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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, July 26, 2015

THAKUR KUSHAL SINGH JI RATHORE AUWA

THAKUR KUSHAL SINGH RATHORE AUWA AND HIS BRAVERY AGAINST BRITISH RULE

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास





ठाकुरो की बगावत लटका दिए ब्रिटिश गोरो के सिर अपने किलो के बहार लगवा दिए दिए थे मेले आजादी के
इतिहास की एक सच्ची घटना
जो लोग राजपूतो से जलकर हर दिन नए इल्जाम लगाते रहते है कि इतिहास को छोडकर राजपूतो ने अंग्रेजो के खिलाफ क्या किया ये पोस्ट उन्ही खोखले लोगो के लिए है जो आजकल हमारे पूर्वजो को अपना बनाकर हमे ही आंखे दिखा रहे है और एक बात ये कि ये तो सिर्फ एक महान योद्धा के बारे मे बताया है आज इनके अलावा भी हजारो राजपूत योद्धा है उनके बारे मे भी धीरे धीरे पोस्ट करेगें --!!
Thakur Kushal Singh ji Rathore From Auwa,Pali-Rajasthan
"लटका दिया था बड़े अँगरेज़ अफसर का सर अपने किले के बहार लगवा दिया था मेला जब हुयी थी अँगरेज़ गोरो की हार "
ठाकुरो की और ब्रिटिश जोधपुर संयुक्त सेना की जंग
"ठाकुर कुशाल सिंह आउवा" 1857 में राजस्थान क्रांति के पूर्व जहाँ राजस्थान में अनेक शासक ब्रिटिश भक्त थे, वहीं राजपूत सामन्तों का एक वर्ग ब्रिटिश सरकार का विरोध कर रहा था। अत: उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया । इस अवसर पर उन्हें जनता का समर्थन भी प्राप्त हुआ। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि राजस्थान की जनता में भी ब्रिटिश साम्राज्य के
विरुद्ध असंतोष की भावनाएं विद्यमान थी। जोधपुर में विद्रोह जोधपुर के शासक तख्तसिंह के विरुद्ध वहाँ के जागीरदारों में घोर असंतोष व्याप्त था। इन विरोधियों का नेतृत्व पाली मारवाड़ आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह कर रहे थे ।
1857 में आउवा ,पाली के ठाकुर कुशल सिंह जी राठौड़ ने जोधपुर राज्य से बगावत कर दी क्यों की जोधपुर के महाराजा तखत सिंह जी उस वक़्त ब्रिटिश गोवेर्मेंट और ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ दे रहे थे ठाकुर कुशल सिंह का गोडवाड़ के ज्यादातर ठाकुरो ने साथ दिया .....
1857 की क्रांति में में मारवाड़ /मेवाड़/गोडवाड़ के 30 से ज्यादा ठाकुरो ने जोधपुर स्टेट से बगावत कर ठाकुर कुशल सिंह जी का साथ दिया जिस में एरिनपुरा सुमेरपुर पाली की राजपूत आर्मी भी शामिल हो गयी अजमेर से पहले पाली अजमेर की सरहद पर भयानक लड़ाई हुयी और ब्रिटिश और जोधपुर राज्य की की सयुक्त सेना की अप्रत्यक्ष रूप से हार हुयी ठाकुर कुशल सिंह ने भंयकर युद्ध किया। २००० हजार सैनिको को मार डाला और तोपखाने की तोपे छीन ली। ब्रिगेडियर जनरल सर पैट्रिक लारेंस मैदान छोड़ कर भाग गया। इतनी बड़ी पराजय से फिरंगीयों को होश ऊड गये
,,,,तभी आउवा ठाकुर वह के कप्तान मोंक मेंसेंन का सिर काट कर आपने घोड़े पर बांधकर आपने किल्ले ले आये दूसरे ठाकुरो ने भी दूसरे ब्रिटिश गोरो का सिर काट अपने साथ ले आये ..........
इस लड़ाई के बाद अँगरेज़ राजपूताने में आपने पाँव नही जमा पाये और पुरे राजस्थान में अजमेर शहर को छोड़ कही अपनी ईमारत तक नही बना पाये …
और उस दिन सारे गाव में जश्न हुआ जो आज भी मेले के रूप में पाली जिले के "आउवा" गाव में मनाया जाता है एक साल बाद फिर आउवा पर अजमेर ,नसीराबाद ,मऊ व नीमच की छावनियो की फोजो आउवा पंहुची। सब ने मिलकर आऊवा पर हमला बोल दिया। क्रांति कारी सामन्तो के किलों को सुरंग से उड़ा दिया। आउवा को लूटा। सुगली देवी की मूर्ति अंग्रेज उठा ले गये।
हमला हुआ को किल्ले को काफी नुकशान पहुचाया गया
वही 1857 में गए ठाकुरो के ज्यादातर ठिकानो को जोधपुर दरबार ने खालसा कर दिया गया
** सलूम्बर के रावत केसरी सिंह के साथ मिलकर जो व्यूह-रचना उन्होंने की उसमें यदि अँग्रेज़ फँस जाते तो राजस्थान से उनका सफाया होना निश्चित था। बड़े राजघरानों को छोड़कर सभी छोटे ठिकानों के सरदारों से क्रांति के दोनों धुरधरों की गुप्त मंत्रणा हुई। इन सभी ठिकानों के साथ घ् जोधपुर लीजन ' को जोड़कर कुशाल सिंह और केसरी सिंह ब्रितानियों के ख़िलाफ़ एक अजेय मोर्चेबन्दी करना चाहते थे।
** इसी के साथ आसोप के ठाकुर शिवनाथ सिंह, गूलर के ठाकुर बिशन सिंह तथा आलयनियावास के ठाकुर अजीत सिंह भी अपनी सेना सहित आउवा आ गए। लाम्बिया, बन्तावास तथा रूदावास के जागीरदार भी अपने सैनिकों के साथ आउवा आ पहुँचे। सलूम्बर, रूपनगर, लासाणी तथा आसीन्द के स्वातंत्र्य-सैनिक भी वहाँ आकर ब्रितानियों से दो-दो हाथ करने की तैयारी करने लगे। वही अपने क्षेत्र गोड़वाड के भी बहुत से ठाकुरो ने इनका साथ दिया
** जोधपुर सेना की अगुवाई अनाड़सिंह पंवार ने की थी जो बिथौड़ा के पास हुए इस युद्ध मरे गए तथा अँगरेज़ अफसर हीथकोट भाग खड़ा हुआ
** दुर्गति का समाचार मिलते ही जार्ज लारेंस ने ब्यावर में एक सेना खड़ी की तथा आउवा की ओर चल पड़ा। 18 सितम्बर को फ़िरंगियों की इस विशाल सेना ने आउवा पर हमला कर दिया। ब्रितानियों के आने की ख़बर लगते ही कुशाल सिंह क़िले से निकले और ब्रितानियों पर टूट पड़े। चेलावास के पास घमासान युद्ध हुआ तथा लारेन्स की करारी हार हुई।
** आस-पास से क्षेत्रों में आज तक लोकगीतों में इस युद्ध को याद किया जाता है। एक लोकगीत इस प्रकार है
ढोल बाजे चंग बाजै, भलो बाजे बाँकियो।
एजेंट को मार कर, दरवाज़ा पर टाँकियो।
झूझे आहूवो ये झूझो आहूवो, मुल्कां में ठाँवों दिया आहूवो।

Sunday, July 19, 2015

Valour Jaimal Mertiya and Jauhar of Chittorgarh

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----चित्तौड़गढ़ का जौहर और जयमल-पत्ता का बलिदान----
राजपूत विरूद्ध #मुग़ल युद्ध #1568 ईस्वी
पुरखों के शौर्य,रक्त और बलिदान को भुलाये कैसे???

पुरखो के शाका और जौहर को हम इतनी आसानी से नही भूल सकते।राजपूत योद्धा अपनी प्रजा के रक्षा करना जानते थे ,जीते जी एक पर भी आंच नही आने दी,कट गए मर मिटे इज्जत की खातिर जौहर की चिता में लाखो राजपूतानिया जिन्दा जल गई,लाखो राजपूत योद्धा कट गए, सिर कट गए धड़ लड़ते रहे ।

वक़्त 15 वी शताब्दी दिल्ली के मुग़ल बादशाह ने मेवाड़ चित्तौड़ पर आक्रमण की योजना की और खुद 60000 मुगलो की सेना लेकर मेवाड़ आया।उस वक़्त महाराणा उदय सिंह भी लोहा लेने को तैयार हुए अपने पूर्वज बाप्पा रावल राणा हमीर राणा कुम्भा राणा सांगा के मेवाड़ी वंसज तैयार हुए पर मेवाड़ के तत्कालीन ठाकुरो/उमरावो ने उदय सिंह जी को मेवाड़ हित में कहा की आप न लडे क्यों की आपको उदयपुर और कुंभलगढ़ में सेना मजबूत करनी है ।अंत ना मानने पर भी उमरावो ठाकुरो ने उन्हें कुंभलगढ़ भेज दिया और फैसला किया मेड़ता के दूदा जी पोते वीरो के वीर शिरोमणि जयमल मेड़तिया को चित्तोड़ का सेनापति बना भार सोपने का और जयमल के साले जी पत्ता जी चुण्डावत को उनके साथ नियुक्त किया गया।

खबर मिलते ही जयमल जी और उनके भाई बन्धु प्रताप सिंह और दूसरे भाई भतीजे राठौड वीरो की तीर्थ स्थली चित्तोड़ की और निकल पड़े ।निकलते ही अजमेर के आगे मगरा क्षेत्र में उनका सामना हुआ वहा बसने वही रावत जाति के लूटेरो से!!!!!

