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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Wednesday, November 25, 2015

ब्रिगेडियर (retiered) गोविन्द सिंह सिसोदिया(Brigadier Govind singh sisodiya,the hero of 26/11 mumbai terrorist attack)

===#26/11 मुम्बई पर आतंकवादी हमलों में भारतीय कमांडो ऑपरेशन के अगुवा ब्रिगेडियर (retiered) गोविन्द सिंह सिसोदिया===

आज #26/11 मुम्बई में आतंकवादी हमलों की पुण्यतिथि होने के मौके पर यह पोस्ट 26/11 के हमलों के खिलाफ भारतीय एनएसजी कमांडो की जवाबी कार्यवाही को लीड करने वाले ब्रिगेडियर गोविन्द सिंह सिसोदिया और इस हमले में शहीद होने वाले वीर जवानो के नाम----
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जीवन परिचय---

ब्रिगेडियर गोविंद सिंह सिसोदिया का जन्म हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले के चौपाल कसबे के भरनो गांव में हुआ था।
ब्रिगेडियर सिसोदिया अपने परिवार में चार भाइयो में से सबसे छोटे है। इनके पिता का नाम शेर सिंह सिसोदिया था जो राजस्व सेवा में अधिकारी थे।इनके बड़े भाई के एस सिसोदिया पुलिस में डीआईजी पद से रिटायर हुए।दूसरे भाई आईएस सिसोदिया आर्मी में कर्नल पद से रिटायर हुए।जिससे पता चलता है कि यह परिवार शुरू से उच्च शिक्षित और प्रतिभाशाली रहा है।

शिक्षा और बेजोड़ सैन्य सेवा-----

ब्रिगेडियर सिसोदिया ने हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर के गवर्नमेंट विजय हाई स्कूल से बचपन में शिक्षा प्राप्त की। सन् 1975 में भारतीय सेना ज्वाइन करने से पहले इन्होंने S D College, Shimla से उच्च शिक्षा प्राप्त की।सन 1975 में इन्हें 16 सिख रेजिमेंट में नियुक्ति प्राप्त हुई। बाद में इन्होंने 19 और 20 सिख रेजिमेंट का नेतृत्व भी किया।

सन् 1987 में भारतीय सेना के श्रीलंका में शांति स्थापना के अभ्यान में इन्होंने वीरता से भाग लिया तथा एक आतंकवादी हमले के दौरान यह गोली लगने ले कारण घायल भी हुए थे।
बाद में इन्होंने कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय सेना के कई ऑपरेशनो में हिस्सा लिया। ब्रिगेडियर सिसोदिया ने करीब 35 साल भारतीय सेना को देकर देश की सेवा की।
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26/11/2008 को मुम्बई पर पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा हमला-----
मुंबई पर 26 नवंबर 2008 के हमलों को भला कौन भूल सकता है. किस तरह 10 हमलावरों ने मुंबई को ख़ून से रंग दिया था. हमलों में 160 से ज़्यादा लोग मारे गए थे, कई घायल हुए थे.

रात के तक़रीबन साढ़े नौ बजे मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर गोलीबारी की ख़बर मिली. मुंबई के इस ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन के मेन हॉल में दो हमलावर घुसे और अंधाधुंध फ़ायरिंग शुरू कर दी. इनमें एक मुहम्मद अजमल क़साब था जो हमलों के दौरान गिरफ्तार इकलौता हमलावर है. दोनों के हाथ में एके47 राइफ़लें थीं और पंद्रह मिनट में ही उन्होंने 52 लोगों को मौत के घाट उतार दिया और 109 को ज़ख़्मी कर दिया.

लेकिन आतंक का यह खेल सिर्फ़ शिवाजी टर्मिनस तक सीमित न था. दक्षिणी मुंबई का लियोपोल्ड कैफ़े भी उन चंद जगहों में था जो तीन दिन तक चले इस हमले के शुरुआती निशाने थे. यह मुंबई के नामचीन रेस्त्रांओं में से एक है, इसलिए वहां हुई गोलीबारी में मारे गए 10 लोगों में कई विदेशी भी शामिल थे जबकि बहुत से घायल भी हुए. 1871 से मेहमानों की ख़ातिरदारी कर रहे लियोपोल्ड कैफ़े की दीवारों में धंसी गोलियां हमले के निशान छोड़ गईं. 10 :40 बजे विले पारले इलाक़े में एक टैक्सी को बम से उड़ाने की ख़बर मिली जिसमें ड्राइवर और एक यात्री मारा गया, तो इससे पंद्रह बीस मिनट पहले बोरीबंदर में इसी तरह के धमाके में एक टैक्सी ड्राइवर और दो यात्रियों की जानें जा चुकी थीं. तकरीबन 15 घायल भी हुए.

लेकिन आतंक की कहानी यही ख़त्म हो जाती तो शायद दुनिया मुंबई हमलों से उतना न दहलती. 26/11 के तीन बड़े मोर्चे थे मुंबई का ताज होटल, ओबेरॉय ट्राइडेंट होटल और नरीमन हाउस. जब हमला हुआ तो ताज में 450 और ओबेरॉय में 380 मेहमान मौजूद थे. ख़ासतौर से ताज होटेल की इमारत से निकलता धुंआ तो बाद में हमलों की पहचान बन गया.

