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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Thursday, October 22, 2015

पूर्व उपराष्ट्रपति स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत(The legendary Bhairo singh Shekhawat ji)

आज क्षत्रिय समाज के पुरोधा देश के पूर्व उपराष्ट्रपति स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत जी की जयंती है।
स्वर्गीय भैरो सिंह जी की गणना स्वतंत्र भारत के सर्वाधिक योग्य और महान राजनेताओं में की जाती है।वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में एक थे।
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जीवन परिचय----

भैरोंसिंह शेखावत जी का जन्म 23 अक्टूबर 1923 ईस्वी को तत्कालिक जयपुर रियासत के गाँव खाचरियावास में हुआ था। यह गाँव अब राजस्थान के सीकर जिले में है। इनके पिता का नाम श्री देवी सिंह शेखावत और माता का नाम श्रीमती बन्ने कँवर था। गाँव की पाठशाला में अक्षर-ज्ञान प्राप्त किया। हाई-स्कूल की शिक्षा गाँव से तीस किलोमीटर दूर जोबनेर से प्राप्त की, जहाँ पढ़ने के लिए पैदल जाना पड़ता था। हाई स्कूल करने के पश्चात जयपुर के महाराजा कॉलेज में दाखिला लिया ही था कि पिता का देहांत हो गया और परिवार के आठ प्राणियों का भरण-पोषण का भार किशोर कंधों पर आ पड़ा, फलस्वरूप हल हाथ में उठाना पड़ा।
बाद में पुलिस की नौकरी भी की; पर उसमें मन नहीं रमा और त्यागपत्र देकर वापस खेती करने लगे।

इनकी पत्नी का नाम सूरज कंवर और एकमात्र संतान पुत्री रतन कँवर है।इनके दामाद श्री नरपत सिंह राजवी हैं जो राजस्थान में मंत्री रह चुके है ।

राजस्थान में वर्ष 1952 में विधानसभा की स्थापना हुई तो शेखावत ने भी भाग्य आजमाया और विधायक बन गए। फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा तथा सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ते हुए विपक्ष के नेता, मुख्यमंत्री और उपराष्ट्रपति पद तक पहुँच गए।

भैरो सिंह शेखावत का राजनितिक कैरियर एक नजर में
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1-आरएसएस में स्वयंसेवक रहे। थानेदार की नौकरी छोड़ने के बाद 1948 में जनसंघ की सदस्यता ली। शेखावत ने 1952 में विधानसभा की चुनाव लड़ा।

2-जनसंघ के प्रदेश अध्यक्ष रहे।

3-जनसंघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे।

4-भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे।

5-भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य रहे।

6-जिन सीटों पर वे विधायक रहें

1952 दांतारामगढ़ से 
1957 श्रीमाधोपुर से 
1962 किशनपोल से
1967 किशनपोल से 
1977 छबड़ा से 
1980 छबड़ा से 
1985 आमेर से 
1990 धौलपुर से 
1993 बाली से 
1998 बाली से

7-राज्य सभा सदस्य : 1974 से 1977

8-मुख्यमंत्री

पहली बार : 22 जून, 1977 से 15 फरवरी, 1980 
दूसरी बार : 4 मार्च, 1990 से 15 दिसबर, 1992
तीसरी बार : 4 दिसंबर, 1993 से 31 दिसंबर, 1998

9-विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष

पहली बार : 15 जुलाई, 1980 से 10 मार्च,1985 
दूसरी बार : 28 मार्च,1985 से 30 दिसंबर, 1989 
तीसरी बार : 8 जनवरी, 1999 से 18 अगस्त, 2002

10-उपराष्ट्रपति : (देश के 11 वे उपराष्ट्रपति)

19 अगस्त, 2002 से 21 जुलाई, 2007
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सभी पक्षो में स्वीकार्यता---
बीजेपी के संस्थापक सदस्यों में रहे भैरोसिंह जी की स्वीकार्यता सभी दलो में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर थी।उपराष्ट्रपति के चुनाव में उनके विरुद्ध दलित नेता सुशील कुमार शिंदे को इस उद्देश्य से खड़ा किया गया था कि वो एनडीए ख़ेमे के दलित मतों में सेंधमारी करेंगे।मगर जब परिणाम आया तो मालूम पड़ा कि उल्टा स्व: भैरोसिंह जी के पक्ष में विपक्षी दलो में भारी  क्रॉस वोटिंग हुई थी।

लेकिन यह भी तथ्य है कि स्वर्गीय भैरोसिंह जी के मुख्यमंत्रिकाल में ही राजस्थान में राजपूत विधायको की संख्या घटकर 16 तक आ गयी थी और जाट विधायको की संख्या बढ़कर 50 तक पहुंच गयी थी।उन्होंने जाटों को बीजेपी से जोड़ने का भरसक प्रयत्न किया पर सफलता नही मिली।यहाँ तक कि राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में अपने भतीजे प्रतापसिंह खाचरियावास के विरुद्ध उन्होंने जाट छात्र नेता पूनिया को समर्थन दिया था।
राजपूत समाज से अलग हटकर भैरोसिंह जी ने जमीदारी उन्मूलन का समर्थन किया और रूपकँवर सती मामले में भी राजपूतो की नाराजगी के बावजूद सती प्रथा की निंदा भी की।

हाल ही में बीजेपी की कोई पत्रिका प्रकाशित हुई है उसमे भी स्वर्गीय भैरोसिंह जी के बीजेपी में योगदान का उल्लेख तक नही है।
ये विडम्बना ही है कि जिस पार्टी को बनाने और मजबूत करने के लिए भैरोसिंह जी ने कई बार अपने समाज,परिवारजनो तक की नाराजगी मोल ली और अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया उस पार्टी ने उनकी उपलब्धियों और योगदान का उल्लेख करना भी गवारा नही किया।।

अंतिम दिन-------
जब भैरो सिंह जी राजस्थान छोड़कर देश के उपराष्ट्रपति बनने जा रहे थे तो उन्होंने ही वसुंधरा राजे को राजस्थान बीजेपी की कमान सौंपने का निर्णय लिया था।
यह वही वसुंधरा राजे हैं, जिन्होंने राजस्थान के सिंह कहलाने वाले भैरोंसिंह शेखावत को अपने प्रदेश में ही बेगाना करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

स्वर्गीय शेखावत राजस्थान में विपक्ष के नेता की अपनी गद्दी वसुंधरा राजे को सौंपकर दिल्ली गए थे। लेकिन वसुंधरा राजे ने राज शिष्टाचार की वह व्यावहारिक परंपरा भी नहीं निभाई, जिसमें देश के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को पूरे कार्यकाल में अधिकारिक रूप से हर प्रदेश में कमसे कम एक बार तो आमंत्रित किया ही जाता है। 

श्रीमती राजे यह नहीं चाहतीं थीं कि उपराष्ट्रपति के पद से रिटायर होने के बाद शेखावत फिर से राजस्थान में अपनी राजनीतिक पकड़ गहरी करें। जो लोग थोड़ी बहुत राजनीति समझते हैं, उनको यह भी अच्छी तरह से पता है कि वसुंधरा राजे अपने कार्यकाल में इतनी आक्रामक हो गई थीं कि बीजेपी के बहुत सारे लोग शेखावत की परछाई से भी परहेज करने लगे थे। वजह यही थी कहीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे नाराज न हो जाएं।
आज भी शेखावत जी के निधन के बाद वसुंधरा उनके दमाद नरपत सिंह राजवी की घोर विरोधी है और उन्हें मन्त्रीमण्डल में शामिल नही कर रही है।
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निधन----
वे कांग्रेस के धुर-विरोधी वरिष्ठ नेताओं में प्रमुख थे लेकिन उन्हें सभी राजनीतिक दलों में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।उनकी स्वीकार्यता सभी दलों में बराबर थी।तभी उपराष्ट्रपति चुनाव में उनको सभी दलों का वोट मिला था।
उनकी स्वीकार्यता सर्वसमाज में थी।
दिनांक 15 मई 2010 को जयपुर में 86 वर्ष की आयु में आपका देहांत हो गया।

स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत जी को शत शत नमन।
Thakur Bhairo Singh Shekhawat Ji

Wednesday, October 21, 2015

फरीदाबाद में दलितों को जलाने की कथित घटना कहीं मिडिया के दलालों और सेकुलर गैंग द्वारा बिहार चुनाव को प्रभावित करने की साजिश तो नहीं???(prestitutes in faridabad)

----फरीदाबाद में दलितों को जलाने की कथित घटना कहीं मिडिया के दलालों और सेकुलर गैंग द्वारा बिहार चुनाव को प्रभावित करने की साजिश तो नहीं??????----

फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में दबंग राजपूत नही थे बल्कि वहां के दलित परिवार पिछले कई दशक से गुंडई कर रहे थे जबकि राजपूत ही इन्हें बर्दाश्त कर रहे थे क्योंकि हरियाणा में दलितों का बड़ा वोटबैंक है और वहां राजपूतो की संख्या दलितों के सामने न के बराबर है इसलिए शासन प्रशासन का पूरा समर्थन इन कथित दलितों को प्राप्त था।

एक वर्ष पहले इसी दलित परिवार के लोगो ने छोटे से विवाद में 3 राजपूतों की नृशंस हत्या कर दी थी तब उन राजपूतो का दुःख दर्द बाटने कौन गया??
उनके बच्चे भी अनाथ हुए होंगे तब मिडिया के दलाल कहाँ मर गए थे???
तब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और हुड्डा मुख्यमंत्री था तब राहुल गांधी उन राजपूत परिवारो के आंसू पोंछने क्यों नही गया था??????
राहुल गांधी के राजपूत चमचे दिग्विजय सिंह,भवर जितेंद्र सिंह,वीरभद्र सिंह,शक्तिसिंह गोहिल उस समय क्या कर रहे थे???
इन चमचो के सोशल मिडिया पर तरफदारी करने वाले कथित बुद्धिजीवी उस समय कहाँ थे???
केजरीवाल,मनीष सिसोदिया,,संजय सिंह उस समय कहाँ थे??

अगर ये सब हरामी उस समय पीड़ित राजपूतो के आंसू पोछने उस समय नही गए तो आज इस घटना के बाद उन्हें अपना कर्तब्य कैसे याद आ गया????