भारी लाव लश्कर और जनाना के साथ जयमल जी को लूटेरो ने रोक दिया एक लूटरे ने सिटी बजायी देखते ही देखते एक पेड़ तीरो से भर गया सभी समझ चुके थे की वे लूटेरो से घिरे हुए है ।
तभी भाई प्रताप सिंह ने कहा की "अठे या वटे" जयमल जी ने कहा "वटे" तभी जनाना आदि ने सारे गहने कीमति सामान वही छोड़ दिया और आगे चल पड़े लूटेरो की समझ से ये बाहर था कि एक राजपूत सेना जो तलवारो भालो से सुसज्जित है वो बिना किसी विवाद और लडे इतनी आसानी से कैसे छोड़ जा सकते है।अभी जयमल की सेना अपने इष्ट नाथद्वारा में श्रीनाथ जी के दर्शन ही कर रही थी कि तभी लूटेरे फिर आ धमके और सरदार ने जयमल जी से कहा की ये "अटे और वटे" क्या है ????

तब वीर जयमल मेड़तिया ने कहा की यहाँ तुमसे धन के लिए लडे या वहा चित्तौड़ में तुर्को से ?
तभी लूटेरे सरदार की आँखों में आंसू आ गए और उसने जयमल जी के पैेरो में गिर कर माफ़ी मांगी और अपनों टुकड़ी को शामिल करने की बात कही पर जयमल जी ने कहा की तुम लूटपाठ छोड़ यहाँ मुगलो का सामना करो।अतः लूटेरे आधे रास्ते वीरो को छोड़ने आये और फिर लोट गए।

मेड़ता के वीर अब चित्तोड़ में प्रवेश कर गए और किले की प्रजा को सुरक्षित निकालने में जुटे ही थे कि तभी खबर मिली की मुग़ल सेना ने 10 किमी दूर किले के नीचे डेरा जमा दिया है। सभी 9 दरवाजे बंद किये गए 8000 राजपूत वीर वही किले में रहे।

मुगलो ने किले पर आक्रमण किया पर हर बार वो असफल हुये आखिर में मुगलो ने किले की दीवारो के निचे सुरंगे बनाई पर रात में राजपूत फिर उसे भर देते थे ।आखिर में किले के दरवाजो के पास दीवारे तोड़ी पर योद्धा उसे रात में फिर बना देते थे।ये जद्दोजहद 5 माह तक चलती रही पर किले के निचे मुगलो की लाशे बिछती गई।उस वक़्त मजदूरी इंतनी महगी हो गयी की एक बाल्टी मिट्टी लाने पर एक मुग़ल सैनिक को एक सोने का सिक्का दिया गया।वहाँ मिटटी सोने से अधिक महंगी हो गयी थी।

अब अकबर ने जयमल जी के पास अपना दूत भेजकर प्रलोभन दिया कि अगर मेरे अधीनता स्वीकार करे तो जयमल को उसके पुरखों का राज्य मेड़ता सहित पूरे मेवाड़ का भी राजा बना देगा।तब वीरवर सूर्यवंशी राजपूत गौरव राव जयमल राठौड़ मेड़तिया का उत्तर था-------

है गढ़ म्हारो म्है धणी,असुर फ़िर किम आण |

कुंच्यां जे चित्रकोट री दिधी मोहिं दीवाण ||

जयमल लिखे जबाब यूँ सुनिए अकबर शाह |

आण फिरै गढ़ उपरा पडियो धड पातशाह ||

अर्थात अकबर ने कहा जयमल मेड़तिया तू अपने प्राण चित्तोड और महाराणा के लिए क्यों लूटा रहा है ?
तू मेरा कब्ज़ा होने दे में तुझे तेरा मूल प्रदेश मेड़ता और मेवाड़ दोनों का राजा बना दूंगा ।
पर जयमल ने इस बात को नकार कर उत्तर दिया मै अपने स्वामी के साथ विश्वासघात नही कर सकता।
मेरे जीते जी तू अकबर तुर्क यहाँ प्रवेश नही कर सकता मुझे महाराणा यहाँ का सेनापति बनाकर गए है।

एक हरियाणवी रागिनी गायक ने भी जयमल के बारे में क्या खूब लिखा है कि जब अकबर के संधि प्रस्ताव को जयमल ठुकराकर अकबर को उसी के दूत के हाथों सन्देश भिजवाता है कि---
ए अकबर
"हम क्षत्री जात के ठाकुर, समझे न इंसाण तनै"
"रे तै हिजड़ा के गीत सुणे सै,देखे न बलवान तैने"।।

एक दिन रात में जयमल जी किले की दिवार ठीक करवा रहे थे और अकबर की नजर उन पर पड़ गयी।तभी अकबर ने अपनी बन्दुक संग्राम से एक गोली चलाई जो जयमल के पैरो पर आ लगी और वो घायल हो गए।गोली का जहर शरीर में फैलने लगा।अब राजपूतो ने कोई चारा न देखकर जौहर और शाका का निर्णय लिया।

आखिर वो दिन आ ही गया 6 माह तक किले को मुग़ल भेद नही पाये और रसद सामग्री खाना आदि खतम हो चुकी था ।किले में आखिर में एक ऐसा निर्णय हुआ जिसका अंदाजा किसी को नही था और वो निर्णय था जौहर और शाका का और दिन था 22 फरवरी 1568!!!!!

चित्तौड़ किले में कुण्ड को साफ़ करवाया गया गंगाजल से पवित्र किया गया ।बाद में चन्दन की लकड़ी और नारियल से उसमे अग्नि लगायी गयी उसके बाद जो हुआ वो अपने आप में एक इतिहास था।
12000 राजपूतानिया अपने अपनी पति के पाव छूकर और अंतिम दर्शन कर एक एक कर इज्जत कि खातिर  आग में कूद पड़ी और सतीत्व को प्राप्त हो गयी ये जौहर नाम से जाना गया।

रात भर 8000 राजपूत योद्धा वहा बैठे रहे और सुबह होने का इन्तजार करने लगे ।सुबह के पहले पहर में सभी ने अग्नि की राख़ का तिलक किया और देवी पूजा के बाद सफ़ेद कुर्ते पजामे और कमर पर नारियल बांध तैयार हुए।

अब जौहर के बाद ये सभी भूखे शेर बन गए थे।
मुग़ल सेना चित्तोड किले में हलचल से पहले ही सकते में थी।उन्होंने रात में ही किले से अग्नि जलती देखकर समझ आ गया था कि जौहर चल रहा है और कल अंतिम युद्ध होगा।

सुबह होते ही एकाएक किले के दरवाजे खोले गए। जयमल जी के पाँव में चोट लगने की वजह से वो घोड़े पर बैठने में असमर्थ थे तो वो वीर कल्ला जी राठौड़ के कंधे पर बेठे।

युद्ध शुरू होते ही वीर योद्धाओ ने कत्ले आम मचा दिया अकबर दूर से ही सब देख रहा था।जयमल जी और कल्ला जी ने तलवारो का जोहर दिखाया और 2 पाव 4 हाथो से मारकाट करते गये उन्हें देख मुग़ल भागने लगी।
स्वयम अकबर भी यह दृश्य देखकर अपनी सुध बुध खो बैठा। उसने चतुर्भुज भगवांन का सुन रखा था।
"जयमल बड़ता जीवणे, पत्तो बाएं पास |
हिंदू चढिया हथियाँ चढियो जस आकास" ||

पत्ता जी प्रताप सिंह जी जयमल जी कल्ला जी आदि वीरो के हाथो भयंकर मार काट हुयी ।
सिर कटे धड़ लड़ते रहे ।
"सिर कटे धड़ लड़े रखा रजपूती शान "
दो दो मेला नित भरे, पूजे दो दो थोर॥

जयमल जी के एक वार से 2 - 2 मुग़ल तुर्क साथ कटते गए किले के पास बहने वाली गम्भीरी नदी भी लाल हो गयी। सिमित संसाधन होने के बाद भी राजपूती सेना मुगलो पर भारी पढ़ी।
युद्ध समाप्त हुआ कुल 48000 सैनिक मारे गए जिनमे से पुरे 8000 राजपूत वीरगति को गए तो बदले में 40000 मुग़लो को भी साथ ले गए ।

बचे तो सिर्फ अकबर के साथ 20000 मुग़ल बाद में अकबर किल्ले में गया वहा कुछ न मिला। तभी अकबर ने चित्तौड़ की शक्ति कुचलने के लिये वहाँ कत्लेआम का आदेश दिया और 20 हजार आम जनता को क्रूरता से मारा गया।यह कत्लेआम अकबर पर बहुत बड़ा धब्बा है।