मुम्बई एटीएस के हेमन्त करकरे,विजय सालस्कर आदि कई अधिकारी और जवान इन हमलो में शहीद हो गए।तब जाकर नेशनल सेक्यूरिटी गार्ड (N.S.G)के कमांडो को दिल्ली से बुलवाया गया जिनका नेतृत्व कर रहे थे उस समय NSG के DIG गोविन्द सिंह सिसोदिया जी जिन्होंने अपने जवानो के दम पर इस ऑपरेशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। एन एस जी के जवाबी हमलों के परिपाटी इन्होंने ही तैयार की जिस कारण भारतीय सेना आतंकवाद के इस घिनोने कृत्य का मुँह तोड़ जवाब दे पाई और विजय हुई। ब्रिगेडियर सिसोदिया 26/11 के मुम्बई हमलों के दौरान भारतीय सेना के नायक थे। तथा होटल ताज ओबेरॉय और नरीमन पॉइंट से आतंकवादियों का सफाया इनके जिम्मे था।

ब्रिगेडियर जवाबी कार्यवाही के दिन को याद करते हुए बतातें है की इन हमलों की जवाबी कार्यवाही में सबसे बड़ी चुनौती यह थी की आम जन मानस को कोई क्षति ना पहुचाते हुए दुश्मन का सफाया हो जाये।
इस चुनोती में भारतीय सेना की कार्य वाही सफल भी रही और किसी आम जन को जवाबी कार्य वाही में क्षति नहीं पहुची और अजमल कसाब को छोड़कर सभी आतंकी मारे गए।परन्तु भारतीय सेना ने दो अनमोल जवान गवां दिए। जवाबी हमलों में शहीद हुए अपनी टीम के सदस्यों मेजर उन्नीकृष्णन और गजेन्द्र सिंह को आज भी याद करते हुए इन्हें बहुत दुःख होता है और साथ में ही उनपर गर्व भी होता है।

मुंबई हमले में कई वीर सपूतों को हमने खो दिया। इस हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। यह हमला सिर्फ मुंबई पर न होकर देश पर हमला था। 26-28 नवंबर तक रात दिन चली मुठभेड़ के बाद गोविन्द सिंह सिसोदिया जी के नेतृत्व में कमांडो ने आतंकियों को मार गिराया गया और एक को जिंदा पकड़ लिया गया। इस एकमात्र आतंकी अजमल कसाब को बाद में पुणे की जेल में फांसी दे दी गई।
अजमल कसाब से सिसोदिया जी ने कड़ी पूछताछ भी की थी जिसमे कई राज उजागर हुए थे।इस जीवित पकड़े गए आतंकी की वजह से ही भारत पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय जगत में शर्मिंदा कर पाया था।

इन्हें 26/11 के हमले के खिलाफ सफल अभ्यान के लिए सेना का वशिष्ठ सेवा मेडल और चीफ ऑफ़ आर्मी स्टाफ प्रशंसनीय कार्ड ऑपरेशन रक्षक जम्मू कश्मीर के लिये से नवाजा गया।

समस्त आर्यव्रत और राजपूत समाज को आज अपने इस पूत पर बहोत गर्व है। ब्रिगेडियर सिसोदिया ने एक रघुवंशी क्षत्रिय होने की परम्परा खूब निभाई और देश को रक्षा के लिए अपनी पूरी जिंदगी न्योछावर करदी।
आज 26/11 के दिन सभी मृतकों और शहीदों को श्रध्दांजलि देते हुए राजपुताना सोच और क्षत्रिय इतिहास पेज ब्रिगेडियर गोविन्द सिंह सिसोदिया जी को सैल्यूट करता है।

जय हिन्द 🙏🙏🙏

जय श्री राम

Monday, November 16, 2015

COLONIAL MYTH OF ORIGIN OF GURJARA PRATIHARAS

THE COLONIAL MYTH OF GURJARA PRATIHARA ORIGIN PART-1

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास



भाइयों आज से हम एक ऐसे क्षत्रिय राजपूत राजवंश के ऊपर अपनी पोस्ट्स की शृंखला शुरू करने जा रहें है जिसके इतिहास को कई विदेशी व उनके देसी वाम्पन्ति इतिहासकारों ने अपने तरह तरह के ख्याली पुलाव व तर्कहीन वादों से दूषित करने की कोशिश की और वे इस कार्य में कुछ हद तक सफल भी रहे। परंतु आज के समय में जब साधन व संसाधन बढ़ गएँ है और सभी प्रकार के ऐतिहासिक साक्ष्य जन साधारण व विशेषज्ञ शोधकर्ताओं के पहुच के भीतर उपलब्ध ही चुके है तो नए विश्लेषण पुराने बेतुके तर्कों के साथ तोड़ मरोड़ कर पेश किये गए इतिहास की कलई खोल रहें हैं।

दरहसल पुरातन काल से ये माना जाता रहा है के इतिहास उसी का होता है जिसका शाशन होता है और शाशक आदिकाल से इतिहास को तोड़ मरोड़ के अपने अनुसार जन साधारण के सामने प्रस्तुत कर उनकी भावनाओं का फायदा उठातें आएं हैं।

