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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, September 27, 2015

47 आईएएस अधिकारीयों वाला राजपूतों का गांव माधो पट्टी(madho patti village of rajputs which has 47 IAS)


--47 IAS अधिकारी वाला राजपूतों का गांव माधो पट्टी--
जरूर पढ़ें और अधिक से अधिक शेयर करें।

आम तौर पर आरक्षण को राजपूत समाज के युवाओं के लिए पैरो की बेड़ियां माना जाता है।लाखों बेरोजगार युवा सिर्फ आरक्षण को ही इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।
पर क्या ये पूरा सच है????
जी नहीं ये पूर्ण सत्य नही है।अगर कुरीतियों का त्याग करके कोई समाज सही दिशा में मेहनत करें तो भले ही कितनी भी बेड़ियां और मुश्किलें हमारा रास्ता रोकें पर हमे हमारी मंजिल को पाने से नही रोक सकती।
अगर युवा मन लगाकर दिलो जान से परिश्रम करें तो कोई भी लक्ष्य असम्भव नही है।
अक्सर राजपूत समाज के युवा अपनी सभी असफलताओं के लिए सिर्फ आरक्षण को जिम्मेदार ठहराते हैं जबकि उनमे से कई अपना लक्ष्य पाने के लिए कोई परिश्रम ही नही करते।
वो जरूर पढ़ें और प्रेरणा प्राप्त करें।
उत्तरप्रदेश के जौनपुर जिले में सोलंकी (स्वर्णवान सोनवान शाखा) राजपूत बाहुल्य माधोपट्टी एक ऐसा गांव है जहां से कई आईएएस और अफसर हैं। इस गांव में महज 75 घर हैं, लेकिन यहां के 47 आईएएस अधिकारी विभिन्न विभागों में सेवा दे रहे हैं।
इस एरिया में सोलंकी राजपूतों के 12 गांव हैं और जौनपुर के वर्तमान सांसद के0 पी0 सिंह भी इन्ही 12 गाँवो में से हैं ।

इतना ही नहीं माधोपट्टी की धरती पर पैदा हुए बच्चे इसरो, भाभा, काई मनीला और विश्व बैंक तक में अधिकारी हैं। सिरकोनी विकास खण्ड का यह गांव देश की अंगूठी में नगीने की तरह जगमगा रहा है।

1952 में इन्दू प्रकाश सिंह का आईएएस की दूसरी रैंक में सलेक्शन क्या हुआ मानो यहां युवा वर्ग को खुद को साबित करने की होड़ लग गयी। आईएएस बनने के बाद इन्दू प्रकाश सिंह फ्रांस सहित कई देशों में भारत के राजदूत रहे।

इस गांव के चार सगे भाइयों ने आईएएस बनकर जो इतिहास रचा है वह आज भी भारत में कीर्तिमान है। इन चारों सगे भाइयों में सबसे पहले 1955 में आईएएस की परीक्षा में 13वीं रैंक प्राप्त करने वाले विनय कुमार सिंह का चयन हुआ। विनय सिंह बिहार के प्रमुख सचिव पद तक पहुंचे।

सन् 1964 में उनके दो सगे भाई क्षत्रपाल सिंह और अजय कुमार सिंह एक साथ आईएएस अधिकारी बने। क्षत्रपाल सिंह तमिलनाडु के प्रमुख सचिव रहे।

विनय सिंह के चौथे भाई शशिकांत सिंह 1968 आईएएस अधिकारी बने। इनके परिवार में आईएएस बनने का सिलसिला यहीं नहीं थमा। 2002 में शशिकांत के बेटे यशस्वी न केवल आईएएस बने बल्कि इस प्रतिष्ठित परीक्षा में 31वीं रैंक हासिल की। इस कुनबे का रिकॉर्ड आज तक कायम है।

इसके अलावा इस गांव की आशा सिंह 1980, उषा सिंह 1982, कुवंर चद्रमौल सिंह 1983 और उनकी पत्नी इन्दू सिंह 1983, अमिताभ पुत्र इन्दू प्रकाश सिंह 1994 आईपीएएस, उनकी पत्नी सरिता सिंह ने 1994 में आईपीएस भारत की सर्व प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में चयनित होकर इस गांव मान और बढ़ाया।

राज्य सिविल सेवा अधिकारियों का तो यहां पूरी फौज है। इस गांव के राजमूर्ति सिंह, विद्याप्रकाश सिंह, प्रेमचंद्र सिंह पीसीएस, महेन्द्र प्रताप सिंह, जय सिंह, प्रवीण सिंह व उनकी पत्नी पारूल सिंह, रीतू सिंह, अशोक कुमार प्रजापति, प्रकाश सिंह, राजीव सिंह, संजीव सिंह, आनंद सिंह, विशाल सिंह, व उनके भाई विकास सिंह, वेदप्रकाश सिंह, नीरज सिंह पीसीएस अधिकारी बने चुके थे।

अभी हाल ही 2013 के आये परीक्षा परिणाम इस गांव की बहू शिवानी सिंह ने पीसीएस परीक्षा पास करके इस कारवां को आगे बढ़ाया है।

इस गांव के अन्मजेय सिंह विश्व बैंक मनीला में, डॉक्टर निरू सिंह, लालेन्द्र प्रताप सिंह वैज्ञानिक के रूप में भाभा इंस्टीट्यूट तो ज्ञानू मिश्रा इसरो में सेवाएं दे रहे हैं। यहीं के रहने वाले देवनाथ सिंह गुजरात में सूचना निदेशक के पद पर तैनात हैं।
संदर्भ----
1- http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/09/47-madho-patti-village-of-rajputs-which.html?m=1
2-http://khabarnawees.com/75-घर-का-गांव-और-47-आईएएस/

Thursday, September 24, 2015

गुजरात के वीर राजपूत - पार्ट 2 (rajputs of gujrat)

तुर्क-मुगल-अफगान हमलावरो को खदेड़ने वाले गुजरात के वीर राजपूत - पार्ट 2 🔸

1 ➡  ठाकोर रणमलजी जाडेजा (खीरसरा) - जूनागढ़ के नवाब ने खीरसरा पर दो बार हमला किया लेकिन रणमलजी ने उसे हरा दिया, युद्ध की जीत की याद मे जूनागढ की दो तोपे खीरसरा के गढ़ मे मौजूद हैँ ||

2 ➡ राणा वाघोजी झाला (कुवा) - मुस्लिम सुल्तान के खिलाफ बगावत करी, सुल्तान ने खलिल खाँ को भेजा लेकिन वाघोजी ने उसे मार भगाया, तब सुल्तान खुद बडी सेना लेकर आया, वाघोजी रण मे वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी रानीयां सती हुई ||

3 ➡ राणा श्री विकमातजी || जेठवा (छाया) - खीमोजी के पुत्र विकमातजी द्वितीय ने पोरबंदर को मुगलो से जीत लिया। वहां पर गढ का निर्माण कराया। तब से आज तक पोरबंदर जेठवाओ की गद्दी रही है ||

4 ➡ राव रणमल राठोर (ईडर) - जफर खाँ ने ईडर को जीतने के लिये हमला किया लेकिन राव रणमल ने उसे हरा दिया. श्रीधर व्यासने राव रणमल के युद्ध का वर्णन 'रणमल छंद' मे किया है ||

5 ➡ तेजमलजी, सारंगजी, वेजरोजी सोलंकी (कालरी) - सुल्तान अहमदशाह ने कालरी पर आक्रमण किया, काफी दिनो तक घेराबंदी चली, खाद्यसामग्री खत्म होने पर सोलंकीओ ने शाका किया, सुल्तान की सेना के मोघल अली खान समेत 42 बडे सरदार, 1300 सैनिक और 17 हाथी मारे गये। तेजमलजी, सारंगजी और वेजरोजी वीरगति को प्राप्त हुए ||

6 ➡ ठाकुर सरतानजी वाला (ढांक) - तातरखां घोरी ने ढांक पर हमला किया, सरतानजी ने सामना किया पर संख्या कम होने की वजह से समाधान कर ढांक तातर खां को सोंप ढांक के पीछे पर्वतो मे चले गये, बाद मे चारण आई नागबाई के आशिर्वाद से अपने 500 साथियो के साथ ढांक पर हमला किया और तातर खां और उसकी सेना को भगा दिया, मुस्लिमो की सेना के नगाडे आज भी उस युद्ध की याद दिलाते ढांक दरबारगढ मे मोजूद है ||

7 ➡ ठाकोर वखतसिंहजी गोहिल (भावनगर) - भावनगर के पास ही तलाजा पर नूरूद्दीन का अधिकार था, ठाकोर वखतसिंहजी ने तलाजा पर आक्रमण किया। नूरुद्दीन की सेना के पास बंदूके थी लेकिन राजपूतो की तलवार के सामने टिक ना सकी। वखतसिंहजी ने खुद अपने हाथो नुरुदीन को मार तलाजा पर कब्जा किया ||

8 ➡ रणमलजी जाडेजा (राजकोट) - राजकोट ठाकोर महेरामनजी को मार कर मासूमखान ने राजकोट को 'मासूमाबाद' बनाया. महेरामनजी के बडे पुत्र रणमलजी और उनके 6 भाईओने 12 वर्षो बाद मासूम खान को मार राजकोट और सरधार जीत लिया, अपने 6 भाईओ को 6-6 गांव की जागीर सोंप खुद राजकोट गद्दी पर बैठे ||

9 ➡ जेसाजी और वेजाजी सरवैया (अमरेली) - जुनागढ के बादशाह ने जब इनकी जागीरे हडप ली तब बागी बनकर ये बादशाह के गांव और खजाने को लूटते रहे लेकिन कभी गरीब प्रजा को परेशान नही किया | बगावत से थककर बादशाह ने इनसे समझौता कर लिया और जागीर वापिस दे दी ||

10 ➡ रा' मांडलिक (जूनागढ) - महमूद बेगडा ने जुनागढ पर आक्रमण कर जीतना चाहा पर कई महिनो तक उपरकोट को जीत नही सका। इससे चिढ़कर जुनागढ के गांवो को लूटने लगा  और प्रजा का कत्लेआम करने लगा, तब रा' मांडलिक और उनकी राजपूती सेना ने शाका कर बेगडा की सेना पर हमला कर दिया। संख्या कम होने की वजह से रा' मांडलिक ईडर की ओर सहायता प्राप्त करने निकल गये, बेगडा ने वहा उनका पीछा किया, रा' मांडलिक और उनके साथी बहादुरी से लडते हुए वीरगति को प्राप्त हुए ||

11 ➡ कनकदास चौहान (चांपानेर) - गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने चांपानेर पर हमला कर उस पर मुस्लिम सल्तनत स्थापित करने की सोची लेकिन चौहानो की तलवारो ने उसको ऐसा स्वाद चखाया की हार कर लौटते समय ही मुजफ्फर शाह की मृत्यु हो गई ||

12 ➡ विजयदास वाजा (सोमनाथ) - सुल्तान मुजफ्फरशाह ने सोमनाथ को लुंटने के लिये आक्रमण किया लेकिन विजयदास वाजा ने उसका सामना करते हुए उसे वापिस लौटने को मजबूर कर दिया, दो साल बाद सुल्तान बडी सेना लेकर आया, विजयदास ने बडी वीरता से उसका सामना कर वीरगति प्राप्त की ||

👆👆👆👆 ये तो सिर्फ गिने चुने नाम है, ऐसे वीरो के निशान आपको यहां हर कदम, हर गांव मिल जायेगे..

👉 डुप्लीकेटो से निवेदन है की यह सिर्फ और सिर्फ राजपूतो की पोस्ट है, इसमे दुसरो के नाम एड करके पोस्ट से छेडखानी ना करे...आभार 

Monday, September 21, 2015

जब शरणागत 140 सुमरा-मुस्लिम कन्या को बचाने के लिए जाडेजा राजपुतो ने किया जौहर और शाका...!!!

--जाम अबड़ाजी जाडेजा---

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास


जब शरणागत 140 सुमरा-मुस्लिम कन्या को बचाने के लिए जाडेजा राजपुतो ने किया जौहर और शाका...!!!