अकबर जयमल जी और पत्ता जी की वीरता से प्रभावित हुआ और नरसंहार का कलंक धोने के लिये उसने उनकी अश्ववारुड मुर्तिया आगरा के किले के मुख द्वार पर लगवायी।
वही कल्ला जी घर घर लोकदेवता के रूप में पूजे गए मेवाड़ महाराणा से वीरता के बदले वीर जयमल मेड़तिया के वंशजो को बदनोर का ठिकाना मिला तो पत्ता जी चुण्डावत के वंशज को आमेट ठिकाना ।
वही प्रताप सिंह मेड़तिया के वंशज को घाणेराव ठिकाना दिया गया।

ये वही जयमल मेड़तिया है जिन्हीने एक ही झटके में हाथी की सिर काट दिया था

ये वही वीर जयमल जी है वो महाराणा प्रताप के सैनिक(अस्त्र शस्त्र) गुरु भी थे।

ये वही वीर है जो स्वामिभक्ति को अपनी जान से ज्यादा चाहा अकबर द्वारा मेवाड़ के राजा बनाए जाने के लालच पर भी नही झुके।

कर्नल जेम्स टोड राजस्थान के प्रत्येक राज्य में "थर्मोपल्ली" जैसे युद्ध और "लियोनिडास" जैसे योधा होनी की बात स्वीकार करते हैं ये जयमल पत्ता जैता कुंपा गोरा बादल जैसे सैंकड़ो वीरो के कारण है।

हिंदू,मुस्लमान,अंग्रेज,फ्रांसिस,जर्मन,पुर्तगाली आदि अनेक इतिहासकारों ने जयमल के अनुपम शौर्य का वर्णन किया है |

अबुल फजल,हर्बर्ट,सर टामस रो, के पादरी तथा बर्नियर जैसे प्रसिद्ध लेखकों ने जयमल के कृतित्व की अत्यन्त ही प्रसंशा की है |
जर्मन विद्वान काउंटनोआर ने अकबर पर जो पुस्तक लिखी उसमे जयमल को "Lion of Chittor" कहा |

नमन है ऐसे वीरो को।।।
नोट--कृपया कॉपी पेस्ट की स्थिति में राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास पेज का नाम और लिंक जरूर लिखें।
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Friday, July 10, 2015

HARSHVARDHAN_THE GREAT BAINS RAJPUT RULER

***महान सम्राट हर्षवर्धन बैस(606-647)***



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मित्रो आज हम आपको बैस वंशी महान राजपूत सम्राट हर्षवर्धन बैस के बारे में बताएँगे। हर्षवर्धन ने छठी-सातवी शताब्दी में 41 साल तक लगभग पुरे उत्तर और मध्य भारत पर शासन किया। हर्षवर्धन के राज्य की सीमा एक समय उत्तर पश्चिम में पंजाब से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी और पूर्व में बंगाल और उड़ीसा तक फैली थी। गुप्त साम्राज्य के विघटन के बाद उत्तर भारत छोटे छोटे राज्यो में विभाजित हो गया था। हर्षवर्धन ने इन सभी राज्यो को जीतकर एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। अपने अनेक गुणों के कारण हर्षवर्धन की गिनती भारतीय इतिहास के महान सम्राटों में होती है।

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**वंश परिचय**


हर्षवर्धन बैस राजपूत वंश में पैदा हुए थे। इसके प्रमाण समकालीन महाकवि बाणभट्ट के हर्षचरित और चीनी यात्री हुएन त्सांग के यात्रा विवरणों से प्राप्त होते है। बाणभट्ट ने अपनी कृति हर्षचरित में हर्षवर्धन को सूर्यवंशी क्षत्रिय लिखा है। कुछ विद्वान हर्षवर्धन के राजपूत होने पर संदेह करते हैं,किन्तु उनके तर्क निराधार हैं,प्रस्तुत हैं कुछ साक्ष्य जो हर्षवर्धन को सूर्यवंशी बैस क्षत्रिय राजपूत सिद्ध करने में पर्याप्त हैं-

1-हुएन त्सांग ने हर्षवर्धन को वैश लिखा है। हालांकि इस आधार पर कुछ इतिहासकारों ने हर्षवर्धन को वैश्य जाती का माना है।चीनी यात्री हुएन त्सांग ने वैशाली को भी वेश्याली लिखा है,इसी कारण कोई आश्चर्य नही कि उन्होंने इसी भाषा दोष के कारण वैस को वैश्य लिख दिया हो,जबकि वो खुद क्षत्रिय को राजा कि जाति बताता है। इसीलिए माना जाता है की हुएन त्सांग ने बैस को वैश लिख दिया है ,उसका अर्थ वैस क्षत्रिय है न कि वैश्य.
2- हर्ष के दरबारी कवि बाणभट्ट ने साफ़-साफ़ हर्ष को क्षत्रिय लिखा है। हर्षवर्धन की बहन का विवाह एक प्रसिद्ध चंद्रवंशी क्षत्रिय वंश मौखरी(मकवाना,झाला) में हुआ था। बाणभट्ट ने इस विवाह सम्बन्ध को सूर्यवंश और चंद्रवंश क्षत्रियों का मिलाप लिखा है जिससे ये सिद्ध होता है की वर्धन वंश सूर्यवंशी क्षत्रिय राजपूत वंश था क्योंकि सूर्यवंश और चन्द्रवंश क्षत्रिय राजपूतों में ही होते है और बैस राजपूत सूर्यवंशी ही है।
बाणभट कि हर्षचरित्र,उच्छ्वास 4,पृष्ठ संख्या 146 में श्लोक हैं,
"तत्त्वां प्राप्य चिरात्ख्लू राज(ज्य) श्रीयाघटितो तेजोमयो सकलजगदीयमान बुधकरणानन्दकारिगुणगणों सेम सूर्यावंशाशिव पुष्यभूति मुखरवंशो"
"अस्ति पुण्यकर्तामधिवासो वासवावास इव वसुधामवतीर्ण;****"
बाणभट की हर्षचरित्र में हर्षवर्धन के वंश को स्पष्ट सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है और कई जगह वसु,वास,वासवावास शब्द आये हैं जो हर्षवर्धन को स्पष्ट रूप से वैस/बैस सूर्यवंशी क्षत्रिय कहा गया है।
इतिहासकार डॉ आर बी सिंह के अनुसार बाणभट्ट ने हर्षचरित में वैश्य वर्ण के बारे में बहुत सी निंदनीय बाते लिखी है जैसे "सूदखोर बनिया" तथा "जो लूटेरा ना हो ऐसा बणिक संसार में दुर्लभ है"। अगर हर्षवर्धन वैश्य वर्ण का होता तो उसका आश्रित कवि अपने राजा की जाती के बारे में ऐसी बाते नही बोलता।
इस प्रकार हर्ष के दरबारी राजकवि बाणभट कि हर्षचरित से भी सम्राट हर्षवर्धन का वंश बैस क्षत्रिय राजपूत वंश सिद्ध होता है.

3-हर्षवर्धन की पुत्री का विवाह वल्लभीपुर के सूर्यवंशी मैत्रक क्षत्रिय राजपूत राजा ध्रुवसेन से हुआ था।इन मैत्रक क्षत्रियों के वंशज वाला या वल्ला राजपूत आज भी सौराष्ट्र में मिलते हैं,कई विद्वान गुहिलौत वंश को भी वल्लभी के सुर्यवंश से उत्पन्न बताते हैं.विद्वानों के अनुसार छठी-सातवीं शताब्दी में विवाह संबंधो में वर्ण की शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता था इसलिये इन वैवाहिक संबंधो से हर्षवर्धन का क्षत्रिय होना सिद्ध होता है।
4-नेपाल के इतिहास के अनुसार भी यह बैस क्षत्रिय राजवंश था। हर्ष ने नेपाल को जीतकर वहॉ अपना राज्य स्थापित किया था। कनिंघम के अनुसार नेपाल में जो बैस वंशीय राजपूत है वो सम्राट हर्ष के परिवार से है।हर्ष ने अपनी विजय के दौरान उन्हें वहॉ बसाया था।
इतिहासकार अलेक्जेंडर कनिंघम ने भी हर्षवर्धन को बैस राजपूत माना है,
feishe caste identified by sir alexander cunningham with the 
bais rajput (ano-beo-of india-432-33)
सातवी सदी में अंशुवर्मा नाम के क्षत्रिय ने नेपाल में जिस राजपूत वंश कि नीव रखी उसे वैश्यठाकुरी वंश(वैस राजपूत)वंश कहा जाता है,इनके लेखो में हर्ष संवत का इस्तेमाल होता था,जो यह सिद्ध करता है कि हर्षवर्धन और अंशुवर्मा एक ही क्षत्रिय वंश बैस राजपूत वंश से थे,इनके लेखो में इन्हें राजपुत्र लिखा है.वैशाली नेपाल के निकट है,अंशुवर्मा का शासन काल और हर्षवर्धन का शासनकाल समकालीन था.
(history of kannouj-by pandit R S Tripathi pp-94)
इतिहासकार स्मिथ भी कन्नौज पर बैस वंशी सम्राट हर्षवर्धन का शासन मानते हैं.वस्तुत: हर्षवर्धन का वंश वैस/बैस क्षत्रिय राजपूत वंश ही था.