भारत में पढ़ाये जा रहे जिस इतिहास को आज हम पढ़तें है व दरहसल 18 वीं सदी में अंग्रेजों द्वारा दी व सिखाई पदत्ति पर आधारित है। और यही नहीं भारत के इतिहास में पढाई जाने वाली ज्यादातर विषय और मान्यताएँ आज आजादी के 68 सालों बाद भी इन्हीं अंग्रेजों की देन है। अब आप अनुमान लगा ही सकते हैं के जो विदेशी भारतीय परम्पराओं व मान्यताओं और उसकी समझ से कोसों दूर थे बिलकुल अलग सभ्यता और संस्कृति से थे वे क्या तो भारत की संस्कृति को समझें होंगे और क्या ही इतिहास बांच के गए होंगे।
दरहसल अंग्रेज भारतीय इतिहास को अपनी सियासत का हिस्सा समझ इससे खेलते रहे और भारतीय समाज की संस्कृति नष्ट करने के लिए व इसका बखूबी इस्तेमाल कर गए। दरहसल आज पढ़ाये जाने वाला भारतीय इतिहास की नींव लगभग उसी समय शुरू हुई जब भारत के लोगों ने अंग्रेजों के शाशन के खिलाफ बिगुल बजाया और सन 1857 की क्रांति का उद्घोष हुआ। ऐसे में ज्यादातर अंग्रेज इतिहासकार भारत पर अपने कमजोर होते शाशन को देख इतिहास को सियासी बिसात पर एक हथियार के भांति इस्तेमाल कर के चले गए। जैसे की हम सभी इस कथन से अनिभिज्ञ नहीं है के यदि आप किसी जाती समुदाय के संस्कृति नष्ट करदे तो उस पर अपनी संस्कृति थोप गुलाम बनाने में देर नहीं लगती। अंग्रेज इस कथन का महत्व जान इतिहास की तोड़ मरोड़ भारत की पर प्रहार संस्कृति व् उसके विनाश के लिए कर गए। इस तोर मरोड़ की चपेट में आकर सबसे ज्यादा जिस जाती को नुकसान झेलना पड़ा वो है भारत का अपना आर्य क्षत्रिय वर्ग जिसका विशेषण शब्द है "राजपूत"।

ये उन अंग्रेजों से कम कहाँ जिन्होंने भारत में रहने वाले आर्य व वेदिक संस्कृति में उतपन्न क्षत्रिय वर्ग जिसका विशेषण राजपूत शब्द था उन्हें 6वीं शताब्दी तक सीमित करने की कोशिश की और निराधार तरीके से राजपूतों के प्रति रंजिश निकालते हुए उन्हें निराधार रूप से शक हूण सींथ साबित करने की कोशिश की। वहीं आज के नव सामंतवादी जातियाँ निराधार इतिहास लिख कर उस सोशल मीडिया व इंटरनेट द्वारा फैला कर हमें राजपूत प्रयायवाची या विशेषण शब्द के आधारपर 11वीं सदी तक सीमित करने की फ़िराक में हैं।

ये उन अंग्रेजों से कम कहाँ जिन्होंने भारत में रहने वाले आर्य व वेदिक संस्कृति में उतपन्न क्षत्रिय वर्ग जिसका विशेषण राजपूत शब्द था उन्हें 6वीं शताब्दी तक सीमित करने की कोशिश की और निराधार तरीके से राजपूतों के प्रति रंजिश निकालते हुए उन्हें निराधार रूप से शक हूण सींथ साबित करने की कोशिश की। वहीं आज के नव सामंतवादी जातियाँ निराधार इतिहास लिख कर उस सोशल मीडिया व इंटरनेट द्वारा फैला कर हमें राजपूत प्रयायवाची या विशेषण शब्द के आधारपर 11वीं सदी तक सीमित करने की फ़िराक में हैं।
दरहसल कई अंग्रेज और वामपंथी (भगवान व भारतीय संस्कृति को न मानाने वाले) इतिहासकारों के इतिहास को धूमिल करने के तर्क इतने बेवकूफी भरे है के कई बार उन्हें पढ़ कर भारतवर्ष इसके अस्तित्व और यहाँ की शोध् पदत्ति पर बहोत हँसी आती है। कोई हिंदुओं को कायर मान और राजपूतों को बहादुर जान के आधार पर विदेशी लिख गया । कोई 36 राजवंशों में मजूद हूल को हूण समझ राजपूतों को आर्य क्षत्रियों और हूनो की मिलीजुली संतान लिख गया। किसी ने तो राजपूतों के लडाके स्वाभाव को देख श्री राम और कृष्ण को ही सींथ और शक लिख दिया। किसी ने द्विज शब्द का अर्थ ब्राह्मण बना दिया किसी गुर्जरा देस पर राज करने वाले सभी वंशों को बेतुका गुर्जर लिख दिया। हद तो तब हो गयी जब किसी ने राजपूतों के अंतर पाये जाने वाली सती प्रथा, विधवा विवाह न होना व मांसाहार के प्रचलन के करण इन्हें विदेशी होने का संदेह जाता कर इतिहास परोस दिया और लिख दिया 6ठी शताब्दी के बाद ही राजपूत क्षत्रियों का उद्भव हुआ।


जबकि C V Vaid, G S ojha , K N Munshi or Dashrath Sharma जैसे महान इतिहासकार इन मतों को सिरे से ख़ारिज कर चुकें हैं और राजपूतों को आर्य क्षत्रिय ही मानते हैं जो की पूर्ण रूप से सत्य भी है। 