----अब की ताजा घटना-----
दरअसल 3 राजपूतो की हत्या के कई आरोपी जेल में बन्द थे और उन्हें सजा होने वाली थी और वो लगातार पीड़ित राजपूतो पर समझोते का दबाव डाल रहे थे।
अगर छन कर आ रही सूचनाओ पर यकीन करे तो इस दलित परिवार के पति पत्नी में कलह के बाद पत्नी ने खुद बच्चों सहित आग लगाई।पति और परिवारजनो ने बचाने की कोशीस की पर बच्चे नही बच पाए।

ये भी हो सकता है कि केस उलटा करने के लिए ऐसा प्रतीत होता है दो बच्चों की हत्या एक साजिश है ॥
बच्चे झुलस गए , न कम्बल जला न खिलौने ॥ माँ को कुछ न हुआ , बापके सिर्फ हाथ झुलसे ॥ बैड थोडा बहुत जला , घर के बाकी सामान जस के तस ॥

पर इस घटना के बाद उस दलित परिवार ने इसे पुराने मामले में राजपूतो से समझोते के लिये इस्तेमाल कर इसका आरोप राजपूतो पर ही मढ़ दिया और बचा खुचा काम मोदी विरोधी मिडिया और कांग्रेस ने बिहार चुनाव में दलितों को भड़काने के लिए इस घटना को तूल दे दिया।।।

राजपूत् तो सामने से वार करता है आग लगाकर बच्चों को मारना जैसा काम गिरे से गिरा राजपूत भी नही कर सकता।

सुबह से शाम तक दबंगोंकी दलितों पर किये गए अत्याचार की झूठी कहानी का भंडाभोड कर दिया ज़ी न्यूज़ ने। बहुत  बहुत धन्यवाद।
     एक खिड़की से पेट्रोल फैंका गया एक बेड पर लेकिन खिड़की की तरफ बेड क्यों नहीं जला?
जबकि सबसे ज्यादा वहीँ जलता? जबकि बेड की स्थिति देखें तो उसकी अंदर की एक साइड जली है थोड़ी सी। व् उसी कमरे में दो दरवाजे भी थे। तो क्यों एक बाप अपने दो बच्चों को क्यों बचा नहीं सका दूसरे दरवाजे से निकाल कर????

आज अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के नेताओं के दौरे पर सुनपेड़ में हुई घटना के पीडित परिवार द्वारा आरोपी बताये जाने वाले परिवार की महिलाएं उपस्थित थी। जिन पर आरोप लगाये गये है उन परिवार की महिलाएं जिनमें राजबाला, कविता, नीरज, ललिता, मन्दा, हेमलता, गायत्री, विमला, शशि, सुदेश, महेन्द्री, कमला, लल्ली ने बताया मृतक बच्चों का उनको भी काफी दुख है पंरतु पीडित परिवार जिस प्रकार के आरोप हमारे परिवार पर लगा रहा है ऐसा कुछ भी नहीं है।

इस मुद्दे पर मीडिया एक पक्ष का बयान दिखा देश को भ्रमित कर रहा है जिन्हे दबंग बता रहा है उनके परिवार की महिलाओं की हालत तो देखें जो पट्टे पर खेत लेकर मजदूरी कर रही हैं । एक महिला राजबाला सिंह ने बताया कि जिस घर के बच्चे जले हैं उस घर का मालिक शराब पीकर अपनी पत्नी को मारता था अभी कुछ दिन पहले ही उसकी पत्नी वापस आई थी जहाँ फिर मारपीट शुरू हो गयी थी और पति पत्नी की लड़ाई में दोनों में से किसी ने घर में आग लगा दी बच्चों को जला कर मार दिया और आरोप पुराने मामले की रंजिश की वजह से हमारे परिवार को फंसा दिया।

उन्होंने बताया कि पीडित परिवार जो पुराने केस की बात करके हम पर आरोप लगा रहा है वह पूरी तरह से निराधार है क्योकि यह केस तो अब ब्यान की स्थिति पर पहुंच गया था और फैसला हमारे हक में आने वाला था। इसी को देखते हुए दलित परिवार इस तरह का षडयंत्र रचकर हमें फंसाने का काम कऱ रहा है। उन्होंने बताया कि पूर्व में कांग्रेस की सरकार के दोरान जब यह हादसा हुआ तब राजपूत परिवार के तीन मुखियाओं की हत्या की गयी लेकिन उस समय इस तरह की राजनीति नहीं हुई थी जो की जा रही है जैसा कि उस वक्त भी राहुल गांधी व पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा ने चुप्पी साधी हुई थी। आज वही लोग इस मामले को राजनीतिक रंग देने के लिए आगे आ रहे हैं।

महिलाओं ने कहा कि सरकार व प्रशासन पर उन्हें पूरा भरोसा है कि निष्पक्ष जांच के चलते इस मामले का दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा और कौन आरोपी है वह सामने आ जायेगा। पत्रकार वार्ता को सम्बेाधित करते हुए राजपूत सभा के प्रदेश अध्यक्ष कु. उमेश भाटी ने कहाकि इस मामले की सरकार द्वारा निष्पक्ष जांच की उम्मीद है और वह उन सभी विपक्षी पार्टियों के राजनेताओ को चेतावनी देते है जो कि इस तरह की औच्छी राजनीति ना करे एवं मामले को सुलझाने का काम करें ना की राजनीतिक रंग दे।

पिछले साल इन्हीं दलितों ने तीन राजपूतो को मार दिया तब ये अंजना ओम कश्यप और पूरी मिडिया कहाँ थी ? तब पीड़ित राजपूतो के पक्ष में क्यों नहीं बोली ?
दबंग का मतलब सिर्फ सवर्ण नहीं होता .,. जो भी दूसरी जाति को कुचले उन्हें परेशान करे वही दबंग है .... सुनपेड़ में 32 साल से दलित भी बराबर उन कथित दबंगों की हत्या कर रहे हैं तो फिर ये राजपूतो के खिलाफ राजनीती क्यों ???

मीडिया की ये चाल जय भीम जय मीम के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है ... और दलित कार्ड खेलकर गौमांस के मुद्दे को ढँकने की तैयारी की जा रही है ..और बिहार के चुनाव में इस मुद्दे पर वहां के दलितों को भड़का कर लालू नितीश कांग्रेस गठबंधन के पक्ष में हवा बनाने का देशद्रोही षड्यंत्र है।....

वैसे पिछले साल का न्यूज़ पेपर किसी के पास हो तो पता लगाओ दबंगों की मौत पर भी मीडिया रोइ थी क्या :)

सेक्युलरों के पिछवाड़े में पेट्रोल का फव्वा लगाते हुए कल हरियाणा के सीएम खट्टर ने एलान किया कि बल्लभगढ़ जाएंगे। लेकिन उन्हें बताया गया था कि खट्टर साहब जाओगे तो जाना दोनों जातियो के पीडितो के घर। नहीं तो गलत हो जाएगा। बाकी तो आप हमसे ज्यादा समझदार हैं।

इसके बाद साजिश की बू आते ही सीएम खट्टर ने अपना दौरा निरस्त करके सीबीआई जांच की सिफारिश कर दी।
उम्मीद है सीबीआई जाँच में सब सच सामने आ जाएगा और जो भी दोषी होगा उसे सजा जरूर मिलेगी।।

अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा द्वारा आज बल्लभगढ में एक प्रैस वार्ता का आयोजन किया गया। प्रैस वार्ता में अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के प्रदेश अध्यक्ष कु.. उमेश भाटी, जगबीर भदोरिया, मनोज रावत, लोकेश भदोरिया, सुल्तान सिंह, सत्यभान चौहान, दीपू चौहान उपस्थित थे। इस अवसर पर सुनपेड़ में हुई घटना के पीडित परिवार द्वारा आरोपी बताये जाने वाले परिवार की महिलाएं उपस्थित थी।।
जय राजपूताना।।।।

Sunday, October 18, 2015

एक मन्दिर जहाँ अंग्रेजों के सिर को काटकर माँ भवानी के चरणों में चढ़ाता था वीर राजपूत बंधू सिंह श्रीनेत(BANDHU SINGH SHRINET_THE GREAT RAJPUT FREEDOM FIGHTER)


स्वतंत्रता संग्राम में राजपूतों का योगदान----

====गोरखपुर जिले मे माता तरकुल्हा देवी का मंदिर जहां अंग्रेजो के सिर को काटकर मां भवानी के चरणो मे चढाया जाता था ===
मित्रो आज हम बात कर रहे है
#बाबू_बंधू_सिंह जी की जिनके प्राक्रम और प्रताप का गुणगान आज भी गोरखपुर मे किया जाता है। बाबू बंधू सिंह गोरखपुर में डुमरी रियासत के थे। ये श्रीनेत वंशी राजपूत थे।।।

गोरखपुर में चौरा चोरी गांव से कुछ ही दूरी पर "माता तरकुल्हा देवी" का पवित्र मंदिर है। इस इलाके में जंगल हुआ करता था जिसमे बाबू बंधू सिंह रहा करते थे उनकी रियासत डुमरी वहीँ थी,और अपनी इष्ट देवी तरकुलहा देवी की उपासना में लीन रहते थे।
बात 1857 से पहले की है। बाबू बंधू सिंह के दिल में बचपन से ही अंग्रेजो के खिलाफ बहुत रोष था। वो गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे इसलिए जब भी मौका मिलता वो अंग्रेजो को मार कर, सर काट कर माता के चरणो मे अर्पित कर देते। दिन प्रतिदिन अंग्रेज अफसरों को गायब होते हुए देखकर अंग्रेज बहुत चिंतित हुए और अपनी बडी फौज के साथ उन पर आक्रमण कर दिया ! बाबू बंधू सिंह जी बहुत ही साहस के साथ अंग्रेजो के साथ लडते रहे पर कभी भी अंग्रेजो के हाथ नही आए। अंत मे एक व्यापारी मजीठिया सरदार की मुखबिरी(ये मजीठिया परिवार के मुखबिरी के चलते अंग्रेजो के पकड़ में आये।बाद में इनकी सारी प्रॉपर्टी इनाम के तौर पर उसको मिली) के कारण अंग्रेजो ने राजा बंधू सिंह  ठाकुर को जिंदा पकड लिया और उनको अनेको यातनाएं दी। कुछ समय बाद उनको फांसी पर चढाने का आदेश दिया गया। गोरखपुर के अली नगर चौराहे पर उनको सार्वजानिक रूप से फ़ासी पर लटकाया गया। लेकिन लगातार 6 बार फ़ासी पर चढाने के बाद भी अंग्रेज सफल नही हुए। अंत मे बाबू साहेब ने तरकुलहा माता का ध्यान करते हुए माँ से उन्हें जाने देने का अनुरोध किया। सातवी बार में उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये -!!

कहते है बाबू साहब को फांसी लगते ही देवी स्थान पर बरसो से खडे तरकुल (नारियल की एक प्रजाति) के बृक्ष 

का उपरी सिरा टूट कर अलग जा गिरा व उसमे से रक्त की धार फूट पडी ! मां का अपने भक्त पर ऐसा स्नेह 

कम ही देखने सुनने को मिलता है !