         बात हे विक्रम सवंत 1356(ई.स. 1309) की तब गुजरात के कच्छ क्षेत्र में जाडेजा राजपुतो का राज था |कच्छ के वडसर में जाडेजा राजवी जाम अबडाजी गद्दी पर बिराजमान थे | जाम अबडाजी एक महाधर्मात्मा और वीरपुरुष होने की वजह से उनको “अबडो-अडभंग, अबडो अणनमी” नाम से भी जाना जाता था |


उस समय सिंध के उमरकोट में हमीर सुमरा(सुमरा परमार वंश की शाखा थे जो धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम बन गए थे।अब सिंध पाकिस्तान में हैं) जिसको सोरठ के चुडासमा राजवी रा’नवघन ने अपनी मुँह बोली बहेन जासल का अपहरण करने पर मार डाला था, उसके वंश में धोधा और चनसेर नामके दो मुस्लिम-सुमरा शाशक राज करते थे | इन दोनों भाईओ के बिच में आपसी कलह बहुत चलता रहेता था, जिसकी वजह से छोटे भाई चनसेर ने उमरकोट की गद्दी हथियाने के लिए दिल्ली के शाशक अलाउदिन-खिलजी से जाके कहा की “आपके जनान-खाने के लिए अच्छी सी सुन्दर सुमरी कन्या मैंने राखी हुई थी, पर मेरे भाई धोधे ने मेरा राज्य हथिया लिया और खुद सिंध की गद्दी पर बैठ गया | इसलिए में आपके पास सहायता मांगने के लिए आय हु” और कहा की “आप खुद सिंध पधारिए और मुझे मेरी गद्दी वापस दिलवाए तथा स्वयं उस स्वरूपवान सुमरी कन्याओ को कब्जे में ले कर दिल्ही अपने जनान-खाने के लिए ले जाए |
   
           इस बात को सुनकर अलाउदीन खिलजी ने अपना लश्कर लेकर सिंध पर चड़ाई की और अपने सेनापति हुसैन खान के द्वारा धोधा को संदेसा भिजवाया की दिल्लीपति अलाउदीन खिलजी के साथ उस सुमरी कन्याओ का विवाह करवाओ” लेकिन धोधा ने इस बात से मन कर दिया और वो अलाउदीन के साथ लड़ने के लिए तैयार हो गया | और युद्ध में जाते समय उसने अपने वफादार भाग सुमरे को कहा की अगर मुझे कुछ हो जाए तो इन सुमरियो को कच्छ के जाम अबडाजी के पास भेज देना, एक वो ही वीर पुरुष हे जो इन सुमरियो को बचा सकते हे | इतना कह कर धोधा सुमरा अपनी फ़ौज के साथ अलाउदीन से भीड़ गया | उसकी सेना अलाउदीन की विशाल सेना के सामने बहुत छोटी होने के कारण वो युद्ध भूमि में ही मारा गया | जब सरदार हुसैन खान ने घोघे की लाश को पैरो से लात मरी तब उसके भाई  चनसेर को बहुत अफ़सोस हुआ और उसने हुसैन खान का सिर धड से अलग कर दिया, बाद में वो भी अलाउदीन के लश्कर द्वारा मारा गया | बाद में अलाउदीन ने जब उमरकोट नगर में जाके देखा तो वह पे सुमरि कन्याओ का नमो निशान नहीं था | उसे बाद में पता चला की सभी सुमरी कन्या कच्छ की तरह जा चुकी हे, इसलिए उसने अपने लश्कर को कच्छ की तरफ कुच करवाया |
   
          इस तरफ कच्छ में भाग सुमरा उस 147 मुस्लिम कन्याओ के साथ कच्छ के वडसर के पास आए, पर ये सुमरी कन्या बहुत चलने के कारण थकी हुई थी जिससे उनको कच्छ के रोहा पर्वत पर आराम करने के लिए कहेकर खुद जाम अबडाजी से मिला और उनसे कहा की “मुझे सिंध के धोधा सुमरा ने आपके पास भेजा हे और सब हकीकत जाम अबडाजी को बताई की अब आप ही इन सुमरी कन्याओ को अलाउदीन के जनान खाने से बचा सकते हे” इसे सुनकर अबडाजी ने संदेशा भिजवाया की की...

 भले आवयु भेनरू, अबडो चयतो ईय
 अनदिठी आडो फीरां, से डिठे दियां किय...?
(अर्थ:- मेरी बहेनो अच्छा किया आप मेरे पास आ गई, अगर मेरे ध्यान में भी कुछ नही हो फिर भी में उसको बचाने के लिए जाता हु, आप तो स्वयं मेरे पास आई हों अब आपको कैसे जाने दूँ, आप निश्चिंत रहिये।)
और इन सुमरी कन्या को लाने के लिए जाम अबडाजी ने बैल-गाडे भिजवाए पर इन बैल-गाड़े को सुमरी कन्या दुश्मन का लश्कर समज बैठी और डर के मारे इन 147 सुमरी कन्या में से 7 ने वही पर आत्म-हत्या कर लि | बाकि की 140 सुमरी कन्या वहा से वडसर आ पहुची | बादशाह का लश्कर वडसर की तरफ आ रहा हे इस बात को जानकर जाम अबडाजी ने रोहा पर्वत के उपर रात को मशाले जलवाकर खुद बादशाह के लश्कर को युद्ध के लिए आमत्रित किया...!!!अलाउदीन का लश्कर वडसर के पास आ कर रुक गया और दोनों तरफ फौजे इक्कठा हो गई |


         जाम अबडाजी की सेना में ओरसा नामका एक मेघवाल जाती का आदमी भी था जो बहुत ही बहादुर था, उसने जाम अबडाजी को कहा की अगर आज्ञा दे तो में अकेला ही रात को जाकर उस अलाउदीन का सिर काट के आपके पास रख दु, लेकिन जाम अबडाजी ने उसे कहा की “ऐसे कपट से वार दुशमन को मारने वाला में जाम अबडाजी नहीं हु फिर भी तुम कुछ ऐसा करो जिससे अलाउदीन की रूह कांप उठे” | ये ओरसा मेघवाल जाती से था जो मृत पशुओ की खाल उतारने का कम करते थे, उसने एक युक्ति निकाली और रात को वो कुत्ते की खाल पहेनकर अलाउदीन के लश्कर में भीतर जाता हुआ उसके तंबू में घुस गया, उसका मन तो सोते हुए अलाउदीन का सिर काटने का ही था, पर जाम अबडाजी के मना करने की वजह से उसने अलाउदीन का शाही खंजर निकल लिया और उसकी जगह अपना खाल उधेड़ने वाला खंजर रख दिया | सुबह फिर जाम अबडाजी ने अलाउदीन खिलजी को संदेशा भिजवाया की “अगर में चाहू तो कपट से तेरा सिर धड से अलग करवा सकता था लेकिन क्षत्रिय ना ही ऐसा करते हे न ही दुसरो से करवाते हैे, इसलिए अब अभी समय है चला जा यहाँ से और भूल जा मुस्लिम सुमरी कन्या को”, और निशानी के तौर पर उसको उसका शाही खंजर भिजवाया | जिसे देखकर अलाउदीन हक्का-बक्का रह गया | उसने सोचा की जिसका एक आदमी उसके इशारे पे ये कार्य कर सकता हे उसके साथ युद्ध नही करता ही अच्छा हैे | इसलिए उसने जाम अबडाजी जो पत्र लिखा की अगर आप उस मुस्लिम सुमरी कन्याओ को मेरे हवाले कर दे तो में आपको कोई भी नुकशान नहीं करूँगा | लेकिन जाम अबडाजी ने जवाब दिया की “मैंने उन सुमरी कन्या को वचन दिया हे की जब तक में जिन्दा हु तब तक आपको उनके साथ कुछ नहीं करने दूंगा, और क्षत्रिय कभी अपनी जुबान से नहीं हिलता” भूल जा उस कन्या को |  

            इसे सुनकर दुसरे दिन सुबह फिर अलाउदीन ने अबडाजी के लश्कर पर हमला बोल दिया | जाम अबडाजी और ओरसा अपनी सेना के साथ अलाउदीन के लश्कर को काटते काटते उसके हाथी के पास पहुच गए थे तभी ओरसा पर किसी ने पीछे से हमला कर उसे मार डाला | इस पराक्रम को देखकर अलाउदीन ने दूसरी बार जाम अबडाजी को सुलह के लिए संदेसा भिजवाया लेकिन जाम अबडाजी अपनी बात से हिलने वाले कहा थे | दुसरे दिन फिर युद्ध शुरु हो गया इस तरह ये युद्ध ७२ दिनों तक चलता रहा धीरे धीरे जाम अबडाजी का सैन्य कम होता जा रहा था | आखिर में उन्होंने अपनि राणी और राज घराने की औरतो को बुलाकर कहा की अब अंत आ गया हे हम ज्यादा देर तक अलाउदीन के लश्कर का सामना नहीं कर सकेंगे | और उन्होंने सुमरी कन्याओ को वडसर गाव से 2 कोस दूर पर्वत पर भिजवाया और साथ में दूध का प्याला देकर कहा की जब इस दूध का रंग लाल हो जाए तो समाज लेना में इस दुनिया में नहीं रहा |





        जिसे सुनकर राजपुत क्षत्राणी ने वडसर के गढ़ के बीचो बिच चंदन की लकड़ी इकठ्ठा की उसकी श्रीफल धुप आदि से पूजा करके फिर चिता जलाके एक के बाद एक राजपुत क्षत्राणी “जय भवानी” के नारे के साथ चिता पर चड गई और इस तरह जौहर व्रत का अनुष्ठान किया | जिसके बाद सभी राजपुत योध्दाओं ने माथे पे राजपुत क्षत्राणी की भस्म लगाकर केसरिया साफा पहेनकर “हर हर महादेव” के नारे के साथ अलाउदीन के लश्कर पर टूट पडे |
        जाम अबडाजी अदभुत पराक्रम दिखाकर युद्ध भूमि में सहीद हो गए | एस तरफ सुमरी कन्या के पास रखे दूध के प्याले में दूध का रंग लाल हो गया | वे समज गई की अब उनको बचाने वाला कोई नहीं रहा | कहेते है की उस समय उनकी ऊपरवाले की प्रार्थना से ज़मीन फट गई और सभी सुमरी कन्या उसमे समा गई, एक कन्या का दुप्पटा बहार रह गया था क्योकि उसको किसी मर्द ने छुआ था | अलाउदीन के हाथ में कुछ नहीं लगा और वो भारी पस्तावे के साथ वापस चला गया | बाद में वडसर की गद्दी पे अबडाजी के पुत्र डुंगरसिंह जो लड़ाई के वक़्त उसके माम के यहाँ थे वो बेठे |
        ये घटना विक्रम सवंत 1356 में फागुन वद 1 को हुई थी | इस युद्ध में जाम अबडाजी के भाई जाम मोडजी भी सहीद हुए थे | आज भी वडसर गाव जो कच्छ जिल्ले की नलिया तहेसिल में स्थित हे, उस वडसर गाव में नदी के किनारे जाम अबडाजी और जाम मोडजी दोनों के स्मारक मौजूद हे, और हर साल वहा पे होली के दुसरे दिन यानि फागुन वद 1 को इन स्मारकों को लोग वहा पे आकर पूजा करते हैे | और हर साल जन्माष्टमी को वह पे मेला भी लगता है |

Saturday, September 19, 2015

जब एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए सैंकड़ो सोढा-परमार राजपूतो ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया


जब एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए सोढा-परमार राजपूतो ने अपने जीवन का बलिदान दे दिया...!!!

एक ऐसी अनोखी घटना जिसमे एक क्षत्राणी अपने वीर पुत्र की चिता के साथ सती हुई।

“शरणे आयो सोपे नहीं राजपुतारी रीत, धड गिरे पर छोड़े नहीं खत्री होय खचित”
अंग पोरस, रसणे अमृत, भुज परचो रजभार
 सोढा वण सूजे नहीं होय नवड दातार...|| १ ||
(सोढा-परमार राजपूतो के हाथ से जो दान मिलता हे, उनकी जीभ से जो अमृत बरसता हे और उनकी भुजाओ में जो ताकत होती हे वैसे और किसी में नहीं होता)

बात हे विक्रम सवंत 1214 की जब सिंध के थरपारकर में सतत सात साल तक बारिश न होने की वजह से अकाल की स्थिति पैदा हो गई थी जिसकी वजह से वहा के परमार राजा रतनसिंह के बेटे लखधीरसिंह अपनी प्रजा और गोचर के साथ पानी की खोज में सौराष्ट्र के वढवान रियासत में मुली गाव के पास आकर रुके | वहा के उस समय के राजवी विशणदेव वाघेला थे | लखधीरसिंह ने उनसे यहाँ पे रुकने के लिए और अपनी गायो के लिए घास चराने की मांग की, विशणदेव वाघेला अति उदार मन के होने के कारण उन्होंने गायो को चराने के साथ साथ वहा आजू-बाजु की सभी ज़मीन उनको रहेने के लिए दे दी |
 
         धीरे धीरे वहा पर लखधीरसिंहजी और उनके साथ सिंध में से आये लोग वह पे शांति-खुशहाली से रहेने लगे उन्होंने मुली में अपने एक बड़े गढ़ का भी निर्माण कर लिया | परमार राजपुतो की खुशहाली देखकर विशणदेव वाघेला की उपपत्नी जो की सायला के चभाड जाति की थी वो बहुत इर्ष्या करती थी, और मनोमन इनको सबक सिखाने की सोचती रहेती थी | एक बार जब सायला से राणी के भाई वढवान को पधारे तब उन्होंने अपने भाई के सामने परमार राजपूतो के बारे में कई खरी खोटी बाते बताकर उनको परमार राजपुतो को सबक सिखाने के लिए उकसाया |

हालाकि लखधीरसिंहजी और विशलदेव वाघेला के बिच में सबंध बहुत अच्छे होने की वजह से राणी के भाई परमार राजपुतो पर सीधा हमला तो नहीं कर सकते थे, इसलिए वे अपने साथ अपने साथियो और विशलदेव वाघेला के सैन्य से कुछ लोग लेकर कुल ५०० आदमियो को लेकर मुली के पास आकर शिकार करने लगे | उनको जब किसी हिरण या अन्य प्राणी शिकार के लिए नहीं मिला तब उन्होंने तीतर जाती के एक पक्षी को तीर मारा | घायल तीतर जाकर मुली के परमार राजपुतो की हद में गिर पड़ा जिसे देखकर सभी चभाड घोड़े पर चढकर उसके पीछे जाने के बहाने परमार राजपुतो को सबक सिखाने के लिए चल पडे, जिसका दुहा हे की...

जंगल तेतर उडियो, आवयो राजदुवार ||
चभाड सहु घोड़े चड्या बांधी उभा बार || १ ||

       इस तड़पते हुए तीतर को देखर लखधीरसिंहजी की राणी जोमबाई ने उसे हाथ में उठा लिया और कहा “डरना मत शरणागत की रक्षा करना क्षत्रियो का धर्म हे”,

अब तुम मेरे पास आए हो तुम्हे कुछ नहीं होगा | इसको देखकर चभाड लोगो ने कहा की “इसे हमें देदो ये हमारा शिकार हे”, जोमबाई ने जवाब दिया ये घायल तीतर पक्षी हमारे इलाके में आकर गिरा हे इसलिए वो हमारा शरणागत हे, और शरण आने वाले की रक्षा करना क्षत्रियो का धर्म रहा हे और हम वही करेंगे |
 इसको सुनकर शिकारियों ने कहा की हमारा शिकार हमें दे दो या लड़ने को तैयार हो जाओ |

तब जोमबाई ने जवाब दिया की “इ खांडा न खेल अमने न सिखववाना होय”(क्षत्रियो को कभी लड़ना सिखाया नहीं जाता वो मा के पेट के सिख कर आते हे) |
जिसे सुनकर चभाड शिकारी उनके लोगो पर टूट पडे | इसे देखकर जोमबाई ने अपने बेटे “मुंजाजी” से आह्वान किया की...