शुद्ध रघुवंशी क्षत्रिय प्रतिहारों का इतिहास जानने से पहले आइये नजर डालते हैं उस जाती की उतपत्ति के मतों पर जो इस वंश पर झूठा दावा पेश करती है (जिसे NCERT ही नहीं मानता)।

===गुज्जर ( गौ + चर ) जाती की उतपत्ति के मत:===
==== डा भगवानलाल इन्द्राजी का गुजर इतिहास :====

इनके अनुसार गुजर जाती भारतवर्ष के पश्चिमोत्तर मार्ग द्वारा आई गयी विदेशी जाती है जो प्रथम पंजाब में आबाद होकर धीरे धीरे गुजरात खानदेश की और फैली हालाँकि इसका कोई प्रमाण नहीं है। ये और लिखते है की गुजर कुषाण वंशी राजा कनिष्क के राज्यकाल 078 - 108 ईस्वी के समय भारत आये हालांकि इसका भी कोई प्रमाण नहीं है। ये अपने लेख में आगे और तर्क हीन तथा प्रमानरहित बात करते हुए गुजरात चौथी से आठवी शताब्दी के बीच में राज कर रहे मैत्रक वंश को भी गुर्जर होने का संदेह जाता गए जिसे हवेनत्सांग क्षत्रिय बता कर गया है। इन्होंने अपनी थ्योरी सिद्ध करने के लिए आगे सारी हदें ही पार करदी। ये लिखतें की हालांकि गुजरात में गुज्जरों की कई जातियाँ हैं जैसे गुजर बनिये , गुजर सुथार , गुजर सोनी , गुजर सुनार , गुजर कुंभार , गुजर ब्राह्मण , गुजर सिलावट और सबसे ज्यादा गुजर कुर्मी जो सभी गौचर जाती से बने। निष्चित रूप से इतिहासकार सनकी होते थे और अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी भी हद्द तक ख्याली पुलाव पका पका कर परोस देते थे। जिस कुर्मी जाती के ये बात कर रहें है दरहसल गुजरात का पटेल समुदाय है जो शुद्ध रूप से भारतीय जाती है।

==== सर काम्बैल की गुजर थ्योरी ====

सर काम्बैल ने भी अपने ख्याली पुलाव पकाये और गुजर को खजर जाती का ही बता डाला जो 6ठी शतब्दी में यूरोप और एशिया की सीमा पर स्थित के ताकतवर जाती थी। जिसका भी शब्द से शब्द जोड़ कर बनाना और तुक्के बाजी के अलावा कोई प्रमाण नहीं है।

==== बेडेन पॉवेल के अनुसार गुजर :====

"इसमें कोई संदेह नहीं है के पंजाब में भारी संख्या में बसने वाली जातियाँ ये सिद्ध करती है की वेदिशी आक्रमणकरी यथा बाल इंडो सींथियन ,गुजर और हूणों ने अपनों बस्ती बसाई होगी। पर इस कथन का भी इनके पास कोई प्रमाण नहीं।
ए ऍम टी जैकसन और भंडारकर द्वारा अविश्वसनीय गुज्जरों की खोज :

ए ऍम टी जैकसन तो आज के गुज्जरों के जन्मदाता माने जाने चाहिए| सन् 941 में कन्नड़ के सुप्रसिद्ध कवि पम्प जे विक्रमार्जुन विजय (पम्प भारत ) नाम का काव्य रचा| इस काव्य में चोल देश के चालुक्य (सोलंकी) राजा अरिकेसरी द्वितीय और उसके पूर्वजो की शौर्य गाथा लिखी हुई थी। उसमें पम्प यह वर्णन करता है कि अरिकेसरी के पिता नरसिंह द्वितीय (यह राष्ट्रकूटों का सामंत था )ने गुर्जरराज महिपाल को प्रारस्त कर उससे राजश्री छीन और उसका पीछा कर अपने घोड़ो को गंगा के संगम पर स्नान कराया। इस बात की पुष्टि राष्ट्रकूटों के अभिलेख भी करते हैं परंतु इन अभिलेखों में न तो प्रतिहार और ना ही गुजर शब्द का जिक्र मिलता है।
पम्प भारत में गुर्जरराज महिपाल लिखा देख अककल के अंधे जैक्सन ने यह मान लिया की यह महिपालगुर्जर अर्थात गूजर वंश का है। अगर हम किसी महामूर्ख या पागल आदमी से पूछें की गुर्जराराज का क्या अर्थ है ? तो वह भी यही बताएगा की इसका अर्थ तो सीधा साधा गुर्जर देस का राजा हुआ। गुर्जरराज का वास्तविक अर्थ गुर्जरदेस पर राज करने वाला है,गुजर जाती नहीं | यह भी ज्ञात होना बहोत जरूरी है के ऍम टी जैक्सन डिस्ट्रिक कलेक्टर थे इतिहासकार नहीं।