आज भी बाबू बंधू सिंह की स्मृति मे इस मंदिर मे एक स्मारक भी बना हुआ है और आज भी यहां बलि प्रथा चल रही है। तरकुलहा माँ के चरणो मे आज भी बकरे की बलि दी जाती है जिसको बाद मे मिट्टी की हांडियो मे बनाकर प्रसाद के रूप मे सभी भक्तो मे बांटा जाता है। देश में इकलौता मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता है।।

भड़ भवानी रो भगत , बंधू सिंह सुजाण ।
फिरंगी माथा बाढ़ने , देतो जगदम्ब जळ पाण ।।

आधुनिक वीर शिरोमणि,क्षत्रिय हृदय सम्राट "शेर सिंह राणा" की सम्पूर्ण जीवन गाथा

जय भवानी,जय राजपूताना-------------
----आधुनिक वीर शिरोमणि क्षत्रिय हृदय सम्राट "शेर सिंह राणा" की सम्पूर्ण जीवन गाथा----

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राजपूतों और समस्त भारतवर्ष के सम्मान के लिए खुद को किया न्यौछावर------



परिचय------
शेर सिंह राणा का जन्म 17 मई 1976 को उत्तराखंड के रुड़की में हुआ था।इनका बचपन का नाम पंकज सिंह पुंडीर था।इनकी शिक्षा दीक्षा रुड़की और देहरादून में हुई थी।
शेर सिंह राणा के पिता ठाकुर सुरेन्द्र सिंह राणा रुड़की के सबसे बड़े जमीदारो में एक थे।इनकी माता सत्यवती बेहद धार्मिक विचारों की महिला हैं और वो बचपन से ही शेरसिह को क्षत्रिय वीरो की कहानियां सुनाया करती थी।जिनसे प्रेरित होकर उनके मन में बचपन से ही कुछ बड़ा करने की भावना पनपने लगी।
डकैत फूलन द्वारा 22 निर्दोष राजपूतों की हत्या---------
वर्ष 1981 में एक ऐसी लोमहर्षक घटना घटी जिसने पुरे देश विशेसकर पुरे क्षत्रिय समाज को झकझोर कर रख दिया।उत्तर प्रदेश के कानपूर इलाके में बेहमई गांव में डकैत फूलन ने अपने साथियों के साथ मिलकर 22 ठाकुरो को मार दिया और एक दुधमुही बच्ची को उसकी माँ की गोद से जबरन छीनकर जमीन पर पटक दिया,जिससे वो जीवन भर के लिए अपाहिज हो गई।
कुछ लोग झूठ प्रचार करते हैं कि इस गांव में फूलन के साथ दुष्कर्म हुआ था।इसका कोई साक्ष्य नही है।
घटना का वास्तविक कारण डाकू गिरोहों की आपसी रंजिश थी और प्रतिद्वन्दी गिरोह ठाकुर लालाराम और श्रीराम के होने के कारण इस गांव के ठाकुरो का कत्लेआम किया गया था।
उस समय यूपी के सीएम ठाकुर वीपी सिंह थे जिन्होंने उचित कोई कार्यवाही नही की।
यही नही जब पुलिस मुठभेड़ों में फूलन का ज्यादातर गैंग खत्म हो गया और वो जंगल जंगल जान बचाने को भटक रही थी तो वोटबैंक के लिए उसकी जान बचाकर सरेंडर करवाने वाले थे मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री ठाकुर अर्जुन सिंह!!!!!!!!
कुछ समय जेल में रहने के बाद यूपी के उस समय घोर ठाकुर विरोधी रहे मुख्यमन्त्री मुलायम सिंह यादव ने फूलन से सभी मुकदमे वापस ले लिए और उसे समाजवादी पार्टी में शामिल कर सम्मानित सांसद बना दिया गया।
इसके बाद बेहमई हत्याकांड के नाम से पुरे देशभर में राजपूतो पर व्यंग कसे जाने लगे कि देखो तुम्हारे ठाकुरो को कैसे लाइन लगाकर मारा था।ये घटना राजपूतो के मान सम्मान के लिए बहुत बड़ा कलंक बन चुकी थी।
इस कलंक को धोने का काम किया बेहमई से सैंकड़ो किलोमीटर दूर के निवासी शूरवीर पंकज सिंह पुंडीर उर्फ शेर सिंह राणा ने----
फूलन की ह्त्या--------
25 जुलाई 2001 को दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में तत्कालीन सांसद फूलन देवी की हत्या की गई थी।
इसके दो दिन बाद शेर सिंह राणा ने देहरादून में आत्मसमर्पण करके इल्ज़ाम अपने सिर लिया।
शेर सिंह राणा ने कहा कि उन्होंने फूलन से राजपूतों की हत्याओं का बदला लिया है।हालाँकि बाद में शेर सिंह ने कोर्ट में कहा कि उनको इस केस में झूठा फंसाया गया है।उनके साथ भाई धीरज राणा शेखर पवार विजय आदि पर भी आरोप लगे।
इसके बाद शेर सिंह राणा और उनके साथियोँ को दिल्ली की तिहाड़ जेल भेज दिया गया।
मगर ये कहानी का अंत नही है।अभी और इतिहास लिखा जाना बाकी था।
अंतिम हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि के अवशेष वापस लाना(कुलदीप तोमर की रिपोर्ट)------------
भारत के अंतिम हिन्दू सम्राट वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की वीर गाथाएं तो हमारे सम्रद्ध इतिहास मैं शरू से पढ़ी और सुनी जा रही हैं लेकिन उनसे जुड़ा एक और असली सच उस समय सामने आया जब आतंकियों द्वारा भारत का हवाई जहाज हाई जैक कर कंधार ले जाया गया | उसे वापिस लाने के लिए तत्कालीन विदेशमंत्री जसवंत सिंह वहा गये और लोट कर उन्होंने जिस हकीकत से पर्दा उठाया उसने समस्त देशवासियों का मन झकझोर कर रख दिया बकौल जसवंत सिंह अफगानिस्तान मैं आज भी पृथ्वीराज चौहान की समाधी स्थित है जिस पर वहा के नागरिक जुते - चप्पल मरकर न सिर्फ उस वीर शिरोमणि का अपमान करते हैं बल्कि समूचे भारत व् भारत के गोरवशाली इतिहास को बेज्जत करते हैं |
जसवंत सिंह के इस बयान को समूचे भारतीय मीडिया ने बड़ चड़ कर देश की जनता के सामने रखा | फिर क्या नेता या आम आदमी सभी ने पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ वापस लाने की वकालत तो की पर प्रयास करने की जहमत शायद किसी ने नहीं उठाई | यही खबर टेलीविजन पर शेर सिंह राणा ने देखी जो फूलन देवी ( पूर्व डाकुनी ) की हत्या के आरोप मैं तिहाड़ जेल में था | खबर सुनते ही शेर सिंह राणा के दिल में राष्ट्र सम्मान वापस लाने की बेचेनी बड गयी | कई दिन तक इसी उदेहदबुन में रहे की किस तरह वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की अस्थिया वापस हिंदुस्तान लाई जा सकती हैं और जब उन्हें कुछ नहीं सुझा तो उन्होंने जेल से भागने का फैसला कर लिया |
शेर सिंह राणा के मन में विचार चल ही रहे थे की एक दिन एक पुलिस कर्मी ने उनसे पूछ ही लिया की आखिर क्या बात है परेशान से नज़र आ रहे हो | राणा ने अपने दिल की बात उन पुलिस कर्मियों से कह डाली की में किसी भी तरह पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ वापस हिन्दुतान लाना चाहता हूँ | इस पर पुलिस वाले राणा भाई का मजाक उड़ने लगे की पहले तो तू फूलन की हत्या के आरोप से ही नहीं बच पायेगा और किसी भी तरह बच भी गया तो समय इतना गुजर जाएगा की तेरे बस में कुछ नहीं रहेगा | फिर ८०० साल से एसा नहीं हो पाया तो तेरी क्या बिसात है | बस पुलिस कर्मियों के यही शब्द सुन कर शेर सिंह राणा का फैसला और भी अडिग हो गया और 2003 के अंतिम माह में शेर सिंह राणा ने तिहाड़ जेल से बाहर आने का खाका बनाना शुरू कर दिया और उसके बाद शेर सिंह राणा ने अपने भाई विक्रम सिंह राणा को पूरी योजना समझाई | विक्रम ने पूरी दिल से अपने भाई की भावनाए समझी और हर स्तर पर साथ देने का भरोसा दिया |
योजना के अनुसार पुलिस वन जैसी एक बड़ी गाडी एक हथकड़ी कुछ पुलिस की वर्दी और कुछ विशवास वाले लड़कों की जरूरत थी | विक्रम ने सबसे पहले इस योजना में रूडकी के संदीप ठाकुर को जोड़ा | संदीप ठाकुर तिहाड़ में शेर सिंह राणा से मिला और पूरी योजना को समझा | शेर सिंह राणा से मिलने के लिए संदीप ठाकुर नकली वकील बना और उसी लिबास में अक्सर तिहाड़ जाता था ताकि जेल का सिस्टम समझ सके और आने जाने का खोफ भी दूर हो सके | शेर सिंह संदीप को जेल की हर गतिविधि से अवगत करता ताकि संदीप अपनी योजना को फुलप्रूफ निभा सके | इस दोरान विक्रम ने तीन लड़के और योजना में जोड़ लिए और उनको उनका काम समझा दिया |
17 फरवरी 2004 को शेर सिंह राणा जेल नंबर एक मैं हाई रिक्स वार्ड मैं था | सुबह 6 बजे हवालदार ने बताया की तुम्हारी कोर्ट की तारीख है 6. 30 पर तुम को जेल की ड्योढ़ी मैं आना हैं योजना के अनुसार शेर सिंह राणा पहले से ही तैयार था | उस दोरान शेर सिंह राणा का एक साथी शेखर सिंह जो फूलन के हत्या के आरोप जेल मैं था , से उसने कहा की भाई आज अगर सायरन बजे तो समझ लेना की शेर सिंह राणा तिहाड़ जेल से भाग गया , आगे हनुमान जी मेरी रक्षा करेंगे ठीक 6 . 30 पर शेर सिंह राणा जेल की ड्योडी मैं हवालदार के साथ पहुंचा तभी संदीप ठाकुर पुलिस की वर्दी मैं अन्दर आगया | संदीप ने नकली वारंट जेल अधिकारीयों को दिखा कर हथकड़ी पहना दी और गेट पर ले आया। गेट पर खड़ी नकली पुलिस वैन मैं शेर सिंह राणा महाराज जी बैठ रफुचकर हो गये | एक घंटे के बाद असली पुलिस के पहुचने पर पता चला की शेर सिंह राणा जेल से निकल गया है |
आनन् फानन मैं सायरन बजाया गया सारे जेल मैं तहलका मच गया पर तब तक शेर सिंह राणा जेल की हद से बहुत दूर निकल गया था।
जेल से भागने के बाद शेर सिंह राणा ने अपने भाई से संपर्क किया और कुछ रूपये मंगाए और रांची पहुँच गया | वंहा संजय गुप्ता के नाम से पासपोर्ट बनवाया और बंगला देश निकल गये | कुछ क्षत्रिय नेताओं से संपर्क साधा और जेल से भागने के पीछे उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की समाधी वापस हिंदुस्तान लाना बताया | इस पर क्षत्रिय नेताओं ने उन्हें पूरा साथ देने का भरोसा दिया | उस दोरान अफगानिस्तान , के लिए सिर्फ दिल्ली पाकिस्तान और दुबई से ही जाया जा सकता था | चूँकि दिल्ली पुलिस शेर सिंह राणा के पीछे थी इसलिए उसने पाकिस्तान से जाने का प्रयास किया | लेकिन पाकिस्तान शेर सिंह राणा जैसे सच्चे हिन्दुस्तानी सपूत के कंधे पर बन्दुक रख के भारत पर वार करना चाहता था , लेकिन पाकिस्तान ये भूल रहा था की जो व्यक्ति अपने राष्ट्र का सम्मान वापस लाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल सकता है उसे भला पाकिस्तान कैसे बरगला सकता है |
दिसम्बर 2004 को शेर सिंह राणा ने अफगानिस्तान जाने का रास्ता वाया दुबई चुना | शेर सिंह राणा पहले दुबई गया | वहां से काबुल , काबुल से कंधार और कंधार से हेरात पहुंचा | हेरात से वापस कंधार और कंधार से गजनी | इस तरह तालिबानियों के गड़ में शेर सिंह राणा ने एक माह गुजारा और पृथ्वीराज चौहान की समाधी को खोजते रहे | इस दोरान शेर सिंह राणा की मुलाकात हुई और उसके माध्यम से गजनी में पृथ्वीराज चौहान के समाधी तक पहुचने में सफलता मिली |
पृथ्वीराज चौहान साहब की समाधी गजनी में सुल्तान मोहमद गोरी से करीब बीस किलोमीटर दूर देयक गाँव में हैं | शेर सिंह राणा ने देयक गाँव जाकर अपनी तसल्ली की और वहां पृथ्वीराज चौहान का अपमान अपनी आँखों से देखा और अपने कैमरे में कैद किया | वहां दो महीने के अथक प्रयास के बाद शेर सिंह राणा का मकसद पूरा हुआ | उनकी समधी को हिन्दुतान लाये और क्षत्रिय सभा को सोंप दिया और अपने सच्चे हिन्दुस्तानी होने का सबूत दिया |
क्षत्रिय सभा ने बेवर कानपूर हाई वे के बीच में एक महासमेलन कर के शेर सिंह राणा जी की माता सत्यवती राणा के कर कमलो द्वारा वीर शिरोमणि पृथ्वीराज चौहान की समाधी की स्थापना कराई |
दूसरी और शेर सिंह राणा ने कानून का सम्मान कर मकसद पूरा होने पर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया |
17 मई 2006 को राणा को एक बार फिर कोलकाता के एक गेस्ट हाउस से गिरफ्तार(आत्मसमर्पण) कर लिया गया।
और वहां से सीधा तीसहजारी कोर्ट में लाया गया | कुलदीप तोमर और कई राजपूतों की अगवाई में शेर सिंह राणा को जब कोर्ट में पेश किया तो कोर्ट शेर सिंह राणा के नारों से गूंज गया और पुरे कोर्ट में राणा की एक झलक पाने को सभी बेकरार थे तब कुलदीप तोमर और सत्यवती राणा जी कोर्ट में गयी और शेर सिंह राणा के गले लगी और रोने लगी माँ के गले लग कर वीर शेर सिंह राणा के आँखों में आंसू आ गये पर देश प्रेम का जज्बा था तो माँ ने शाबासी दी शेर सिंह राणा को कोर्ट ने लाल कपडे और हथकड़ी और पेरों में भी जंजीरे बाँधने के आर्डर दिए पर माता जी के कहने पर जंजीरे का आर्डर वापस लिया गया और शेर सिंह राणा को खतरनाक कैदी घोषित किया गया और हमेशा लाल रंग के कपडे पहने के लिए आर्डर दिए |
अगस्त 2014 में दिल्ली की एक निचली अदालत ने फूलन देवी हत्याकांड के दोषी शेर सिंह राणा को उम्रकैद तथा 1 लाख रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई है।उनके सभी साथियों को रिहा कर दिया गया।कोर्ट में शेर सिंह ने जज साहब को कहा कि
"जज साहब आप इस कुर्सी पर ईश्वर की तरह हैं। मैं फूलन हत्याकांड में लगभग 12 वर्ष जेल में काट चूका हूँ और अब मेरी आयु 38 वर्ष हो चुकी है मेरी माँ मेरी शादी करना चाहती है।मै अपनी जान पर खेलकर देश का सम्मान वापस लाया हूँ।इस आरोप में मेरे सभी साथियों को बरी कर दिया गया तो मेरे साथ भी न्याय करे"
मगर कानून के आगे ये दलीलें काम नही आई।
ये है हमारे देश का कानून देश प्रेमी को ऐसी सजा ......... इस समय शेर सिंह राणा तिहाड जेल मे फूलन देवी की हत्या आरोप साबित होने पर सजा काट रहे है।
लेकिन मित्रों कुछ सवाल हैं------------
जब हत्यारिन डकैत फूलन की सजा माफ़ हो सकती है, कोयम्बटूर बम धमाको का आरोपी देशद्रोही मदनी जेल से छूट सकता है,
कई गरीबो को गाड़ी से कुचलकर मारने वाले सलमान खान को जमानत मिल सकती है,
आतंकवादियों से AK 56 रायफल लेकर घर में रखने वाले संजय दत्त को बार बार पेरोल मिल सकती है,
तो जेल में दस साल गुजार लेने वाले और देश का सम्मान वापस लाने वाले शेर सिंह राणा की सजा माफ़ क्यों नही हो सकती?????
अगर शेर सिंह राणा राजपूत न होकर दलित मुस्लिम जाट गुज्जर सिख होते तो उनके समाज के नेता अब तक उन्हें जेल से बाहर निकलवा देते।
सन्दर्भ::::
1-जेल डायरी
2-भाई कुलदीप तोमर टीम शेर सिंह राणा

