की प्रशंसा====


कविराज भूषण ने शिवाजी के दरबार में रहते हुए छत्रसाल की वीरता और बहादुरी की प्रशंसा में अनेक कविताएँ लिखीं। 'छत्रसाल दशक' में इस वीर बुंदेले के शौर्य और पराक्रम की गाथा गाई गई है।
छत्रसाल की प्रशंसा करते हुए कवि भूषण दुविधा में पड़ गये और लिखा कि-----
"और राव राजा एक,मन में लायुं अब ,
शिवा को सराहूँ या सराहूँ छत्रसाल को"


====मुगल सेनापति बंगश का हमला और पेशवा बाजीराव का सहयोग====


महाराज छत्रसाल अपने समय के महान शूरवीर, संगठक, कुशल और प्रतापी राजा थे। छत्रसाल को अपने जीवन की संध्या में भी आक्रमणों से जूझना पडा।सन 1729 में सम्राट मुहम्मद शाह के शासन काल में प्रयाग के सूबेदार बंगस ने छत्रसाल पर आक्रमण किया। उसकी इच्छा एरच, कौच, सेहुड़ा, सोपरी, जालोन पर अधिकार कर लेने की थी। छत्रसाल को मुग़लों से लड़ने में दतिया, सेहुड़ा के राजाओं ने सहयोग नहीं दिया। उनका पुत्र हृदयशाह भी उदासीन होकर अपनी जागीर में बैठा रहा। तब छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा को संदेश भेजा -
'जो गति मई गजेन्द्र की सोगति पहुंची आय 
बाजी जात बुन्देल की राखो बाजीराव'

बाजीराव सेना सहित सहायता के लिये पहुंचा और उसने बंगस को 30 मार्च 1729 को पराजित कर दिया। बंगस हार कर वापिस लौट गया।

4 अप्रैल 1729 को छत्रसाल ने विजय उत्सव मनाया। इस विजयोत्सव में बाजीराव का अभिनन्दन किया गया और बाजीराव को अपना तीसरा पुत्र स्वीकार कर मदद के बदले अपने राज्य का तीसरा भाग बाजीराव पेशवा को सौंप दिया, जिस पर पेशवा ने अपनी ब्राह्मण जाति के लोगो को सामन्त नियुक्त किया। 

प्रथम पुत्र हृदयशाह पन्ना, मऊ, गढ़कोटा, कालिंजर, एरिछ, धामोनी इलाका के जमींदार हो गये जिसकी आमदनी 42 लाख रू. थी।
दूसरे पुत्र जगतराय को जैतपुर, अजयगढ़, चरखारी, नांदा, सरिला, इलाका सौपा गया जिसकी आय 36 लाख थी।
बाजीराव पेशवा को काल्पी, जालौन, गुरसराय, गुना, हटा, सागर, हृदय नगर मिलाकर 33 लाख आय की जागीर सौपी गयी।

=====निधन====

छत्रसाल ने अपने दोनों पुत्रों ज्येष्ठ जगतराज और कनिष्ठ हिरदेशाह को बराबरी का हिस्सा, जनता को समृद्धि और शांति से राज्य-संचालन हेतु बांटकर अपनी विदा वेला का दायित्व निभाया।
इस वीर बहादुर छत्रसाल का 83 वर्ष की अवस्था में 13 मई 1731 ईस्वी को मृत्यु हो गयी। छत्रसाल के लिए कहावत है -
'छत्ता तेरे राज में,
धक-धक धरती होय।
जित-जित घोड़ा मुख करे,
तित-तित फत्ते होय।'



मध्यकालीन भारत में विदेशी आतताइयों से सतत संघर्ष करने वालों में छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप और बुंदेल केसरी छत्रसाल के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, परंतु जिन्हें उत्तराधिकार में सत्ता नहीं वरन ‘शत्रु और संघर्ष’ ही विरासत में मिले हों, ऐसे बुंदेल केसरी छत्रसाल ने वस्तुतः अपने पूरे जीवनभर स्वतंत्रता और सृजन के लिए ही सतत संघर्ष किया। शून्य से अपनी यात्रा प्रारंभ कर आकाश-सी ऊंचाई का स्पर्श किया। उन्होंने विस्तृत बुंदेलखंड राज्य की गरिमामय स्थापना ही नहीं की थी, वरन साहित्य सृजन कर जीवंत काव्य भी रचे। छत्रसाल ने अपने 82 वर्ष के जीवन और 44 वर्षीय राज्यकाल में 52 युद्ध किये थे। शौर्य और सृजन की ऐसी उपलब्धि बेमिसाल है-

‘‘इत जमना उत नर्मदा इत चंबल उत टोंस।छत्रसाल से लरन की रही न काह होंस।’’


===सन्दर्भ===


1-http://hi.bharatdiscovery.org/india/छत्रसाल
2-http://www.bundelkhand.in/portal/history/Bundeli-Kesari-Chhatrasal
3-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 305-313
4-http://en.wikipedia.org/wiki/Chhatrasal

Wednesday, December 23, 2015

NIMIVANSHI RAJPUTS THE DYNASTY OF RAJANYA JANAK AND MAA SITA

RAPUTANA SOCH OR KSHATRIYA ITIHAS


NIMIVANSH THE DYNASTY OF RAJA JANAK AND MAA SITA 



=== निमि वंश(Nimivanshi rajputs)===
~~माता सीता का वंश~~

क्षत्रिय समाज में भगवान राम के वंशजो से सभी परिचित हैं। लेकिन बहुत कम लोगो को निमि वंश के बारे में जानकारी है जिसमे माता सीता का जन्म हुआ था। निमि वंश के क्षत्रिय राजपूत आज भी बिहार राज्य के मिथिला और उसके आसपास के क्षेत्र में मिलते हैं। 

गौत्र- वशिष्ठ, कश्यप, वत्स
प्रवर- वशिष्ठ, अत्रि, सांकृति
वेद- यजुर्वेद
कुलदेवी- चंडिका
नदी- कोसी
प्राचीन गद्दी- मिथिला

निमिवंश वैवस्वत मनु की एक संतान निमि के वंशज हैं। महाराजा निमि के ज्येष्ठ पुत्र का नाम मिथि था। मिथि ने अपने नाम से मिथिला नगरी बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया। मिथि पराक्रमी शासक होने के साथ साथ बहुत बड़े विद्वान् भी थे। इस वजह से उनकी उपाधि जनक पड़ी और उनके बाद मिथिला के सभी शासको की उपाधि जनक हो गई। मिथिला को जनकपुरी भी कहते हैँ जो अब नेपाल में पड़ता है। महाराज निमि नेपाल के भी शाशक थे। कहा जाता है इसीलिए पहले नेपाल को निमिपाल कहते थे, जो कालांतर में नेपाल हो गया। 

निमि की 49वीं पीढ़ी में सीरध्वज नामक राजा हुए। मिथि के सारे वंशज जनक कहलाते हैं इसलिये सीरध्वज को भी जनक कहते हैं। इनकी दो पुत्रियां थी- सीता और उर्मिला जिनका विवाह क्रमशः भगवान राम और लक्ष्मण से हुआ था। उनके भाई का नाम कुशध्वज था जिनकी पुत्री मांडवी और श्रुति कीर्ति का विवाह क्रमशः भरत और शत्रुघ्नजी से हुआ। 

निमि वंश के क्षत्रिय राजपूत आज भी बिहार प्रान्त के मिथिला प्रदेश और उसके आसपास के क्षेत्र में मिलते हैं। 

निमि वंश की शाखाएँ- 

निमुड़ी वंश- महाराज निमि के ज्येष्ठ पुत्र मिथि के वंशज निमि कहलाते हैं जबकि उनके छोटे भाई के वंशज निमूड़ी कहलाते हैं। इनका गोत्र कश्यप और कुलदेवी प्रभावती और नदी कोसी है। निमुड़ी वंश के क्षत्रिय भी बिहार प्रान्त में मिलते हैं। 

निशान वंश- इस वंश के क्षत्रिय भी आज बिहार के मुजफ्फरपुर, गया, पटना, शाहाबाद आदि क्षेत्रो में मिलते हैँ।इनका गोत्र वत्स और कुलदेवी भगवती हैं।
संदर्भ-----1-देवीसिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास पृष्ठ संख्या 323-324

Saturday, December 19, 2015

LEGENDARY WARRIOR THAKUR MOHAN SINGH MADHAD

====हुतात्मा ठाकुर मोहन सिंह मडाड====

(यादगार अहमद की तवारीखें-सलतीने-अफगाना; इलियट एंड डौसन भाग 5; बाबरनामा, सर एडीलवर्ट टेबोलेट का अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित)



ठाकुर मोहन सिंह मडाड का इतिहास साहस और शौर्य की परकाष्ठा है और भारत के इतिहास में जालौर के सोनीगारा चौहान वीरमदेव के बाद क्षत्रियों का शौर्य प्रदर्शित करने वाले इस दुर्लभ वीर पुरुष की जितनी प्रशंशा की जाय वह कम ही होगी क्योकि अल्प और सीमित साधन रहते हुए इन्होंने उस बाबर की समुद्र सी लहराती प्रबल सत्ता को चुनौती दी उसके अह्निर्श विजयों से उत्तर भारत थर थर काँप रहा था, इन्होंने उस महाबली बाबर को भी अपनी तलवार का पानी पिला कर छोड़ा।

यह घटना है सन 936 की है| उस समय बाबर लाहौर में था और आगरा जाने की तैयारी में था। 4 मार्च सन् 1530 ईस्वी को बाबर ने लाहौर से आगरा जोन के लिए प्रस्थान किया।
सरहिंद पहुँचने पर उसे समाना के काजी ने उससे मुलाकात कर बताया की कैथल के मोहन सिंह मडाड (मंडहिर) नामक राजपूत ने उसकी इमलाक (जागीर) पर हमला करके उसे लूटा पाटा और जलाया और उसके बेटे को मार डाला। काजी की बात सुन के आग बबूला हुए बाबर ने फ़ौरन ही तीन हजार घुड़सवारों के साथ अली कुली हमदानी को कैथल परगना में ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव भेजा।

यादगार अहमद बताता है की अलसुबह मुग़लों की सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुँचीं उस समय गाँव में बारात आई हुयी थी। जोड़े का दिन था और उस दिन ठण्ड भी कुछ ज्यादा ही था। जब मुघल सेना की गाँव की तरफ कूच की खबर सुनी तब वह भी अपने नौजवानों के साथ बाहर निकला और सामने आते ही मडाडों ने तेजी से वाणों की वर्षा  करते हुए शाही सेना के पाँव उखाड़ दिए। इस भयंकर युद्ध में 1 हजार तुर्क मारे गए शेष भाग कर पास के ही एक जंगल में छिप गए।