जैक्सन और डा डी आर भंडारकर के पारिवारिक तालुकात थे फिर भी वह इनके द्वारा दिए गए कुछ इतिहासिक विवरणों से इत्तेफाक रखते थे। डा डी आर भंडारकर सन 1907 में पुरातात्विक सर्वेक्षण के दौरान भीनमाल पहुचे तो उन्होंने पाया के जैक्सन ने वहां के जिन मंदिरो के शिलालेखों के अध्यन कर बॉम्बे गजेटियर प्रकाशित किया उनके मूल वचन बहोत भ्रष्ट थे अतः भंडारकर ने दुबारा इनकी छाप ली।


राजस्थान दौरे से लौट कर भंडारकर ने इस बात का स्पष्टीकरण भी जैक्सन से माँगा परंतु उसने देने से इंकार कर दिया। जैकसन और भंडारकर में मतभेद काफी समय तक रहे और पत्र व्यव्हार भी होते रहे |
कुछ समय बाद नासिक में कुम्भ का मेला हुआ जिसमे जैक्सन की हत्या कर दी गई। जैक्सन जाते जाते भंडारकर के कान में क्या मन्त्र फूक गया पता नहीं की वो एक दम से जैकसन की हाँ में हाँ मिलाने लग गया। 

जैकसन की मृत्यु के बाद उसको श्रधांजलि देते हुए आर जी भंडारकर और स्वयं डी आर भंडारकर ने अपनी संवेदना के पत्र इंडियन antiquery जान 1911 की भाग 40 में प्रकाशित करवाये और उसकी विचारधारा पर आधारित इतिहास का सबसे विवादस्पक लेख "फॉरेन एलिमेंट इन दी हिन्दू पापुलेशन" छापा।


गुरु तो निराधार रूप से प्रतिहार और चावड़ा वंश को ही गुजर बता कर नर्क चला गया परन्तु चेले ने तो और भी कमाल कर दिखाया। संस्कृत श्लोकों के मनमाने अर्थ और मुद्राओं की मनमानी व्याख्या और शिलालेखों की त्रुटिपूर्ण अर्थ निष्पत्ति से आधे गुजरात और तजस्थान को गुजर बतला दिया गया। जैसे भारत के इस हिस्से दूसरी कोई और जाती हो ही नहीं।

यह तो ऐसा पागलपण था जो बीसवीं सदी के बंगाली इतिहासकारों और विद्वानों को अपनी चपेट में ले लिया था । ये प्राचीन भारत के महाकवियों , मूर्धन्य विद्वानों को बंगाली बनाने या सिद्ध करने के जोड़ तोड़ में लगे रहते थे यहां तक की महाकवि कालिदास को भीं इन्होंने नहीं छोड़ा|

भंडारकर का यह पक्षपात उनके समय और बाद के कई इतिहासकारों जैसे डा बिन्दिराज ने दर्ज की। और मनगढ़ंत लिखने के कारण भंडारकर इतिहास के विषय में अपनी क्रेडिबिलिटी खो गए जिसे आज भी साजिश के तहत विकिपीडिया पर दिखाया जाता है।

==== स्मिथ और उसकी गूजर अवधारणा ====

गुलाम भारत के आंग्ल इतिहासकार विन्सेंट ए स्मिथ ने ई स की 20 वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में अपने ग्रन्थ ' अर्ली हिस्ट्री ऑफ़ इण्डिया फ्रॉम 600 बी सी टू मोहम्मडन कॉन्क़ुएस्ट' प्रस्तुत किया।

इनके अनुसार प्राचीन लेखों में हूणों के साथ गूजरों का भी उल्लेख मिलता है जो आजकल को गुज्जर जाती है जो उत्तर पश्चिम भारत में निवास करती है। इनके 'अनुमान' से गुज्जर श्वेत हूणों के साथ आये थे और इनके संबंधी थे। इन्होंने राजपूताने में राज्य स्थापित किया और भीनमाल को अपनी राजधानी बनाया। इनके अनुसार भरूच का छोटा सा गुजर सम्राज्य भी राजस्थान के प्रतिहारों की शाखा थी और गुर्जरा की प्रतिहारों ने ही समय पाकर कन्नोज को कब्ज़ा लिया।
अपने से पूर्व आने वाले शक और यु ची ( कुषाण ) लोगों के समान यह विदेशी जाती भी शीघ्र ही हिन्दू धर्म में मिल गई। इनके जिन कुटुम्बों या शाखाओं ने कुछ भूमि पर अधिकार कर लिया वे तत्काल क्षत्रिय (प्रतिहार) और उत्तर भारत के कई दुसरे प्रसिद्ध राजवंश इन्हीं जंगली गुजर समुदाय से निकले हैं जो ई स 5 वीं या 6ठी शताब्दी में हिंदुस्तान आये थे। इन विदेशी सैनिकों और साथियों से गूजर और दूसरी जातियां बनी जो पद और प्रतिष्ठा में राजपूतों से कम थे।

इसी ग्रन्थ के अन्य उल्लेख में स्मिथ कहता है '' इतिहासिक प्रमाणों से भारत में तीन बाहरी जातियाँ सिद्ध हैं जिसमें से शक , कुषाण और का वर्णन कर चूका है। निःसंदेह शक और कुषाण राजाओं ने हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया तब वे हिन्दू जाती प्रथा के अनुसार क्षत्रियों में मिला लिए गए, किन्तु इस कथन के पीछे हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है।"( पेज 407, उसी किताब में)।