5-शम्भुनाथ मिश्र (बैस वंशावली 1752)के पृष्ठ संख्या 2 पर सम्राट हर्षवर्धन से लेकर 25 वी पीढ़ी में राव अभयचंद तक और उसके बाद 1857 इसवी के गदर तक कुल 58 बैसवंशी राजपूतो के नाम दिए गए हैं.यह वंशावली बही के रूप में बैसवारे के बैस राजपूत परिवार रौतापुर में उपलब्ध है.यह क्रमबद्ध वंशावली हर्षवर्धन और आज के बैस राजपूतों का सीधा सम्बन्ध स्थापित करती है.
6-हर्षवर्धन के पिता प्रभाकरवर्धन कि जब मृत्यु हो जाती है तो उनकी माता सती होने के लिए तैयार हो जाती है और हर्ष से कहती है कि मै वीर की पुत्री,वीर की पत्नी और वीर की जननी हूँ,मेरे लिए सती होने के अतिरिक्त और क्या मार्ग है? इतिहासकार मुंशीराम शर्मा अपनी पुस्तक "वैदिक चिंतामणि" में लिखते हैं कि प्राचीन ग्रंथो में वीर शब्द का अर्थ ही क्षत्रिय होता है और सती प्रथा भी क्षत्रिय राजपूतों कि परम्परा रही है न कि वैश्य या शूद्रों की.
सती प्रथा कि परम्परा से भी हर्षवर्धन क्षत्रिय राजपूत प्रमाणित होता है.

7-चंडिका देवी बैस राजपूतों की कुलदेवी हैं और शिवजी उनके कुलदेवता. हर्षवर्धन बाद में बौद्ध हो गए थे,किन्तु वो चंडिका देवी और शिवजी की आराधना भी करते थे,यह सिद्ध करता है कि हर्षवर्धन बैस राजपूत ही थे.बाणभट से हर्षवर्धन ने चंडिका शतक और चंडिकाकष्टक लिखवाया,हर्ष बैसवाडे स्थित चंडिका के भव्य मन्दिर में नियमित रूप से दर्शनों के लिए आते थे, बैस वंश कि कुलदेवी और कुलदेव के प्रति श्रद्धा हर्षवर्धन को बैस राजपूत सिद्ध करती है. हर्षवर्धन और उनके पूर्वज सूर्य पूजा भी करते थे जो उनके वंश को सूर्यवंशी क्षत्रिय सिद्ध करता है.
8-आखिर में सबसे बड़ा तथ्य यह है की हर्षवर्धन ने अपने राज्याभिषेक समारोह में राजपुत्र की उपाधी ग्रहण की थी।हर्ष खुद को राजपुत्र शिलादित्य कहते थे,वस्तुत:हर्षवर्धन पहले क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने राजपुत्र उपाधि को बहुत प्रयोग किया। उनके द्वारा नेपाल में स्थापित बैसठाकुरी वंश के राजा अंशुवर्मा ने भी उसी समय राजपुत्र उपाधि का प्रयोग किया,इसके बाद ही क्षत्रियों में राजपुत्र उपाधि का अधिक प्रयोग होने लगा,पहले यह संज्ञा सिर्फ राजपरिवार के सदस्य प्रयोग करते थे,बाद में सभी क्षत्रिय इसका प्रयोग करने लगे,और कुछ समय बाद क्षत्रियों के लिए राजपुत्र या राजपूत जातिनाम प्रयोग होने लगा। राजपुत्र उपाधि से हर्षवर्धन क्षत्रिय राजपूत प्रमाणित होते है।
इन सब तथ्यों से ये प्रमाणित होता है की हर्षवर्धन बैस राजपूत वंशी राजा थे। प्रसिद्द इतिहासकार कनिंघम, डॉ गौरीशंकर औझा, विश्वेरनाथ रेउ, देवी सिंह मंडावा, डॉ राजबली पांडे, डॉ जगदीश चन्द्र गहलोत, डॉ रामशंकर त्रिपाठी, भगवती प्रसाद पांथरी, पीटन पैटरसन, बुहलर, शैलेन्द्र प्रताप सिंह और प्रो लाल अमरेंद्र सिंह जैसे अनेको इतिहासकारो ने वर्धन वंश को बैस क्षत्रिय माना है। इस सबसे ये ही ज्ञात होता है की जिन इतिहासकारो ने उनके लिये वैश्य, ब्राह्मण या अन्य शब्द का इस्तमाल किया हैँ, वो या तो अज्ञानवष या किसी द्वेष भावना से ग्रस्त होकर किया है।

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**हर्षवर्धन के पूर्वज **


बैस राजपूत वंश उत्तर बिहार के शक्तिशाली वैशाली के लिच्छवी गणराज्य के क्षत्रियोँ से निकला है। जब मगध के नन्द राजवंश ने इस गणराज्य को नष्ट कर दिया तो वहॉ के क्षत्रिय देश के विभिन्न क्षेत्रों में फ़ैल गए। गणराज्य की राजधानी वैशाली नगर से निकास होने के कारण ये क्षत्रिय वैश/बैस के नाम से जाने गए। कालांतर में इनमे से एक शाखा ने श्रीकण्ठ नामक स्थान पर शासन स्थापित किया जिसका नाम बदलकर स्थानेश्वर हो गया।पहले इस स्थान पर श्रीकंठ नामक नागवंशी शासक का राज्य था। बाणभट्ट के अनुसार हर्षवर्धन के किसी पूर्वज का नाम पुष्यभूतिवर्धन था जिसने स्थानेश्वर(वर्तमान थानेश्वर) में राज्य स्थापित किया। इसलिये इस वंश को पुष्यभूती वंश भी कहा जाता है।पुष्यभूति के बाद नरवर्धन,उनके बाद राज्यवर्धन,उसके बाद आदित्यवर्धन,प्रभाकरवर्धन थानेश्वर की गद्दी पर बैठे। इस वंश के पाँचवे और शक्तिशाली शाशक प्रभाकरवर्धन हुए जिन्होंने सिंध, गुजरात और मालवा पर अधिकार कर लिया था और हूणों को भी पराजित किया था। इनकी उपाधी परम् भट्टारक राजाधिराज थी जिससे ज्ञात होता है की इन्होंने अपना स्वतन्त्र राज्य स्थापित कर लिया था। राजा प्रभाकरवर्धन के 2 पुत्र राज्यवर्धन और हर्षवर्धन और एक पुत्री राजश्री थी जिसका विवाह कन्नौज के मौखरी वंश के राजा ग्रहवर्मन से हुआ था जिससे उत्तर भारत के दो शक्तिशाली राजवंशो में मित्रता स्थापित हो गई थी और दोनों की शक्ति काफी बढ़ गई।
606ई. में परभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद उनका बड़ा पुत्र राज्यवर्धन गद्दी पर काबिज हुआ। इसी दौरान मौखरी वंश के शाशक ग्रहवर्मन की मालवा के शासक देव गुप्त से युद्ध में पराजय और मृत्यु हो गई। देव गुप्त ने ग्रहवर्मन की पत्नी और राज्यवर्धन की बहन राजश्री को बन्दी बना लिया। राज्यवर्धन से ये ना देखा गया और उसने देव गुप्त के विरुद्ध चढ़ाई कर के उसे पराजित कर दिया। उसी वक्त गौड़(बंगाल) का शाशक शशांक राज्यवर्धन का मित्र बनकर मगध पर चढ़ आया लेकिन उसकी देव गुप्त से गुप्त संधि थी। शशांक ने धोखे से राज्यवर्धन की हत्या कर दी। अपने बड़े भाई की हत्या का समाचार सुनने के बाद हर्षवर्धन ने इसका बदला लेने का प्रण लिया और देव गुप्त के साथ युद्ध कर के उसे मार दिया। हर्ष का 606ई. के लगभग 16 वर्ष की उम्र में ही राज्याभिषेक हुआ और उन्होंने राजपुत्र की उपाधी धारण की।


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**हर्षवर्धन का राजकाल**

हर्ष ने राजगद्दी संभालने के बाद अपने को महान विजेता और योग्य प्रशाशक के रूप में स्थापित किया। हर्ष ने लगभग 41 वर्ष तक शाशन किया। इस दौरान उन्होंने स्थानेश्वर और कन्नौज के राज्य को एक किया और अपनी राजधानी कन्नौज में स्थापित की। उन्होंने शशांक को हराया और बंगाल, बिहार और उड़ीसा को अपने अधीन किया। हर्ष ने वल्लभी(आधुनिक गुजरात) के शासक ध्रुवभट को हरा दिया किन्तु उसकी वीरता को देखकर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया,हर्ष ने अपने साम्राज्य का विस्तार कश्मीर, नेपाल, गुजरात, बंगाल, मालवा तक कर लिया था। उन्हें श्रीहर्ष शिलादित्य के नाम से भी जाना जाता है और उन्होंने परम् भट्टारक मगध नरेश की उपाधी धारण कर ली थी। हालांकि हर्षवर्धन का दक्षिणी भारत को जीतने का सपना पूरा नही हो पाया। वातापी के चालुक्य नरेश पुलकेशिन द्वितीय से उसे नर्मदा नदी के तट पर हार का सामना करना पड़ा जिसके बाद दोनों के बीच में संधि के तहत नर्मदा नदी को हर्षवर्धन के राज्य की दक्षिणी सीमा चिन्हित किया गया।