मुंजाने माता कहे,सुण सोढाना साम |
दल में बल रखो और करो भलेरा काम ||
मुंजा तेतर माहरो, मांगे दुजण सार |
गर्व भर्या गुजरात धणी, आपे नहीं अणवार ||

(मुंजाजी को माता ने कहा की सुण सोढा वंशज, अब भलाई करने का वक़्त आ गया हे, ये तीतर मेरे पास शरणागत आया हे, अब तुजे मेरे दूध का कर्ज़ चुकाना हे और दिखाना हे हमारे जमीन पे आये हुए शरणागत को हम किसी को नहीं सोपते)

जिसे सुनकर मुंजाजी ने जवाब दिया की...

ध्रुव चडे, मेरु डगे, गम मरडे गिरनार |
मरडे कयम मुलिधणी पग पाछा परमार ||

(चाहे ध्रुव सितारा अपनी जगह से हिल जाए, मेरु या गिरनार जैसे पर्वत अपनी जगह से हिल जाए पर अब ये परमार वंश का मुणी का धनि मुंजाजी पीछे नहीं हटेगा)

      इस तरह तीतर को लेकर दोनों पक्षों में घमासान मच गई, धीरे धीरे होकर परमार राजपुतो ने एक एक करके सभी चभाड शिकारियो का वध करने लगे | जिससे उन शिकारियो में हडकंप मच गया | जिसे देखकर वाघेला के सैन्य से कई लोगो ने और राणी के भाई ने मुंजाजी को घेर लिया और उनपे वार करने लगे, जिसके कारण मुंजाजी भी सहीद हो गए | जिसे देखकर बाकि परमार राजपुत शिकारियो पे टूट पडे | देखते ही देखते वहा पे 640 लोगो की लासे बिछ गई जिसमे 140 परमार राजपुत थे और 500 शिकारी सैन्य में थे | इस तरह मुणी का पादर एक रणमैदान में बदल गया |

       इसे देखकर मुंजाजी की माता जोमबाई को सत चढा और उन्होंने अपने बेटे के पीछे सती होने की ठान ली | उनको बहुत सारे लोगो ने मनाया पर उन्होंने ठान लि थी और मुंजाजी की चिता पर सती हो गई |

पडया चभाडह पांचसे, सोढा विशु सात |
एक तेतर ने कारणे अण राखी अखियात || १ ||

  इस तरह एक तीतर पक्षी को बचाने के लिए 140 सोढा राजपुत 500 चभाड लोगो को मारकर रणमैदान में शहीद हो गए |इस बात की गवाही दे रहे स्मारक आज भी सौरास्ट्र के मुणी गाव में 800 साल से खड़े है |

धन्य हे ऐसे क्षत्रियो को जो एक जीव के लिए अपनी जान न्योछावर करने में पल भर के लिए भी नहीं झिझकते...!!!
संदर्भ- 
1--Rajput Vansh Sagar - Sodha/Parmar Vansh page no. 196 se 200
2--Shambhuprasad Harprasad Desai likhit - " Saurastra ka Itihas"
3--Rastriya Shayar Zaverchand Meghani likhit "Saurastra ni Rasdhar"

Monday, September 14, 2015

1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष- भाग 2***


#‪#‎अंग्रेज़ो‬ के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में राजपूतो का योगदान भाग-5##
***1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष- भाग 2***
===ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी सपनावत===

मित्रो पिछली पोस्ट में हमने साठा चौरासी क्षेत्र के धौलाना के राजपूतो के बलिदान के बारे में बताया था। इसके दुसरे भाग में आज हम मुकीमपुर गढ़ी के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और बागी गाँव सपनावत के बारे में बताएंगे।

~~मुकीमपुर गढ़ी के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर~~


साठा चौरासी का मुकीमपुर गढ़ी गाँव पिलखुवा के निकट अवस्थित है जो कि तोमर राजपूतो का गाँव है। यहाँ के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर बहुत बड़े जमींदार हुआ करते थे और उनका स्थानीय जनता में बहुत प्रभाव और मान सम्मान था। 1858 के विप्लव की शुरुआत के बाद क्षेत्र के राजपूत ग्रामीणों ने भी जमींदार गुलाब सिंह तोमर के नेतृत्व में बगावत कर दी। ठाकुर गुलाब सिंह ने ब्रितानियों को लगान न देने एवं क्रांतिकारियों का साथ देने का निश्चय किया। उन्होंने क्षेत्र वासियों को भी लगान न देने के लिए प्रेरित किया। मुकीमपुरगढ़ी में जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह के नेतृत्व में राजपूतो की एक बैठक बुलायी गयी। इसमें सभी ने ठाकुर गुलाब सिंह से सहमत होते हुए ब्रिटिश सरकार को भू-राजस्व न देने की घोषणा की। इस प्रकार मुकीमपुर गढ़ी राजपूत क्रांतिकारियों का मजबूत गढ़ बन गया। जमींदार ठाकुर गुलाब सिंह ने निकटवर्ती क्षेत्र के गाँवों को भी क्रांति के लिए प्रोत्साहित किया। परिणामतः वहाँ भी क्रांतिकारी भावनाएं पनपने लगी और कुछ समय में वहाँ कानून व्यवस्था पूर्ण रूप से भंग हो गयी। ब्रितानियों से संघर्ष होने के पूर्वानुमान के कारण जमींदार गुलाब सिंह ने अपनी गढ़ी (लखौरी ईटों की किलेनुमा हवेली ) में हथियार भी इकट्ठे करने शुरू कर दिये।

मुकीमपुर गढ़ी के विप्लव की सूचना जब अंग्रेज अधिकारियों तक पहुँची तो उन्होंने उसके दमन का निश्चय किया। ब्रितानियों ने गुलाब सिंह को क्रांतिकारियों का नेता घोषित किया और मुकीमपुर गढ़ी तथा उसके निकटवर्ती क्षेत्र में विप्लव भड़काने का आरोप भी उन पर लगाया गया। एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी यहाँ विप्लव के दमन के लिए भेजी गयी। उसने मुकीमपुर गढ़ी को चारो ओर से घेर लिया। गुलाब सिंह की हवेली पर तोप से गोले बरसाये गये। मुकाबला असमान था लेकिन ठाकुर गुलाब सिंह जी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने ब्रितानियों का सामना किया परन्तु वे तोपों के सामने ज्यादा देर टिक न सके। ठाकुर गुलाब सिंह की गढ़ी को तोपों से खंडहर में परिवर्तित कर दिया। ठाकुर गुलाब सिंह और उनके कई सहयोगी वीरता पूर्वक लड़ते हुए वीरगती को प्राप्त हो गए। ब्रिटिश सेना को हवेली के अन्दर कुएँ से हथियार प्राप्त हुए जो उनका सामना करने के लिए जमींदार गुलाब सिंह एवं ग्रामीणों ने इकट्ठा किये थे। बाद में मुकीमपुर गढ़ी गाँव में आग लगा दी गयी। ब्रिटिश अधिकारी डनलप ने गुलाब सिंह की सम्पूर्ण जायदाद जब्त कर ली। आज भी ठाकुर गुलाब सिंह जी की हवेली के खंडहर 1857 की क्रांति के गवाह बने हुए हैं।
~~बागी गाँव सपनावत ~~
सपनावत साठा क्षेत्र के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण गाँव में से है जो गुलावठी के पास अवस्थित है। यह गहलोत(शिशोदिया) राजपूतो का गाँव है और बहादुरी और बगावती तेवरो के लिये हमेशा प्रसिद्ध रहा है। यहाँ के राजपूतो ने हमेशा की तरह 1857 के विप्लव में भी अपनी बहादुरी और देशभक्ति का परिचय दिया। साठा चौरासी में बह रही क्रांति की लहर से सपनावत भी अछूता नही रहा और गाँव ने बगावत कर दी। सपनावत के राजपूतो ने भी मुकीमपुरगढ़ी और पिलखुवा की तरह भू-राजस्व गाजियाबाद तहसील में जमा करने से इंकार कर दिया। इसके बाद सपनावत ने पूरी तरह अपने को स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।
मशहूर क्रांतिकारी मालागढ के नवाब वलीदाद खाँ जिनपर मेरठ से लेकर अलीगढ तक बागियों की सरकार की जिम्मेदारी थी, को भी सपनावत के ग्रामीणों से अत्यधिक सहयोग मिला था। नवाब वलीदाद खाँ गाजियाबाद तथा लोनी का निरीक्षण करके सपनावत में भी रूके थे। यहाँ के ग्रामीणों से इनके नजदीकी सम्बन्ध थे। इसी कारण सपनावत के निवासियों ने क्रांति के समय नवाब वलीदाद खाँ की बहुत सहायता की।
सपनावत से कुछ दूर बाबूगढ़ में अंग्रेजी सेना की छावनी थी। गढ़मुक्तेश्वर से बाबूगढ़ आए बागी बरेली ब्रिगेड के क्रांतिकारी सैनिकों की सहायता के लिए यहाँ के अनेक नौजवान वहाँ पहुँच गये। बाबूगढ़ में क्रांतिकारियों ने अत्यधिक लूटपाट की और दुकानों में आग लगा दी।
1857 की क्रांति की असफलता के पश्चात् अनेक ग्रामों को क्रांतिकारियों का साथ देने या क्रांति में संलग्न होने के कारण ब्रिटिश सरकार ने बागी घोषित कर दिया। उन गाँवों की जमीन-जायदाद छीन ली गई। इन बागी ग्रामों में सपनावत भी था। सपनावत गाँव को भी विप्लवकारी गतिविधियों में भाग लेने के कारण बागी घोषित कर दिया गया और यहाँ के किसानो की जमीने छीन ली गईं।इसके बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्रांति में भाग लेने वाले राजपूतों,मुस्लिमो की जमीने अंग्रेजों के भक्त जाटों के नाम चढ़ा दी गयी.
इन वीर आत्माओ को हमारा नमन जिनकी बहादुरी और बलिदानो की वजह से आज हम स्वतंत्र हैँ_/\_

1857 की क्रांति में उत्तर प्रदेश की साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष भाग-1


===अंग्रेज़ो के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम में राजपूतो का योगदान- भाग-4 ===
****1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष भाग-1***


~~लाल किले पर केसरिया फहराने वाले राजपूत~~

****1857 की क्रांति में साठा-चौरासी के राजपूतो का संघर्ष भाग-1***
(edited on date 02-09-2015)

पिछले 4 दिन से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दादरी के पास बिसाहदा गाँव में गौ हत्या का मामला देश भर में सुर्खिया बन रहा है। हालाकि इस मामले में अब मीडिया के झूठ और सरकार के पक्षपात पूर्ण रवैय्ये की वजह से मामले को दूसरा रूप दे दिया गया है।

यह बिसाहदा गाँव क्षत्रियों के मशहूर साठा चौरासी क्षेत्र का हिस्सा है। इस घटना को लेकर पूरे क्षेत्र में बवाल के हालात हैँ। यहाँ के क्षत्रिय पुलिस से भिड़ने को तैयार हैँ और कई जगह भिड़ंत हो चुकी है।

दरअसल सरकारी दमन का डट कर विरोध करने का इस क्षेत्र का इतिहास रहा है। 1857 के संग्राम में भी यहां के क्षत्रियो ने अंग्रेजो के विरुद्ध बढ़ चढ़ कर भाग लिया था। इन क्षत्रियो में गौ रक्षा को लेकर कितना आग्रह है ये आप हमारी इस पुरानी पोस्ट से जान सकते हैँ, जब 1857 संग्राम में गौवंश की रक्षा के लिये साठा चौरासी के क्षत्रियो ने अंग्रेजो के विरुद्ध युद्ध का शंखनाद कर दिया था और लाल किला तक पर केसरिया लहरा आए थे--------

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दिल्ली के नजदीक गाज़ियाबाद, हापुड़, दादरी के बीच में राजपूत बहुल प्रसिद्ध साठा चौरासी क्षेत्र है जिसमे गहलोत(शिशोदिया) राजपूतो के 60 और तोमर राजपूतो के 84 गाँवों में राजपूतो की बहुत बड़ी आबादी रहती है। इसी कारण इसे आम बोलचाल में पश्चिम उत्तर प्रदेश का राजपूताना और छोटी चित्तोड़ भी कहा जाता है।

इस क्षेत्र में तोमर राजपूतो ने दिल्ली में उनकी सत्ता छिन जाने के बाद राज स्थापित किया जबकि गहलोत मेवाड़ के महान शाशक रावल खुमान के वंशज है। राणा खुमान के वंशज राणा वक्षराज ने मेवाड़ से आकर इस क्षेत्र में अपना राज स्थापित किया और विक्रम संवत 1106 में अपनी राजधानी देहरा गाँव में स्थापित की। इसी देहरा से क्षेत्र में गहलोत(सिसोदिया) राजपूतो के 60 गाँव निकले हैँ। राणा वक्षराज के भाई राणा हस्तराज ने हाथरस नगर बसाया और उनके वंशज आगरा, हाथरस में गहलोत और मथुरा के 42, बदायूँ के 18, फर्रुखाबाद के 12 और बुलंदशहर के स्याना-ऊंचागांव क्षेत्र के 12 गाँवों में बाछल के नाम से मिलते हैँ। 