हा हा हा। तो स्मिथ भईया ने भी कल्पना के घोड़े सांतवे आसमान तक दौड़ा कर भारतीय इतिहास लिख डाला जिसका कोई प्रमाण उनके पास नहीं था। निश्चित ही आर्यों की महान सभ्यता को लांछित कर के वह नर्क ही गए होंगे।

और अंत में स्मिथ हूणों के बारे में कहता है," शक कुशान के बाद भारत में प्रवेश करने वाली तीसरी जाती हूण या श्वेत हूण थी जो पांचवी या छठी शताब्दी के प्रारंभ में यहाँ आई। इन तीनों के साथ कई जातियों ने भारत में प्रवेश किया|

मनुष्यों की जातियाँ निर्णय करने वाली विद्या पुरातत्व और सिक्कों ने विद्वानों के चित्त पर अंकित कर दिया है कि हूणों ने ही हिन्दू संथाओं और हिन्दू राजनीती को हिला कर रख दिया ... हूण जाती ही विशेशकर राजपुताना और पंजाब में स्थाई हुई जैसे भारत में आर्य तो लुप्त ही हो गए।
स्मिथ के कथनानुसार गुर्जर हूणों का एक विभाग है परंतु जनरल cunnigham ' उन्हें यू ची या टोचरि लुटेरी जातियों के वंशज बतातें हैं।"(Cunningham Archeological survey of India,1963-64, भाग 2, पृ 70.)


===समीक्षा===

निश्चित रूप से इतिहास उत्थान और पतन की कुंजी है | इस रहस्य को समझ क्र अंग्रेजों ने भारतीय इतिहास को विकृत करने की कोशिश करने में अपने पूर्ण सामर्थ्य के साथ योजनाबढ़ काम किया। इस कार्य के लिये मध्यकाल की भारतीय समाज की अज्ञानता और धार्मिक जड़ता के साथ कूप मंडकुता और पराधीनता ने उन्हें मनवांछित फल प्रदान किया है।
यह सत्य है की इतिहासिक शोध की नई प्राणाली के जन्म दाता वही रहे हैं, परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि शोध के नाम पर किये गए विश्लेषण में उनके जातीय और राजनीतिक हितों ने जबरदस्त हस्तक्षेप किया है और यह सिलसिला आजादी के बाद उभरी जातियों ने आज भी अपने लाभ के लिए जारी रखा है।


विन्सेंट स्मिथ अर्ली हिस्ट्री और इण्डिया में भारत का प्राचीनतम इतिहास लिख रहा था, तोता मैना की कहानी नहीं। जब वह स्वयं स्वीकार कर रहा है ' इस कथन के पीछे कोई प्रमाण नहीं है। जब प्रमाण ही शून्य है तब उठा कल्पना को इतिहास के कलेवर में रखने की कोनसी विवशता या आवश्यकता थी??

धुनिया रुई घुनंने के लिए रुई पर नहीं तांत पर प्रहार करता है, ठीक यही नीती अंग्रेज लेखकों ने अपनाइ। स्मिथ और उसकी चोकड़ी का निशाना कितना सही था? स्मिथ के निराधार लेख प्रकाशित होते ही राजपूतों को गुजर मानने का प्रवाह इतने वेग से चला कि कई विद्वानों ने चावड़ा , प्रतिहार , परमार , चौहान , तंवर , सोलंकी , राठौड़ , गहरवार आदि आदि को गुजर वंशी बतलाने के लिए कई लेख लिख डाले।
इतिहास की सीमा से परे इस कल्पना ने गूजरों के साथ निम्न जातियों में दूषित भावना भरने की कोशिश की गई जिससे जातीय एकता भंग होने के साथ भारतीय वर्ण व्यवस्था में संदेह और कटुता पैदा हुआ जिससे बंधुत्व भावना गला घोट दिया गया और यही अंग्रेज चाहते थे।

इसी समय अंतराल में भारत वर्ष के तमाम राजवंशों से संभंधित अनेकों तथ्यपूर्ण शिलालेख , ताम्र शाशनपत्र , प्राचीन मुद्राएं और प्राचीन महाकाव्य प्रकाश में आते रहे परन्तु इन साम्राज्य वादी लेखकों ने इस सामग्री की निरंतर अवहेलना की और उनकी परिपाटी पर चलने वाले भारतीय प्रतिग्रही विद्वानों की जड़ता भंग नहीं हुई और वे भी भारतीय इतिहासिक सामग्री से मूहँ मोड़ते हुए अंग्रेजी आकाओं द्वारा शोध के नाम पर प्रस्तुत कूड़ा करकट से अपनी सम्बद्धता प्रदर्शित करते रहे।
यह कितने दुर्भाग्य की बात है बॉम्बे गजट के लिए गुजरात का प्राचीन इतिहास लिखने वाला देशी विद्वान पंडत डॉक्टर भगवानलाल इंद्रजी की धारणा है की गुजर कुषाणों के साथ आये परंतु सिद्ध करने के लिए उसके पास कोई प्रमाण नहीं है। इनका यह कहना है की गुप्तवंशियों के समय इन्हें राजपुताना, गुजरात और मालवा में जागीर मिली हो परंतु इसके लिए भी उन्होंने कोई प्रमाण नहीं दिया। अगर कोई प्रमाण होता तो ढेरों गुप्त अभिलेखों और भड़ौच के गूजरों के अभिलेख प्राप्त हो चुके हैं।