यादगार अहमद को शर्मिंदगी उठाते हुए भी इस घटना का जिक्र करना पड़ा और उसने हार का बहाना बनाते हुए लिखा के जाड़े की दिनों में तुर्की धनुष की तांत अकड़ जाती है इस वजह से तुर्क कायदे से धनुष पर बाण चढ़ा ही नहीं सके।

जंगल में पहुचने के बाद तुर्कों ने लकड़ियाँ इकट्ठी कर के उसमे आग जलाकर पूरी तरह तापा और आग से धनुष की तांत को ढीला कर फर से योजना बनाकर एक बार फिर मोहन के गाँव की और बढ़ने लगे। तुर्कों की इस धृष्टता को देखकर राजपूतों की आँखों में खून उतर आया और उन्होंने दुगने उत्साह से तुर्कों से मुकाबला किया। इस बार भी बहुत सारे शाही सैनिक मारे गए। बाकि सैनिको को लेकर अली खान हमदानी भाग चला और सरहिंद पहुँच कर ही साँस ली।

शाही सेना की हार सुनकर बाबर शर्मसार होते हुए ठाकुर मोहन सिंह मडाड के नाश का संकल्प लेते हुए तुरन्त 6000 घुड़सवार सैनिकों के साथ अपने सिपहसालार तरसम बहादुर और नौरंगवेग को भेजा जो पानीपत दोनों युद्धों में अपनी तलवार और तीर का जौहर दिखा चुके थे। इन्होंने छोटे मोटे युद्ध तो देखे ही नहीं थे बड़ी बड़ी लड़ाइयों में अपनी योग्यता दिखाने का आनंद आता था। ठाकुर मोहन सिंह मडाड के पराकम की कहानी अली कुली हमदानी के मुँह से तरसेम बेग ने सुनी थी। हमदानी संकोच करते हुए बेग को बताता है की अब तक लड़ीं हुईं लड़ाइयों में सिर्फ ठाकुर मोहन सिंह मडाड ने ही उसकी पीठ देखी है।

सरहिंद से चलते चलते तरसेम बेग ने सोचा की मोहन सिंह जरूर विशेष किस्म का बहादुर व्यक्ति होगा नहीं तो सब ओअर गालियाँ न्योछावर करने वाला अली कुली मोहन सिंह के तारीफों के पुल नहीं बाँधता। रास्ता तय करते हुए उसने सोच लिया के दुश्मन को सिर्फ बल से नहीं छल से मारना और हराना होगा।

ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गांव के नजदीक आने पर तरसेम बेग ने अपने सैनिकों को तीन भागों में बाँट दिया। हरावल दस्ते को यह हिदायत दी की वे गाँव के पास जाकर मडाडों को ललकारें। जब ललकार सुनकर राजपूत गाँव से बाहर युध्द के लिए आग बाबुल होकर निकलें तो हरावल दस्ता भाग चले और भागते जाए इसी बीच उसकी राइट विंग गाँव को घेर ले और उसमें आग लगा दे इस विंग की कमांड उसने खुद अपने हाथों में ली और नौरंग बेग के हाथों में 2 हजार घुड़सवारों की सेना रिजर्व रखी। जब मडाड बीच में घिर जाएँ तब उन पर जोरदार करना इस दस्ते का काम था।

यादगार अहमद बताता है के जिस दिन जब शाही सेना ठाकुर मोहन सिंह मडाड के गाँव पहुची संयोग वष उस दिन भी गांव में बारात आई हुई थी।

जब शाही सेना का हरावल दस्ता गाँव के नजदीक पहुँचा तो योजना अनुसार उन्होंने मडाडों को ललकारा तब मडाडों की नस नस में चिंगारी दौड़ पङी और वह तुरन्त तैयार होकर बहार निकले और शाही सेना पर तीरों की बौछार करने लगे।राजपूतों के आम के साथ ही पूर्व योजनानुसार शाही सेना पश्चिम की ओर भागने लगी और क्षत्रियों ने उनका तेजी से पीछा किया। शाही सेना भागती रही और राजपूत सेना उसका पीछा करती रही इसी बीच तरसेम बेग की टुकड़ी ने राजपूत विहीन गाँव में आग लगा दी। जब राजपूतों ने गाँव से उमड़ता हुआ धुँआ देखा तो वग वापिस लौटे। उनके पीछे मुड़ते ही भागती हुई सेना लौटने लगी। इस प्रकार राजपूतों की सेना शाही सेना के बीच फंस गयी। इसी समय नौरंगबेग अपनी सेना के साथ राजपूतों पर टूट पड़ा। चारों और से घिरने के बाद भी राजपूत वीरता और शौर्य से लड़े उधर गाँव धु धु करता जलता रहा। राजपूत शाही सेना के इस छल को नहीं समझ पाए और पूरा साहस और पराक्रम होते हुए भी इन्हें पराजित होना पड़ा।
इस युद्ध में एक हजार वीर राजपूत शहीद हुए । ठाकुर मोहन सिंह अंत तक लड़ते रहे परन्तु कब तक ? आखिर उन्हें भी पृथ्वीराज चौहान की तरह कैदी बनना पड़ा। उस दिन हजारों नर नारियों और बच्चों को शाही सेना ने कैद कर लिया और मोहन सिंह के साथ उन कैदियों को दिल्ली ले जाया गया क्योकि तब तक बाबर सरहिंद से रवाना होकर दिल्ली पहुँच गया था।

दिल्ली दरबार में ठाकुर मोहन सिंह मडाड की पेशी हुई और बाबर ने इन्हें सजा ए मौत का फरमान सुनाया पर साथ साथ यह भी कहा यदि ठाकुर मोहन सिंह मडाड इस्लाम कबूल लेतें है तो उनकी सजा माफ़ कर दी जायेगी। ठाकुर साहब चाहते तो मुस्लिम बनकर अपने प्राण बचा सकते थे परन्तु उस योद्धा को जीवन से प्यारा वह मूल्य था जो क्षत्रियों के लिए अभिप्रीत था उनका धर्म। मोहन सिंह मडाड ने यह साबित कर दिया के वह एक सच्चे प्रतिहार और रघुवंशी थे जिनकी रीत में ही प्राणों से पहले वचन और धर्म की रक्षा करना है।

सिजदा से गर वहिश्त मिले दूर कीजिये,
दोजख ही सही सर को झुकाना नहीं अच्छा।
बेटा तूं राजपूत, याद सदा ही राखिजे,
माथा झुके न सूत, चाहे शीश ही कटिजे।।

==== मृत्युंजय मोहन ====
स्वाभिमानी ठाकुर मोहन अपना सर नहीं झुका सका और ख़ुशी ख़ुशी मृत्यु को आलिंगन करते हुए आगे बढे।क्षत्रियों के इस वारिस को बाबर ने एक विषेश प्रकार की विधि से मौत देने का फैसला किया।
ठाकुर मोहन सिंह को कमर तक मिटटी में दफना दिया गया और शाही सेना ने उनपर तीरों की बौछारें शुरू कर दी। सैकड़ों तीर देखते ही देखते ठाकुर मोहन सिंह का शरीर भेदने लगे। उनके शरीर से खून की फुहारें छूटने लगीं परन्तु गर्दन और शीश बाबर के सामने तना खड़ा रहा। वह अभी भी नहीं झुका जिससे बाबर झल्ला उठा। जब तक रक्त की अंतिम बूँद ठाकुर मोहन सिंह के शरीर से नहीं छुटी वह तन के खड़े रहे और देखने वाले भी हैरानी से देखते रहे की इतनी आघातों के बाद भी उनके चेहरे पर दर्द और पीड़ा नहीं छलक रही थी जैसे वह संवेदनहीन ही हो गए हो। अंत में ठाकुर मोहन सिंह जी का शीश धरती माँ को वंदन करते हुए छु पड़ा और उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।

ठाकुर मोहन सिंह मर कर भी अमर हो गए। उन्होंने दो बार शाही सेना को अपने शौर्य से पराजित किया जिससे बाबर लज्जित हुआ उसने अपनी आत्म कथा तजुके बाबरी में जहाँ छोटी छोटी बातें भी दर्ज कर लीं थी वहीं शर्मिन्दिगी के कारण इस प्रसंग को छोड़ दिया। इस महत्वपूर्ण घटना का पूर्ण विवरण हुमायूँ कालीन यादगार अहमद ने अपनी तवारीख ए सलातीने अफगाना में दिया।

इस युद्ध में मुआँना गाँव के परम् योद्धा ठाकुर मामचन्द मडाड भी शाही सेना के साथ युद्ध करते हुए शहीद हुए वे ठाकुर मोहन सिंह के रिसालदार थे, जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कपूर कँवर सतीं हूईं। जिनकी देवली मुआँना गाँव तहसील सफीदों जिला जींद हरयाणा में आज तक बनीं हुई है जहाँ शादी के बाद हर नव विवाहिता राजपूत क्षत्राणी आशीर्वाद और सौभाग्य लेने जाती है।

=== संदर्भ ===

1. डॉक्टर विंद्यराज चौहान कृत भारत के प्रहरी प्रतिहार वंश।
2. ब्रिटिश कालीन करनाल गजट
3. ठाकुर ईश्वर सिंह मडाड कृत राजपूत वंशवाली

Friday, December 11, 2015

YADUVANSHI CHUDASMA KSHATRIYA CLAN

RAJPUTANA SOCH और क्षत्रिय इतिहास

यदुवंशी चुडासमा क्षत्रिय वंश


==चुडासमा क्षत्रिय_वंश परिचय==

गोत्र : अत्रि
वंश : चन्द्रवंश / यादव / यदुवंश
शाखा : माध्यायनी
कुल देवी : अम्बा भवानी
सहायक देवी: खोडियार माँ
आदि पुरुष: आदिनारयण भगवान
कुल देवता: भगवन श्री कृष्ण
तलवार : ताती
ध्वजा : केसरी
शंख: अजय
नदी: कालिंदी
नगाड़ा : अजीत
मुख्य गद्दी : जूनागढ़