इस साठा चौरासी क्षेत्र के राजपूतो का इतिहास बहुत गौरवशाली रहा है और लड़ाकू प्रवृत्ति के होने के साथ ही सरकारी दमन का हमेशा बहादुरी के साथ विरोध करते आए है। तुर्क, मुगलो के समय घोर दमनकारी शासन के बावजूद उनमे से कोई भी इन दिल्ली के बगल में बसे राजपूतो की शक्ति को खत्म नही कर पाया, जबकि वो खुद खत्म हो गए। इसी बहादुरी की एक झलक 1857 के संग्राम में भी देखने को मिली जब साठा चौरासी के राजपूतो ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध खुली बगावत कर दी थी। मुकीमपुर गढ़ी के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर ने क्षेत्र में बगावत का झंडा बुलंद किया ही, इसके साथ ही पिलखुवा, धौलाना और सपनावत जैसे कस्बे इस क्रांति के केंद्र थे। साठा चौरासी की इस क्रांति गाथा का पहला भाग धौलाना के शहीदों के बारे में यहाँ प्रस्तुत है जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने लाल किले पर क्षत्रिय शक्ति का प्रतिक केसरिया ध्वज फहरा दिया था-

***धौलाना के शहीद***


मेरठ में सैनिक बगावत की सूचना मिलते ही साठा चौरासी क्षेत्र में अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांति का वातावरण बनने लगा। बहुत से सैनिक मेरठ से दिल्ली जाने के क्रम में इस क्षेत्र में धौलाना, डासना आदि गाँवों में रुके। अगले दिन प्रातःकाल को सब धौलाना के चौधरी के यहाँ इकट्ठे हो गये और धौलाना की गलियों में ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध 'हर-हर महादेव' के नारे लगाने शुरू कर दिये, थोड़ी ही देर में धौलाना ग्राम तथा आस-पास के हजारों राजपूत युवक इकट्ठा हो गये। इसी दौरान साठा के सबसे बड़े गाँव धौलाना में ईद के मौके पर एक गाय काट दी गयी थी। जिसे यहाँ के ग्रामीणों ने ब्रितानियों का षड्यंत्र माना तथा अपने धर्म पर आघात होना माना। इस घटना से यहाँ धार्मिक उन्माद का वातावरण बन गया। इस उत्तेजित वातावरण में ग्रामीणों ने 'मारो फिरंगी को' के नारे लगाये और वे गाँव में स्थित पुलिस थाने की दिशा में चल पड़े, जहाँ उन्होंने उसमें आग लगा दी। थानेदार मुबारक अली मुश्किल से जान बचाकर भागने में सफल हुआ और वह निकटवर्ती गाँव ककराना में दिन भर गोबर के बिटोरो में छिपे रहा। रात में वह वहाँ से निकलकर मेरठ पहुँचा तथा अंग्रेज़ उच्च अधिकारियों को धौलाना की स्थिति से अवगत कराया। इस दौरान पूरा क्षेत्र बागियों के नियंत्रण में आ गया और अंग्रेजी सत्ता समाप्त हो गई। कई सप्ताह तक राजपूतो ने स्वतंत्र राज किया।

कुछ समय पश्चात् अधिकारी डनलप के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना की एक बड़ी टुकड़ी धौलाना पहुँच गयी और विद्रोह का निर्ममता से दमन करना शुरू किया। विद्रोह को दबाकर शांति स्थापित करने के बाद प्रतिशोध की कार्यवाई करने के लिये थानेदार की रिपोर्ट के आधार पर 13 राजपूतों तथा एक अग्रवाल बनिया लाला झनकूमल को गिरफ्तार करके डनलप के सामने लाया गया। क्रांतिकारियों में बनिये झनकूमल को देखकर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि- "राजपूतों ने ब्रिटिश शासन के विरूद्ध विद्रोह किया यह बात समझ में आती है किन्तु तुमने महाजन होकर, इन विद्रोहियों का साथ दिया, यह बात समझ में नहीं आती। तुम्हारा नाम इनके साथ कैसा आ गया?" लाल झनकू ने जवाब दिया कि "इस क्षेत्र में जब से आपके व्यक्तियों ने मुसलमानों के साथ मिलकर गौ-हत्या करायी तब से मेरे हृदय में गुस्सा पनप रहा था। मैं सब कुछ सहन कर सकता हूँ साब, किन्तु अपने धर्म का अपमान, गौ-माता की हत्या सहन नहीं कर सकता।"

डनलप ने इन 14 क्रांतिकारियो को फाँसी लगाने का आदेश दिया। परिणामतः गाँव में ही चौपाल पर खड़े दो पीपल के वृक्षों पर उन्हें फाँसी दे दी गयी।

इस क्षेत्र के व्यक्तियों को आतंकित करने तथा आने वाले समय में फिर इस प्रकार की घटना की पुनरावृत्ति न हो यह दिखाने के लिए चौदह कुत्तों को मारकर इन ग्रामीणों के शवों के साथ दफना दिया गया। धौलाना गाँव को बागी घोषित कर दिया तथा ग्रामीणों की सम्पत्ति जब्त करके अपने वफादारों को दे दी गई। पुलिस थाने को पिलखुवा स्थानान्तरित कर दिया गया। गाँव में एक ब्रिटिश सैन्य टुकड़ी नियुक्त की गयी जो काफी दिनों तक धौलाना में मार्च करती रही।

हालांकि इस घटना के बारे में एक दूसरा मत भी है।


इस घटना के सम्बन्ध में क्षेत्र निवासी ठाकुर मेघनाथ सिंह सिसौदिया जी(पूर्व विधायक) ने '1857 में ब्रितानियों के खिलाफ जनता व काली पल्टन द्वारा साठे में लड़ा गया प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (गदर) का आरम्भिक सच्चा वर्णन' शीर्षक से एक गुलाबी रंग का पैम्पलेट जारी किया था। उनके अनुसार------

"11 मई, 1857 को इस साठा क्षेत्र के राजपूतों का खून क्रांति के लिए खौल उठा। दोपहर से पहले ही धौलाना व पास-पड़ोस के हजारों राजपूत युवक ब्रिटिश सरकार के खिलाफ वीरतापूर्वक नारे लगाते हुए तथा ढोल, शंख, घड़ियाल बजाते हुए धौलाना की गलियों में घूमने लगे और हर-हर महादेव के नारे लगाने लगे। इससे भयभीत होकर धौलाना थाने के दरोगा व सिपाही थाने को छोड़कर भाग गये, इन क्रांतिकारियों ने मेरठ की काली पल्टन के सैनिकों के साथ मिलकर थाने में आग लगा दी तथा सभी सरकारी कागजात फूँक डाले। तत्पश्चात् ठाकुर झनकू सिंह के नेतृत्व में यह जत्था दिल्ली कूच कर गया। रास्ते में क्रांतिकारियों ने रसूलपुर, प्यावली के किसानों को अपने साथ चलने के लिए प्रेरित किया। रोटी मांगते हुए और रोटी बाँटते हुए वे दिल्ली की ओर चले दिये और 12 मई को प्रातः काल दिल्ली पहुँच गये। वहाँ 12 मई को धौलाना के राणा झनूक सिंह गहलोत ने दिल्ली के हजारों लोगों के सामने ब्रितानियों की गुलामी का चिन्ह यूनियन जैक को जो लाल किले पर टंगा हुआ था, ऊपर चढ़कर फाड़कर उसके स्थान पर अपनी केशरिया पगड़ी टांग दी और इस प्रकार दिल्ली के लाल किले पर केशरिया झण्डा फहरा दिया।

ब्रितानियों ने दिल्ली पर पुनः अधिकार करने के पश्चात् ठाकुर झनकू सिंह की खोजबीन की परन्तु उनका कहीं भी पत्ता नहीं चला। पूरब में उनकी रिश्तेदारी से सूचना प्राप्त हुई कि वह कमोना के बागी नवाब दूंदे खाँ के पासे है। दूंदे खाँ के पकड़े जाने पर ठाकुर झनकू सिंह, पेशवा नाना साहब के साथ नेपाल चले गये। साठा के क्षेत्र में धौलाना की जमींदारी मालगुजारी जमा न करने के अपराध में छीन ली...परिणाम यह निकला कि धौलाना के 14 क्रांतिकारियों ठाकुर झनकू सिंह को छोड़कर 13 राजपूत क्रांतिकारियों को पकड़ लिया गया। पकड़े जाने पर इनके परिवार के स्त्री-पुरूष तथा ग्रामवासियों को इकट्ठा करके सबके सामने धौलाना में पैंठ के चबूतरे पर खड़े दो पीपल के पेड़ों पर 29 नवम्बर, 1857 को फाँसी दे दी गयी। 

बागियों के घरो में आग लगा दी गई और इनके परिवारो पर भयंकर अत्याचार किये गए। अत्याचार की इंतेहा ये थी ठाकुर झनकू सिंह के पकड़े ना जाने पर खीज मिटाने के लिये उनके ही समान नाम के धौलाना के एक बनिये झनकूमल को फांसी पर लटका दिया गया। इन सबके बाद एक गहरे गड्ढे में इन सबकी लाशो को फिकवा कर उन सबके साथ एक एक जीवित कुत्ता बंधवा दिया गया और फिर गढ्ढे को पटवा दिया गया।"

धौलाना में फांसी पर चढ़ाए गए 14 शहीदों के नाम इस प्रकार है- 1. लाला झनकूमल 2. वजीर सिंह चौहान 3. साहब सिंह गहलौत 4. सुमेर सिंह गहलौत 5. किड्ढा गहलौत, 6. चन्दन सिंह गहलौत 7. मक्खन सिंह गहलौत 8. जिया सिंह गहलौत 9. दौलत सिंह गहलौत 10. जीराज सिंह गहलौत 11. दुर्गा सिंह गहलौत 12. मुसाहब सिंह गहलौत 13. दलेल सिंह गहलौत 14. महाराज सिंह गहलौत।
इनमें साहब सिंह तथा जिया सिंह सगे भाई थे। सन् 1957 में ठाकुर मेघनाथ सिंह सिसौदिया जी ने ठाकुर मानसिंह को साथ लेकर इस स्थान पर शहीद स्मारक बनवाया जो आज भी इन क्रांतिकारी ग्रामीणों की शहादत की याद दिला रहा है।


इस कड़ी के अगले भाग में कल हम आपको साठा चौरासी के दुसरे नायक मुकीमपुर गढ़ी के ठाकुर गुलाब सिंह तोमर और सपनावत गाँव के योगदान के बारे में बताएंगे।
सन्दर्भ-
1. http://www.kranti1857.org/kranti_ka_failav.php
2. ठाकुर मेघनाथ सिंह सिसोदिया जी द्वारा '1857 में ब्रितानियों के खिलाफ जनता व काली पल्टन द्वारा साठे में लड़ा गया प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (गदर) का आरम्भिक सच्चा वर्णन'
3-http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/09/1857-1.html

1857 की क्रांति के महानायक कुंवर सिंह की महागाथा (VEER KUNVAR SINGH,THE GREATEST FREEDOM FIGHTER)

===अंग्रेज़ो विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में राजपूतो का योगदान- भाग-3 ===


मित्रो जैसा कि सभी को पता है कि 1857 के संग्राम में राजपूत अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में सबसे आगे रहे थे। हमेशा की तरह राजपूतो ने इस संग्राम का नेतृत्व किया था। 1857 का संग्राम, सबसे पहले मुख्यत: एक सैनिक विद्रोह था जिसमे अधिकतर अवध, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के राजपूत सैनिक शामिल थे। इन सैनिको से प्रेरणा लेकर ही इन क्षेत्रो में आम जनता ने अंग्रेज़ो के विरुद्ध बगावत करी। अवध में तो ये बगावत सबसे भीषण थी और समाज के लगभग हर वर्ग ने संग्राम में भाग लिया जिसका नेतृत्व राजपूतो ने किया। अवध, पूर्वांचल और पश्चिम बिहार के राजपूतो ने संग्राम में सबसे सक्रीय रूप से भाग लिया जिसके परिणाम स्वरुप संघर्ष समाप्ति के बाद अंग्रेज़ो ने उनका दमन किया। सिर्फ अवध में ही एक साल के अंदर राजपूतो की 1783 किलों/गढ़ियों को ध्वस्त किया गया जिनमे से 693 तोप, लगभग 2 लाख बंदूके, लगभग 7 लाख तलवारे, 50 हजार भाले और लगभग साढ़े 6 लाख अन्य तरह के हथियारों को अंग्रेज़ो ने जब्त करके नष्ट किया। यहाँ तक की अधिकतर संपन्न राजपूतो के घर किलेनुमा होते थे, उन्हें भी नष्ट कर दिया गया। इसके बाद शस्त्र रखने के लिये अंग्रेज़ो ने लाइसेंस अनिवार्य कर दिया जो बहुत कम लोगो को दिया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ की अवध के राजपूत शस्त्रविहीन हो गए।इसके अलावा वर्तमान पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुन्देलखण्ड, मध्य प्रदेश, हरयाणा, राजस्थान में भी राजपूत ही स्वाधीनता के इस संघर्ष में सबसे आगे थे जिसका खामियाजा उन्हें अपनी जमीनें और रियासते गवाँ कर उठाना पड़ा।
अंग्रेज़ो के विरुद्ध संघर्ष में राजपूतो के योगदान से परिचित कराते हुए इससे पहले हम लखनेसर के सेंगर और वीर राम सिंह पठानिया पर पोस्ट कर चुके है। इस श्रृंखला में यह तीसरी पोस्ट 1857 के सबसे बड़े योद्धा बिहार के वीर राजपूत कुँवर सिंह जी और उनके भाई अमर सिंह जी पर है।