**धर्मपरायण और दानवीर सम्राट**


हर्षवर्धन ना केवल एक धर्मपरायण शाशक थे बल्कि वो सभी पंथो का सम्मान और प्रचार करते थे। शुरुआत में वो सूर्य उपासक थे, बाद में खुद शिव, विष्णु और कालिका की उपासना करते थे लेकिन साथ ही साथ बौद्ध धर्म की महायान शाखा के समर्थक भी थे। ऐसा माना जाता है की हर्ष प्रतिदिन 500 ब्राह्मणों और 1000 बौद्ध भिक्षुओँ को भोजन कराते थे। वो बौद्ध धर्म से बहुत प्रभावित थे और उसके प्रचार के लिये उन्होंने बहुत दान दिया। उन्होंने अनेक स्तूप बनवाए और नालंदा विश्वविद्यालय को भी बहुत दान दिया। नालंदा विश्वविद्यालय की सुरक्षा के लिये उन्होंने उसके चारों ओर एक विशाल दिवार का निर्माण किया। कन्नौज में सैकड़ो बौद्ध विहार थे। डौंडियाखेड़ा, जो कुछ समय पहले तक भी बैस राजपूतो की रियासत रही है, वहा भी सैकड़ो विहार थे। कन्नौज में उन्होंने सन् 643 ई.में एक विशाल बौद्ध सभा का आयोजन किया जिसमे देश विदेश से अनेकों राजा और हजारों बौद्ध भिक्षु सम्मिलित हुए।
इन्होंने अपने समय में पशु हत्या और मांसाहार पर प्रतिबंध लगा दिया। गरीबो के लिये अनाथालय और पर्यटकों के लिये धर्मशालाए बनवाई। इनके समय में दो प्रमुख विश्विद्यालय थे जिसमे बड़ी संख्या में बाहर से विद्यार्थी आते थे, साथ ही अनेक पाठशालाओं का निर्माण इन्होंने करवाया।
हर्षवर्धन प्रत्येक कुम्भ में प्रयाग जाते थे और वहा अपना समस्त धन गरीबो को दान कर देते थे तथा अपनी बहन राज्यश्री से मांगकर कपड़े पहनते थे।

**धर्म, कला और साहित्य का संरक्षक**


हर्ष ना केवल कला और साहित्य के संरक्षक थे बल्कि खुद एक प्रतिष्ठित नाटककार एवं कवि भी थे। उन्होंने 'नागानन्द', 'रत्नावली' एवं 'प्रियदर्शिका' नामक नाटकों की रचना की। इनके दरबार में बाणभट्ट, हरिदत्त एवं जयसेन जैसे प्रसिद्ध कवि एवं लेखक शोभा बढ़ाते थे। बाणभट्ट ने हर्ष के काल के ऊपर हर्षचरित नामक ग्रन्थ लिखा जो की संस्कृत में लिखा पहला ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थ है। इन्होंने हुएन त्सांग जैसे अनेक विद्वानों को भी प्रश्रय दिया।

***महान प्रशासक***


हर्षवर्धन एक महान प्रशाशक थे। वो अपने राज्य के प्रशाशन में व्यक्तिगत रूची लेते थे। उनका प्रशाशन बहुत सुव्यवस्थित था और जनता बहुत खुशहाल थी। इनके राज्य में कर बहुत कम होते थे और बड़े अपराध भी कम थे। अपराध करने वालोँ को कठोर सजा दी जाती थी। बड़े अपराध में नाक, कान, हाथ, पैर काट दिए जाते थे। इनके समय विदेशी नागरिक भी आने से डरते थे। एक बार हुएन त्सांग को भी सीमा पर रोक लिया गया था।
उनकी सेना भी उच्च कोटि की थी। हर्षवर्धन अपना अधिकतर समय युद्धभूमी पर सौनिक शिविरो में ही बिताते थे। वर्षा ऋतु को छोड़कर बाकी समय उनकी सेना विजय अभियान पर ही रहती थी। बाणभट्ट और हुएन त्सांग से उनकी भेंट सैन्य शिविरो में ही हुई थी।
हर्षवर्धन अच्छे कूटनीतिज्ञ भी थे। अनेक राजाओं से उनके मैत्रीपूर्ण सम्बंध थे। उन्होंने चीन के शासकों से भी पहली बार कूटनीतिक सम्बंध स्थापित किये और कई दूत चीन भेजे। चीन शाशक की तरफ से भी कई दूत भारत आए।

अंत में हम इतना कह सकते है की हर्षवर्धन निस्संदेह भारतीय इतिहास के एक महान व्यक्तित्व है। वह एक कुशल शाशक, महान विजेता, दानशील और प्रजावत्सल, धर्मपरायण जैसे गुणों से युक्त व्यक्तित्व के धनी थे। साथ ही एक उच्च कोटि के कवि और नाटककार भी थे। गुप्त साम्राज्य के बाद के अव्यवस्था के दौर में इतना विशाल साम्राज्य स्थापित करने वाले पहले और संभवतया आखिरी शाशक थे। उन्होंने सभी धर्मो को समान आदर दिया और विद्या,कला, साहित्य का प्रसार किया। विद्वानों को भी वो बहुत आदर करते थे। इसलिये वो संस्कृति के महान संरक्षक और विद्या अनुरागी के रूप में भी जाने जाते हैँ। इसके साथ ही वो महान दानवीर भी थे। कूटनीति और सैन्य संचालन के क्षेत्र में भी उन्होंने महान कार्य किये। हर्ष ने अपनी माता और बहन को सती होने से बचाया और अपने भाई और बहन के पति की हत्या का बदला लिया। उन्होंने आपनी विधवा बहन राजश्री का जीवन भर संरक्षण किया। इनसे पता चलता है की एक शक्तिशाली शाशक होने के बावजूद पारिवार से लगाव जैसे मानवीय गुण भी उनके व्यक्तित्व का हिस्सा थे।
हर्ष ने अपने राज्याभिषेक के समय ईस्वी सन 606 से हर्ष संवत प्रारम्भ किया.


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***हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद***

हर्षवर्धन की मृत्यु 647ई. में हुई। उनकी मृत्यु के बाद कमजोर शासकों की वजह से उनका राज्य कई छोटे-छोटे राज्यो में विभाजित हो गया।हर्ष कि मृत्यु के बाद किसी अर्जुन ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया,उसका हर्ष से या बैस वंश से क्या सम्बन्ध था ये ज्ञात नहीं है,अर्जुन ने चीनी दूत के साथ दुर्व्यवहार किया जिससे चीनी दूत अपने साथ नेपाल और तिब्बत कि सेना लेकर आया और अर्जुन हारकर कैद हो गया, हर्षवर्धन के विवरण में उनके मामा भंडी का जिक्र मिलता है,बाद में कन्नौज पर भंडी वंश के आयुध शासको का जिक्र मिलता है जिसे कुछ इतिहासकार राष्ट्रकूट वंश(राठौड़)का भी बताते हैं।
हर्षवर्धन के बाद उनके वंशज कन्नौज के आस पास ही कई शक्तियों के अधीन सामन्तों के रूप में शाशन करते रहे। हर्षवर्धन से 24 वीं पीढ़ी में बैस सामंत केशव राय ने मुहम्मद गोरी के विरुद्ध राजा जयचन्द की तरफ से चंदावर के युद्ध में भाग लिया। उनके पुत्र राव अभयचन्द ने उन्नाव,राय बरेली स्थित बैसवारा की स्थापना की। आज भी सबसे ज्यादा बैस राजपूत इसी बैसवारा क्षेत्र में निवास करते है। हर्षवर्धन से लेकर राव अभयचन्द तक 25 शासक/सामन्त हुए, जिनकी वंशावली इस प्रकार है-
1.हर्षवर्धन
2.यशकर्ण
3.रणशक्ति
4.धीरचंद
5.ब्रजकुमार
6.घोषचन्द
7.पूरनमल
8.जगनपति
9.परिमलदेव
10.मनिकचंद
11.कमलदेव 
12.यशधरदेव
13.डोरिलदेव
14.कृपालशाह
15.रतनशाह
16.हिंदुपति
17.राजशाह
18.परतापशाह
19.रुद्रशाह
20.विक्रमादित्य
21-ताम्बेराय 
22.क्षत्रपतिराव
23.जगतपति
24.केशवराव
25.अभयचंद
इन्ही हर्षवर्धन के वंशज राव अभयचंद बैस ने सन 1230 के लगभग बैसवारा राज्य कि नीव रखी.
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सन्दर्भ--------
1-हर्षचरित्र बाणभट्ट उच्छ्वास 4,पृष्ठ संख्या 146
2-ठाकुर ईश्वर सिंह मढ़ाड कृत राजपूत वंशावली के प्रष्ठ संख्या 112-114
3-देवी सिंह मंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास के पृष्ठ संख्या 67-74
4-महान इतिहासकार गौरिशंकर ओझा जी कृत राजपूताने का इतिहास के पृष्ठ संख्या154-162
5-श्री रघुनाथ सिंह कालीपहाड़ी कृत क्षत्रिय राजवंश के प्रष्ठ संख्या 78,79 एवं 368,369
6-डा देवीलाल पालीवाल कि कर्नल जेम्स तोड़ कृत राजपूत जातियों का इतिहास प्रष्ठ संख्या 182
7-ठाकुर बहादुर सिंह बीदासर कृत क्षत्रिय वंशावली एवं जाति भास्कर
8-http://kshatriyawiki.com/wiki/Bais
9-https://www.google.co.in/url
10-http://www.indianrajputs.com/dynasty/Bais
11-http://wakeuprajput.com/orgion_bais.php
12-feishe caste identified by sir alexander cunningham with the
bais rajput (ano-beo-of india-432-33)
13-history of kannouj-by pandit jankisharan tripathi pp-94)
14-शम्भुनाथ मिश्र (बैस वंशावली 1752)के पृष्ठ संख्या 2
15-इतिहासकार मुंशीराम शर्मा की पुस्तक "वैदिक चिंतामणि"
16-विश्वेरनाथ रेउ, डॉ राजबली पांडे, डॉ जगदीश चन्द्र गहलोत, डॉ रामशंकर त्रिपाठी, भगवती प्रसाद पांथरी, पीटन पैटरसन, बुहलर, शैलेन्द्र प्रताप सिंह और प्रो लाल अमरेंद्र सिंह जैसे अनेको इतिहासकारो ने वर्धन वंश को बैस क्षत्रिय माना है।
17-http://books.google.co.in/…/about/The_Harshacharita.html%E2…
18- Cunningham, Alexander. The Ancient Geography of India: The Buddhist Period, Including the Campaigns of Alexander, and the Travels of Hwen-Thsang. 1871, Thübner and Co. Reprint by Elbiron Classics. 2003., p. 377.
19-http://www.encyclopedia.com/to…/Harsha_(Indian_emperor).aspx
20-http://www.kurukshetra.nic.in/…/Archeolog…/harsh_ka_tila.htm
21-http://www.encyclopedia.com/to…/Harsha_(Indian_emperor).aspx
22-http://www.britannica.com/EBchecked/topic/256065/Harsha
23-https://books.google.co.in/books
24-https://books.google.co.in/books
25-https://books.google.co.in/books
26-https://books.google.co.in/books
27-https://books.google.co.in/books
28-https://books.google.co.in/books
29-https://books.google.co.in/books
30-https://books.google.co.in/books
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RAJA SUHAIL DEV BAIS