== जूनागढ़ और चुडासमा का इतिहास ==


>जुनागढ का नाम सुनते ही लोगो के दिमाग मे "आरझी हकुमत द्वारा जुनागढ का भारतसंघ मे विलय, कुतो के शोखीन नवाब, भुट्टो की पाकिस्तान तरफी नीति " जैसे विचार ही आयेंगे, क्योकी हमारे देश मे ईतिहास के नाम पर मुस्लिमो और अंग्रेजो की गुलामी के बारे मे ही पढाया जाता है, कभी भी हमारे गौरवशाली पूर्खो के बारे मे कही भी नही पढाया जाता || जब की हमारा ईतिहास इससे कई ज्यादा गौरवशाली, सतत संघर्षपूर्ण और वीरता से भरा हुआ है || 

> जुनागढ का ईतिहास भी उतना ही रोमांच, रहस्यो और कथाओ से भरा पडा है || जुनागढ पहले से ही गुजरात के भुगोल और ईतिहास का केन्द्र रहा है, खास कर गुजरात के सोरठ प्रांत की राजधानी रहा है || गिरीनगर के नाम से प्रख्यात जुनागढ प्राचीनकाल से ही आनर्त प्रदेश का केन्द्र रहा है || उसी जुनागढ पर चंद्रवंश की एक शाखा ने राज किया था, जिसे सोरठ का सुवर्णकाल कहा गया है || वो राजवंश चुडासमा राजवंश | जिसकी अन्य शाखाए सरवैया और रायझादा है ||

> मौर्य सत्ता की निर्बलता के पश्चात मैत्रको ने वलभी को राजधानी बनाकर सोरठ और गुजरात पर राज किया || मैत्रको की सत्ता के अंत के बाद और 14 शताब्दी मे गोहिल, जाडेजा, जेठवा, झाला जैसे राजवंशो के सोरठ मे आने तक पुरे सोरठ पर चुडासमाओ का राज था ||

=== चुडासमा वंश का उद्भव ===


> भगवान आदिनारायण से 119 वी पीढी मे गर्वगोड नामक यादव राजा हुए, ई.स.31 मे वे शोणितपुर मे राज करते थे || उनसे 22 वी पीढी मे राजा देवेन्द्र हुए, उनके 4 पुत्र हुए, 
1) असपत, 2)नरपत, 3)गजपत और 4)भूपत

>असपत शोणितपुर की गद्दी पर रहे, गजपत, नरपत और भूपत ने एस नये प्रदेश को जीतकर विक्रम संवत 708, बैशाख सुदी 3, शनिवार को रोहिणी नक्षत्र मे 'गजनी' शहर बसाया || नरपत 'जाम' की पदवी धारण कर वहा के राजा बने, जिनके वंशज आज के जाडेजा है || भूपत ने दक्षिण मे जाके सिंलिद्रपुर को जीतकर वहां भाटियानगर बसाया, बाद मे उनके वंशज जैसलमेर के स्थापक बने जो भाटी है ||

> गजपत के 15 पुत्र थे, उसके पुत्र शालवाहन, शालवाहन के यदुभाण, यदुभाण के जसकर्ण और जसकर्ण के पुत्र का नाम समा था || यही समा कुमार के पुत्र चुडाचंद्र हुए || वंथली (वामनस्थली) के राजा वालाराम चुडाचंद्र के नाना थे || वो अपुत्र थे ईसलिये वंथली की गद्दी पर चुडाचंद्र को बिठाया || यही से सोरठ पर चुडासमाओ का आगमन हुआ, वंथली के आसपास का प्रदेश जीतकर चुडाचंद्र ने उसे सोरठ नाम दिया, जंगल कटवाकर खेतीलायक जमीन बनवाई, ई.स. 875 मे वो वंथली की गद्दी पर आये || 32 वर्ष राज कर ई.स. 907 मे उनका देहांत हो गया ||

वंथली के पास धंधुसर की हानीवाव के शिलालेख मे लिखा है :

|| श्री चन्द्रचुड चुडाचंद्र चुडासमान मधुतदयत |
   जयति नृप दंस वंशातस संसत्प्रशासन वंश ||
- अर्थात् जिस प्रकार चंद्रचुड(शंकर) के मस्तक पर चंद्र बिराजमान है, उसी प्रकार सभी उच्च कुल से राजाओ के उपर चंद्रवंशी चुडाचंद्र सुशोभित है ||

== चुडासमा/रायझादा/सरवैया वंश की वंशावली ==


 1.     श्री आदी नारायण
 3.     अत्रि
 5.     सोम
11.   ययाति
12.    यदु
59.    सुरसेन
60.    वसुदेव
61.    श्री कृष्ण
62.    अनिरुद्ध
63.    वज्रनाभ
140.  देवेन्द्र
141.  गजपत
142.  शालिवाहन
143.  यदुभाण
144.  जसकर्ण
145.  समाकुमार

••• 146.  चुडचंद्र (ई.स. 875-907)


••• हमीर>> चुडचंद्र का पुत्र ||


••• मुलराज (ई.स. 907-915)

>> चुडचंद्र के पश्चात उनका पोत्र मुलराज वंथली की गद्दी पर आया || मुलराज ने सिंध पर चडाई कर किसी समा कुल के राजा को हराया था ||


••• विश्ववराह (ई.स. 915-940)

>> विश्ववराह ने नलिसपुर राज्य जीतकर सौराष्ट्र का लगभग समस्त भुभाग जीत लिया था ||


••• रा' ग्रहरिपु (ई.स. 940-982)

>> * विश्ववराह का पुत्र
* नाम - ग्रहार / ग्रहरिपु / ग्रहारसिंह / गारियो
* "रा' / राह" पदवी धारन करने वाला प्रथम राजा (महाराणा/राओल/जाम जैसी पदवी जिसे ये राजा अपने नाम के पहले लगाते थे)
* कच्छ के राजा जाम लाखा फुलानी का मित्र
* मुलराज सोलंकी, रा'ग्रहरिपु और जाम लाखा फुलानी समकालिन थे 
* आटकोट के युद्ध (ई.स. 979) मे मुलराज सोलंकी vs रा' और जाम थे.
* जाम लाखा की मृत्यु उसी युद्ध मे हुई थी
* रा' ग्रहरिपु की हार हुई और जुनागढ को पाटन का सार्वभौमत्व स्विकार करना पडा.


••• रा' कवांट (ई.स. 982-1003)

>> ग्रहरिपु का बडा पुत्र, तलाजा के उगा वाला उसके मामा थे, जो जुनागढ के सेनापति बने. मुलराज सोलंकी को आटकोट युद्ध मे मदद करने वाले आबु के राजा को उगा वाला ने पकडकर जुनागढ ले आये....रा' कवांट ने उसे माफी देकर छोड दिया... रा' और मामा उगा के बीच कुछ मनभेद हुए इससे दोनो मे युद्ध हुआ और उगा वाला वीरगति को प्राप्त हुए ||


••• रा' दियास (ई.स. 1003-1010)

>>  अबतक पाटन और जुनागढ की दुश्मनी काफी गाढ हो चुकी थी | पाटन के दुर्लभसेन सोलंकी ने जुनागढ पर आक्रमन कीया | जुनागढ का उपरकोट तो आज भी अजेय है, इसलिये दुर्लभसेन ने रा' दियास का मस्तक लानेवाले को ईनाम देने लालच दी | रा' के दशोंदी चारन बीजल ने ये बीडा उठाया, रा' ने अपना मस्तक काटकर दे दिया |


(ई.स. 1010-1025) - सोलंकी शासन


••• रा' नवघण (ई.स. 1025-1044)

>> * रा' दियास के पुत्र नवघण को एक दासी ने बोडीदर गांव के देवायत आहिर के घर पहुंचा दिया, सोलंकीओ ने जब देवायत को रा' के पुत्र को सोंपने को कहा तो देवायत ने अपने पुत्र को दे दिया, बाद मे अपने साथीदारो को लेकर जुनागढ पर रा' नवघण को बिठाया|
* गझनी ने ई.स 1026 मे सोमनाथ लुंटा तब नवघण 16 साल का था, उसकी सेना के सेनापति नागर ब्राह्मन श्रीधर और महींधर थे, सोमनाथ को बचाते हुए महीधर की मृत्यु हो गई थी |
* देवायत आहिर की पुत्री और रा' नवघण की मुंहबोली बहन जाहल जब अपने पति के साथ सिंध मे गई तब वहां के सुमरा हमीर की कुदृष्टी उस पर पडी, नवघण को यह समाचार मिलते ही उसने पुरे सोरठ से वीरो को ईकठ्ठा कर सिंध पर हमला कर सुमरा को हराया, उसे जीवतदान दिया | (संवत 1087)


••• रा' खेंगार (ई.स. 1044-1067)

>> रा' नवघण का पुत्र, वंथली मे खेंगारवाव का निर्माण किया |


••• रा' नवघण 2 (ई.स. 1067-1098)

>> * पाटन पर आक्रमन कर जीता, समाधान कर वापिस लौटा | अंतिम समय मे अपनी चार प्रतिज्ञाओ को पुरा करने वाले पुत्र को ही राजा बनाने को कहा | सबसे छोटे पुत्र खेंगार ने सब प्रतिज्ञा पुरी करने का वचन दिया इसलिये उसे गद्दी मिली | 
* नवघण के पुत्र :
• सत्रसालजी - (चुडासमा शाखा)
• भीमजी - (सरवैया शाखा)
• देवघणजी - (बारैया चुडासमा शाखा)
• सवघणजी - (लाठीया चुडासमा शाखा)
• खेंगार - (जुनागढ की गद्दी)


••• रा' खेंगार 2 (ई.स. 1098-1114)

>> * सिद्धराज जयसिंह सोलंकी का समकालिन और प्रबल शत्रु |
* उपरकोट मे नवघण कुवो और अडीकडी वाव का निर्माण कराया |
* सती राणकदेवी खेंगार की पत्नी थी |
* सिद्धराज जयसिंह ने जुनागढ पर आक्रमन कीया 12 वर्ष तक घेरा लगाया लेकिन उपरकोट को जीत ना पाया |
* सिद्धराज के भतीजे जो खेंगार के भांजे थ़े देशल और विशल वे खेंगार के पास ही रहते थे, सिद्धराज जयसिंह ने उनसे दगा करवाकर उपरकोट के दरवाजे खुलवाये |
* खेंगार की मृत्यु हो गई, सभी रानीयों ने जौहर किये, रानी रानकदेवी को सिद्धराज अपने साथ ले जाना चाहता था लेकिन वढवाण के पास रानकदेवी सति हुई, आज भी वहां उनका मंदीर है |


(ई.स. 1114-1125) - सोलंकी शासन


••• रा' नवघण 3 (ई.स. 1125-1140)

>> अपने मामा जेठवा नागजी और मंत्री सोमराज की मदद से जुनागढ जीतकर पाटन को खंडणी भर राज किया |