~~भारत माँ का सच्चा सपूत 1857 का महान राजपूत योद्धा वीर कुंवर सिंह 1777 -1858~~

जीवन परिचय और गौरव गाथा-----

बाबू कुंवर सिंह का जन्म आरा के निकट जगदीशपुर रियासत में 1777 में हुआ था | मुग़ल सम्राट शाहजहा के काल से उस रियासत के मालिक को राजा की उपाधि मिली हुई थी।ये उज्जैनिया पवार(परमार)राजपूत कुल के थे. कुंवर सिंह के पिता का नाम साहेबजादा सिंह और माँ का नाम पंचरतन कुवरी था | कुंवर सिंह की यह रियासत भी डलहौजी की हडप नीति का शिकार बन गयी थी।

कुंवर सिंह न केवल 1857 के महासमर के सबसे महान योद्धा थे, बल्कि वह इस संग्राम के एक वयोवृद्ध योद्धा भी थे। इस महासमर में तलवार उठाने वाले इस योद्धा की उम्र उस समय 80 वर्ष की थी। महासमर का यह वीर न केवल युद्ध के मैदान का चपल निर्भीक और जाबांज खिलाड़ी था, अपितु युद्ध की व्यूहरचना में भी उस समय के दक्ष , प्रशिक्षित एवं बेहतर हथियारों से सुसज्जित ब्रिटिश सेना के अधिकारियों, कमांडरो से कही ज्यादा श्रेष्ठ थे।

क्रांति की घटनाएँ------

10 मई 1857 से इस महासमर की शुरुआत के थोड़े दिन बाद ही दिल्ली पर अंग्रेजो ने पुन: अपना अधिकार जमा लिया था। अंग्रेजो द्वारा दिल्ली पर पुन:अधिकार कर लेने के बाद भी 1857 के महासमर की ज्वाला अवध और बिहार क्षेत्र में फैलती धधकती रही। दानापुर की क्रांतिकारी सेना के जगदीशपुर पहुंचते ही 80 वर्षीय स्वतंत्रता प्रेमी योद्धा कुंवर सिंह ने शस्त्र उठाकर इस सेना का स्वागत किया और उसका नेतृत्त्व संभाल लिया।
इस समय तक क्रांतिकारियों की अधिकांश गथिविधियाँ असफल सिद्ध हो रही थी क्योंकि उनमे उचित रणनीति का आभाव था,
महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के शब्दों में -----------

"अंग्रेजो का जुआ उतार फेकने के बाद जिस एक कमी के कारण क्रांतिकारियों के सारे परिश्रम विफल हो रहे थे,वह कुशलता और रणनीति की कमी जगदीशपुर के राजमहल ने शेष न रहने दी,इसलिए जगदीशपुर के उस हिन्दू राजा के ध्वज की और सोन नदी उतरकर ये सिपाही दोड़े जा रहे थे.क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम का नेत्रत्व करने वाला सुयोग्य नेता इन्हें जगदीशपुर में ही मिलने वाला था.राजपूत वंश की खान से ही जिस महान स्वतंत्रता सेनानी का जन्म हुआ उस वीर का नाम कुंवर सिंह था.अपने स्वदेश को गुलामी की कठिन अवस्था में देखकर मन में उत्पन्न हुई क्रोधाग्नि के कारण वह वृद्ध कुंवर सिंह अपने महल में मूंछो पर ताव देता खड़ा था.
वृद्ध युवा--हाँ वह वृद्ध युवा था,क्योंकि अस्सी शरद ऋतुएँ देह पर से उतर गई थी.परन्तु उनकी आत्मा का तेज अभी भी जीवित अंगारे सा दहकता था.अस्सी वर्ष का कुंवर सिंह,अस्सी वर्ष का कुमार और उसमे भी सिंह,,,उसके देश का अंग्रेजो द्वारा किया गया अपहरण उसे कैसे मान्य हो?????अपने स्वदेश का अपहरण करने वाली अंग्रेजी तलवार के मै टुकड़े करूँगा,ऐसी गर्जना कुंवर सिंह ने कीं और उन्होंने गुपचुप शिवाजी की निति पर चलते हुए नाना साहब से सम्पर्क करके क्रांति की योजना बनाई,

कुंवर सिंह के मन में क्रांति की भावनाएं जोर पकड़ रही हैं ये जानकारी जल्द ही अंग्रेजो को मिल गई और उन्होंने छल से कुंवर सिंह को पकड़ने की निति बनाई...
भयंकर चाल,भयंकर बोल और हर हर महादेव का बोल...अफजल खान वध के पोवाडा की चाल.....
पटना के कमिश्नर टेलर ने कुंवर सिंह को आतिथ्य का विनम्र निमन्त्रण भेजा,पर चतुर कुंवर सिंह ने अस्वस्थता का बहाना बनाकर इसे ठुकरा दिया,
जल्द ही दानापुर के बागी सिपाही जगदीशपुर आ पहुंचे,अब फिर किसके लिए ठहरना????
पटना शहर हाथी पर बैठकर जाने से भी अस्वस्थता के कारण जिस कुंवर सिंह ने मना कर दिया था वो राजा भोज परमार का वंशज और अस्सी साल का बुजुर्ग राजपूत अपनी रुग्ण शैय्या से तडाक से उठा और सीधा रणभूमि में ही जाकर रुका"

क्रांति की घटनाएँ-----

कुंवर सिंह के नेतृत्त्व में इस सेना ने सबसे पहले आरा पर धावा बोल दिया। क्रांतिकारी सेना ने आरा के अंग्रेजी खजाने पर कब्जा कर लिया। जेलखाने के कैदियों को रिहा कर दिया गया। अंग्रेजी दफ्तरों को ढाहकर आरा के छोटे से किले को घेर लिया। किले के अन्दर सिक्ख और अंग्रेज सिपाही थे। तीन दिन किले की घेरेबंदी के साथ दानापुर से किले की रक्षा के लिए आ रहे कैप्टन डनवर और उनके 400 सिपाहियों से भी लोहा लिया। डनवर युद्ध में मारा गया। थोड़े बचे सिपाही दानापुर वापस भाग गये। किला और आरा नगर पर कुंवर सिंह कीं क्रांतिकारी सेना का कब्जा हो गया। लेकिन यह कब्जा लम्बे दिनों तक नही रह सका। मेजर आयर एक बड़ी सेना लेकर आरा पर चढ़ आया। युद्ध में कुंवर सिंह और उसकी छोटी सी सेना पराजित हो गयी। आरा के किले पर अंग्रेजो का पुन: अधिकार हो गया।

कुंवर सिंह अपने सैनिको सहित जगदीशपुर की तरफ लौटे। मेजर आयर ने उनका पीछा किया और उसने जगदीशपुर में युद्ध के बाद वहा के किले पर भी अधिकार कर लिया। कुंवर सिंह को अपने 122 सैनिको और बच्चो स्त्रियों के साथ जगदीशपुर छोड़ना पडा। अंग्रेजी सेना से कुंवर सिंह की अगली भिडंत आजमगढ़ के अतरौलिया क्षेत्र में हुई। अंग्रेजी कमांडर मिल मैन ने 22 मार्च 1858 को कुंवर सिंह की फ़ौज पर हमला बोल दिया। हमला होते ही कुंवर सिंह की सेना पीछे हटने लगी अंग्रेजी सेना कुंवर सिंह को खदेड़कर एक बगीचे में टिक गयी। फिर जिस समय मिल मैन की सेना भोजन करने में जुटी थी, उसी समय कुंवर सिंह की सेना अचानक उन
पर टूट पड़ी। मैदान थोड़ी ही देर में कुंवर सिंह के हाथ आ गया। मिलमैन अपने बचे खुचे सैनिको को लेकर आजमगढ़ की ओर निकल भागा। अतरौलिया में पराजय का समाचार पाते ही कर्नल डेम्स गाजीपुर से सेना लेकर मिलमैन की सहायता के लिए चल निकला। 28 मार्च 1858 को आजमगढ़ से कुछ दूर कर्नल डेम्स और कुंवर सिंह में युद्ध हुआ। कुंवर सिंह पुन: विजयी रहे। कर्नल डेम्स ने भागकर आजमगढ़ के किले में जान बचाई।

अब कुंवर सिंह बनारस की तरफ बड़े। तब तक लखनऊ क्षेत्र के तमाम विद्रोही सैनिक भी कुंवर सिंह के साथ हो लिए थे। बनारस से ठीक उत्तर में 6 अप्रैल के दिन लार्ड मार्क्कर की सेना ने कुंवर सिंह का रास्ता रोका और उन पर हमला कर दिया। युद्ध में लार्ड मार्क्कर पराजित होकर आजमगढ़ की ओर भागा। कुंवर सिंह ने उसका पीछा किया और किले में पनाह के लिए मार्क्कर की घेरे बंदी कर दी। इसकी सुचना मिलते ही पश्चिम से कमांडर लेगर्ड की बड़ी सेना आजमगढ़ के किले की तरफ बड़ी। कुंवर सिंह ने आजमगढ़ छोडकर गाजीपुर जाने और फिर अपने पैतृक रियासत जगदीशपुर पहुचने का निर्णय किया। साथ ही लेगर्ड की सेना को रोकने और उलझाए रखने के लिए उन्होंने अपनी एक टुकड़ी तानु नदी के पुल पर उसका मुकाबला करने के लिए भेज दी। लेगर्ड की सेना ने मोर्चे पर बड़ी लड़ाई के बाद कुंवर सिंह का पीछा किया। कुंवर सिंह हाथ नही आये लेकिन लेगर्ड की सेना के गाफिल पड़ते ही कुंवर सिंह न जाने किधर से अचानक आ धमके और लेगर्ड पर हमला बोल दिया। लेगर्ड की सेना पराजित हो गयी।

अब गंगा नदी पार करने के लिए कुंवर सिंह आगे बड़े लेकिन उससे पहले नघई गाँव के निकट कुंवर सिंह को डगलस की सेना का सामना करना पडा। डगलस की सेना से लड़ते हुए कुंवर सिंह आगे बढ़ते रहे। अन्त में कुंवर सिंह की सेना गंगा के पार पहुचने में सफल रही। अंतिम किश्ती में कुंवर सिंह नदी पार कर रहे थे, उसी समय किनारे से अंग्रेजी सेना के सिपाही की गोली उनके दाहिनी बांह में लगी। कुंवर सिंह ने बेजान पड़े हाथ को अपनी तलवार से काटकर अलग कर गंगा में प्रवाहित कर दिया। घाव पर कपड़ा लपेटकर कुंवर सिंह ने गंगा जी पार की।
वीर सावरकर ने किस प्रकार अपनी पुस्तक 1857 के स्वतंत्रता समर के पृष्ठ संख्या 340-341 में इस घटना का वर्णन किया है आप स्वयं पढ़ें------
"भारत भूमि का यह सौभाग्य तिलक,स्वतंत्रता की तलवार-राणा कुंवर सिंह !गंगा पाट में बीचो बीच पहुँच गया तब शत्रु की एक गोली आई और राणा के हाथ में घुस गई.खून की धारा बह निकली.जिससे सारे शरीर में गोली का जहर फैलने का खतरा हो गया.....
यह देखते ही उस भीष्म ने क्या किया???
आंसू बहाने लगा क्या???
तनिक भी विचलित हुआ क्या?रक्त का बहाव रोकने को किसी से सहायता मांगी क्या??
नही-नही ऐसा कुछ भी नहीं हुआ.हाथ पर मक्खी बैठे,उतना भी कम्पित नही हुआ.उसने दुसरे हाथ से अपनी तलवार निकाली,और फिरंगी गोली से भ्रष्ट हुआ अपना हाथ कुहनी से छांट दिया और वह काटा हुआ टुकड़ा गंगा को अर्पण करते हुए कुंवर सिंह ने गंभीर गर्जना की--हे माता हे गंगा ! बालक का यह उपहार स्वीकार कर!!
इस महान वृद्ध राजपूत द्वारा भगीरथी को यह अलौकिक उपहार अर्पित करते ही उसकी शीतल फुआरो ने उसका देह सिंचन किया और मात्रप्रेम से उत्साहित यह वीरवर अपनी सेना सहित गंगा पार हो गया"
अंग्रेजी सेना उनका पीछा न कर सकी। गंगा पार कर कुंवर सिंह की सेना ने 22 अप्रैल को जगदीशपुर और उसके किले पर पुन: अधिकार जमा लिया। 23 अप्रैल को ली ग्रांड की सेना आरा से जगदीशपुर की तरफ बड़ी ली ग्रांड की सेना तोपों व अन्य साजो सामानों से सुसज्जित और ताजा दम थी। जबकि कुंवर सिंह की सेना अस्त्र -शस्त्रों की भारी कमी के साथ लगातार की लड़ाई से थकी मादी थी। अभी कुंवर सिंह की सेना को लड़ते - भिड़ते रहकर जगदीशपुर पहुचे 24 घंटे भी नही हुआ था। इसके बावजूद आमने-सामने के युद्ध में ली ग्रांड की सेना पराजित हो गयी।
चार्ल्स बाल की 'इन्डियन म्युटनि' में उस युद्ध में शामिल एक अंग्रेज अफसर का युद्ध का यह बयान दिया हुआ है की-------
"वास्तव में जो कुछ हुआ उसे लिखते हुए मुझे अत्यंत लज्जा आती है। लड़ाई का मैदान छोडकर हमने जंगल में भागना शुरू किया। शत्रु हमे पीछे से बराबर पीटता रहा। स्वंय ली ग्रांड को छाती में गोली लगी और वह मारा गया। 199 गोरो में से केवल 80 सैनिक ही युद्ध के भयंकर संहार से ज़िंदा बच सके। हमारे साथ के सिक्ख सैनिक हमसे आगे ही भाग गये थे"
22 अप्रैल की इस जीत के बाद जगदीशपुर में कुंवर सिंह का शासन पुन: स्थापित हो गया। किन्तु कुंवर सिंह के कटे हाथ का घाव का जहर तेजी से बढ़ रहा था इसके परिणाम स्वरूप 26 अप्रैल 1858 को इस महान वयोवृद्ध पराक्रमी विजेता का जीवन दीप बुझ गया।
राजा कुंवर सिंह के दो पुत्र हुए वे भी इस संग्राम में शहीद हुए
1. दल भंजन सिंह जो 5 नवंबर 1857 को कानपूर के युद्ध में शहीद हुए
2. वीर भंजन सिंह जो 8 अक्टूबर 1857 को बाँदा के युद्ध में शहीद हुए
आप परमार वंश की उज्जैनिया शाखा हुए थे बिहार में उज्जैन से आये हुए परमारों को उज्जैनिया कहा जाता है
अंग्रेज इतिहासकार होम्स लिखता है की-- उस बूढ़े राजपूत की जो ब्रिटिश सत्ता के साथ इतनी बहादुरी व आन के साथ लड़ा 26 अप्रैल 1858 को एक विजेता के रूप में मृत्यु हुई। एक अन्य इतिहासकार लिखता है की कुवरसिंह का व्यक्तिगत चरित्र भी अत्यंत पवित्र था, उसका जीवन परहेजगार था। प्रजा में उसका बेहद आदर- सम्मान था। युद्ध कौशल में वह अपने समय में अद्दितीय थे। 