मसूद गाजी को धूल चटाने वाले राजा सुहेलदेव बैस

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास





===महाराजा सुहेलदेव बैस और बहराइच का युद्ध===Mahraja Suheldev Bais and battle of Bahraich


मित्रो आज हम आपको भारतीय इतिहास के एक ऐसे महान राजपूत योद्धा से परिचित कराएंगे जिन्होंने विभिन्न राजपूत राजाओं का अपने नेतृत्व में संघ बनाकर इस्लामिक हमलावरो का सफलतापूर्वक सामना किया और अयोध्या, काशी जैसे हिन्दू तीर्थो की रक्षा की लेकिन जिसे देश की हिन्दू जनता ने ही भूलाकर एक आक्रमणकारी जेहादी को अपना भगवान बना लिया।
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सुहेलदेव बैस का वंश परिचय 


राजा सुहेलदेव बैस 11वीं सदी में वर्तमान उत्तर प्रदेश में भारत नेपाल सीमा पर स्थित श्रावस्ती के राजा थे जिसे सहेत महेत भी कहा जाता है। 
सुहेलदेव महाराजा त्रिलोकचंद बैस के द्वित्य पुत्र विडारदेव के वंशज थे,इनके वंशज भाला चलाने में बहुत निपुण थे जिस कारण बाद में ये भाले सुल्तान के नाम से प्रसिद्ध हुए।
सुल्तानपुर की स्थापना इसी वंश ने की थी।
सुहेलदेव राजा मोरध्वज के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका राज्य पश्चिम में सीतापुर से लेकर पूर्व में गोरखपुर तक फैला हुआ था। उन्हें सुहेलदेव के अलावा सुखदेव, सकरदेव, सुधीरध्वज, सुहरिददेव, सहरदेव आदि अनेको नामो से जाना जाता है। माना जाता है की वो एक प्रतापी और प्रजावत्सल राजा थे। उनकी जनता खुशहाल थी और वो जनता के बीच लोकप्रिय थे। उन्होंने बहराइच के सूर्य मन्दिर और देवी पाटन मन्दिर का भी पुनरोद्धार करवाया। साथ ही राजा सुहेलदेव बहुत बड़े गौभक्त भी थे। 

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~~सैयद सालार मसूद का आक्रमण~~


11वीं सदी में महमूद ग़ज़नवी ने भारत पर अनेक आक्रमण किये। उसकी मृत्यु के बाद उसका भांजा सैय्यद सालार मसूद ग़ाज़ी की उपाधी लेकर 1031-33ई. में अपने पिता सालार साहू के साथ भारत पर आक्रमण करने अभियान पर निकला। ग़ाज़ी का मतलब होता है इस्लामिक धर्म योद्धा। मसूद का मकसद हिन्दुओ के तीर्थो को नष्ट करके हिन्दू जनता को तलवार के बल पर मुसलमान बनाना था। इस अभियान में उसके साथ सैय्यद हुसैन गाजी, सैय्यद हुसैन खातिम, सैय्यद हुसैन हातिम, सुल्तानुल सलाहीन महमी, बढ़वानिया सालार सैफुद्दीन, मीर इजाउद्दीन उर्फ मीर, सैय्यद मलिक दौलतशाह, मियां रज्जब उर्फ हठीले, सैय्यद इब्राहिम और मलिक फैसल जैसे सेनापति थे।

महमूद ने भारत में आते ही जिहाद छेड़ दिया। जनता को बलपूर्वक इस्लाम कबूलवाने के लिये उसने बहुत अत्याचार किये लेकिन कई ताकतवर राज्यो के होते मसूद को अपने इस अभियान में ज्यादा सफलता नही मिली। इसलिए उसने रणनीति बदल कर मार्ग के राजाओ से ना उलझ कर अयोध्या और वाराणसी के हिन्दू तीर्थो को नष्ट करने की सोची जिससे हिंदुओं के मनोबल को तोड़ा जा सके। वैसे भी उसका मुख्य लक्ष्य राज्य जीतने की जगह हिन्दू जनता को मुसलमान बनाना था इसलिये वो राजाओ की सेना से सीधा भिड़ने की जगह जनता पर अत्याचार करता था।
मसूद का मुकाबला दिल्ली के तंवर शासक महिपाल से भी हुआ था पर अतिरिक्त सेना की सहायता से वो उन्हें परास्त कर कन्नौज लूटता हुआ अयोध्या तक चला गया,मसूद ने कन्नौज के निर्बल हो चुके सम्राट यशपाल परिहार को भी हराया।
मालवा नरेश भोज परमार से बचने के लिए उसने पूरब की और बढ़ने के लिए दूसरा मार्ग अपनाया जिससे भोज से उसका मुकाबला न हो जाए,खुद महमूद गजनवी भी कभी राजा भोज परमार का मुकाबला करने का साहस नहीं कर पाया था।
सुल्तानपुर के युद्ध में भोज परमार कि सेना और बनारस से गहरवार शासक मदनपाल ने भी सेना भेजी ,जिसके सहयोग से राजपूतो ने मसूद कि सेना को सुल्तानपुर में हरा दिया और उनका हौसला बढ़ गया।

वहॉ से मसूद अपनी विशाल सेना लेकर सरयू नदी के तट पर सतरिख(बारबंकी) पहुँच गया।वहॉ पहुँच कर उसने अपना पड़ाव डाला। उस इलाके में उस वक्त राजपूतों के अनेक छोटे राज्य थे। इन राजाओं को मसूद के मकसद का पता था इसलिये उन्होंने राजा सुहेलदेव बैस के नेतृत्व में सभी राजपूत राज्यो का एक विशाल संघ बनाया जिसमे जिसमे बैस, भाले सुल्तान, कलहंस, रैकवार आदि अनेक वंशो के राजपूत शामिल थे। इस संघ में सुहेलदेव के अलावा कुल 17 राजपूत राजा शामिल थे जिनके नाम इस प्रकार है- राय रायब, राय सायब, राय अर्जुन, राय भीखन, राय कनक, राय कल्याण, राय मकरु, राय सवारु, राय अरन, राय बीरबल, राय जयपाल, राय हरपाल, राय श्रीपाल, राय हकरु, राय प्रभु, राय देवनारायण, राय नरसिंहा।
सालार मसूद के आक्रमण का सफल प्रतिकार जिन राजा-महाराजाओं ने किया था उनमें गहड़वाल वंश के राजा मदनपाल एवं उनके युवराज गोविंद चन्द्र ने भी अपनी पूरी ताकत के साथ युद्ध में भाग लिया था। इस किशोर राजकुमार ने अपने अद्भुत रणकौशल का परिचय दिया। गोविंद चन्द्र ने अयोध्या पर कई वर्षों तक राज किया।