SHOOTER BAISA_APOORVI CHANDELA









#‎अपूर्वी_चंदेला‬ देश का उभरता हुआ नाम 

अपूर्वी चंदेला का जन्म जयपुर में कुलदीप सिंह जी ये घर हुआ जो एक सफल होटल व्यवसाईं है

अपूर्वी चंदेला भारत की एक राष्ट्रीय शूटर है इन्होंने बहुत ही कम उम्र में सफलता के झंडे गाड़े है ये अगले ओलम्पिक के लिए क्वलिफाईड कर चुकी है वही TOI के टॉप युवा प्रतिभाओ में इनको स्थान मिला

कॉमन वेल्थ गेम 2014 ग्लासगोमें 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग इवेंट में 206.7 का स्कोर बनाकर भारत को दूसरी बार निशानेबाजी में स्वर्ण पदक दिलाया।

अपूर्वी चंदेला ने इतिहास रच कर जर्मनी मे अंतर्राष्ट्रीय शूटिंग में भारत को कांस्य पदक जिताया.....

वही अपूर्वी ने ISSF World Cup म्यूनिख में निशानेबाजी में अपूर्वी चंदेला ने देश के लिए जीता रजत पदक

अपूर्वी लगातार 3 साल से 10 मीटर शूटिंग में नैशनल चेम्पियन है,इन्हें हाल ही में अगस्त 2016 में अर्जुन अवार्ड मिला है।

इनका परिवार हिमाचल के बिलासपुर राजपरिवार के चंदेला वंश से तालुक रखता है वहा से इनके पर दादा जी उठ कर उदयपुर आ गए थे वहा ये लीगल एडवाईजर थे महाराणा मेवाड़ के तब से ये उदयपुर में बस गए वही इनकी चौथी पीढ़ी यहाँ निवास कर रही है उदयपुर में पिछोला के पीछे "बीसलपुर हाउस" बना हुआ है

वही wikipedia पर कुछ गुर्जर भाई इन्हे अपनी जाति का बता रहे थे वहा भी एडिट करके हमारी टीम ने उसमे सुधार किया

HISTORY CHEATERS_ FAKE KSHATRIYAS OF INDEPENDANT INDIA






मित्रों जब आरक्षण का कटोरा हाथ में होता है तब तो वर्णसंकर जातियां चाण्डाल और न जाने क्या क्या बताते है अपने पूर्वजों को और जब वंश वर्ण और कुल की बात आती है तो ये जातियां समस्त आदर्श क्षत्रियों को अपना पूर्वज बताने लगते हैं।

अहीर पिछले सिर्फ 90-100 साल से जबरदस्ती चन्द्रवंशी वासुदेव श्री कृष्ण को अपना पूर्वज कहकर यादव लिखने लगे,ग्वाल,गोप,अहीर,अहर,कमरिया,घोसी ,जैसी कई अलग अलग जातियों ने मिलकर सन 1915 के आसपास खुद को अचानक से यादव घोषित कर दिया जबकि यादव राजपूतों का एक कुल है जिसके करौली के जादौन, जाधव ,जैसलमेर के भाटी ,गुजरात के जाडेजा और चुडासमा छोकर राजपूत असली वंशज है ।

कुर्मी कोयरी काछी माली कुनबी पिछले 50 साल से ही अपने को सूर्यवंशी श्री राम पुत्र कुश के वंशज घोषित करते है जबकि कछवाह ,राघव ,सिकरवार,बडगुजर,पुंडीर आदि राजपूत कुल उनके असली वंशज है । 

अनेको दलित और यूपी के मुराव मुराई जाति के लोग 40 साल से मौर्य वंश के टाइटल यूज़ करने लगे है जबकि मौर्य वंश सूर्यवंश के महाराज मान्धाता के छोटे भाई मंधात्री के वंशज है और सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म धारण करने पर उन्हें सनातनियों ने शूद्र घोषित कर दिया था किन्तु जब आबू पर्वत पर आदि शंकराचार्य जी ने पुनः उन सभी क्षत्रियों को यज्ञ की अग्नि के समक्ष पुनः क्षात्र धर्म में नियुक्त किया तब वे ही परमार सोलंकी चौहान और चंदेल कुल बने जिनमे मौर्य के असली वंशज परमार राजपूत हैं।आज भी आगरा मालवा उज्जैन और निमाड़ में शुद्ध मौर्य राजपूत उसी प्राचीन नाम से मिलते हैं ,

भंडारकर और कई विदेशी देशी वामपंथी इतिहासकारों को पढकर पिछले 60 साल से गुज्जर भी जबरदस्ती लक्ष्मण के वंशज प्रतिहार वंश को अपना बताकर मिहिरभोज की जयंती मनाने लगे हैं जबकि प्रतिहार परिहार राजपूत और उनकी विभिन्न शाखाएँ आज भी लाखों की संख्या में कन्नौज एटा इटावा ग्वालियर नागौद बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश हरियाणा राजस्थान गुजरात खानदेश पंजाब हिमाचल प्रदेश उतराखंड में भरी पड़ी है जबकि देश भर में एक भी गुज्जर प्रतिहार परिहार वंश का नहीं है,,प्रतिहार राजपूतों का ऋषि गोत्र नागभट के समय से ही कश्यप चला आ रहा है और आज भी परिहार राजपूतों का ऋषि गोत्र कश्यप है ,,,जबकि जाट गूजर अहीर मुराई आदि जातियों के ऋषि गोत्र नहीं मिलते,जो इनके पहले से शूद्र होने का स्पष्ट प्रमाण हैं,ऋषि गोत्र सिर्फ ब्राह्मण,राजपूत,मराठो,राजू,नायर,काठी,खत्री आदि द्विज जातियों के मिलते हैं,
शूद्रों में ही विधवा महिला का नाता होता है न कि ब्राह्मण राजपूतो मराठो में बिलकुल नहीं होता.....