••• रा' कवांट 2 (ई.स. 1140-1152)

>> पाटन के कुमारपाल से युद्ध मे मृत्यु |


••• रा' जयसिंह (ई.स. 1152-1180)

>> * संयुक्ता के स्वयंवर मे गये थे, जयचंद को पृथ्वीराज के साथ युद्ध मे सहायता की थी |


••• रा' रायसिंहजी (ई.स. 1180-1184)

>> जयसिंह का पुत्र |


••• रा' महीपाल (ई.स. 1184-1201)

>> ईनके समय घुमली के जेठवा के साथ युद्ध होते रहे |


••• रा' जयमल्ल (ई.स. 1201-1230)

>> इनके समय भी जुनागढ और घुमली के बीच युद्ध होते रहे |


••• रा' महीपाल 2 (ई.स. 1230-1253)

>>  * ई.स.1250 मे सेजकजी गोहिल मारवाड से सौराष्ट्र आये, रा' महिपाल के दरबार मे गये |
* रा'महीपाल का पुत्र खेंगार शिकार पर गया, उसका शिकार गोहिलो की छावनी मे गया, इस बात पर गोहिलो ने खेंगार को केद कर उनके आदमियो को मार दिया, रा' ने क्षमा करके सेजकजी को जागीरे दी, सेजकजी की पुत्री का विवाह रा' महीपाल के पुत्र खेंगार से किया |


••• रा' खेंगार 3 (ई.स. 1253-1260)

>> अपने पिता की हत्या करने वाले एभल पटगीर को पकड कर क्षमादान दीया जमीन दी |


••• रा' मांडलिक (ई.स. 1260-1306)

>> रेवताकुंड के शिलालेख मे ईसे मुस्लिमो पर विजय करनेवाला राजा लिखा है |


••• रा' नवघण 4 (ई.स. 1306-1308)

>> राणजी गोहिल (सेजकजी गोहिल के पुत्र) रा' नवघण के मामा थे, झफरखान के राणपुर पर आक्रमण करने के समय रा' नवघण मामा की सहाय करने गये थे, राणजी गोहिल और रा' नवघण उस युद्ध वीरोचित्त मृत्यु को प्राप्त हुए | ( ये राणपुर का वही युद्ध है जिसमे राणजी गोहिल ने मुस्लिमो की सेना को हराकर भगा दिया था, लेकिन वापिस लौटते समय राणजी के ध्वज को सैनिक ने नीचे रख दिया और वहा महल के उपर से रानीयो ने ध्वज को नीचे गीरता देख राणजी की मृत्यु समजकर कुवे मे गीरकर जौहर किया ये देख राणजी वापिस अकेले मुस्लिम सेना पर टुट पडे और वीरगति को प्राप्त हुए )


••• रा' महीपाल 3 (ई.स. 1308-1325)

>> सोमनाथ मंदिर की पुनःस्थापना की |


••• रा' खेंगार 4 (ई.स. 1325-1351)

>> सौराष्ट्र मे से मुस्लिम थाणो को खतम किया, दुसरे रजवाडो पर अपना आधिपत्य स्थापित किया |


••• रा' जयसिंह 2 (ई.स. 1351-1373)

>> पाटन से झफरखान ने जुनागढ मे छावनी डाली, रा' को मित्रता के लिये छावनी मे बुलाकर दगे से मारा, रा'जयसिंह ने तंबु मे बैठे झफरखां के 12 सेनापतिओ को मार दिया, उन सेनापतिओ कि कबरे आज जुनागढ मे बाराशहिद की कबरो के नाम से जानी जाती है |


••• रा' महीपाल 4 (ई.स. 1373)

>> झफरखाँ के सुबे को हराकर वापिस जुनागढ जीता, सुलतान से संधि करी |


••• रा' मुक्तसिंहजी (भाई) (ई.स. 1373-1397)

>> रा' महिपाल का छोटा भाई , दुसरा नाम - रा' मोकलसिंह |


••• रा' मांडलिक 2 (ई.स. 1397-1400)

>> अपुत्र मृत्यु |


••• रा' मेंलंगदेव (भाई) (ई.स. 1400-1415)

>> * मांडलिक का छोटा भाई |
* वि.सं. १४६९ ज्येष्ठ सुदी सातम को वंथली के पास जुनागढ और गुजरात की सेना का सामना हुआ, राजपुतो ने मुस्लिमो को काट दिया, सुलतान की हार हुई |
* ईसके बाद अहमदशाह ने खुद आक्रमन करा, राजपुतो ने केसरिया (शाका) किया, राजपुतानीओ ने जौहर किये, रा' के पुत्र जयसिंह ने नजराना देकर सुलतान से संधि की |


••• रा' जयसिंहजी 3 (ई.स.1415-1440)

>> गोपनाथ मंदिर को तोडने अहमदशाह की सेना जब झांझमेर आयी तब झांझमेर वाझा (राठौर) ठाकुरो ने उसका सामना किया, रा'जयसिंह ने भी अपनी सेना सहायार्थे भेजी थी, ईस लडाई मे भी राजपुत मुस्लिमो पर भारी पडे, सुलतान खुद सेना सहित भाग खडा हुआ |


••• रा' महीपाल 5 (भाई) (ई.स.1440-1451)

>> पुत्र मांडलिक को राज सौंपकर संन्यास लेकर गिरनार मे साधना करने चले गये |


••• रा' मांडलिक 3 (ई.स. 1451-1472)

>> * जुनागढ का अंतिम हिन्दु शासक |
* सोमनाथ का जिर्णोद्धार कराया |
* ई.स.1472 मे गुजरात के सुल्तान महमुद शाह (बेगडा) ने जुनागढ पर तीसरी बार आक्रमण किया, जुनागढ की सेना हारी, राजपुतो ने शाका और राजपुतानीयो ने जौहर किये,  दरबारीओ के कहने पर रा'मांडलिक युद्ध से नीकलकर कुछ साथियो के साथ ईडर जाने को निकले ताकी कुछ सहाय प्राप्त कर सुल्तान से वापिस लड शके, सुल्तान को यह बात पता चली, उसने कुछ सेना मांडलिक के पीछे भेजी और सांतली नदी के मेदान मे मांडलिक की मुस्लिमो से लडते हुए मृत्यु हुई |

√√√√√ रा'मांडलिक की मृत्यु के पश्चात जुनागढ हंमेशा के लिये मुस्लिमो के हाथ मे गया, मांडलिक के पुत्र भुपतसिंह के व्यक्तित्व, बहादुरी व रीतभात से प्रभावित हो महमुद ने उनको बगसरा (घेड) की चौरासी गांवो की जागीर दी, जो आज पर्यंत उनके वंशजो के पास है |

* रा'मांडलिक के पुत्र भुपतसिंह और उनके वंशज 'रायजादा' कहलाये, रायजादा मतलब राह/रा' का पुत्र | 


••• रायजादा भुपतसिंह (ई.स. 1471-1505)

>> रायजादा भुपतसिंह के वंशज आज सौराष्ट्र प्रदेश मे रायजादा राजपुत कहलाते है, 

* चुडासमा, सरवैया और रायजादा तीनो एक ही वंश की तीन अलग अलग शाख है | तीनो शाख के राजपुत खुद को भाई मानते है, अलग अलग समय मे जुदा पडने पर भी आज एक साथ रहते है |


> मध्यकालीन समय की दृष्टी से ईतिहास को देखे तो यह समय 'राजपुत शासनकाल' का सुवर्णयुग रहा | समग्र हिन्दुस्तान मे राजकर्ता ख्यातनाम राजपुत राजा ही थे | ईन राजपुत राजाओ मे सौराष्ट्र के प्रसिद्ध और समृद्ध राजकुल मतलब चुडासमा राजकुल, जिसने वंथली, जुनागढ पर करीब 600 साल राज किया, ईसिलिये मध्यकालिन गुजरात के ईतिहास मे चुडासमा राजपुतो का अमुल्य योगदान रहा है ||


==चुडासमा सरवैया रायजादा राजपूतो के गांव==


 ==रायजादा के गांव==

1. सोंदरडा 2. चांदीगढ 3. मोटी धंसारी 
4. पीपली 5. पसवारिया 6. कुकसवाडा
7. रुपावटी 8. मजेवडी 9. चूडी- तणसा के पास
10. भुखी - धोराजी के पास 11. कोयलाणा (लाठीया) 

=== सरवैया के गांव ===

सरवैया (केशवाला गांव भायात) 

1. केशवाला 2. छत्रासा 3. देवचडी 
4. साजडीयाली 5. साणथली 6. वेंकरी 
7. सांढवाया 8. चितल 9. वावडी

सरवैया ( वाळाक के गांव) 

1. हाथसणी 2. देदरडा 3. देपला 
4. कंजरडा 5. राणपरडा 6. राणीगाम 
7. कात्रोडी 8. झडकला 9. पा
10. जेसर 11. चिरोडा 12. सनाला 
13. राजपरा 14. अयावेज 15. चोक
16. रोहीशाळा 17. सातपडा 18. कामरोल
19. सांगाणा 20. छापरी 21. रोजिया 
22. दाठा 23. वालर 24. धाणा
25. वाटलिया 26. सांखडासर 27. पसवी
28. मलकिया 29. शेढावदर

सरवैया के और गांव जो अलग अलग जगह पर हे 

1. नाना मांडवा 2. लोण कोटडा 3. रामोद 
4. भोपलका 6. खांभा ( शिहोर के पास ) 7. विंगाबेर. 8. खेडोई

===चुडासमा के गांव===

🔺जो चुडासमा को उपलेटा-पाटणवाव विस्तार की ओसम की चोराशी राज मे मीली वो लाठीया और बारिया चुडासमा के नाम से जाने गए 

बारिया चुडासमा के गांव 

1. बारिया 2. नवापरा 3. खाखीजालिया 
4. गढाळा 5. केराळा 6. सवेंतरा 
7. नानी वावडी 8. मोटी वावडी 9. झांझभेर 
10. भायावदर 11. कोलकी 

लाठिया चुडासमा के गांव 

1. लाठ 2. भीमोरा 3. लिलाखा 
4. मजीठी 5. तलगणा 6. कुंढेच 
7. निलाखा 

चुडासमा के गांव ( भाल विस्तार, धंधुका ) 