इसका सबसे बड़ा सबूत यह है की इस महान योद्धा ने न केवल कई जाने माने अंग्रेज कमांडरो को युद्ध के मैदान में पराजित किया अपितु जीवन के अंतिम समय में विजित रहकर अपने गाँव की माटी में ही प्राण त्याग किया | उनकी मृत्यु 26 अप्रैल 1858 को हुई, जबकि उसके तीन दिन पहले 23 अप्रैल को जगदीशपुर के निकट उन्होंने कैप्टन ली ग्राड की सेना को युद्ध के मैदान में भारी शिकस्त दी थी। 
वीर सावरकर के शब्दों में-------
"""'जब कुंवर सिंह का जन्म हुआ था तब उनकी भूमि स्वतंत्र थी और जिस दिन कुंवर सिंह ने प्राण त्यागे उस दिन भी उनके किले पर स्वदेश और स्वधर्म का भगवा ध्वज लहरा रहा था,,राजपूतो के लिए इससे पुण्यतर मृत्यु और कौन सी हो सकती है??????
उसने अपने अपमान का प्रतिशोध लिया और अल्प साधनों से शक्तिशाली अंग्रेज सेना के दांत खट्टे कर दिए...श्री कुंवर सिंह की भूमिका किसी वीर काव्य के नायक स्थान पर शोभित हो सकती है,सन 1857 के क्रांतियुद्ध में कोई नेता सर्वश्रेष्ठ था तो वीर कुंवर सिंह था,युधकला में कोई उनकी बराबरी कर सके ऐसा कोई था ही नहीं,क्रांति में शिवाजी के कूट युद्ध की सही सही नकल कैसे की जाए उसी अकेले ने सिद्ध किया.तांत्या टोपे और कुंवर सिंह के युद्ध चातुर्य की तुलना करें तो कुंवर सिंह की कूट पद्धति ही अधिक बेजोड़ थी"""