गुज्जर और जाट तो सिर्फ कुछ दशक पहले तक अंग्रेजो के समक्ष खुद के अधिकांश वंशो को राजपूत पिता और जाटनी,गूजरी माता की संतान से चला हुआ होने का दावा करके खुश होते थे,ये सब विवरण ब्रिटिश गजेटियरो में दर्ज हैं जिनके प्रमाणिक सबूत हमारे पास हार्ड और सॉफ्ट कॉपी में उपलब्ध हैं........

जाटों ने तो जाटलैंड डॉट कॉम के माध्यम से झूठ बोलने और गप फेकने के सारे रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिए,उसे पढकर इनके कुछ ज्ञानी व्यक्ति भी हंसते जरुर होंगे कहीं वो हिटलर को जाट बताते हैं तो कहीं हनुमान जी को,कहीं खुद को शक कुषाण बताते हैं तो उसी आर्टिकल में खुद को श्रीकृष्ण ,अर्जुन का वंशज घोषित कर देते हैं,,,,,,
जो प्राचीन चन्द्रवंशी यौधेय जोहिया राजपूत वंश कई हजार साल से क्षत्रिय राजपूत समाज का अभिन्न अंग है उसके नाम पर उधार का नारा "जय यौधेय" लगाकर सोशल मिडिया पर खुश हो लेते हैं जबकि आरक्षण लेने के लिए जाट समाज ने अपने प्रत्यावेदन में खुद को प्राचीन चाण्डाल बताया और यहाँ तक कहा कि उनकी पहचान कुत्ते से सुंगवाकर की जाती थी,अभी हाल में हरियाणा के जाट नेता संपत सिंह ने भी जाटों को शूद्र बताया है.......

आरक्षण लेने के लिए तो खुद को शूद्र और चाण्डाल बताना और सोशल मिडिया,इन्टरनेट पर खुद को क्षत्रिय बताना और क्षत्रिय राजपूत वंशो पर दावा ठोकने वालो को क्या संज्ञा दी जाए???????

आभार---कुंवर राजेन्द्र सिंह जी

Tuesday, October 6, 2015

KUMBHALGADH_ A TRUE LEGACY OF RAJPUTANA

राजपूताने की शान- कुम्भलगढ़ का किला

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास



1. कुम्भलगढ़ का निर्माण 15वीं सदी में महाराणा कुंभा ने किया था। मेवाड़ के 84 में से 32 किलो को महाराणा कुंभा ने बनवाया जिनमे यह सबसे बड़ा और अजेय दुर्ग है।
2. कुम्भलगढ़ किले को देश का सबसे मजबूत दुर्ग माना जाता है जिसे आज तक सीधे युद्ध में जीतना नामुमकिन है। गुजरात के अहमद शाह से लेकर महमूद ख़िलजी सभी ने आक्रमण किया लेकिन कोई भी युद्ध में इसे जीत नही सका।
3. यह चित्तौरगढ़ के बाद सबसे बड़ा दुर्ग है।
4. इसकी परकोटे की दीवार लंबाई में दुनिया में चीन की दीवार के बाद दुसरे स्थान पर है। इसकी लंबाई 38 किलोमीटर है और इसे भारत की महान दिवार भी कहा जाता है।
5. कुम्भलगढ़ के निर्माण के वक्त आने वाली बाधाओ को दूर करने के लिये सबसे पहले इस स्थान पर एक राजपूत योद्धा की स्वेछिक नर बलि दी गई थी।
6. कुम्भलगढ़ मेवाड़ के महाराणाओं की शरणस्थली रहा है। विपत्तिकाल में हमेशा महाराणाओं ने इस दुर्ग में शरण ली है। यही पर महाराणा उदय सिंह को छिपाकर सुरक्षित रखा गया और उनका पालन हुआ।
7. इसी दुर्ग में हिंदुआ सूर्य महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। उस कमरे को आज भी देखा जा सकता है।
8. महाराणा कुंभा हर रात को दुर्ग के निचे वादियों में काम करने वाले किसानो के लिये 50 किलो घी और 100 किलो रुई के इस्तमाल से जलने वाले दियो से रोशनी करवाते थे।
9. कुम्भलगढ़ किले को हाल ही में चित्तोड़, गागरोन, जैसलमेर, आम्बेर और रणथम्भोर के साथ यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज साईट के रूप में मान्यता मिली है और इन्हें राजपूत पहाड़ी दुर्ग कला का अद्वितीय नमूना माना गया है।
10. कुम्भलगढ़ किला 1100 मीटर ऊँची पहाड़ी पर बना है और इसकी दीवारे 14 फ़ीट मोटी हैँ और इसके 7 मुख्य दरवाजे हैँ।
11. इस दुर्ग में 360 जैन और सनातनी मन्दिर हैँ जिनमे कई अब भी अच्छी हालत में हैँ।
12. कुम्भलगढ़ से एक तरफ सैकड़ो किलोमीटर में फैले अरावली पर्वत श्रृंखला की हरियाली दिखाई देती हैँ जिनसे वो घिरा हैँ, वहीँ दूसरी तरफ थार रेगिस्तान के रेत के टीले भी दिखते हैँ।
13. हर साल यहाँ राजस्थान सरकार द्वारा 3 दिन का उत्सव मनाया जाता है जिसमे महाराणा कुंभा के स्थापत्य और कला में योगदान को याद किया जाता है।


Jai rajputana.........................

UNIQUE SOLDIER OF LOHARU STATE


क्षत्रियों की संगत में कुत्ते भी सिंह बन जाते हैँ





महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक,शुभरक और हाथी रामप्रसाद के बारे में सब जानते हैं लेकिन इस बहादुर कुत्ते के बारे में बहुत कम लोगो को पता होगा....
हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसे कुत्ते की कहानी जिसने जंग के मैदान में दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे।

यूं तो कुत्ते वफादारी के लिये जाने जाते हैँ और आपने कई तरह के कुत्तों की वफादारी की कहानी सुनी होगी लेकिन इस कुत्ते ने वो काम किया जिसकी वजह से इसका नाम इतिहास में पन्नों पर दर्ज हो गया है।
यह बात है लोहारू रियासत की !!!

-----लोहारु रियासत------

वर्तमान में लोहारू जिला हरियाणा में भिवानी का एक उपमंडल मुख्यालय है। जनश्रुति के अनुसार काफी समय पूर्व इस क्षेत्र में काफी संख्या में लोहार निवास करते थे। उस समय इसे लोहारगढ़ कहा जाता था जो बाद में लोहारू हो गया। लोहारू में कई प्राचीन भवन, किले व मंदिर आदि भी हैं। लोहारू में एक समय शेखावत राजपूतो का राज था और यह शेखावटी का हिस्सा होता था, बाद में यह अलवर रियासत का हिस्सा भी रहा। लोहारू में शेखावत राजपूत राज्य की स्थापना और किले का निर्माण 1570 में ठाकुर अर्जुन सिंह ने करवाया।
तत्कालीन लोहारू रियासत के अंतर्गत बावन गांव आते थे अत: इसे बावनी रियासत भी कहा जाता था। 

रणक्षेत्र में एक कुत्ते ने छुड़ा दिए थे मुगलों के छक्के, जानिए पूरी दास्तां""



सन 1671 में लोहारू रियासत पर ठाकुर मदन सिंह का राज था !!! उनके दो बेटे महासिंह व नौराबाजी थे , महाराज का एक वफादार था जिसका नाम बख्तावर सिंह था !!! बख्तावर सिंह के पास एक कुत्ता था जिसे वो अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता था !!! बताया जाता है कि उस कुत्ते की कद काठी किसी कटड़े जैसी थी और बाल बड़े बड़े।’ वह ठाकुर मदन सिंह और बख्तावर सिंह का साथ एक पल के लिए भी नहीं छोड़ता था।

हिसार गैजेटियर में दर्ज विवरण के अनुसार, सन् 1671 में ठाकुर मदन सिंह ने बादशाह औरंगजेब को राजस्व देने से इनकार कर दिया, जिससे नाराज होकर बादशाह औरंगजेब ने हिसार गवर्नर अलफू खान को लोहारू पर हमला करने के आदेश दिए !!! फिर शुरू हुई एक भीषण जंग , इस जंग में दोनों ही तरफ से बहुत जन हानि हुई !!!

ठाकुर मदन सिंह के दोनों पुत्र इस जंग में शहीद हो गए। पर बख्तावर पूरी बहादुरी से मैदान में डटे रहे !!! उनके साथ उनका वफादार कुत्ता भी युद्धभूमि में ही था। जैसे ही कोई मुग़ल सैनिक बख्तावर कि तलवार से जख्मी होकर निचे गिरता, कुत्ता उसकी गर्दन दबोचकर मार देता। इस तरह उसने खुद 28 मुग़ल सैनिकों के प्राण लिए। 

कुत्ते को ऐसा करता देखकर एक साथ कई मुग़ल सैनिकों ने कुत्ते पर हमला किया !!! अंततः कई वार सहने के बाद कुत्ता वीरगति को प्राप्त हुआ !!! उसके कुछ देर बाद बख्तावर भी रणभूमि में बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुआ !!! हालाकि तब तक मुग़ल सैनिकों कि पराजय तय हो चुकी थी और अंततः ठाकुर मदन सिंह के सामने अलफू खान को मैदान छोड़कर भागना पडा !!!

कुत्ते की बहादुरी की कहानी दूर दूर तक फ़ैल गई। लड़ाई के बाद ठाकुर मदन सिंह ने उस जगह समाधी और गुंबद का निर्माण कराया जहां कुत्ते की मौत हुई थी।

बाद में इसी गुंबद से कुछ दूरी पर बख्तावर सिंह की पत्नी भी उनकी चिता पर सती हो गईं थी। वहां पर उनकी पत्नी की याद में रानी सती मंदिर बनवाया गया जो आज भी मौजूद है। कुत्ते की समाधी और सती मंदिर आज भी आकर्षण और श्रद्धा के केंद्र हैँ।

(तस्वीर- बहादुर कुत्ते की याद में पुराने किले से कुछ दूरी पर बनाई गई गुंबद व् रानी सती माता मन्दिर, कमेंट्स में। )।

संदर्भ--हिसार गजेटियर,शेखर चौहान जी,दैनिक ट्रिब्यून।

ANJNA BHADAURIYA_ THE FIRST LADY OFFICER TO WIN A GOLD MEDAL IN INDIAN ARMY


भारतीय सेना में गोल्ड मेडल हासिल करने वाली प्रथम महिला अंजना सिंह भदौरिया





आजकल देश में चहुंओर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान की चर्चा है. पिछले दिनों गणतंत्र दिवस की परेड में पहली बार तीनों सेनाओं की नारी शक्ति का दबदबा रहा. लेकिन क्या आप जानते हैं कि सेना में स्वर्ण पदक पानेवाली सबसे पहली महिला कौन थी? आइए जानें सेना की पहली बैच की अफसर अंजना भदौरिया और उन चुनौतियों को, जिनसे पार पाकर उन्होंने यह शानदार उपलब्धि हासिल की. और बीते दो दशकों में महिलाओं के लिए कितनी बदली है सेना!