1. तगडी 2. परबडी 3. जसका 
4. अणियारी 5. वागड 6. पीपळी
7. आंबली 8. भडियाद 9. धोलेरा 
10. चेर 11. हेबतपुर 12. वाढेळा 
13. बावलियारी 14. खरड 15. कोठडीया 
16. गांफ 17. रोजका 18. उचडी 
19. सांगासर 20. आकरू 21. कमियाळा
22. सांढिडा 23. बाहडी (बाड़ी) 24. गोरासु 
25. पांची 26. देवगणा 27. सालासर
28. कादिपुर 29. जींजर 30. आंतरिया*
31. पोलारपुर 33. शाहपुर
33. खमीदाणा, जुनावडा मे अब कोइ परिवार नही रहेता

चुडासमा के अन्य गांव 

1. लाठीया खखावी 2. कलाणा 3. चित्रावड 
4. चरेल (मेवासिया चुडासमा) 5. बरडिया



●●●●●●● संदर्भ●●●●●●●●

( गुजराती ग्रंथ)

*  गुजराती मध्यकालीन राजपुत साहित्यनो ईतिहास - ले. दुर्गाशंकर शास्त्री
* सौराष्ट्रनो ईतिहास - ले. शंभुप्रसाद ह. देसाई
* यदुवंश प्रकाश - ले. मावदानजी रत्नु
* दर्शन अने ईतिहास - ले. डो.राजेन्द्रसिंह रायजादा
* चुडासमा राजवंशनी प्रशस्ति कविता - ले. डो.विक्रमसिंह रायजादा
* प्रभास अने सोमनाथ - ले. शंभुप्रसाद देसाई
* सोरठ दर्शन - सं. नवीनचंद्र शास्त्री
* सोमनाथ - ले. रत्नमणीराव भीमराव
* तारीख ए सोरठ - दीवान रणछोडजी
* चक्रवर्ती गुर्जरो - ले. कनैयालाल मुन्शी

(हिन्दी ग्रंथ)

* कहवाट विलास - सं. भाग्यसिंह शेखावत
* रघुवर जस प्रकाश - सीताराम कालस
* मांडलिक काव्य - गंगाधर शास्त्री

(सामयिको की सुची)

* पथिक (खास सौराष्ट्र अंक) (May/June 1971)
* उर्मी नवरचना (1971, 1988, 1989)
* राजपुत समाज दर्पण (August 1990)
* क्षत्रियबंधु (June 1992)
* चित्रलेखा (30/03/1992)

(हस्तप्रतो की सुची)

* सौराष्ट्र युनि., गुजराती भाषा - साहित्य भवन, राजकोट के हस्तप्रतभंडार से...
* बोटाद कवि विजयकरण महेडु के हस्तप्रतसंग्रह से...
* स्व श्री बाणीदानजी बारहठ (धुना) के हस्तप्रतभंडार से...

_/\_ समाप्त _/\_

Monday, December 7, 2015

PRATIHAR MADHAD RAJPUTS

====मडाड प्रतिहार वंश====

भाइयों आज हम इस लेख के माध्यम से आप सभी बंधुओं को विस्तार से एक ऐसे क्षत्रिय वंश की जानकारी देंगे जो सदियों पराक्रमी बलिदानी और शौर्यवान होने के बावजूद भी इतिहासिक शोध की कमियों के चलते उपेक्षित रहा है।

जी हाँ आज हम आपको रघुवंशी प्रतिहारों की एक शाखा , भगवान श्री राम के अनुज श्री लक्षमण के वंशज मडाड राजपूत वंश की जानकारी देगें।

मडाड क्षत्रिय वंश प्रतिहार राजपूत (क्षत्रिय) वंश की ही एक शाखा है जिसका उद्धव रघुवंशी राजा श्रीरामचंद्र जी के अनुज  लक्षमण जी के वंश से हुआ। क्षत्रिय प्रतिहारों के घटियाला मंडोर ग्वालियर शिलालेखों/प्रशस्ति/ताम्रपत्रों से भी यह ज्ञात (इन शिलालेखों में यह अंकित है) होता है के प्रतिहार राजपूत भगवान श्री राम के अनुज लक्षमण के वंशज और रघुवंशी है।

" कैथल चंदैनो जीतियो, रोपी ढिंग ढिंग राड़।
नरदक धरा राजवी, मानवे मोड़ मडाड।।"


गोत्र : भारद्वाज 
प्रवर: भारद्वाज, बृहस्पति , अंगिरस 
वेद: सामवेद
कुलदेवी: चामुंडा
कुलदेव: विष्णु
पक्षी: गरुड़
वृक्ष: सिरिस
प्रमुख गद्दी: कलायत
विरुद: मानवै मोड़ मडाड ( सबसे बड़े मडाड)
आदि पुरुष: लक्ष्मण
पवित्र नदी: गंगा
वर्तमान निवास---करनाल,कुरुक्षेत्र,जीन्द,अम्बाला,पटियाला,रोपड़,सहारनपुर,रूडकी आदि में मिलते हैं हरियाणा से विस्थापित मुस्लिम मड़ाड राजपूत पाकिस्तान में बड़ी संख्या में मिलते हैं जो अपने कुल पर आज भी गर्व करते हैं 

==== मडाड प्रतिहारों की अभिन्न शाखा ====


भाटों की पोथियों और नवीन शोध के अनुसार मंढाड़ और बडगुजर दोनों ही प्रतिहार राजपूत वंश की शाखाएँ हैं। इनके रेकॉर्डस के अनुसार प्रतिहारों के दो राजा आज के राजस्थान और मध्यप्रदेश के इलाके से विस्थापित हो कर उत्तर में राज्य स्थापित करने आए जिनमे से मंढाड़ उत्तर में ही बसे रहे और खडाड विस्थापित हो कर वापिस दक्षिण दिशा की और चले गए। यह घटना 10वीं शताब्दी के आस पास की मानी गयी है।

राजस्थान में गुर्जरा इलाके से अलवर आकर बसे प्रतिहारों को बड़गुर्जर प्रतिहार कहा गया जिन्होंने 9 वीं शताब्दी के आस पास यहाँ शाशन जमाया। बड़गुर्जरों के राज्य के समीप उत्तर में बसे मडाड़ो को इस कारण भूल वष बड़गुर्जरों से अलग हुई शाखा माना जाने लगा। परंतु मडाड़ो पर किये गए नए इतिहासिक शोधों से पता चलता है की यह शाखा प्रतिहारों से निकलकर बड़गुर्जरों से पहले ही अस्तित्व में आ गयी थी जिसका प्रमाण राजस्थान के मेवाड़ इलाके में सिरोही जिले की रेवदर तहसील में मिले मंढाड़ प्रतिहारों के शिलालेख हैं। यह शिलालेख 11 वीं शताब्दी के आसपास केे सिद्ध होतें है। यहां पाये गए शिलालेखों और लोक परम्पराओं से यह भी सिद्ध हो जाता है के मडाड प्रतिहार नामक राजा ने 11 वीं शताब्दी से बहुत पहले ही यहाँ शाशन किया और अपनी जागीर जमाई।

प्रतिहारों को रघुकुली होंने का समर्थन सन् 973 ईसवीं का शाकम्भरी चाहमान सम्राट विग्रहराज २ का हर्ष शिलालेख भी करता है जिसमें स्पष्ट अंकित है।

सम्राट मिहिर भोज के पुत्र महेन्द्रपाल देव कनौज के शाशक बने। काव्य मीमांसा का रचियता राजशेखर इस सम्राट का गुरु था। इसने अपनी प्रसिद्ध कृति 'कर्पूर मंजरी' में महेन्द्रपाल को निर्भयराज और रघुकुल चूड़ामणि लिखा है यानि रघुकुल के नायक कहा....

7 वीं - 10 वीं शताब्दी को भारत में स्वर्णिम प्रतिहार काल माना जाता है। इस समय प्रतिहारों ने समस्त उत्तर भारत पर शाशन जमाया और आर्यव्रत के सम्राट बने। इस दौरान चौहान परमार राष्ट्रकूट जैसे कई क्षत्रिय कुलों ने प्रतिहारों का अधिपत्य स्वीकार किया और इनके अधीन रहे।इस दौरान नागभट, मिहिरभोज, वत्सराज, महेन्द्रपाल आदि प्रतिहार राजाओं ने पहले अवन्ती,फिर गुर्जरो को उनके प्रदेश से खदेड़कर जालौर भीनमाल में और उसके बाद कन्नौज में राजधानी जमाकर पूरे उत्तर भारत पर शासन किया...

प्रतिहार वंश में अवन्ती उज्जैनी के शासक महान नागभट्ट-1 प्रतिहार हुए जिन्होंने गल्लका लेख के अनुसार गुर्जरों को गुर्जरा देश से खदेड़ा और वहाँ अपना शाशन जमाया व गुर्जरा नरेश कहलाए।

सम्राट मिहिर भोज महान के काल ( सन 836 - 888 ईस्वीं ) के दौरान प्रतिहारों का राज्य समस्त उत्तर भारत में और अफ़ग़ानिस्तान से लेकर बंगाल तक तथा दक्षिण में कोंकण तक फैला। इस दौरान कन्नौज प्रतिहारों की राजधानी थी।

इसी महान कुल की एक शाखा है मडाड/ मुंढाड़ प्रतिहार क्षत्रिय राजपूत वंश।

मडाड राजपूत मध्य और उत्तर हरयाणा के जींद पानीपत करनाल कैथल अम्बाला आदि जिलों के 80 गाँवों में निवास करते हैं। कभी हरयाणा प्रदेश में इनका राज्य यमुना नदी से लेकर घग्गर नदी तक सम्पूर्ण मध्य और उत्तर हरयाणा में फैला हुआ था जिसके पूर्व में पुण्डीर और चौहान पश्चिम में और दक्षिण में तंवर और उत्तर में भाटी क्षत्रियों के राज्य थे। आजादी के समय तक मंडाड़ राजपूत इस इलाके के 360 गाँवों में निवास करते थे। अफ़ग़ानों मुग़लों और अंग्रेजो के ताज से इस वंश के इस महान क्षत्रिय वंश ने जम कर लगातार लोहा लिया और निरंतर संघर्ष किया जिसका विवरण हम अगले भाग में देंगे।

संभवत: जिस खडाड वंशी प्रतिहार क्षत्रियों का उल्लेख भाट करते हैं वह आज के बड़गुर्जर क्षत्रिय ही हैं जिन्हें खडावत भी कहा जाता है।
कुछ इतिहासकार मड़ाड वंश को बडगुजर राजपूतों की शाखा बताते हैं और बडगुजर राजपूतों को श्रीराम के पुत्र लव की संतान और गहलौत राजपूतो का भाईबंद बताते हैं बताते हैं किन्तु हरियाणा के मड़ाड राजपूतों में लग्न/शुभ कार्यों में मड़ाड गोत्रे लक्ष्मण गोत्रे का उच्चारण होता है,ग्वालियर की भोज प्रशस्ति और घटियाला शिलालेख के अनुसार प्रतिहार लक्ष्मण के वंशज हैं तथा राजौरगढ़ के शिलालेख से स्वयम बडगुजर वंश भी प्रतिहार वंश की शाखा सिद्ध होता है,इसके अतिरिक्त नवीन शोध से सिद्ध हो गया है कि स्वयम गहलौत वंश भी लव की बजाय कुश का वंशज है,
ब्रिटिश गजेटियर में भी उल्लेख है कि बडगुजर,परिहार(प्रतिहार),मड़ाड,सिकरवार वंश आपस में शादी ब्याह नहीं करते और स्वयम को भाई मानते हैं यह परम्परा और जनविश्वास डेढ़ सदी से पहले भी था,
इससे सिद्ध होता है कि रघुवंशी लक्ष्मण के वंश में प्रतिहार (परिहार) क्षत्रिय हुए और बडगुजर सिकरवार मड़ाड आदि उन्ही की शाखाएँ थी.......