कुंवर सिंह द्वारा चलाया गया स्वतंत्रता युद्ध खत्म नही हुआ। अब उनके छोटे भाई अमर सिंह ने युद्ध की कमान संभाल ली।

~~~अमरसिंह~~~

कुंवर सिंह के बाद उनके छोटे भाई अमर सिंह जगदीशपुर की गद्दी पर बैठा। अमर सिंह ने बड़े भाई के मरने के बाद चार दिन भी विश्राम नही किया। केवल जगदीशपुर की रियासत पर अपना अधिकार बनाये रखने से भी वह सन्तुष्ट न रहे। उन्होंने तुरंत अपनी सेना को फिर से एकत्रित कर आरा पर चढाई की। ली ग्रांड की सेना की पराजय के बाद जनरल डगलस और जरनल लेगर्ड की सेनाये भी गंगा पार कर आरा की सहायता के लिए पहुच चुकी थी। 3 मई को राजा अमर सिंह की सेना के साथ डगलस का पहला संग्राम हुआ। उसके बाद बिहिया, हातमपुर , द्लिलपुर इत्यादि अनेको स्थानों पर दोनों सेनाओं में अनेक संग्राम हुए। अमर सिंह ठीक उसी तरह युद्ध नीति द्वारा अंग्रेजी सेना को बार - बार हराते और हानि पहुचाता रहे, जिस तरह की युद्ध नीति में कुंवर सिंह निपुण थे। निराश होकर 15 जून को जरनल लेगर्ड ने इस्तीफा दे दिया। लड़ाई का भार अब जनरल डगलस पर पडा।
डगलस के साथ सात हजार सेना थी। डगलस ने अमर सिंह को परास्त करने की कसम खाई। किन्तु जून , जुलाई, अगस्त और सितम्बर के महीने बीत गये अमर सिंह परास्त न हो सके। इस बीच विजयी अमर सिंह ने आरा में प्रवेश किया और जगदीशपुर की रियासत पर अपना आधिपत्य जमाए रखा। जरनल डगलस ने कई बार हार खाकर यह ऐलान कर दिया जो मनुष्य किसी तरह अमर सिंह को लाकर पेश करेगा उसे बहुत बड़ा इनाम दिया जाएगा, किन्तु इससे भी काम न चल सका। तब डगलस ने सात तरफ से विशाल सेनाओं को एक साथ आगे बढाकर जगदीशपुर पर हमला किया। 17 अक्तूबर को इन सेनाओं ने जगदीशपुर को चारो तरफ से घेर लिया। अमर सिंह ने देख लिया की इस विशाल सैन्य दल पर विजय प्राप्त कर सकना असम्भव है। वह तुरंत अपने थोड़े से सिपाहियों सहित मार्ग चीरते हुए अंग्रेजी सेना के बीच से निकल गए। जगदीशपुर पर फिर कम्पनी का कब्जा हो गया, किन्तु अमर सिंह हाथ न आ सके। कम्पनी की सेना ने अमर सिंह का पीछा किया। 19 अक्तूबर को नौनदी नामक गाँव में इस सेना ने अमर सिंह को घेर लिया। अमर सिंह के साथ केवल 400 सिपाही थे। इन 400 में से 300 ने नौनदी के संग्राम में लड़कर प्राण दे दिए। बाकी सौ ने कम्पनी की सेना को एक बार पीछे हटा दिया। इतने में और अधिक सेना अंग्रेजो की मदद के लिए पहुच गयी। अमर सिंह के सौ आदमियों ने अपनी जान हथेली पर रखकर युद्ध किया। अन्त में अमर सिंह और उसके दो और साथी मैदान से निकल गये। 97 वीर वही पर मरे। 
नौनदी के संग्राम में कम्पनी के तरफ से मरने वालो और घायलों की तादाद इससे कही अधिक थी। 

कम्पनी की सेना ने फिर अमर सिंह का पीछा किया। एक बार कुछ सवार अमर सिंह के हाथी तक पहुच गये। हाथी पकड लिया, किन्तु अमर सिंह कूद कर निकल गए। अमर सिंह ने अब कैमूर के पहाडो में प्रवेश किया। शत्रु ने वहा पर भी पीछा किया किन्तु अमर सिंह ने हार स्वीकार न की।
इसके बाद राजा अमर सिंह का कोई पता नही चलता। जगदीशपुर की महल की स्त्रियों ने भी शत्रु के हाथ में पड़ना गवारा न किया। लिखा है की जिस समय महल की 150 स्त्रियों ने देख लिया की अब शत्रु के हाथो में पड़ने के सिवाय कोई चारा नही तो वे तोपों के मुँह के सामने खड़ी हो गयी और स्वंय अपने हाथ से पलीता लगाकर उन सबने ऐहिक जीवन का अन्त कर दिया।
बाबू कुँवर सिंह और अमर सिंह की शौर्य गाथा आज भी याद की जाती है और उनपर भोजपुरी में अनेक लोकगीत और लोकोक्तिया प्रचलित है-
बाबू कुंवरसिह तेगवा बहादुर
बंगला पर उडता अबीर
होरे लाला बांग्ला पर उडता अबीर।
बाबू कुंवर सिंह तोहरे राजबिनु,
हम ना रंगाइबो केसरिया।
कप्तान लिखे मिलअ कुंवर सिंह,
आरा के सबा बनाइब रे
बाबू कुंवर सिंह भेजते सनेसवा, मोसे
न चली चतुराई रे
जब तक प्रान रहीतन भीतर, मारग नहीं बदलाई रे
जे न हिदी कुंवर सिंह के साथ,
उ अगीला जन्म में होई सुअर।
ओकर बाद होई भुअर
राम अनुज जगजान लखन,
ज्यो उनके सदा सहाई थे।
गोकुल मे बलदाऊ के प्रिय थे,
जैंसे कुँवर कन्हाई थे।
वीर श्रेष्ठ आल्हा के प्यारे,
ऊदल ज्यो सुखदाई थे।
अमर सिंह भी कुंवर सिंह के
वैंसे ही प्रिय भाई थे।
कुवरसिंह का छोटा भाई
वैंसा ही मस्ताना था,
सब कहते हैं अमर सिंहभी
बडा वीर मर्दाना था।
संदर्भ सूची--
1---वीर सावरकर कृत 1857 का स्वतंत्रता समर पृष्ठ संख्या 259-271 एवं पृष्ठ संख्या 333-347
2-http://freegita.in/1857-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A…/2

दुल्ला भट्टी एक मुस्लिम राजपूत यौधा जिसकी याद में लोहड़ी का पर्व मनाया जाता है (DULLA BHATI,A MUSLIM RAJPUT WARRIOR)





लोहड़ी का पर्व एक मुस्लिम राजपूत योद्धा दुल्ला भट्टी कि याद में पुरे पंजाब और उत्तर भारत में मनाया जाता है ,

लोहड़ी की शुरुआत के बारे में मान्यता है कि यह राजपूत शासक दुल्ला भट्टी द्वारा गरीब कन्याओं सुन्दरी और मुंदरी की शादी करवाने के कारण शुरू हुआ है. दरअसल दुल्ला भट्टी पंजाबी आन का प्रतीक है. पंजाब विदेशी आक्रमणों का सामना करने वाला पहला प्रान्त था ।ऐसे में विदेशी आक्रमणकारियों से यहाँ के लोगों का टकराव चलता था .

दुल्ला भट्टी का परिवार मुगलों का विरोधी था.वे मुगलों को लगान नहीं देते थे. मुगल बादशाह हुमायूं ने दुल्ला के दादा सांदल भट्टी और पिता फरीद खान भट्टी का वध करवा दिया.
दुल्ला इसका बदला लेने के लिए मुगलों से संघर्ष करता रहा. मुगलों की नजर में वह डाकू था लेकिन वह गरीबों का हितेषी था. मुगल सरदार आम जनता पर अत्याचार करते थे और
दुल्ला आम जनता को अत्याचार से बचाता था.

दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उस समय पंजाब में स्थान स्थान पर हिन्दू लड़कियों को यौन गुलामी के लिए बल पूर्वक मुस्लिम अमीर लोगों को बेचा जाता था।

दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को न सिर्फ मुक्त करवाया बल्कि उनकी शादी भी हिन्दू लडको से करवाई और उनकी शादी कि सभी व्यवस्था भी करवाई।

सुंदर दास नामक गरीब किसान भी मुगल सरदारों के अत्याचार से त्रस्त था. उसकी दो पुत्रियाँ थी सुन्दरी और मुंदरी. गाँव का नम्बरदार इन लडकियों पर आँख रखे हुए था और सुंदर दास को मजबूर कर रहा था कि वह इनकी शादी उसके साथ कर दे.
सुंदर दास ने अपनी समस्या दुल्ला भट्टी को बताई. दुल्ला भट्टी ने इन लडकियों को अपनी पुत्री मानते हुए नम्बरदार को गाँव में जाकर ललकारा. उसके खेत जला दिए और लडकियों की शादी वहीं कर दी।जहाँ सुंदर दास चाहता था. इसी के प्रतीक रुप में रात को आग जलाकर लोहड़ी मनाई जाती है.!!


दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया। कहते हैं दुल्ले ने शगुन के रूप में उनको शक्कर दी थी। इसी कथा की हमायत करता लोहड़ी का यह गीत है, जिसे लोहड़ी के दिन गाया जाता है :


सुंदर, मुंदरिये हो,
तेरा कौन विचारा हो,
दुल्ला भट्टी वाला हो,
दुल्ले धी (लडकी)व्याही हो,
सेर शक्कर पाई हो।


दुल्ला भट्टी मुगलों कि धार्मिक नीतियों का घोर विरोधी था। वह सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष था.उसके पूर्वज संदल बार रावलपिंडी के शासक थे जो अब पकिस्तान में स्थित हैं। वह सभी पंजाबियों का नायक था।
आज भी पंजाब(पाकिस्तान)में बड़ी आबादी भाटी राजपूतों की है जो वहां के सबसे बड़े जमीदार हैं।

Sunday, September 13, 2015

देश को आरक्षण की आग में झोंकने वाले दो खलनायक--वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी


देश को आरक्षण की आग में झोंकने वाले दो खलनायक---

-----वीपी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी-----

सन् 1990 में देश को जातिवाद की अग्नि में जलाने का काम किया था वीपी सिंह ने।जब अपने ही दल के प्रतिद्वंदी चौधरी देवीलाल को राजनितिक पटकनी देने के लिये उन्होंने मण्डल आयोग की सिफारिशें लागु कर दी थी जिनके अनुसार तथाकथित पिछड़े वर्गों को सभी क्षेत्रों में 27% कोटा आरक्षित कर दिया गया था।इसके बाद देश में जो जातिगत दावानल की अग्नि प्रज्वलित हुई वो आज तक नही बुझ पाई है।
वी पी सिंह द्वारा लागु मण्डल आयोग की सिफारिशों के कारण कई जातियां हर प्रकार से साधनसम्पन्न और ताकतवर होते हुए भी आरक्षण की मलाई चट कर रही हैं और धोबी कुम्हार जोगी बढ़ई कहार केवट नाई डोम झींवर गड़रिया आदि का हक मार रही हैं।

ये तो हुई वी पी सिंह की बात जिन्हें सब खलनायक मानते हैं।अब बात उस शख्श की जिन्हें हाल ही में भारत रत्न दिया गया है और तथाकथित राष्ट्रवादी उन्हें महान बताते हुए नही थकते।किन्तु वी पी सिंह के बाद देश में आरक्षण की आग भड़काने का काम किसी ने किया है तो वो है पूर्व

 "प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी"-----

मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू होने के 09 साल बाद राजस्थान के जाटों ने भी खुद को पिछड़ा घोषित करवाने के लिए आंदोलन शुरू कर दिया।1999 में लोकसभा चुनाव और बाद में राजस्थान विधानसभा जीतने के लिए उस समय के प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने राजस्थान के सबसे सम्पन्न और ताकतवर जाट समुदाय को ओबीसी आरक्षण दे दिया,जबकि पिछड़ा वर्ग आयोग ने जाटों को हर प्रकार से सम्पन्न बताया था।
अटल बिहारी की गन्दी राजनीति से आरक्षण का लाभ उठाकर राजस्थान के अतिसम्पन्न और ताकतवर जाट समुदाय ने शिक्षण संस्थाओं और नोकरियों लगभग पूरा ओबीसी कोटा अकेले ही चट कर दिया।पंचायत/ नगर निकाय में ओबीसी के लिए आरक्षित अधिकतर सीटों पर जाटों का कब्जा हो गया।
जाटों द्वारा राजस्थान में ओबीसी कोटे का सूपड़ा साफ़ कर देने से गुर्जर जैसी मूल ओबीसी जातियां बुरी तरह प्रभावित हुई।और उन्होंने अनुसूचित जाति में शामिल होने के लिए हिंसक आंदोलन किया जिससे उनका संघर्ष पहले से जनजाति कोटे को अकेले भोग रहे ताकतवर मीणा समुदाय से हुआ।
सैंकड़ो गुर्जर आंदोलनकारी मारे गए।फिर भी ये मुद्दा अभी हल नही हुआ है।
अतिसम्पन्न जाट समुदाय को आरक्षण का लाभ मिलता देखकर लगातार पिछड़ रहे राजपूत और ब्रह्ममण समुदायो ने भी आरक्षण के लिए आंदोलन किया।और आज भी राजस्थान जातिगत दंगो के बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है।

राजस्थान में अपने भाइयों को आरक्षण मिलता देखकर अभी तक इस मांग के प्रति उदासीन रहे हरियाणा वेस्ट समुदाय के अतिअगड़े जाट समाज ने भी इसके लिए जबरदस्त आंदोलन शुरू कर दिया।जबकि हरियाणा और वेस्ट यूपी में जाट समुदाय आर्थिक सामाजिक और राजनितिक रूप से सबसे सम्पन्न  और ताकतवर है।
"हरियाणा पंजाब दिल्ली और वेस्ट यूपी में जाट पिछड़ा है तो यहाँ अगड़ा कौन है???"

इनकी ब्लैकमेलिंग के आगे झुककर कांग्रेस सरकार ने इन्हें ओबीसी सूची में शामिल कर दिया जिसे हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया।

उत्तर भारत के जाट, गुज्जर समाज के आरक्षण आंदोलन से प्रेरणा लेकर और केजरीवाल, नितीश के इशारे पर गुजरात का पटेल समाज भी हार्दिक पटेल के नेतृत्व में जबरदस्त तरीके से आंदोलित है।पटेल समुदाय के पिछड़े लोग ओबीसी दर्जा पाने के लिए ऑडी और मर्सडीज में रैलियों में जा रहे हैं।
इन्होंने भीड़ जुटाने तोड़ फोड़ हिंसा में जाट गुज्जरों को भी पीछे छोड़ दिया।
अब इनके जवाब में गुजरात के मूल ओबीसी भी आंदोलित हैं और पटेल समाज से प्रेरणा लेकर उत्तर भारत में जाट समुदाय भी ऐसा ही शक्ति प्रदर्शन करने की तैयारी में है और इसके जवाब में स्वर्णो और मूल ओबीसी में भी प्रतिक्रिया जरूर होगी।
मतलब देश में भयंकर जातिवादी संघर्ष होना तय है।
वहीँ मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ रही है,आईएस तेजी से भारत की और बढ़ रहा है।पंजाब में पाकिस्तान और आपिये दोबारा से खालिस्तानी अलगाववाद को जिन्दा करने की फ़िराक में हैं।दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर के कई राज्य देश से अलग होने की फ़िराक में हैं।
यही हाल रहा तो सिर्फ अगले दस साल के भीतर संयुक्त भारत वर्ष का नाम दुनिया के नक्शे पर नही मिलेगा।यही तो पाकिस्तान,चीन,जेहादी आतंकी,ईसाई मिशनरी,केजरी, सब चाहते हैं----

ये सब कुछ होता हुआ दिख रहा है और देश को जातिगत संघर्ष की इस भयंकर अग्नि में झुलसाने के लिए जो दो नेता सबसे ज्यादा जिम्मेदार हैं वो हैं ------
देश के दो पूर्व प्रधानमन्त्री वी पी सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी जिन्होंने अपने राजनितिक स्वार्थ में अँधा होकर भारी भूल की।
वीपी सिंह तो गुमनामी की मौत मर गए,उनके मण्डल ओबीसी आरक्षण का लाभ उठाकर सरकारी नोकरिया/पंचायत-नगर निकाय पद कब्जा चुके लोग भी कृतघ्न होकर उन्हें याद नही करते।
लेकिन अटल बिहारी को महान घोषित कर दिया और भारत रत्न भी दे दिया गया।
आप खुद मन्थन करें कि वी पी सिंह खलनायक थे तो क्या अटल बिहारी वाजपेयी कुछ कम खलनायक है?????

पंचायत चुनाव में आरक्षण संवैधानिक अधिकारो का उल्लंघन


===पंचायत चुनाव में आरक्षण के विरुद्ध आंदोलन===

शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण खत्म करने की बात करने वाले पहले चुनावो में आरक्षण और उससे भी पहले पंचायत चुनावो में आरक्षण खत्म करवा ले जो कहीँ ज्यादा अन्यायपूर्ण है।

एक लोकतंत्र में चुनावो में जातिगत आधार पर चुनाव लड़ने से वंचित करना लोकतान्त्रिक अधिकारो का हनन हैं। लेकिन संविधान में ऐसी व्यवस्था की गई और इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था का किसीने विरोध भी नही किया।  सरकारो ने एक कदम आगे बढ़ते हुए पंचायत चुनावो में अनुसूचित जाती के साथ तथाकथित पिछड़ा वर्ग को भी आरक्षण का प्रावधान कर दिया। चुनावो में संख्या का महत्व होता है। अगर चुनावो में आरक्षण देना ही है तो उनको देना चाहिये जिन जातियो की संख्या कम है, जिनमे से किसी ग्राम प्रधान का चुना जाना भी बहुत बड़ी बात होती है। लेकिन संख्या बल में सबसे बड़ी जातियो को भी आरक्षण का लाभ देना अन्याय और बेशर्मी की पराकाष्ठा है। लेकिन हद तो ये है की चिरनिंद्रा में लीन स्वर्ण समाज ने अपने लोकतान्त्रिक अधिकारो के इस खुले दमन का कभी कोई प्रतिकार नही किया। जबकि इस व्यवस्था ने स्वर्णो को पंचायत की राजनीति से गायब कर दिया है। स्वर्ण विधायक या सांसद तो बन सकता है लेकिन जिला पंचायत अध्यक्ष या ब्लॉक प्रमुख बनना उसके लिये दूर की कौड़ी हो गई है।

उत्तर पदेश में तो सरकारो ने स्वर्णो की राजनितिक हत्या करने की सुपारी ली हुई है। उत्तर प्रदेश में इस बार के पंचायत चुनावो में सरकार ने स्वर्णो के प्रति भेदभाव करने में पिछले सभी चुनावो को पीछे छोड़ दिया गया है। प्रदेश सरकार की यह नीति रही है कि पंचायत चुनावो में जानबूझकर स्वर्ण बहुल क्षेत्रो को आरक्षित कर दिया जाता है और स्वर्णो की अल्प संख्या वाले क्षेत्रो को सामान्य कर दिया जाता है। इससे दोनों ही जगह आरक्षित जातियो विशेषकर संख्या बल में ताकतवर कुछ विशेष तथाकथित पिछड़ी जातियो की जीत पक्की हो जाती है जिस कारण अध्यक्ष और प्रमुखी के चुनाव में इन्ही जातियो का दबदबा होता है।