बात सन 1992 की है, जब माइक्रोबायोलॉजी में मास्टर्स की डिग्री लेने के बाद अंजना भदौरिया चंडीगढ़ स्थित एक फार्मास्यूटिकल कंपनी में काम कर रही थीं. उन्हीं दिनों सेना में पहली बार महिला अफसरों की बहाली के लिए वीमेन स्पेशल एंट्री स्कीम का विज्ञापन निकला. इस विज्ञापन पर अंजना की भी नजर गयी और उन्होंने इसके लिए आवेदन कर दिया. अंजना की खुशकिस्मती थी कि वह भारतीय थल सेना के महिला कैडेटों के पहले बैच के लिए चुन भी ली गयीं. सेना के लिए उन्होंने 10 सालों तक काम किया. इस दौरान उनका सर्विस नंबर 00001 रहा और उन्हें सेना का स्वर्ण पदक पानेवाली पहली महिला होने का गौरव भी प्राप्त हुआ.

वायु सेना के एक अफसर की बेटी रही अंजना बताती हैं कि उनके परिवार में हमेशा से सैन्य सेवा को बड़े आदर से देखा जाता था. लेकिन पिता के गुजर जाने के बाद पूरे परिवार का दारोमदार अंजना के बड़े भाई पर आ चुका था. और इसी बीच अंजना ने सेना में भर्ती के लिए आवेदन दिया. अंजना बताती हैं, इंटरव्यू के बाद जब कॉल लेटर मिला, तो मेरे बड़े भाई ने सेना में जाने से साफ मना कर दिया. उन्हें इस बात की चिंता थी कि ट्रेनिंग के लिए चंडीगढ़ से चेन्नई जाना पड़ेगा, वह भी अकेले. इस दौरान मेरे साथ अगर कुछ गलत हो जाता, तो नाते-रिश्तेदारों के बीच उन्हें शर्मिदा होना पड़ता. अंजना बताती हैं, लेकिन मैं अपनी मां को अपने पाले में करने में कामयाब रही और उन्होंने भाई को समझाया. 

तब जाकर सब तैयार हुए और मैं ट्रेनिंग के लिए निकल पड़ी. अंजना कहती हैं, उस दौरान मुझको लेकर हमारे रिश्तेदार भी तरह-तरह की बातें किया करते थे, लेकिन जब मैंने अपने बैच में टॉप किया और गोल्ड मेडल मिला तो उनके मुंह बंद हो गये. तब सबको मुझ पर गर्व होने लगा.

कैडेट अंडर ऑफिसर अंजना बताती हैं कि पहले सेना में महिलाओं की सेवा मेडिकल कॉर्प्स, डेंटल कॉर्प्स और नर्सिग सर्विस तक ही सीमित थी. 25 महिला कैडेटों का हमारा पहला ऐसा बैच था जिसे सेना में सीधे प्रायोगिक तौर पर शामिल किया गया. अंजना कहती हैं, सेना के अधिकारियों को हमारी क्षमता का अंदाजा नहीं था. राइफल ड्रिल के दौरान जहां पुरुषों को भारी 7.62 एमएम राइफल लेकर मैदान के दो चक्कर लगाने होते थे, वहीं हम सब को लाठियां पकड़ायी गयीं. अधिकारियों को संदेह था कि हमसे उतना भार उठ पायेगा भी या नहीं. अंजना कहती हैं, हमने राइफल की जगह लाठी लेकर दौड़ लगाने से इनकार कर दिया. लेकिन सही मापदंडों के अनुसार ट्रेनिंग पूरी करना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. 

हालांकि ट्रेनिंग पूरी करने के बाद हमने और हमारे बाद वाले बैच ने जो फीडबैक दिया, उससे हमारे अधिकारियों को यह बात अच्छी तरह से समझ में आ गयी कि हम लड़कियां भी लड़कों के बराबर मेहनत कर सकती हैं. सेना में महिला कैडेटों की क्षमता की सराहना करते हुए अंजना कहती हैं, हाल ही में महिला और पुरुष कैडेट्स को एक ही कोर्स की ट्रेनिंग में विलय कर दिया गया. हालांकि दोनों के शारीरिक मापदंडों में थोड़ा-बहुत अंतर है, लेकिन महिला और पुरुष कैडेट्स के पहले संयुक्त बैच में गोल्ड मेडल पानेवाली भी एक महिला ही थी.

एक साक्षात्कार में अंजना कहती हैं, ‘ट्रेनिंग शुरू होती है तो हमें ज्य़ादा जानकारी नहीं होती। जैसे, भारी-भरकम राइफल को संभालना एक बडा काम होता है, लेकिन धीरे-धीरे सब आसान लगने लगता है। शारीरिक स्तर पर स्त्री-पुरुष के बीच फर्क होता है, मगर जब स्त्री-पुरुष का पहला कंबाइंड बैच आया तो मैंने इसमें टॉप किया और मुझे, यानी एक स्त्री को ही गोल्ड मेडल मिला। यह बडा परिवर्तन है कि स्त्रियां सैन्य सेवाओं में आ रही हैं। 

बहरहाल, अंजना की पहली पोस्टिंग कोलकाता में हुई. तब बहुत सारे लोगों को यह पता नहीं था कि अब सेना में महिलाओं की बहाली होने लगी है, खासतौर से जवानों और रंगरूटों को. अंजना बताती हैं कि हमें अफसर की भूमिका मिली थी और हमारी ड्रेस पैंट-शर्ट थी, जबकि मेडिकल कॉर्प में महिलाओं को साड़ी पहनना होता था. ऐसे में जवान जब मुझको देखते तो वे अचरज के मारे हमें सलामी देना भूल जाते. हम 25 महिला कैडेट्स को अलग-अलग जगह पर पोस्टिंग दी गयी. यानी हर आर्मी स्टेशन पर एकमात्र महिला अधिकारी. बाद वाले बैचेज से एक स्टेशन पर कम से कम दो महिला अफसरों की नियुक्ति की जाने लगी. ऐसे में शुरू में तो मुश्किल हुई, पर धीरे-धीरे सब सामान्य होता गया.

इनफैंट्री और लड़ाकू टुकड़ियों में महिलाओं को शामिल किये जाने के बारे में अंजना बताती हैं कि इस मामले में मानसिक तनाव और सुरक्षा अहम मुद्दा है. इनफैंट्री के लिए महिलाओं को इसलिए उपयुक्त नहीं समझा जाता, क्योंकि इसके लिए असाधारण और कड़ी मेहनत की जरूरत पड़ती है. बहरहाल, आनेवाले दिनों में महिलाओं को बटालियनों में शामिल किया भी जा सकता है, लेकिन इसके लिए सबसे पहले उनके लिए सुरक्षा इंतजामों पर भी काम करना जरूरी होगा. सेना में जाने की इच्छा रखनेवाली महिलाओं को अंजना का संदेश है कि यह हर लिहाज से महिलाओं के लिए सुरक्षित है. आपको रहने से लेकर, खाने-पीने की सुविधा मिल जाती है और काम-काज की जगह तो सुरक्षित है ही. ऐसे में सैन्यकर्मी महिलाएं सुरक्षा से जुड़े कई ऐसे पहलुओं के प्रति बेपरवाह रह सकती हैं, जिनसे आमतौर पर आम महिलाओं को दो-चार होना पड़ता है.

समस्त मातृशक्ति और क्षत्रिय समाज के लिए प्रेरणास्रोत अंजना भदौरिया पर पुरे राजपूत समाज को गर्व है।
जय राजपूताना।


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FIRST WOMAN WHO WON GOLD MEDAL IN INDIAN ARMY
Anjana Bhadoria was one of the 25 women cadets of the first woman cadet batch of Indian army in 1992 inducted through the Women Special Entry Scheme (WSES).The journey for Anjana in the Armed forces was not easy but its her faith and determination to conquer her fears which led her way to success as rightly quoted “ it is fatal to enter an war without the will to win it”.

She believed in "To live for something rather than die for nothing ", she followed her belief and joined the armed forces in 1992 .Anjana bhadoria father was in Airforce so she already has a glimpse of what life in the armed forces was all about , “discipline, self-respect, pride for unit and country, a high sense of duty and obligation to comrades and to superiors, and a self confidence born of demonstrated ability.” .Before joining the Indian army she had completed her Msc in Microbiology and was working in one of the pharmaceutical firm in Chandigarh. Initially her family was not in favour of her joining the armed forces but they have to give up in front of Anjana passion for armed forces.she too have proved herself by topping her batch and getting gold medal .when Anjana got commissioned her first posting was In Calcutta.

Initial years of her service as a women officer in the armed force were not easy as people are not familiar with women officers in army at that time but Anjana bhadoria with her faith and determination paved her way towards her success and served 10 years in the Indian army.