मड़ाड वंश प्रतिहार राजपूतों से कैसे अलग हुआ------

लोकपरंपरा जिसका समर्थन शिलालेख भी करते हैं की प्रतिहार क्षत्रिय कुल में मडाड नामक एक प्रभावशाली वीर राजा हुआ जिसकी जागीर का  विस्तार आबू से पश्चिम जीरापल्ली तक था।

इसने अपने नाम से सुकड़ी नदी के किनारे पहाड़ी की तलहटी में एक गाँव बसाया और यहीं से अपना शाशन किया।लोक परम्परा में आये उन स्थानों की पहचान आज भी आसानी से की जा सकती है। जीरापल्ली ही आज का विश्व प्रसिद्ध जैन तीर्थ जीरावला है जो दिलवाड़ा से 32 किमी पश्चिम में स्थित है।
मडाड प्रतिहार के शिलालेखों में उसके राज्य का जो विस्तार बताया गया है उनमें वरमान और कुसमा के क्षेत्र भी सम्मिलित थे जो अपने सूर्य मंदिरों और जैन महावीर स्वामी के भव्य मंदिर के लिए पूरे भारतवर्ष में प्रसिद्ध है।
वरमान और कुसमा प्रतिहार क्षत्रियों के निवास स्थान आदि काल से रहें है । कुसमा से ही राजिल के भाई सत्यभट्ट का एक शिल्लालेख प्राप्त हुआ है जो सन् 636-37 का है।

मडाड क्षेत्र से 7 किमी की दुरी पर ही वर्माण सूर्य मंदिर स्तिथ है जिसका निर्माण नाहड़ देव(नागभट्ट द्वितीय) प्रतिहार ने करवाया। यही नहीं इन्होंने सांचोर के प्रसिद्ध महावीर स्वामी जैन मंदिर का भी निर्माण करवाया था।

प्रतिहार सम्राट महिपाल देव 910-30 ईस्वीं के पश्चात विनायक पाल देव के समय जब प्रतिहार सत्ता का कमशः पतन होने लगा तब ऐसा ज्ञात होता है इन मंदिरों पर राजकीय संरक्षण ढीला पद गया तब प्रतिहार सोहाप मडाड ने इस मंदिर के रखरखाव के लिए व  पूजा पाठ के लिए दो गांव दान में दिए थे।(Archeological survey of India; सन 1917 पृष्ठ 72)
इसी प्रकार सन 1029 ईस्वीं के शिलालेखों से ज्ञात होता है की परमार राजा पूर्णपाल के समय में प्रतिहार सारम मडाड के पुत्र नौचक ने इस मंदिर का जीर्णोदार सन् 1099 में करवाया था। (श्री गौरी शंकर ओझा ; सिरोही राज्य का इतिहास पृष्ठ 274)

यही नहीं डॉक्टर के सी जैन; Ancient Cities and Towns of Rajasthan पृष्ठ 274 के अनुसार सन् 1299 में चंद्रावती के परमार राजा विक्रम सिंह के समय प्रतिहार राज बिन्नद मडाड की रानी ललिता देवी ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
वर्माण के पास ही में 11 वीं शताब्दी के आरंभिक काल में यहाँ के श्रावकों ने  मडाड राजपूतों की सहायता से महावीर स्वामी का भव्य मंदिर बनवाया। सन 1294 में पद्मसिंह मडाड ने इसी मंदिर पर दो जैन मूर्तियां भेंट की थी।

ऊपर लिखित सभी सबूतों से यह ज्यात होता है की परमेश्वर परम भट्टारक महाराजाधिराज नाहड़राव (नागभट्ट द्वितीय) के समय प्रतिहार क्षत्रिय मडाड नाम के व्यक्ति ने आबू के पश्चिम संभाग पर अपना अमल जमाया और वहीं अपने नाम की बस्ती बसा कर उसे अपना प्रशानिक केंद्र बनाया। उस समय प्रतिहारों की सत्ता शिखर पर थी। महाप्रतापी नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल से मुंगेर में युद्ध किया था। इस प्रकार उनके समय में ही प्रतिहारों की राजधानी जालौर अवंती होती हुई कन्नौज स्थापित हुई जो उस समय भारत की एक प्रमुख राजधानी के रूप में विख्यात थी। सम्राट मिहिर भोज के शाशन के दौरान प्रतिहारों का सम्राज्य चारों और दूर दूर तक फैला जो एक प्रकार का महासाम्राज्य ही था।

सन 1037-38 ईस्वीं के आसपास कनौज के प्रतिहार सत्ता का पतन होते ही सम्पूर्ण सम्राज्य छिन्न भिन्न होकर इनके सामन्तों के बीच बिखर गया। यह सत्य है के प्रतिहारों की सत्ता पर मर्मान्तक चोट महमूद गजनवी ने ही 1018 ईस्वी में की थी; परन्तु इनकी सत्ता का विनाश का वास्तविक कारण प्रतिहारों के सामंतों को स्वेच्छा चारिता के साथ उनका महत्वकांशी होना भी था।
10 वीं शताब्दी में ही जेजाक भुक्ति के चांदेल यशोवर्मन के नेतृत्व में स्वतन्त्र हो चुके थे, शाकुम्भरी के चौहान स्वतन्त्र होने की राह पर थे, गुहिलो ने प्रतिहारों से पिंड छुड़ा लिया था और चालुक्य तो सन 941 ईस्वी से ही स्वतंत्रता का आनंद ले रहे थे। राष्ट्रकूट और परमार नई ताकत बन कर उभर रहे थे ।

धीरे धीरे जिन कुलों पर कभी प्रतिहार शाशन किया करते थे वक्त के फेर ने उन्हें उनका सामन्त बना के छोड़ दिया।मडाड का राज्य हमेशा अर्बुद मंडल के अंतर्गत रहता आया था और परमारों के बंदरबांट में भी यह आबू और चन्द्रावती के अंतर्गत शाशित होता रहा। परमार जो कभी मडाडो के पूर्वजों के सामंत रहे थे उन्हीं परमारों के शाशन के अंतर्गत मडाड प्रतिहार जागीरदार हो गए।

परमार राजा पूर्णपाल जिनका उल्लेख पहले भी किया गया है के समय का एक शिलालेख गोडवाड़ जिला पाली के भांडूड की एक बावड़ी से प्राप्त हुआ है जो सन 1046 का है। इस शिलालेख को स्थापित करने वाला व्यक्ति रघुवंशी था ऐसा लिखा हुआ है। निःसंदेह यह पुरुष प्रतिहार वंशी ही रहा होगा। रघुवंशी पदवी धारण करने का दावा करने वाला गुर्जरत्रा और आज के राजस्थान में सिर्फ यही मात्र क्षत्रिय राजवंश है जिसके अनेकों प्रमाण पुष्ट किये जा चुकें हैं। इन लेखों के अनुसार ऐसा ज्ञात होता है के पूर्णपाल परमार के समय मडाड राज्य काफी प्रभावशाली हो चूका था। भांडूड के अभिलेखों से यह ज्ञात होता है गोडवाड़ के इस क्षेत्र जिसमें नाना से मोरिबेड़ा, विजयपुर, सेवाड़ी, लुणावा, कोट , मुंडरा, मडाड (आज का माडा जो सादड़ी से 2 किमी उत्तर) तक के भूभाग  पर प्रतिहार वंश के मडाड बसे हुए थे।

==== मडाडों का गोडवाड़ से हरियाणा की ओर पलायन का सफर ====

जिस समय का इतिहास यहां बताया गया उस समय अर्बुद मंडल और गोडवाड़ का सारा क्षेत्र युद्ध का अखाड़ा बना हुआ था। उस समय सत्ता विस्तार के लिए जो शक्तियां यहां सक्रिय थीं उनमें नाडोल के चौहान, अनहिलपाटन के चालुक्य, अर्बुद मंडल के परमार, हस्तिकुण्ड के राष्ट्रकूट और नागदा और आहड़ के गोहिल थे। उस समय प्रतिहार अपने अस्तित्व के लिए झुझ रहे थे और यह क्षेत्र रण क्षेत्र में तबदील हो चूका था।

अतः चारों और से विपत्तियों से झूझते हुए मडाड प्रतिहारों को अर्बुद मंडल छोड़ कर बसंतगढ़ होते हुए अरावली का पश्चिम किनारा पकड़ कर उत्तर की ओर प्रयाण किया और विंध्य पर्वत की तलहटी पहुंचे। और वहीं डेरा डाला । क्योंकि इसके पूर्व इनके ही पूर्वज 25-30 वर्ष पहले यहाँ बस चुके थे। वहाँ पहुचने पर पहले ही बसे हुए चंदेलों से विवाद प्रारम्भ कर दिया और खुनी संघर्ष जारी कर उन्हें प्रारस्त कर के उस भूमि पर अपना अधिकार कर लिया। आज भी माडा गांव के पास चंदेलों का तलाब इस घटना की मूक साक्षी दे रहा है। इस तालाब के पास ही मडाडों ने शिव मंदिर बनवाया। समय में फेर से इन्हें यहाँ से भी विस्थापित होना पड़ा, आज इस गांव में राजपुरोहितों की बस्ती है।

सादड़ी से फालना जाने वाले मार्ग पर सादड़ी से लगभग 7 किमी पश्चिम में मुण्डाड नामक एक प्राचीन गांव भी इन्हीं मडाडों ने बसाया जिसका उल्लेख कीर्तिपाल के ताम्रशाशन पत्राभिलेख में आया हुआ है।( एपिग्राफिक इंडिका भाग 9 पृष्ठ 148)