===गुज्जरों की हस्याप्तक जॉर्जियन उतपत्ति===

जॉर्जियन गणितज्ञ डा जी चोगोसोविलि और भारतीय भू विज्ञानिक प्रॉ खटाना ने तो 80 के दशक में फेकने की सारी हदें फेंक डाली और गुर्जरों को जॉर्जिया से मिलते जुलते जाती नाम के बेस पर जॉर्जियन ही बता डाला ( भाई शक्ल और सूरत तो देख ली होती कम से कम)। गौर तलब बात यह है की दोनों ही महाशय इतिहासकार नहीं थे परंतु शब्द से शब्द जोड़ कर नई बखर रच डाली। इनके अनुसार गुर्जर जॉर्जिया के जॉर्जत्ति नदी के पास से भारत में सदियों विस्थापित हो सकते है। इन्होने हर उस चीज जिसके नाम के साथ गू शब्द जुड़ा या सम्बन्ध रखता हो को गूजरों से जोड़ कर इतिहास रचने की कोशिश की। हा हा हा परंतु ये दोनों भी अंत में खुद ही लिखते है गूजरों का जॉर्जिया से संभंद प्रमाणित नहीं किया जा सकता पर ये संभावित हो सकता है। जूठ फैलने की हद्द तो हम उसी दिन मान गए जब कई गुज्जरों को अपनी गाड़ियों के पीछे जॉर्जियन लिखवाते देखा। हा हा हा हद्द है।

तो मित्रों प्रतिहारों उतपत्ति के सारे भ्रमों को तोड़ते हुए इस लेख के पहले भाग में हमने यह बताने की कोशिश की कैसे अंग्रेजो ने इतिहास के जरिये भारतीय समाज के अभिन्न अंग क्षत्रियों को विदेशी बता कर उनके और दूसरी जातियों के बीच अविश्वास पैदा करने और दरार पैदा करने की कोशिश की जिससे यह समाज बंटे। बड़े दुर्भाग्य की बात है की अपने जिस इतिहास को वो खुद ही अप्रमाणित कह कर गए है उसका प्रचलन भारतीय समाज को तोड़ने के लिए आज भी किया जा रहा है और राजपूतों को बदनाम किया जा रहा है।
इन्ही कुछ मूर्ख इतिहासकारों का फायदा आज की गुजर जाती के कुछ मूर्ख लोग उठा रहे है और अपने ही समाज को भ्रमित कर रहें है जबकि इनके खुद का इतिहास ही इतना विरोधभासी है और अप्रमाणित है। अपने पूर्वजों का ज्ञान नहीं तो देश के क्षत्रियों को ही अपने बाप दादा साबित करने की कोशिश कर रहें है ताकि पैसे के साथ साथ सम्मान भी मिले।

जबकि डा सी वि वैद्य , दशरथ शर्मा , गौरी शंकर ओझा , बी न मिश्रा बिन्दयराज अदि जैसे न कितने भारतीय इतिहासकार राजपूतों को भारतीय क्षत्रिय साबित कर चुके है सभी प्रमाणों के साथ और विदेशी उत्पीति की बखर को सरा सर नकार चुकें हैं।

इस श्रृंख्ला के अगले भाग में हम आपको वे सारे प्रमाण देंगे जिनसे साफ़ साफ़ पता चलता है प्रतिहारों के शिलालेखों में लिखे गुर्जरा शब्द का अर्थ स्थान सूचक था जिसे जबरदस्ती गुजर जाती बनाने की कोशिश की गयी।


दरहसल नए शोध से पता चलता है की 12वीं सदी से पहले गुर्जर नाम की कोई जाती थी ही नहीं । गुर्जरा देस से जिस भी जाती के लोग माइग्रेट करके दुसरे राज्यों में जा बसे वह गुर्जर कहलाये जो की आज भी कई जातियों जाती प्रमाण पत्र इस बात के गवाह है। महाराष्ट्र के रेवे और डोरे गुर्जर जाती के कुर्मी और गिरे हुए राजपूत वंश से हैं। सौराष्ट्र और गुजरात के गुर्जर ब्राह्मण , गुर्जर मिस्त्री , गुर्जर वैश्य , गुर्जर क्षत्रिय भी इसी बात के उद्धाहरण हैं। यह गुर्जर (गुर (शत्रु) + जर (नष्ट) करने वाला) गायें भैंस चराने वाले गौ + चर = गौचर / गुज्जर से भिन्न भी हो सकते हैं। यह मुमकिन है के इन दोनों जातियों के मिलते जुलते नाम के कारन कई इतिहासकार दोखा खा गए।

साथ ही साथ डा शांता रानी शर्मा के नए शोध MYTH OF GUJJAR ORIGIN OF PRATIHAR और डॉ ऐरावत सिंह के भी नए शोध THE COLONIAL MYTH OF GURJARA ORIGIN OF PRATIHARAS के बारे में भी बताएँगे जिसमे साफ साफ़ प्रतिहारों की गुज्जर उतपत्ति कि सभी थेओरी का तर्क पूर्ण खण्डन किया गया है। सभी नए शोध उन सभी के मूह पर तमाचा है जो प्रतिहारों को गुज्जर बनाने की कोशिशों में जूटे हुए है और विकिपीडिया जैसी तुच्छ साईट का हवाला देते हैं।