A big salute to Anjana singh bhadoriya


Reference---
1- http://nehanair1993.blogspot.in/2015/03/first-woman-who-won-gold-medal-in.html?m=1
2- http://m.prabhatkhabar.com/news/special-news/story/304626.html
3- http://indianarmy.nic.in/Site/FormTemplete/frmTempSimpleWithFourPara.aspx?MnId=gmI24OhR6cfjI0L7PahOiA%3D%3D&ParentID=coq9O%2FadDbKw00jqRBhLyw%3D%3D&flag=z+IaVzxY7iQDS+PpsVPbZQ%3D%3D

Sunday, October 4, 2015

बिहार विधानसभा चुनाव में राजपूतों की भूमिका (rajputs of bihar)


बिहार विधानसभा चुनाव में राजपूतों की भूमिका-------


मित्रों बिहार में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है,इस बार का चुनाव राष्ट्रिय राजनीती के लिए भी बेहद अहम और निर्णायक सिद्ध होने जा रहा है,मोदी लहर की इस बार बेहद कठिन परीक्षा भी होने जा रही है और साथ ही साथ उनके विपक्षी लालू प्रसाद यादव और नितीश कुमार भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं,

इस बार अगर बीजेपी हार गयी तो उसकी पुरे देश भर में उलटी गिनती शुरू हो जाएगी और बीजेपी के अंदर भी मोदी विरोधी एक बार फिर से उन पर हावी होकर सत्ता परिवर्तन की मांग कर सकते हैं,बिहार चुनाव में अगर बीजेपी हार जाती है तो फिर वो अगली बार उत्तर प्रदेश,पंजाब,बंगाल में भी नहीं जीत पाएगी ,
वहीं अगर लालू-नितीश का महागठबंधन हार गया तो उनकी राजनीती समाप्त हो जाएगी और इससे दबंग और नवसामंतवादी पिछड़ों के वर्चस्व की राजनीती को भी गहरा अघात होगा और सवर्णों को बिहार में कुछ राहत की सांस मिल सकती है,

राजनितिक दलों के अलावा बिहार चुनाव में विभिन्न सामाजिक वर्गों का  भविष्य भी दांव पर लगा हुआ है,लालू प्रसाद यादव ने इसे अगड़े पिछड़ों की जंग का रूप दे दिया है और आरक्षण सीमा को बढ़ाकर 80% किये जाने की भी चुनौती दे डाली है उन्हें नितीश कुमार का पूरा समर्थन हासिल है और लालू-नितीश मिलकर कुर्मी+अहीर मुस्लिम वोट के सहयोग से बिहार से सवर्णों के सफाए के लिए कटिबद्ध हैं और इन वर्गों का उन्हें भरपूर समर्थन भी प्राप्त हो रहा है,अगर लालू-नितीश का महागठबंधन जीत जाता है तो बिहार में दम तोड़ चूका नक्सलवादी आन्दोलन फिर से सर उठा सकता है और इसके फलस्वरूप राजपूत-भूमिहार किसानो का बड़े पैमाने पर नरसंहार और उनकी भूमि बंधक बनाई जा सकती है,
इसलिए बिहार का आने वाला विधानसभा चुनाव इस बार सवर्णों का भविष्य तय करेगा ,अगर यहाँ बीजेपी जीत जाती है तो फिर इसका सीधा प्रभाव उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावो पर जरुर पड़ेगा और वहां से माया-मुलायम की पिछड़ा-दलित-मुस्लिम राजनीती का सफाया होना निश्चित है,,,,,,

बिहार विधानसभा चुनावो में राजपूतों की क्या भूमिका और रणनीति हो इस पर विशेष मंथन अतिआवश्यक है,
अनुग्रह नारायण सिंह से लेकर आनंद मोहन सिंह तक के नेताओं को षडयंत्र के तहत हाशिये पर डाला गया और राजपूत समाज राष्ट्र प्रेम में लगा रहा और कुछ चालाक जातियां अपनी जाति के फायदे में लगी रही. उन्हे राष्ट्र से कोई मतलब नही! क्या राजपूत समाज अबकि बार अपनी गहरी नींद से जागेगा?
क्या राजपूत समाज मुफ्त में वोट देता रहेगा?
क्या राजपूत समाज राष्ट्र प्रेम को कुछ दिन छोड़कर अपनी जाति के प्रति हुए अन्याय का प्रतिकार करने के लिए खड़ा हो पाएगा??
हम इस सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण और अधयन्न इस निबन्ध के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं.......

बिहार के सामाजिक समीकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि----

 ब्रिटिशकाल शुरू होने से कुछ समय पहले तक बिहार में अधिकतर जमीदारी राजपूतो और मुसलमानो के पास थी।जैसे जैसे अंग्रेजो की ताकत बढ़ती गई तो बिहार में ब्राह्मणों की उपजाति भूमिहार ने उनसे सम्पर्क शुरू कर दिया।राजपूतो और मुस्लिमो के सम्बन्ध अंग्रेजो से अच्छे नही थे इसीलिए अंग्रेजो ने ईस्ट यूपी के बनारस से बिहार तक भूमिहार जाति को बढ़ावा देना शुरू किया।भूमिहारो ने अंग्रेजो के सहयोग से बड़ी बड़ी जमीदारी स्टेट बना ली और राजपूतो ने इस पुरे इलाके में 1857 की क्रांति के समय और इसके पहले और बाद में भी अंग्रेजो से डटकर लोहा लिया जिसका परिणाम इन्हें भुगतना पड़ा और राजपूतो की बहुत सी जमीदारियां जब्त कर ली गई।
भूमिहारो का बिहार में जो भी उत्कर्ष हुआ वो सब राजपूतो की कीमत पर हुआ।हालाँकि इसके बाद भी बिहार में राजपूतो की ताकत और रुतबा कायम रहा।

स्वतंत्रता के बाद बिहार की राजनीति-------

आजादी के तुरन्त बाद आबादी के मात्र 3% भूमिहारो ने ब्राह्मणों के सहयोग से बिहार की सत्ता हथिया ली।दलित मुस्लिम वोट कांग्रेस के नाम पर इन्हें थोक में मिलता रहा और ब्राह्मण भूमिहारो ने मिलकर बिहार पर 35-40 साल राज किया।सभी सरकारी नोकरिया हथिया ली और इन दोनों ने मिलकर आबादी के 7% राजपूतों को पूरी तरह सत्ता सुख से वंचित रखा और इनके राज में राजपूत समाज पूरी तरह से उपेक्षित रहे।
 राजस्थान की अपेक्षा यहाँ के राजपूत शुरू से कांग्रेस से जुड़ गए।किंतु आजादी के बाद कांग्रेस ने सबसे वरिष्ठ राजपूत नेता बाबू अनुग्रह नारायण सिंह की बजाय भूमिहार जाति के श्रीकृष्ण सिंह को मुख्यमन्त्री बनाया जो लगातार 16 वर्ष तक मुख्यमन्त्री बने रहे।और अनुग्रह  नारायण सिंह को सिर्फ डिप्टी सीएम के पद से संतोष करना पड़ा।

शासन प्रशासन पर इस प्रकार शुरू से ही भूमिहार जाति ने बड़ी पकड़ बना ली।एक समय ऐसा था कि बिहार की जनसंख्या के सिर्फ 3% भूमिहारो के वहां 18 सांसद और 50 विधायक चुने गये थे ।

शिक्षा के दम पर ब्राह्मणों और कायस्थों ने भी भरपूर विकास किया।राजपूत भी अधिक पीछे नही रहे और चूँकि वहां भूमि सुधार नही हुआ था इसलिए मजबूत राजपूत भी बीच बीच में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते रहे और चन्द्रशेखर सिंह तथा सत्येंद्र नारायण सिंह जैसे राजपूत मुख्यमन्त्री बिहार में थोड़े थोड़े समय के लिए बने पर इस अल्पकाल में राजपूत हित का कोई ठोस कार्य नही हो सका।स्वतंत्रता के बाद 68 साल में 04 राजपूत मुख्यमन्त्री कुल 02 साल भी मिलकर राज नही कर पाए या ये कहें कि ब्राह्मण भूमिहारो ने जमने नही दिया।

1977 की जेपी क्रांति ने भी बिहार को लालू अहीर और नितीश जैसे नेता दिए जो आगे चलकर बिहार के लिए अभिशाप सिद्ध हुए।
जेपी आंदोलन से बिहार में कर्पूरी ठाकुर मुख्यमन्त्री बने जो जाति से नाई थे।उन्होंने पिछड़ी जातियों के हित के कुछ कार्य किये पर इससे बिहार में कोई बड़ा सामाजिक परिवर्तन नही हुआ।पर इसी काल में वहां नक्सलवाद की नीव पड़ गयी जो बंगाल और दिल्ली के जेएनयू की देन थी।
इसके बाद बिहार में मण्डल की राजनीती शुरू हो गई और इसी के साथ लालू अहीर के नेतृत्व में पिछड़ी जातियो और मुसलमानो की गोलबन्दी शुरू हो गई और ब्राह्मण/भूमिहार/राजपूतो के दुर्दिन शुरू हो गए।

लालू प्रसाद यादव ने नारा दिया--------

भूरा बाल साफ़ करो(भूरा बाल मतलब भूमिहार राजपूत ब्राह्मण लाला)।
जब तक ब्राह्मण की बेटी दलित की खाट पर नही बैठेगी तब तक सामाजिक न्याय नही मिलेगा।।
भूरा बाल साफ़ करने के लिए लालू की शह पर नक्सलवादियों ने भूमिहार और राजपूत किसानो का नरसंहार करना शुरू कर दिया।और स्वर्ण किसानो को अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझना पड़ा।इसका मुकाबला करने के लिए जमीदारो ने सनलाइट सेना/रणवीर सेना जैसी निजी सेनाएं बनाई और इस दौर में राजपूत/भूमिहारो ने मिलकर नक्सलवादियो के पैर उखाड़ दिए।इनपर दर्जनों नरसंहारो का आरोप भी लगा।

ये दौर बिहार में अहीरों के वर्चस्व का था और एक समय बिहार में कुल 80 अहीर विधायक चुने गए थे.भूमिहार/ब्राह्मण हाशिये पर चले गए।राजपूतो के एक छोटे से वर्ग को लालू प्रसाद ने टिकट देकर अपने साथ मिला लिया।इस दौर में आनन्द मोहन जैसे दमदार युवा राजपूत नेता ने लालू यादव का जमकर विरोध किया,पर उन्हें अन्य सवर्णों का यथोचित सहयोग नहीं मिला क्योंकि लालू के स्वर्ण युग में भी भूमिहार और ब्राह्मण कमजोर हो चुकी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी को वोट देते रहे,जिससे लालू प्रसाद लगातार चुनाव जीतते चले गए,
आरक्षण विरोधी आंदोलन से बिहार में आनन्द मोहन सिंह जैसा दबंग राजपूत नेता सामने आया जिसने राजपूतो के साथ भूमिहार ब्राह्मण और गैर अहीर मौर्चा बनाकर बिहार पीपुल्स पार्टी का गठन किया।जिसने वैशाली के उपचुनाव में लालू के उम्मीदवार को हराकर तहलका मचा दिया था और यह दल बिहार में सत्ता के विकल्प के रूप में उभरा पर सदियो से सवर्णो में चली आ रही खाई पट नही पाई और यह प्रयास विफल रहा।

नितीश कुमार-----
लालू युग के बाद बिहार में बीजेपी के सहयोग से नितीश कुमार का युग शुरू हुआ जो कुर्मी जाति के थे।नितीश घोर राजपूत विरोधी नेता है।इसने सवर्णो में फुट डालने के लिए भूमिहारो को अपने साथ मिला लिया और बीजेपी के सुशील मोदी के साथ मिलकर राजपूत नेताओं का सफाया शुरू कर दिया।
पहले इन्होंने दबंग राजपूत नेता आनन्द मोहन सिंह को झूठे मुकदमे में फांसी/उम्रकैद की सजा कराई।फिर दिग्विजय सिंह (अब स्वर्गीय) को अपने दल से बाहर करा दिया।इसके बाद दबंग नेता प्रभुनाथ सिंह को पार्टी से बाहर कर दिया।
इस प्रकार नितीश कुमार ने भूमिहारो को साथ मिलाकर बीजेपी नेताओं के साथ मिलकर राजपूत समाज को रसातल में पहुँचाने का प्रयास किया।

बिहार में विभिन्न वर्गों की संभावित आबादी और पतिनिधित्व------

1-अहीर(गोप,ग्वाल)--14%
2-मुस्लिम--16%
3-राजपूत --7%
4-ब्राह्मण --6%
5-भूमिहार--3%
6-कुर्मी--3%
7-कोइरी--7%
बिहार में यादव 14% के बाद सबसे अधिक जनसंख्या वाला राजपूत 7%, बिहार के कुल 243 विधानसभा क्षेत्रों में 75 विधानसभा क्षेत्रों में पहले या दूसरे नंबर पर हैं. बिहार के मुख्यमंत्रियों में भूमिहार 24 वर्ष, यादव 16 वर्ष, कुर्मी 10 वर्ष, ब्राह्मण 23 वर्ष, कायस्थ 5 वर्ष व चार टर्म में राजपूत 2 वर्ष रहा है. इस प्रकार बिहार में बड़ी आबादी होते हुए भी राजपूत समाज सत्ता सुख से वंचित रहा है,और राजपूतों के लिए अपने समाज से मुख्यमंत्री बनना बेहद जरुरी है...