 इस बार जिला और ब्लॉक पंचायत की आरक्षण व्यवस्था जो घोषित हुई है उसमे भी कोई कसर नही छोड़ी गई। स्वर्ण जाती बहुल क्षेत्रो को एकतरफा आरक्षित करके काफी समय से तैयारी करने वाले अनेक युवा स्वर्ण नेताओ  के अरमानो पर पानी फेर दिया गया है। उदाहरण के लिये राजपूत बहुल साठा चौरासी क्षेत्र की सभी सीटे आरक्षित कर दी गईं हैँ, जिसका मतलब उस क्षेत्र से कोई भी स्वर्ण समाज का व्यक्ति वोट तो दे सकता है लेकिन चुनाव नही लड़ सकता।

ऐसी स्थिति कमोबेश पूरे प्रदेश की है, लेकिन अगर अब भी इस खुले आम अन्याय का तीव्र विरोध नही किया गया तो बहुत शर्मनाक होगा। इसलिये उत्तर प्रदेश के स्वर्ण समाज से और विशेषकर राजनैतिक लोगो से ये अपील करते है कि इस अन्याय के विरुद्ध जोरदार आंदोलन चलाया जाए। इस अन्याय से स्वर्णो का राजनैतिक वर्ग सीधे प्रभावित होता है। यह सरकारो की साजिश है कि स्वर्ण समाज में नए युवा राजनैतिक नेतृत्व की पैदा होने से पहले ही हत्या कर दी जाए। इसलिये स्वर्णो का राजनैतिक नेतृत्व खुद आगे बढ़ कर राज्य व्यापी आंदोलन की शुरुआत करे और यह अन्यायपूर्ण आरक्षण व्यवस्था खत्म ना होने तक पंचायत चुनाव बहिष्कार का एलान करें।

Thursday, September 10, 2015

सतीत्व की अनूठी मिशाल रानी पद्मिनी और गोरा बादल की वीरता


🚩चित्तौड़ की महारानी पद्मनी 
त्याग,सतीत्व,प्रेरणा,जौहर और वीरता की अनुपम मिशाल ....

समय 13वीं ईस्वी जब चित्तौड़गढ़ लगातार तुर्को के हमले झेल रहा था बाप्पा रावल के वंशजो ने हिंदुस्तान को लगातार तुर्को और मुस्लिम आक्रांताओ को रोके रखा
चित्तोड़ के रावल समर सिंह के बाद उनके बेटे रतन सिंह का अधिकार हुआ उनका विवाह रानी पद्धमणि से हुयी जो जालोर के चौहान वंश से थी (कुछ उन्हें सिंहल द्विव कुछ जैसलमेर के पूंगल की भाटी रानी भी बताते है) उस वक़्त जालोरऔर मेवाड़ की कीर्ति पुरे भारत में थे रतन सिंह जी की पत्नी पद्मनी अत्यंत सुन्दर थी इसी वजह से उनकी ख्याति दूर दूर फ़ैल गयी
इसी वजह दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अल्लाउद्दीन ख़िलजी रानी पद्मनी की और आकर्षित होकर रानी को पाने की लालसा से चित्तोर चला आया और रानी पद्मणि को अपनी रानी बनाने की ठानी

अल्लाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने चितौड़ के किले को कई महीनों घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया |

अंत अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने थक हार कर एक योजना बनाई जिसमें अपने दूत को चितौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि "हम आपसे संधि करना चाहते है अगर आप एक बार रानी का चेहरा हमें दिखा दे तो हम यहाँ से दूर चले जायेगे"

इतना सुनते ही रत्नसिंह जी गुस्से में आ गए और युद्ध करने की ठानी पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि " सिर्फ मेरी वजह से व्यर्थ ही चितौड़ के सैनिको और लोगो का रक्त बहाना ठीक नहीं रहेगा " रानी ने रतन सिंह जी को समझाया और सायं से काम लेने को कहा रानी नहीं चाहती थी कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अल्लाउद्दीन की लाखो की सेना के आगे बहुत छोटी थी | 
तभी रानी पद्मनी ने एक सुझाव दिया और रतन सिंह जी को मनाया

अल्लाउद्दीन अच्छी तरह से जनता था की राजपूतो का हराना इतना आसान भी नही और अगर सेना का पड़ाव उठा दिया और उसके सेनिको का मनोबल टूट जायेगा व बदनामी होगी वो अलग इसने मन ही मन एक योजना बनाई

एक निश्चित समाज चित्तौड़ के द्वार खोले गए अल्लाउद्दीन ख़िलजी का स्वागत हुआ और वादे के मुताबिक रानी पद्मनी को देखने के लिए लाया 

किल्ले के हजारो राजपूतो की भोहे तन गयी अल्लाउद्दीन को सामने देख वो आवेश में आ पर राणा जी और रानी के हुकम की पालना अपनी तलवारो को म्यान में रख कर करते गए राजपूत जनाना में किसी भी पुरुष का जाना निषेद था केवल छटे हुए कुछ सगोत्र राजपुत जनाना के बहार सुरक्षा में थे उसके आगे सेना उन्ही आज्ञा से कोई आर पार नही जा सकता था

रानी पद्मनी का महल के कमरे के पीछे एक बड़ा सरोवर था उसमे एक छोटा महल था वाहा अल्लाउद्दीन को बिठाया गया और पानी के दूसरी तरफ रानी पद्मनी महल मे उनके कमरे एक बड़ा काँच/दर्पण लगाया जिसका प्रतिबिम्ब सरोवर के पानी में गिरता रानी के केवल क्षण भर के लिए देखा वही प्रतिबिम्ब पानी में दूसरी तरह से अल्लाउद्दीन ने देखा

रानी के मुख की परछाई में उसका सौन्दर्य देख देखकर अल्लाउद्दीन पागल सा हो गया और उसने अभी रानी को हर हाल में पाने की ठान ली

जब रत्नसिंह अल्लाउद्दीन को वापस जाने के लिए किले के द्वार तक छोड़ने आये तो अल्लाउद्दीन ने अपने सैनिको को संकेत कर रत्नसिंह को धोखे से गिरफ्तार कर लिया |
और रानी के पास सन्देश भिजवाया अगर वो उसके हरम में आती है तो वो रतन सिंह जी को छोड़ देंगे
किल्ले में हाहाहाकार मच गया जिसका डर था वही हुआ अब सब कुछ् रानी पर था

पर रानी ने भी अल्लाउद्दीन ख़िलजी को जवाब उसी की भाषा में देना उचित समझा और दूत से सन्देश भिजवाया की "मै आप के साथ आने को तैयार हु पर मेरे साथ 650 दासिया और होगी और पति के अंतिम दर्शन कर आपके सम्मुख उपस्थित हो जाउंगी"


रानी पद्मनी की शर्त मान ली गयी अल्लाउद्दीन के ख़ुशी का ठिकाना न रहा 

इधर किल्ले में रानी पद्मनी ने अपने काका गोरा चौहान व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर साढ़े छः सौ डोलियाँ तैयार करवाई 

राजपूतो ने इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गया

चित्तोड़ के द्वार खोले गए तुर्क सेना निचिंत थी रानी पद्मनी की डोली जिसमे राजपूत वीर बेठे थे वही आगे पीछे की कमान गोरा बादल संभाले हुए थे तुर्क सेना जश्न मना रही थी बिना लड़े जीत का राजपूत जो भेष बदल कर चल रहे थे अजीब सी शांति थी सबके चेहरे पर अल्लाउद्दीन दूर बेठा देख रहा था और अति उत्साहित था
तभी पद्मनी की डोली रतन सिंह जी के दर्शन के लिए रुकी तबी एका एक सिंह गर्जना हुआ वीर गोरा चौहान ने तलवार निकल दी इधर बादल ने हुंकार भरी और 650 डोलियों में भरे हुए राजपूत और 1300 राजपूत जो कहारों के भेष में थे एक दम से तुर्क/यवन की सेना पर टूट पड़े तुर्क कुछ समझ पाते इससे पहले सर्व प्रथम रंतन सिंह जी को कैद से छुड़ाया और एक योजना के तहत उन्हें जल्दी से किल्ले में ले जाया गया तुर्क सेना में अफरा तफरी मच गयी अल्लाउद्दीन भी बोखला गया बहुत से राजपूत लड़ते रहे पर योजना के तहत हजारो की लाशे बिछाकर पुनः किल्ले में आ गए

इस अप्रत्याक्षित हार से तुर्क सेना मायूस हुयी अल्लाउद्दीन बहुत ही लज्जित हुआ अल्लाउदीन में चित्तोड़ विजय करने की ठानी और अपने दूत भेज कर गुजरात अभियान में लगी और सेना बुला ली अब राजपूतो की हार निश्चित थी

7 माह चित्तोड़ को घेरे रखा 
किल्ले से राजपूतो ने 7 माह तुर्को चित्तोड़ में घुसने नही दिया अंत किल्ले में रसद की कमी हो गयी और राजपूतो ने जौहर और शाका की ठानी

राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया | जौहर के लिए वहा मैदान में रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 23000 राजपूत रमणियों ने विवाह के जोडे में अपने देवी देवताओ का स्मरण कर सतीत्व और धर्म की रक्षा के जौहर चिता में प्रवेश किया | थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया | 
जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी और उसकी सेना भी सोच में पड़ गयी

| महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर 30000 राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे शेरो की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ 

रानी पद्मनी के काका गोरा और उसके भाई बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया -

बादल बारह बरस रो,लड़ियों लाखां साथ |
सारी दुनिया पेखियो,वो खांडा वै हाथ ||

इस प्रकार सात माह के खुनी संघर्ष के बाद 18 अप्रेल 1303 को विजय के बाद उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि आख़िर विजय किसकी हुई और उसकी अधीनता स्वीकार कर सके | 

रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी |
संदर्भ---
1-वीर विनोद
2-http://www.gyandarpan.com/2011/03/rani-padmini.html?m=1

Wednesday, September 9, 2015

स्वतंत्र भारत में सर्वोच्च सैन्य पुरुस्कार प्राप्त करने वाले वीर राजपूत सैनिक

                          हनुतसिंह राठौड़

जो लोग आजकल राजपूतों के शौर्य बलिदान और वीरता पर सवाल उठाते है और हमे गुजरे हुए कल की बात बताते हैं वो जान लें कि स्वतंत्र भारत में भी सबसे ज्यादा सैन्य पुरुस्कार जिस समाज ने जीते हैं वो राजपूत समाज के वीर सैनिको ने जीते हैं।
----परमवीर चक्र: सर्वोच्च सैन्य सम्मान-----

# राजपूत जिन्हे परमवीर चक्र से नवाजा गया है-
1. नायक जादुनाथ सिंह राठौड़
2. हवलदार पीरु सिंह शेखावत
3. कप्तान गुरुबचन सिंह सलारिया
4. मेजर शैतान सिंह भाटी
5. राइफल मैन संजय कुमार डोगरा

# राजपूत जिन्हे महावीर चक्र से नवाजा जा चुका है -
1. ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह डोगरा
2. सिपाही दीवान सिंह
3. मेजर खुशाल चंद
4. लेफ्टिनेंट किशन सिंह राठौर
5. ब्रिगेडियर यदुनाथ सिंह भाटी
6. मेजर ठाकुर पृथि चन्द
7. राइफलमैन धोकल सिंह
8. नाइक नर सिंह
9. लेफ्टिनेंट कर्नल कमल सिंह पठानिया
10. लेफ्टिनेंट कर्नल अनंत सिंह पठानिया
11. लेफ्टिनेंट भगवान् दत्त डोगरा
12. ब्रिगेडियर शेर प्रताप सिंह श्रीकंठ
13. राइफलमैन जसवंत सिंह
14. कप्तान चन्दर नारायण सिंह
15. लेफ्टिनेंट कर्नल रघुबीर सिंह राजावत
16. मेजर अनूप सिंह गुहिलोत
17. लिएउटेनैंट कर्नल राजकुमार सिंह
18. मेजर बसदेव सिंह मनकोटिआ
19. लेफ्टिनेंट कर्नल महाराजा सवाई भवानी सिंह राजावत
20. मेजर जयवीर सिंह
21. ग्रुप कप्तान चन्दन सिंह चम्पावत
22. नाइक सुगन सिंह राठौर
23. लांस नाइक दृग पाल सिंह राठौड़
24. लेफ्टिनेंट कर्नल हनुत सिंह राठौड़
25. कर्नल उदय सिंह इंदा
26. कप्तान प्रताप सिंह
27. मेजर राजेश सिंह अधिकारी

Monday, September 7, 2015

गणगौर पर्व--GANGAUR FESTIVAL ,THE INTEGRAL PART OF RAJPUTANA CULTURE



गणगौर पर्व-

मित्रो राजपूत समाज अपनी विशेष रीती रिवाज और संस्कृति के लिये जाना जाता है। राजपूत हिन्दू समाज के सिरमौर है इसलिये बाकी जातीया भी राजपूत संस्कृति को आदर्श के रूप में देखती हैँ। राजपूतो में साल भर में कई तरह के त्यौहार मनाते हैँ और राजपूतो में इनको विशेष तरीको और शानो शौकत के साथ मनाया जाता है। ऐसे ही एक गणगौर नामक त्यौहार के महत्व से आपका परिचय आज कराएंगे जो राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरयाणा, गुजरात के कई क्षेत्रो में बहुत लोकप्रिय है लेकिन राजपूत स्त्रियों के लिये इसका विशेष महत्व है और राजपूत समाज में यह पर्व बहुत धूम धाम से मनाया जाता है।
गणगौर एक प्राचीन त्यौहार है जिसमे शिव जी के अवतार के रूप में गण(ईसर) और पार्वती के अवतार के रूप में गौरा माता का पूजन किया जाता है। यह होली के तीन बाद से शुरू होता है और 18 दिन तक चलता है जिसमे महिलाये अपने यहाँ गणगौर और ईसार की पूजा करती है।

मान्यता है कि प्राचीन समय में पार्वती जी ने शंकर भगवान को पति (वर) रूप में पाने के लिए व्रत और तपस्या की। शंकर भगवान तपस्या से प्रसन्न हो गए और वरदान माँगने के लिए कहा। पार्वती ने उन्हें ही वर के रूप में पाने की अभिलाषा की। पार्वती की मनोकामना पूरी हुई और पार्वती जी का शिव जी से विवाह हो गया। तभी से कुंवारी लड़कियां इच्छित वर पाने के लिए ईशर और गणगौर की पूजा करती है जो कि होली के दूसरे दिन से शुरू होकर अठारह दिनों तक चलता है। प्रात:काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करके कन्याएँ व महिलाएँ, शहर या ग्राम से बाहर सरोवर अथवा नदियों तक जाती हैं, जहाँ से शुद्ध जल और उपवनों से हरी घास-दूब तथा रंग-बिरंगे पुष्प लाकर गौरा देवी के गीत गाते हुए समूह में अपने घरों को लौटती हैं और घर आकर सब मिलकर गौराजी की अर्चना और पूजा आराधना करती हैं। सुहागिन स्त्री पति की लम्बी आयु के लिए यह पूजा करती है। यह पर्व इन क्षेत्रो में विशेषकर राजपूतो में बहुत धूम धाम से मनाया जाता है और गणगौर का यहाँ के राजपूत समाज में अपना महत्व है। बहुत से स्थानो में मेले लगते है और काम काज बंद रहता है।

पुराने समय में राजपूत राजघरानो ,ठिकानो ,रावलो से गणगौर की सवारी निकली जातीथी जो की अपने आप में एक भव्य आयोजन होता था। सभी समाज के लोगो को इस सवारी का इन्तजार रहता था और शाही गणगौर के हवेली से निकलते ही सभी लोग उस सवारी का हिस्सा बन जाते थे। राजपूत औरते सिर्फ जनाना ड्योढ़ी तक गणगौर छोड़ने आती थी। पहले राजपरिवारों की महिलाएं सिंजारा मनाती हैं और दूसरे दिन गणगौर माता की चांदी की पालकी तैयार की जाती है। राजपरिवार की महिलाएं गणगौर माता की पूजा अर्चना कर जनानी ड्योढी से पालकी को विदा करती हैं। रियासत काल में गणगौर के दिन ठिकानेदारों की औरते(ठाकुरानिया) राजमहलों में पूजा कर घूमर गणगौर त्यौहार मानती थी राजघरानों में रानियाँ और राजकुमारियाँ ,बाईसा सभी प्रतिदिन गौर की पूजा करती हैं।

रियासत काल में गणगौर में राजसी ठाट बाट देखने को मिलते थे और विभिन्न समाज के लोग दूर दूर से बड़े ठिकानो और राजघरानो में आया करते थे। गणगौर के अवसर पर मंदिरों में विशेष भोग व पूजा के कार्यक्रम सम्पन्न होते है महूर्त पर पूजा होती है और सवारी निकली जाती है।
समय के साथ ज्यादातर समाज अपनी गणगौर अलग निकलने लगे है। जयपुर की गणगौर दुनिया भर में प्रसिद्ध है। हाथी ,घोड़े और भारी लवाजमे के साथ ये निकलती है। वही मेवाड़ राजघराने की गणगौर भी काफी प्रसिद्ध है। .... पहले कोई राजपूत राजा युद्ध हार जाता था तो दूसरे राजा उनकी उपाधि,राज झंडा, राज चिन्ह के साथ गणगौर भी छीन कर ले जाते थे जो अपने आप में अपनी कीर्ति बखान करती थी। मेवाड़ राज्य की गणगौर मालवा के सोनिगरा चौहानो के ठिकाने"नामली" में है।

अगर आप गणगौर त्यौहार के समय राजस्थान में हैं तो सभी लड़कियां और विवाहित स्त्रियाँ गणगौर की पूजा के वक़्त बहुत से गीत गाती सुनाई देंगी। राजस्थान में गणगौर का त्यौहार बहुत मान्यता रखता है। वसंत उत्सव के आते ही होली के रंग के साथ ही गणगौर पूजा का रंग भी राजस्थान की हवा में फैला दिखाई देता है।
राजस्थान में इस संदर्भ के कुछ गीत है-
""भँवर म्हाने खेलण दो गणगौर""
""औढो कोढो वीरा रांवला रे ,राई चन्दन को रूख ""
""ओ म्हारी घूमर छे नखराळी ऐ माँ घूमर रमवा म्हें जास्याँ ओ राजरी घूमर रमवाम्हें जास्याँ""
""म्हारा दादोसा रे जी मांडी गणगौर म्हारा काकोसा रे मांडी गणगौर "


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