सुहेलदेव बैस के संयुक्त मोर्चे में भर जाति के राजा भी शामिल थे,भर जनजाति सम्भवत प्राचीन भारशिव नागवंशी क्षत्रियों के वंशज थे जो किसी कारणवश बाद में अवनत होकर क्षत्रियों से अलग होकर नई जाति बन गए थे,बैस राजपूतों को अपना राज्य स्थापित करने में इन्ही भर जाति के छोटे छोटे राजाओं का सामना करना पड़ा था। ये सब एक विदेशी को अपने इलाके में देखकर खुश नही थे। संघ बनाकर उन्होंने सबसे पहले मसूद को सन्देश भिजवाया की यह जमीन राजपूतो की है और इसे जल्द से जल्द खाली करे।
मसूद ने अपने जवाब में अपना पड़ाव यह कहकर उठाने से मना कर दिया की जमीन अल्लाह की है।

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~~बहराइच का युद्ध~~


मसूद के जवाब के बाद युद्ध अवश्यम्भावी था। जून 1033ई. में मसूद ने सरयू नदी पार कर अपना जमावड़ा बहराइच में लगाया। राजा सुहेलदेव के नेतृत्व में राजपूतो ने बहराइच के उत्तर में भकला नदी के किनारे अपना मोर्चा जमाया। जब राजपूत युद्ध की तैयारी कर ही रहे थे तभी रात के वक्त अचानक से मसूद ने हमला कर दिया जिसमे दोनों सेनाओ को बहुत हानि हुई।

इसके बाद चित्तोरा झील के किनारे निर्णायक और भयंकर युद्ध हुआ जो 5 दिन तक चला। मसूद की सेना में 1 लाख से ज्यादा सैनिक थे जिसमे 50000 से ज्यादा घुड़सवार थे जबकि राजा सुहेलदेव की सेना में 1 लाख 20 हजार राजपूत थे।
इस युद्ध में मसूद ने अपनी सेना के आगे गाय, बैल बाँधे हुए थे जिससे राजपूत सेना सीधा आक्रमण ना कर सके क्योंकि राजपूत और विशेषकर राजा सुहेलदेव गौ भक्त थे और गौ वंश को नुक्सान नही पहुँचा सकते थे, लेकिन राजा सुहेलदेव ने बहुत सूझ बूझ से युद्ध किया और उनकी सेना को इस बात से ज्यादा फर्क नही पड़ा और पूरी राजपूत सेना और भर वीर भूखे शेर की भाँति जेहादियों पर टूट पड़ी। राजपूतो ने जेहादी सेना को चारों और से घेरकर मारना शुरू कर दिया। इसमें दोनों सेनाए बहादुरी से लड़ी और दोनों सेनाओं को भारी नुक्सान हुआ। ये युद्ध 5 दिन तक चला और इसका क्षेत्र बढ़ता गया। धीरे धीरे राजपूत हावी होते गए और उन्होंने जेहादी सेना को गाजर मूली की तरह काटना शुरू कर दिया।
लम्बे भाले से लड़ने में माहिर बैस राजपूत जो बाद में भाले सुल्तान के नाम से माहिर हुए उन्होंने अपने भालो से दुश्मन को गोदकर रख दिया।
किवदन्ती के अनुसार अंत में राजा सुहेलदेव का एक तीर मसूद के गले में आकर लगा और वो अपने घोड़े से गिर गया। बची हुई सेना को राजपूतों ने समाप्त कर दिया और इस तरह से मसूद अपने 1 लाख जेहादीयों के साथ इतिहास बन गया।
विदेशी इतिहासकार शेख अब्दुर्रहमान चिश्ती ने सालार मसूद की जीवनी "मीरात-ए-मसूदी" में लिखा है "इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या तक जा पहुंचा था, वह सब नष्ट हो गया। इस युद्ध में अरब-ईरान के हर घर का चिराग बुझा है। यही कारण है कि दो सौ वर्षों तक मुसलमान भारत पर हमले का मन न बना सके।"

राजा सुहेलदेव के बारे में ये कहा जाता है की वो भी अगले दिन मसूद के एक साथी के द्वारा मारे गए लेकिन कई इतिहासकारो के अनुसार वो युद्ध में जीवित रहे और बाद में कन्नौज के शाशको के साथ उन्होंने एक युद्ध भी लड़ा था।
इस युद्ध की सफलता में राजा सुहेलदेव बैस के नेतृत्व, सन्गठन कौशल और रणनीति का बहुत बड़ा हाथ था। इसीलिए आज भी राजा सुहेलदेव बैस को इस अंचल में देवता की तरह पूजा जाता है।
श्रीराम जन्मभूमि का विध्वंस करने के इरादे से आए आक्रांता सालार मसूद और उसके सभी सैनिकों का महाविनाश इस सत्य को उजागर करता है कि जब भी हिन्दू समाज संगठित और शक्ति सम्पन्न रहा, विदेशी शक्तियों को भारत की धरती से पूर्णतया खदेड़ने में सफलता मिली। परंतु जब परस्पर झगड़ों और व्यक्तिगत अहं ने भारतीय राजाओं-महाराजाओं की बुद्धि कुंठित की तो विधर्मी शक्तियां भारत में पांव पसारने में सफल रहीं।

लेकिन विडंबना यह है की जो सैयद सालार मसूद हिन्दुओ का हत्यारा था और जो हिन्दुओ को मुसलमान बनाने के इरादे से निकला था, आज बहराइच क्षेत्र में उस की मजार को ग़ाज़ी का नाम देकर पूजा जाता है और उसे पूजने वाले अधिकतर हिन्दू है। बहराइच में एक पुराना सूर्य मन्दिर था जहाँ एक विशाल सरोवर था जिसके पास मसूद दफन हुआ था। तुग़लक़ सुल्तान ने 14वीं सदी में इस मन्दिर को तुड़वाकर और सरोवर को पटवाकर वहॉ मसूद की मजार बनवा दी। हर साल उस मजार पर मेला लगता है जिसमेँ कई लाख हिन्दू शामिल होते है।
राजा सुहेलदेव बैस जिन्होंने हिंदुओं को इतनी बड़ी विपदा से बचाया, वो इतनी सदियोँ तक उपेक्षित ही रहे। शायद वीर क्षत्रियो के बलिदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का हिन्दुओ का ये ही तरीका है। कुछ दशक पहले पयागपुर के राजा साहब ने 500 बीघा जमीन दान में दी जिसपर राजा सुहेलदेव बैस का स्मारक बनाया गया और अब वहॉ हर साल मेला लगता है।

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~~राजा सुहेलदेव बैस के विषय में मिथ्या प्रचार~~



इस युद्ध में राजपूतो के साथ भर और थारू जनजाति के वीर भी बड़ी संख्या में शहीद हुए,राजपूतों के साथ इस संयुक्त मौर्चा में भर और थारू सैनिको के होने के कारण भ्रमवश कुछ इतिहासकारों ने सुहेलदेव को भर या थारू जनजाति का बता दिया जो सत्य से कोसो दूर है क्योकि स्थानीय राजपुतो की वंशावलीयो में भी उनके बैस वंश के राजपूत होने के प्रमाण है। सभी किवदन्तियो में भी उनहे राजा त्रिलोकचंद का वंशज माना जाता है और ये सर्वविदित है की राजा त्रिलोकचंद बैस राजपूत थे।

पिछले कई दशको से कुछ राजनितिक संगठन अपने राजनितिक फायदे के लिये राजा सुहेलदेव बैस को राजपूत की जगह पासी जाती का बताने का प्रयत्न कर रहे है जिससे इन्हें इन जातियों में पैठ बनाने का मौका मिल सके। दुःख की बात ये है की ये काम वो संगठन कर रहे है जिनकी राजनीती राजपूतो के समर्थन के दम पर ही हो पाती है। इसी विषय में ही नही, इन संगठनो ने अपने राजनितिक फायदे के लिये राजपूत इतिहास को हमेशा से ही विकृत करने का प्रयास किया है और ये इस काम में सफल भी रहे है। राजपूत राजाओ को नाकारा बताकर इनके राजनितिक हित सधते हैं।
पर हम अपना गौरवशाली इतिहास मिटने नहीं देंगे।

वीर योद्धा, महान संगठक महाराजा सुहेलदेव बैस को शत शत नमन _/\_
जय श्री राम, जय राजपूताना-----

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Note: This Post belongs to team Rajputana soch, Copyrights are reserved
सन्दर्भ----
1-http://en.wikipedia.org/wiki/Raja_Sukhdeo
2-देवी सिंह मुंडावा कृत राजपूत शाखाओं का इतिहास प्रष्ठ संख्या 70-73
3-रघुनाथ सिंह kalipahadi कृत क्षत्रिय राजवंश पृष्ठ संख्या 369
4-गोंडा एवं बहराइच गजेटियर

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भारत का सबसे ज्यादा शहीदों वाला जांबाज राजपूतों का गाँव मौधा

LAND OF MARTYRS : VILLAGE MOUDHA UTTAR PRADESH

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास 

देशभक्ति का जज्बा देखना हो तो मौधा गाँव आइये...
अब तक देश के लिये हो चुके हैँ 44 शहीद....
ये है भारत माता के सच्चे सपूत असली राजपूत....

उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में मोहम्मदाबाद के पास स्थित है मौधा नामक गाँव। आजादी की लड़ाई के दिनों से भारत माता की आन बान शान के लिये मौधा गाँव के रहने वाले सैनिको के शहीद होने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता के बाद आज तक भी उसी भावना से कायम है। देश की सीमा पर बेटे के शहीद होने की खबर आती है तो मौधा में मातम नही छाता बल्कि माँ अपने दुसरे बेटे को भी उसी रास्ते पर चलने के लिये भेज देती है।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1987 के श्री लंका गृह युद्ध तक विभिन्न रेजिमेंट में लड़ते हुए मौधा गाँव के 44 सैनिको ने मातृ भूमि की रक्षा के लिये अपनी शहादत दी है। इस छोटे से गाँव में 200 से उपर पूर्व सैनिक अभी भी रह रहे हैँ और करीब 350 जवान आज भी राजपूत सहित कई रेजिमेंटो में देश की सीमाओ की रक्षा के लिये तैनात हैँ। गाँव में 5 जुलाई का दिन गौरवशाली था जब देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने यहाँ बने शहीद स्मारक का लोकार्पण किया जिस पर लगी पट्टिका पर शहादत देने वाले 44 सैनिको का नाम अंकित है।
मौधा गाँव पूरा क्षत्रियो का है जिसमे मुख्यत राठौड़ क्षत्रिय निवास करते हैँ। इस गाँव के राजपूत ठाकुर शक्ति सिंह के वंशज है। यह गाँव फर्रुखाबाद में राठौड़ो का सबसे प्राचीन गाँव है। कन्नौज के बाद खोर और खोर के बाद मौधा को ही राठौड़ो ने अपनी राजधानी बनाया और इसके बाद खिमसेपुर रियासत की स्थापना, इसी गाँव के राठौड़ो ने की थी। इन्होंने एक समय कन्नौज पर भी राज किया था और बाद में फर्रुखाबाद क्षेत्र में लगातार मुग़ल और तुर्को से संघर्ष करते हुए राठोड़ो की खिमसेपुर रियासत के नेतृत्व में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखी।
इस गाँव और क्षेत्र के क्षत्रियो द्वारा देश, धर्म के लिये लड़ने की यह राजपूती परंपरा प्रथम तुर्क आक्रमण से बदस्तूर चली आ रही है जब चंदावर के युद्ध में गौरी के विरुद्ध क्षेत्र के राजपूत लड़ाके बहादुरी से लड़े थे। इसके बाद भी मुगल काल से लेकर फर्रुखाबाद के बंगश नवाबो तक से क्षेत्र के लड़ाके लगातार जूझते रहे। मुगल काल में जनपद के क्षत्रियो के लगातार बगावती और स्वतंत्र आचरण से मजबूर होकर ही उनको दबाने के लिये बंगश पठानों को बसाया गया था। इन बंगश नवाबो के बहुत अत्याचारो का मुकाबला यहाँ के क्षत्रियो ने किया।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इन क्षत्रियो ने बंगश अफगान नवाब की कई गुना ताकतवर सेना को कई दिन तक चले भीषण युद्ध में धूल चटाई थी। भारत भूमि के लिये कुर्बान होने की यह राजपूती परंपरा बाद में भारतीय फ़ौज में शामिल होकर निभाई जाती रही है।
सिर्फ 800 की वयस्क पुरुष आबादी वाले इस गांव के हर घर के बेटे फ़ौज में रहकर देश की सीमाओं की रखवाली में लगे हैँ। हर घर में पूर्व फौजी हैँ और उनकी अगली पीढ़ी भी फ़ौज में है। पूर्व फौजियों में एक ब्रिगेडियर रामसेवक सिंह राठौड़ और 7 कर्नल के पद से रिटायर हुए हैँ।
प्रथम विश्व युद्ध में लड़ते हुए इसी गाँव के 10 सैनिक शहीद हुए थे। उसके बाद से द्वितीय विश्व युद्ध, चीन युद्ध, 1965, 1971 और श्रीलंका के गृह युद्ध तक कुल 44 लोग शहीद हो चुके हैँ। इस गाँव के अलावा आस पास के हैदरपुर, गोसरपुर, मुड़गांव, करनपुर, अरसानी, ईसेपुर, गढ़ी बनकटी, सहसपुर, मॉडल शंकरपुर, जिन्जौटा पहाड़पुर, संकिसा, सिरौली, न्यामतपुर ठाकुराना, धीरपुर, बनकिय, जमुनापुर, सनौड़ा, इश्वरी और मरान गाँव के अनेको क्षत्रिय देश के लिये लड़े और शहीद हुए हैँ। 1971 की लड़ाई में अकेले मौधा गाँव से सौ से ऊपर लड़ाको ने देश के लिये के लिये मोर्चा लिया था। कारगिल युद्ध तक यहाँ के राजपूत लड़ाके दुश्मनों के दांत खट्टे करते आ रहे हैँ। ज्यादातर लोगो ने 2-3 युद्धों में लगातार हिस्सा लिया। एक युद्ध में घायल होने के बाद दुसरे युद्ध में दोबारा लड़ने के लिये चले गए। एक ही परिवार के कई भाई एक साथ युद्ध के मोर्चे पर होते थे।
आज भी गाँव के पूर्व सैनिको की स्मृतियों में युद्ध भूमि की यादे तरो ताजा हैँ और बहादुरी के किस्सों की खान हैँ जिन्हें वो गर्व से सुनाते हैँ। इनमे बहुत से लोग युध्दों में घायल हुए, किसी के हाथ नही, किसी के पैर नही, तो किसी के पास हाथ, पैर, आँखे कुछ भी नही बची, ये सब गाँव में आज भी हैँ। इन सभी को आज पेंशन मिलती है। लेकिन आज भी उनमे बलिदान देने का जज्बा है, कहते हैँ कि आज भी मातृभूमि के लिये लड़ने का मौका मिले तो दुश्मन के दांत खट्टे करने में पीछे नही रहेंगे। बहुत से शहीदों की विधवाओ का भी निधन हो चुका है। कहते हैँ कि उस समय शहीदों का शव वापिस नही आता था, सिर्फ कपड़े आते थे। बहुत से लोगो के तो कपड़े भी नही आ पाए थे, सिर्फ टेलीग्राम आया था। अधिकारी, नेता आदि एक बार पूछकर फिर दोबारा हाल चाल नही लेते। उस समय शहीदों के परिवारो को बहुत सुविधाए भी नहीँ मिलती थीं, वेतन मात्र 200 रुपए होता था, लेकिन गाँव के नौजवान सेना में जाने के लिये सदैव आतुर रहे।
मेजर जगदीश सिंह की पहल पर बना स्मारक----
शहीदों का गाँव होने के बाद भी गाँव में शहीद स्मारक नही था जिससे शहीदों की स्मृतियों को सुरक्षित रखने के साथ ही आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिले। शहीद स्मारक बनवाने में मेजर जगदीश सिंह राठौड़ सबसे पहले आगे आए और मुहीम की शुरुआत की। इसके लिए उन्होंने पूर्व सैनिकों, समाजसेवियों और जनप्रतिनिधियों से संपर्क किया। सभी ने पूरा मदद करने का आश्वासन दिया। वर्ष 2013 में नींव रखी। वर्ष 2015 में शहीद स्मारक बनकर तैयार हो गया। शहीद स्मारक के निर्माण में करीब 20 लाख रुपये की लागत आई है। इसके निर्माण कार्य में कैप्टन लालबहादुर सिंह, इंद्रपाल सिंह, हवलदार संभर सिंह, मेजर जगदीश सिंह समेत आधा सैकड़ा पूर्व सैनिकों, प्रधानों, पूर्व सांसद ठाकुर चंद्रभूषण सिंह मुन्नूबाबू और राजपूताना ग्रुप के चेयरमैन वीरेंद्र सिंह राठौर ने सहयोग किया।
इस शहीद स्मारक का अनावरण 5 जुलाई को देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह जी ने किया। शहीदों की विधवाओ को सम्मानित करते हुए गृह मंत्री भावुक हो गए और उनका गला रुंध गया। 
इस अवसर पर गृहमंत्री ने कहा कि "वीर सपूतों की धरती मौधा पर उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश को नाज है। मौधा के शहीदों ने भारत माता के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने को बलिदान कर दिया। मैं यहां के भाई बहनों को अपना शीश झुकाकर नमन करता हूं। प्रथम विश्व युद्ध हो या द्वितीय। हिटलर के नाजीवाद के खिलाफ लड़ाई हो या फिर 1971 और कारगिल का युद्ध यहां के सैनिकों ने भारत मां के सम्मान पर चोट नहीं पहुंचने दी। मौधा के सपूतों ने हर लड़ाई में बलिदान दिया। देश में जहां भी जाऊंगा और विश्व में भी मैं मौधा गांव का नाम लोगों को याद कराने की कोशिश करूंगा। देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले यह सैनिक मरने वाले नहीं हैं। वह तो अमर हैं। प्रति वर्ष शहीद स्मारक पर एकत्र होकर कार्यक्रम होने चाहिए। मैं भी दोबारा यहां आऊंगा।"

मौधा के शहीदो से प्रेरणा लेकर आज भी गाँव के युवा सेना में बड़ी संख्या में उत्साह से भर्ती होते है और उनहे गर्व है की सबसे ज्यादा शहीदो वाले गाँव होने का गौरव उनके गाँव को प्राप्त है।
बलिदानियों की भूमि मौधा और उसके सपूतो को हमारा शत शत नमन_/\_
राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास
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