1990 में राजपूत विधायको की संख्या 41 थी जो 1995 में गिरकर सिर्फ 22 रह गयी और 2010 में यह संख्या 31 हो गयी थी,अहीर विधायक भी एक समय 80 पर जा पहुंचे थे ,अब सिर्फ 40 रह गए हैं,भूमिहार एक समय 50 तक विधायक चुने गए थे,अब सिमट कर 26 पर आ गए हैं...
फिर भी बिहार में 1989 के बाद सबसे ज्यादा सांसद और विधायक अहीर बन रहे हैं और उनके बाद राजपूतो का नम्बर आता है।इस समय बिहार में 6 सांसद राजपूत हैं(पिछली बार 8)।जिनमे दो केंद्रीय मंत्री हैं।अहीरो के बाद सबसे ज्यादा 31 विधायक भी राजपूत ही हैं,और आधा दर्जन राज्य सरकार में मंत्री भी हैं।यहाँ के राजपूत अधिकतर बीजेपी के वोटर हैं पर लालू या नितीश भी राजपूत को टिकट दे या कोई निर्दलीय तगड़ा राजपूत उम्मीदवार हो तो उसे भी भरपूर वोट मिलता है।इसी कारण बिहार में राजपूत विधायक/सांसदों की संख्या जनसँख्या के अनुपात से हमेशा दो से तीन गुणी होती है।
पर फिर भी इतने मंत्री/सांसद/विधायक होते हुए भी बिहार में राजपूतो का वो दबदबा नही है जो होना चाहिए।हालाँकि ओरंगाबाद,छपरा,महाराजगंज आदि कई जिलो में राजपूती वर्चस्व अभी भी साफ़ दिखता है।कोई भी दल कभी राजपूतो का तुष्टिकरण नही करता।

 बिहार में बीजेपी द्वारा घोषित कुछ उमीद्वारो के नाम---------
amrendra pratap singh - (son of bihar ex chief minister harihar singh and right now he is deputy speaker bihar)
Ramadhar singh - (5 times mla continue)
Gopal narayan singh - (owner of narayan group of colleges and ex president bihar BJP)
sarvesh kumar singh -(ex mla)
ashok singh - (ex mla known as yuvraj sahab)
ajay pratap singh -(mla and son of MLC and minister sumit singh)
kameshwar singh
tarkeshwar singh ( 2 times mla)
janak singh
vinay kumar singh(mla and the person who fought with lalu yadav in horse fair when he called his horse chetak)
achyutanand singh (ex student leader and bjp mahasachiv bihar)
rannvijay singh (2 times mla,bahubaali leader)
subhash singh
rajkumar singh (young political face of rajputs)
ashok kumar singh (sitting mla)
arun kumar singh
brij kishor singh
rana randhir singh (son of ex minister sita singh)
sachinendra singh
ajay kumar singh (Buisness man)
sanjay singh urf "tiger" (bahubaali politician)
manoj singh
dev ranjan singh (famous doctor)
sweety singh (from royal family, social worker,Politician,hotelier, bjp yuva morcha adhyaksha)
neeraj kumar singh (2 times mla and brother of sushant singh rajput)
vinod singh (sitting mla)

सिर्फ बीजेपी से 32 और पुरे एनडीए से 39 राजपूत उम्मीदवार लड़ेंगे।
लेकिन जहाँ एक और बीजेपी ने अपने हिस्से की 160 सीटो में राजपूतो को 32 टिकट दिए हैं वहीं उनके सहयोगी एनडीए के घटक दलों ने 80 सीटों में से मात्र 7 टिकट राजपूतो को दिए हैं।कुशवाह और मांझी की पार्टियों ने 1-1 टिकट राजपूतो को थमाकर और भूमिहारो को अधिक सीट बांटकर राजपूतो को लगभग दरकिनार किया है।यही नही मांझी की पार्टी हम ने बिहार के सबसे लोकप्रिय नेता आनन्द मोहन सिंह की पत्नी को बड़ी न नुकर के बाद सिर्फ एक टिकट शिवहर से थमा दिया है।उनके किसी और समर्थक को टिकट नही दिया गया है।
 वही लालू यादव और नितीश कुमार कांग्रेस के महागठबन्धन ने 243 सीटों पर मात्र 16 राजपूत उम्मीदवार उतारे हैं जो उनकी राजपूतो और स्वर्णो के प्रति विध्वंस की निति को दर्शाता है।
हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा किये जाने के बयान पर लालू ने खुली चुनोती स्वर्णो को देते हुए कहा है कि ओबीसी आरक्षण को और बढ़ाकर कुल आरक्षण 80% तक किया जाएगा।अगर इस बार लालू और नितीश का गठबंधन जीत गया तो ये बिहार के स्वर्णो के लिए मौत का पैगाम होगा।क्योंकि अहीर कुर्मी मुस्लिम के मजबूत गठबंधन के आगे सवर्णो की हैसियत शून्य होगी।

रघुवंश प्रसाद सिंह प्रभुनाथ सिंह जगदानन्द सिंह जैसे राजपूत नेता लालू यादव के दल में बिलकुल उपेक्षित और महत्वहीन से हो गए हैं।लालू यादव और नितीश कुमार ने कुल 64 अहीर उम्मीदवार उतारकर अपनी सोच दर्शा दी है।अब फिर से लालू और नितीश एक हो गए हैं और सच यही है कि अगर राजपूत/ब्राह्मण/भूमिहार अपने मतभेद भूलकर एक साथ नही आते है तो बिहार में सवर्णो का भविष्य एकदम अंधकारमय है।।।।।

भूमिहार समाज की भूमिका------

बिहार में स्वर्णो को अपना अस्तित्व बचाने के लिए आपसी मतभेद भूलकर एकजुट हो जाना चाहिए।किन्तु यहाँ भूमिहार जाति का स्वार्थी नजरिया स्वर्ण एकता में सबसे बड़ा बाधक है।आज आनन्द मोहन सिंह जिस भूमिहार नेता छोटन शुक्ला की हत्या के विरोध प्रदर्शन में हुई दुरघटना में जेल में सजा काट रहे हैं उस भूमिहार नेता के भाई सब नितीश कुमार के साथ समझोता करके सत्ता सुख भोग रहे हैं।बहुत से भूमिहार राजपूतों से उसी प्रकार ईर्षा करते हैं जिस प्रकार उत्तर भारत में जाट राजपूतो से करते हैं।

अमित शाह और मोदी ने मिलकर एक लौ प्रोफाइल और मेहनती कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह (जाति राजपूत)को मुख्यमन्त्री पद देने का मन बनाया है और इसीलिए उन्हें विधानसभा चुनाव भी लड़वाया जा रहा है।लेकिन उनका रास्ता रोकने के लिए जातिगत विद्वेष के कारण फिर से भूमिहार नेताओं द्वारा साजिश की जा रही है।भूमिहारो में पहले कुल बाद में फूल का नारा दिया जा रहा है।हाल ही में बीजेपी के भूमिहार नेता गिरीराज सिंह का बयान कि बिहार में कोई स्वर्ण नेता मुख्यमंत्री नही बनेगा।दरअसल ये बयान राजपूत मुख्यमन्त्री का रास्ता रोकने को दिया गया है।
इसका मतलब भूमिहार समाज किसी भी जाति के मुख्यमन्त्री को बर्दाश्त कर सकता है मगर वो राजपूत को उच्च पद पर नही देख सकता!!!!!!!बिहार में भूमिहार और ब्राह्मणों द्वारा राजपूत विरोध की यह निति और सवर्णों के आपसी मतभेद से ही बिहार में दबंग पिछडो का वर्चस्व बढ़ा है....

अगर उनकी यही निति बनी रही तो बिहार से भूरा बाल यानि स्वर्णो का सूपड़ा साफ़ होना निश्चित हैं।।।अगर स्वर्ण एकता चाहिए तो भूमिहार समाज को यह सोच छोड़नी होगी।
और मिलकर इन आरक्षणवादियो को सबक सिखाना होगा....

अंत में राजपूत समाज की बिहार चुनावो में भूमिका पर निष्कर्ष-------

यह भी सही है कि बीजेपी राजपूतो और सवर्णों के वोट बैंक का दोहन करती है पर बदले में कुछ नहीं देती, किन्तु दुर्भाग्यवश बिहार में राजपूतों और सवर्णों के पास कोई और विकल्प नही है,नोटा का बटन दबाने से या किसी निर्दलीय को समर्थन करने से या मतदान का बहिष्कार करने से बिहार में लालू-नितीश की जीत पक्की हो जाएगी और सवर्णों,दलितों,गैर कुर्मी,अहीर पिछडो के लिए यह स्थिति नर्क के समान हो जाएगी..बीजेपी की चाहो कितनी आलोचना करो,कोई भला न करे बीजेपी राजपूतो का-----
पर  राजपूत समाज अपने समाज का मुख्यमन्त्री बनवाने के लिए सिर्फ और सिर्फ बीजेपी और एनडीए उम्मीदवारो को वोट देकर सफल बनाए
(जहाँ किसी और दल से या निर्दलीय कोई अच्छा समाज हितैषी और मजबूत राजपूत उम्मीदवार हो तो उसे भी अपवाद स्वरूप समर्थन दें)
राजपूतो के जन्मजात दुश्मन नितीश कुमार और लल्लू यादव का सूपड़ा साफ़ करके क्षत्रिय शेर आनन्द मोहन सिंह के साथ हुए अन्याय का बदला जरूर लें।
आप सभी से अनुरोध है की आप राजपूत उम्मीदवार का समर्थन करके उसे जीत दिलाये ताकि बिहार में राजपूत मुख्यमंत्री की दावेदारी मजबूत हो सके.....
सन्दर्भ------http://rajputanasoch-kshatriyaitihas.blogspot.in/2015/10/rajputs-of-bihar.html