इससे पहले दसवीं शताब्दी में जब गुजरात की सेनाओं ने माउन्ट आबू के पश्चिमी सम्भाग को लूट कर प्रत्येक गांव को उजाड़ दिया उसी समय मडाडों के साथ लुनावत शाखा के प्रतिहारों ने भी गोडवाड़ आकर आप्रवासन किया। जहाँ मडाडों ने अपने पूर्वज के नाम मडाड गाँव बसाया और इससे थोड़ी ही दूर रणकपुर के उत्तर पश्चिम में लूणा के वंशजों ने लुणावा नामक गाँव आबाद किया।
सन 1196 में इस इलाके में कुतुबुद्दीन और राजपूतों की सेना के बीच भयंकर युद्ध हुआ जिसमे राजपूत परास्त हुये। इस युद्ध में नाडोल के चौहानों की शक्ति पूरी तरह भंग हो गई और मडाडों और लुनावतों को अपना निवास छोड़ना पड़ा।

विस्थापित हुए मडाड मेड़ता होते हुए मंडोर के आस पास दुबारा बसने लगे परंतु अल्तमश ने 1226 में मंडोर पर हमला कर पूरे मारवाड़ को ध्वस्त कर दिया।

मडाडों पर विपत्ति के ऊपर विपत्ति आ रहीं थी परंतु उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और अल्तमश द्वारा पराजित होने के बावजूद भी इन्होंने कोई समझौता नहीं किया और मारवाड़ छोड़ उत्तर की ओर पलायन किया।
मडाड आज के शेखावाटी और भटनेर होते हुये उत्तर मध्य हरयाणा और दक्षिण पंजाब के मालवा के इलाके में आ बसे।

प्रतिहारो की मडाड शाखा बहूत ही हठी जिद्दी दृढ़ प्रतिज्ञ जाती रही है। इस प्रकार अलप समय में ही विस्थापन की सारी पीड़ा भूलकर ये जाति सल्तनत काल में एक अभिनव इतिहास रचने के लिए उठ खड़ी हुईं और पूरी तरह संगठित होकर दिल्ली के सुल्तानों के फरमानों का बहिष्कार विद्रोह और तुर्कों की धन सम्पति लूटने का प्रयास आरम्भ कर दिया।

इस क्षेत्र में मडाड ,चौहान, वराह, भाटी, और मिन्हास,पुण्डीर आदि प्राचीन क्षत्रिय जातियों ने अपनी सुरक्षा के लिये दिल्ली सल्तनत के  खिलाफ एक संघ या मंडल का संगठन बना लिया और इस शक्ति से वे बार बार सुल्तान को चुनौती देने लगे।

इस पश्चात मडाडों का राज्य राजा साढ देव मडाड के शाशन में आज के दक्षिण पानीपत जिले से लेकर उत्तर में कैथल जिले पूर्व में यमुना खादर नरदक से लेकर पश्चिम में भिवानी की सीमाओं तक फैला। मुडाडो के प्रशानिक केंद्र जींद कलायत राजौंद और घरौंडा बने और इन्हें नरदक धरा के राजवी कहा जाने लगा:

" कैथल चैंदेनों जीतियो, रोपी ढिंग ढिंग राड़।
नरदक धरा का राजवी, मानवे मोड़ मडाड।।"
 भाटों की बहियों और इलाके में प्रचलित मान्यता के अनुसार मडाड राजा जन जी कामा पहाड़ी (बांदीकुई और बयाना के बीच)राजस्थान से अपने परिवार सहित थानेसर में तीर्थ करने के लिए आये लौटते समय उनकी रानी को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई जिसका नाम जिंद्र रखा गया। राजा जन ने यहीं बस कर राज्य करने का संकल्प लिया और जोहिया (यौधेय) राजपूतो से यह इलाका जीत लिया.आगे चल कर जिंद्र ने यहां जींद नामक नगर बसाया और वहाँ से अपना शाशन किया।

इन्होने चंदेल और परमार राजपूतों को 
इस इलाके से हराकर निकाल दिया और घग्गर नदी से यमुना नदी तक राज्य स्थापित किया। चंदेल उत्तर में 
शिवालिक पहाड़ियों की तराई में जा बसे।यहां इन्होने नालागढ़ (पंजाब) और रामगढ़ पंचकुला ,हरयाणा) राज्य 
बसाये ).वराह परमार राजपूत सालवन क्षेत्र छोडकर घग्घर नदी के पार पटियाला जा बसे। जींद ब्राह्मणों को दान 
देने के बाद मंढाडो ने कैथल के पास कलायत में राजधानी बसाई व घरौंदा ,सफीदों ,राजौंद और असंध में ठिकाने
बनाये।मंडाड राजपूतो का कई बार पुंडीर राज्य से संघर्ष हुआ पर उन्हें सफलता नहीं मिली.,किन्तु बाद में 
नीमराना के राणा हर राय देव चौहान और पुण्डीर राजपूतों के बीच हुए संघर्ष में इन्होने चौहानों का साथ देकर 
पुण्डीर राजपूतों को भी यहाँ से निकाल दिया,जो यमुना पार कर आज के सहारनपुर हरिद्वार इलाके में चले गये.
संभवत इस इलाके में उस समय सम्राट हर्षवर्धन बैस के वंश के बैस राजपूत भी थानेश्वर के आसपास रहते थे उन्हें भी मड़ाड राजपूतों ने वहां से विस्थापित किया और बैस राजपूत पंजाब और कश्मीर की और चले गये,बाकि बैस पहले ही सम्राट हर्षवर्धन के साथ कन्नौज और अवध के इलाके में चले गये थे ..

किन्तु यहाँ प्रश्न पैदा होता है कि जब गोडवाड क्षेत्र में मड़ाड प्रतिहारों के साक्ष्य इन्हें 12 वी सदी तक वहां स्थापित करते हैं तो ये दसवी सदी में पुण्डीरो के विरुद्ध राणा हर राय चौहान का साथ देने हरियाणा क्षेत्र में कैसे उपस्थित थे???

इसके अलावा कई साक्ष्य और जनश्रुतियां बताते हैं कि मड़ाड राजपूतों द्वारा जीन्द की स्थापना विक्रम संवत 891 में की गयी थी तथा ११३१ ईस्वी में इनके द्वारा सालवन क्षेत्र से वराह परमारों को हराकर राज्य स्थापित किया था,जबकि ये उसके बाद भी गोडवाड इलाके में थे.........

इससे प्रतीत होता है कि इन मड़ाड प्रतिहारों की एक शाखा पहले ही गोडवाड क्षेत्र से कामा पहाड़ी(बांदीकुई और बयाना के बीच) में आ चुकी थी 
और इन्ही में से राजा जन 9 वी सदी के आसपास कुरुक्षेत्र/जीन्द इलाके में आए थे,,
12 वी सदी के बाद में समस्त मड़ाड राजपूत राजपूताना छोडकर हरियाणा में अपने भाई बांधवों के साथ स्थापित हो गए....

श्री ईश्वर सिंह मड़ाड कृत राजपूत वंशावली के अनुसार---

राजा जन ने जोहिया राजपूतो को जीन्द इलाके से हटाकर कब्जा कर लिया,उनके पुत्र जिन्द्र ने यहाँ विक्रम संवत 891 में जीन्द की स्थापना की,जिन्द्रा के भाई लाखा ने लाखौरी नगर बसाया जिसे बाद में आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया.जिन्द्रा का पुत्र बाफरा,बाफरा का पुत्र सलान और सलान का सिंधारा हुआ,सिन्धारे के पुत्र साढ्देव ने जीन्द को ब्राह्मणों को दान दे दिया और कोलायत को नई राजधानी बनाया,इसके बाद मड़ाडो ने चंदेलो से 7 दुर्ग जीतकर घघ्हर से यमुना नदी तक 360 गाँवो पर अपना अधिकार कर लिया,

महाराजा साढ़देव के 3 पुत्र थे जिनमे राज बंट गया ,मामराज को घरौंडा,कालू को कलायत,और कल्लू को शिलोखेडी मुख्यालय मिला,
कालू के पुत्र गुरखा ने असंध सालवन सफीदों से वराह परमार राजपूतों को निकाल दिया वराह राजपूत अब पंजाब के पटियाला और लुधियाना में मिलते हैं,,

फिरोजशाह तुगलक ने प्रबल आक्रमण कर इस रियासत का अंत कर दिया..............


मुंढाड राजपूतो ने सल्तनत काल में तैमूर का डटकर सामना किया,बाबर के समय मोहन सिंह मुंढाड ने इसी 
परम्परा को आगे बढ़ाया.समय समय पर ये महाराणा मेवाड़ की और से भी मुगलो के खिलाफ लड़े।
जोधपुर के बालक राजा अजीत सिंह राठौर को ओरंगजेब से बचाकर ले जाने में इन्होने दुर्गादास राठौर का सहयोग किया।अंग्रेजो के खिलाफ भी इन्होंने जमकर लोहा लिया।
तभी इनके बारे में कहा जाता है,,
"मुगल हो या गोरे,लड़े मुंढाडो के छोरे"।

धर्म परिवर्तन ने इस वंश को बहुत सीमित कर दिया।हरियाणा में अधिकांश राजपूतो द्वारा इस्लाम धर्म ग्रहण
कर लिया और विभाजन के बाद मुस्लिम राजपूत रांघड पाकिस्तान चले गए।जिससे हरियाणा में राजपूतो की 
संख्या बेहद कम हो गयी और जो हरियाणा राजपूतो का गढ़ था वो आज जाटलैंड बन गया है।
अब मुंढाड राजपूत वंश हरियाणा के 80 गांव में बसता है। 

अन्य जातियों में मुंढाड वंश-----

कुछ मुंढाड राजपूतो द्वारा दूसरी जातियों की स्त्रियों से विवाह के कारण उनकी सन्तान वर्णसनकर होकर दूसरी
जातियों में मिल गए।धुल मंधान जाट इन्ही मुंढाड/मड़ाड प्रतिहार राजपूतो के वंशज हैं इसी प्रकार गूजर और 
अहिरो में भी मडाड वंश मिलता है। 

इस वंश के अगली पोस्ट में हम मडाड राजपूतों के दिल्ली सल्तनत और मुग़लों से चलने वाले संघर्षों के बारे में जानकारी देंगे। कैसे इस वीर वंश के लोगों ने सुल्तानों मुग़लों से लेकर अपनी भूमि की रक्षा के लिए लगतार संघर्ष किया। बार बार सब कुछ लुटवा कर भी कभी खो नहीं मानी और किसी भी तरह का समझौता नहीं किया।

इनकी इसी दृढ़ता और वीरता के जज्बे के किया यहाँ एक कहावत कहि जाती है
" चाहे मलेछ हो या गोरे खूब लड़े मडाडों के छोरे।।"
सन्दर्भ---
1-श्री देवी सिंह मुंडावा कृत राजपूत शाखाओ का इतिहास पृष्ठ संख्या 121-185
2-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंशो का इतिहास पृष्ठ संख्या 225-237,378-380
3-श्री ईश्वर सिंह मड़ाड कृत राजपूत वंशावली पृष्ठ संख्या 83-96
4-(Archeological survey of India; सन 1917 पृष्ठ 72)
5-(श्री गौरी शंकर ओझा ; सिरोही राज्य का इतिहास पृष्ठ 274)
6-डॉक्टर के सी जैन; Ancient Cities and Towns of Rajasthan पृष्ठ 274
7-श्री त्रिलोक सिंह धाकरे कृत राजपूतो की वंशावली एवं इतिहास महागाथा पृष्ठ संख्या 57-95
8-डॉक्टर रमेश चन्द गुनार्थी कृत राजस्थानी जातियों की खोज पृष्ठ संख्या 80
9-करनाल डिस्ट्रिक्ट गजेटियर पैरा 144 पृष्ठ संख्या 114
10-श्री विन्ध्यराज चौहान कृत "प्रतिहार" भारत के प्रहरी
11-Sharma, Shanta Rani (2012). "Exploding the Myth of the Gūjara Identity of the Imperial Pratihāras". Indian Historical Review 39 (1): 1–10. doi:10.1177/0376983612449525.
12- एपिग्राफिक इंडिका भाग 9 पृष्ठ 148)
13-http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/12/pratihar-madhad-rajputs.html


Wednesday, November 25, 2015

ब्रिगेडियर (retiered) गोविन्द सिंह सिसोदिया(Brigadier Govind singh sisodiya,the hero of 26/11 mumbai terrorist attack)

===#26/11 मुम्बई पर आतंकवादी हमलों में भारतीय कमांडो ऑपरेशन के अगुवा ब्रिगेडियर (retiered) गोविन्द सिंह सिसोदिया===

आज #26/11 मुम्बई में आतंकवादी हमलों की पुण्यतिथि होने के मौके पर यह पोस्ट 26/11 के हमलों के खिलाफ भारतीय एनएसजी कमांडो की जवाबी कार्यवाही को लीड करने वाले ब्रिगेडियर गोविन्द सिंह सिसोदिया और इस हमले में शहीद होने वाले वीर जवानो के नाम----
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जीवन परिचय---

ब्रिगेडियर गोविंद सिंह सिसोदिया का जन्म हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के चौपाल कसबे के भरनो गांव में हुआ था।
ब्रिगेडियर सिसोदिया अपने परिवार में चार भाइयो में से सबसे छोटे है। इनके पिता का नाम शेर सिंह सिसोदिया था जो राजस्व सेवा में अधिकारी थे।इनके बड़े भाई के एस सिसोदिया पुलिस में डीआईजी पद से रिटायर हुए।दूसरे भाई आईएस सिसोदिया आर्मी में कर्नल पद से रिटायर हुए।जिससे पता चलता है कि यह परिवार शुरू से उच्च शिक्षित और प्रतिभाशाली रहा है।

शिक्षा और बेजोड़ सैन्य सेवा-----

ब्रिगेडियर सिसोदिया ने हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर के गवर्नमेंट विजय हाई स्कूल से बचपन में शिक्षा प्राप्त की। सन् 1975 में भारतीय सेना ज्वाइन करने से पहले इन्होंने S D College, Shimla से उच्च शिक्षा प्राप्त की।सन 1975 में इन्हें 16 सिख रेजिमेंट में नियुक्ति प्राप्त हुई। बाद में इन्होंने 19 और 20 सिख रेजिमेंट का नेतृत्व भी किया।

सन् 1987 में भारतीय सेना के श्रीलंका में शांति स्थापना के अभ्यान में इन्होंने वीरता से भाग लिया तथा एक आतंकवादी हमले के दौरान यह गोली लगने ले कारण घायल भी हुए थे।
बाद में इन्होंने कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेना के कई ऑपरेशनो में हिस्सा लिया। ब्रिगेडियर सिसोदिया ने करीब 35 साल भारतीय सेना को देकर देश की सेवा की।
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26/11/2008 को मुम्बई पर पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा हमला-----
मुंबई पर 26 नवंबर 2008 के हमलों को भला कौन भूल सकता है. किस तरह 10 हमलावरों ने मुंबई को ख़ून से रंग दिया था. हमलों में 160 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, कई घायल हुए थे.

रात के तक़रीबन साढ़े नौ बजे मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर गोलीबारी की ख़बर मिली. मुंबई के इस ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन के मेन हॉल में दो हमलावर घुसे और अंधाधुंध फ़ायरिंग शुरू कर दी. इनमें एक मुहम्मद अजमल क़साब था जो हमलों के दौरान गिरफ्तार इकलौता हमलावर है. दोनों के हाथ में एके47 राइफ़लें थीं और पंद्रह मिनट में ही उन्होंने 52 लोगों को मौत के घाट उतार दिया और 109 को ज़ख़्मी कर दिया.

लेकिन आतंक का यह खेल सिर्फ़ शिवाजी टर्मिनस तक सीमित न था. दक्षिणी मुंबई का लियोपोल्ड कैफ़े भी उन चंद जगहों में था जो तीन दिन तक चले इस हमले के शुरुआती निशाने थे. यह मुंबई के नामचीन रेस्त्रांओं में से एक है, इसलिए वहां हुई गोलीबारी में मारे गए 10 लोगों में कई विदेशी भी शामिल थे जबकि बहुत से घायल भी हुए. 1871 से मेहमानों की ख़ातिरदारी कर रहे लियोपोल्ड कैफ़े की दीवारों में धंसी गोलियां हमले के निशान छोड़ गईं. 10 :40 बजे विले पारले इलाक़े में एक टैक्सी को बम से उड़ाने की ख़बर मिली जिसमें ड्राइवर और एक यात्री मारा गया, तो इससे पंद्रह बीस मिनट पहले बोरीबंदर में इसी तरह के धमाके में एक टैक्सी ड्राइवर और दो यात्रियों की जानें जा चुकी थीं. तकरीबन 15 घायल भी हुए.

लेकिन आतंक की कहानी यही ख़त्म हो जाती तो शायद दुनिया मुंबई हमलों से उतना न दहलती. 26/11 के तीन बड़े मोर्चे थे मुंबई का ताज होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट होटल और नरीमन हाउस. जब हमला हुआ तो ताज में 450 और ओबेरॉय में 380 मेहमान मौजूद थे. ख़ासतौर से ताज होटेल की इमारत से निकलता धुंआ तो बाद में हमलों की पहचान बन गया.

मुम्बई एटीएस के हेमन्त करकरे,विजय सालस्कर आदि कई अधिकारी और जवान इन हमलो में शहीद हो गए।तब जाकर नेशनल सेक्यूरिटी गार्ड (N.S.G)के कमांडो को दिल्ली से बुलवाया गया जिनका नेतृत्व कर रहे थे उस समय NSG के DIG गोविन्द सिंह सिसोदिया जी जिन्होंने अपने जवानो के दम पर इस ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। एन एस जी के जवाबी हमलों के परिपाटी इन्होंने ही तैयार की जिस कारण भारतीय सेना आतंकवाद के इस घिनोने कृत्य का मुँह तोड़ जवाब दे पाई और विजय हुई। ब्रिगेडियर सिसोदिया 26/11 के मुम्बई हमलों के दौरान भारतीय सेना के नायक थे। तथा होटल ताज ओबेरॉय और नरीमन पॉइंट से आतंकवादियों का सफाया इनके जिम्मे था।

ब्रिगेडियर जवाबी कार्यवाही के दिन को याद करते हुए बतातें है की इन हमलों की जवाबी कार्यवाही में सबसे बड़ी चुनौती यह थी की आम जन मानस को कोई क्षति ना पहुचाते हुए दुश्मन का सफाया हो जाये।
इस चुनोती में भारतीय सेना की कार्य वाही सफल भी रही और किसी आम जन को जवाबी कार्य वाही में क्षति नहीं पहुची और अजमल कसाब को छोड़कर सभी आतंकी मारे गए।परन्तु भारतीय सेना ने दो अनमोल जवान गवां दिए। जवाबी हमलों में शहीद हुए अपनी टीम के सदस्यों मेजर उन्नीकृष्णन और गजेन्द्र सिंह को आज भी याद करते हुए इन्हें बहुत दुःख होता है और साथ में ही उनपर गर्व भी होता है।

मुंबई हमले में कई वीर सपूतों को हमने खो दिया। इस हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। यह हमला सिर्फ मुंबई पर न होकर देश पर हमला था। 26-28 नवंबर तक रात दिन चली मुठभेड़ के बाद गोविन्द सिंह सिसोदिया जी के नेतृत्व में कमांडो ने आतंकियों को मार गिराया गया और एक को जिंदा पकड़ लिया गया। इस एकमात्र आतंकी अजमल कसाब को बाद में पुणे की जेल में फांसी दे दी गई।
अजमल कसाब से सिसोदिया जी ने कड़ी पूछताछ भी की थी जिसमे कई राज उजागर हुए थे।इस जीवित पकड़े गए आतंकी की वजह से ही भारत पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय जगत में शर्मिंदा कर पाया था।

इन्हें 26/11 के हमले के खिलाफ सफल अभ्यान के लिए सेना का वशिष्ठ सेवा मेडल और चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ प्रशंसनीय कार्ड ऑपरेशन रक्षक जम्मू कश्मीर के लिये से नवाजा गया।

समस्त आर्यव्रत और राजपूत समाज को आज अपने इस पूत पर बहोत गर्व है। ब्रिगेडियर सिसोदिया ने एक रघुवंशी क्षत्रिय होने की परम्परा खूब निभाई और देश को रक्षा के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर करदी।
आज 26/11 के दिन सभी मृतकों और शहीदों को श्रध्दांजलि देते हुए राजपुताना सोच और क्षत्रिय इतिहास पेज ब्रिगेडियर गोविन्द सिंह सिसोदिया जी को सैल्यूट करता है।

जय हिन्द 🙏🙏🙏

जय श्री राम