Sunday, November 15, 2015

The Legendary Pratihar Rajputs

The Great Kshatriya (Rajput) Pratihara Dynasty

Rajputana Soch राजपूताना सोच और क्षत्रिय इतिहास



आज की यह पोस्ट,मर्यादा पुरुषोत्तम सुर्यवंश शिरोमणि प्रभु श्री राम के भ्राता लक्ष्मण जी से निकास माने जाने वाले प्रतापी प्रतिहार वंश पर केन्द्रित है।
यूँ तो प्रतिहारो की उत्पत्ति पर कई सारे मत है,किन्तु उनमे से अधिकतर कपोल कल्पनाओं के अलावा कुछ नहीं है। प्राचीन साहित्यों में प्रतिहार का अर्थ "द्वारपाल" मिलता है। अर्थात यह वंश विश्व के मुकुटमणि भारत के पश्चिमी द्वारा अथवा सीमा पर शासन करने के चलते ही प्रतिहार कहलाया।
अब प्रतिहार वंश की उत्पत्ति के बारे में जो भ्रांतियाँ है उनका निराकारण करते है। एक मान्यता यह है की ये वंश अबू पर्वत पर हुए यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुआ है,जो सरासर कपोल कल्पना है।हो सकता है अबू पर हुए यज्ञ में इस वंश की हाजिरी के कारण इस वंश के साथ साथ अग्निवंश की कथा रूढ़ हो गई हो। खैर अग्निवंश की मान्यता कल्पना के अलावा कुछ नहीं हो सकती और ऐसी कल्पित मान्यताये इतिहास में महत्त्व नहीं रखती।
इस वंश की उत्पत्ति के संबंध में प्राचीन साहित्य,ग्रन्थ और शिलालेख आदि क्या कहते है इसपर भी प्रकाश डालते है।
१) सोमदेव सूरी ने सन ९५९ में यशस्तिलक चम्पू में गुर्जर देश का वर्णन किया है। वह लिखता है कि न केवल प्रतिहार बल्कि चावड़ा,चालुक्य,आदि वंश भी इस देश पर राज करने के कारण गुर्जर कहलाये।
२) विद्व शाल मंजिका,सर्ग १,श्लोक ६ में राजशेखर ने कन्नौज के प्रतिहार राजा भोजदेव के पुत्र महेंद्र को रघुकुल तिलक अर्थात सूर्यवंशी क्षत्रिय बताया है।
३)कुमारपाल प्रबंध के पृष्ठ १११ पर भी गुर्जर देश का वर्णन है...
कर्णाटे,गुर्जरे लाटे सौराष्ट्रे कच्छ सैन्धवे।
उच्चाया चैव चमेयां मारवे मालवे तथा।।
४) महाराज कक्कूड का घटियाला शिलालेख भी इसे लक्ष्मण का वंश प्रमाणित करता है....अर्थात रघुवंशी
रहुतिलओ पड़ीहारो आसी सिरि लक्खणोत्रि रामस्य।
तेण पडिहार वन्सो समुणई एत्थ सम्प्तो।।
५) बाउक प्रतिहार के जोधपुर लेख से भी इनका रघुवंशी होना प्रमाणित होता है।(९ वी शताब्दी)
स्वभ्राता राम भद्रस्य प्रतिहार्य कृतं सतः।
श्री प्रतिहारवड शोयमत श्रोन्नतिमाप्युयात।
इस शिलालेख के अनुसार इस वंश का शासनकाल गुजरात में प्रकाश में आया था।
६) चीनी यात्री हुएन्त त्सांग ने गुर्जर राज्य की राजधानी पीलोमोलो,भीनमाल या बाड़मेर कहा है।
७) भोज प्रतिहार की ग्वालियर प्रशस्ति
मन्विक्षा कुक्कुस्थ(त्स्थ) मूल पृथवः क्ष्मापल कल्पद्रुमाः।
तेषां वंशे सुजन्मा क्रमनिहतपदे धाम्नि वज्रैशु घोरं,
राम: पौलस्त्य हिन्श्रं क्षतविहित समित्कर्म्म चक्रें पलाशे:।
श्लाध्यास्त्स्यानुजो सौ मधवमदमुषो मेघनादस्य संख्ये,
सौमित्रिस्तिव्रदंड: प्रतिहरण विर्धर्य: प्रतिहार आसी।
तवुन्शे प्रतिहार केतन भृति त्रैलौक्य रक्षा स्पदे
देवो नागभट: पुरातन मुने मुर्तिर्ब्बमूवाभदुतम।
अर्थात-सुर्यवंश में मनु,इश्वाकू,कक्कुस्थ आदि राजा हुए,उनके वंश में पौलस्त्य(रावण) को मारने वाले राम हुए,जिनका प्रतिहार उनका छोटा भाई सौमित्र(सुमित्रा नंदन लक्ष्मण) था,उसके वंश में नागभट हुआ। इसी प्रशस्ति के सातवे श्लोक में वत्सराज के लिए लिखा है क़ि उस क्षत्रिय पुंगव(विद्वान्) ने बलपूर्वक भड़ीकुल का साम्राज्य छिनकर इश्वाकू कुल की उन्नति की।
८) देवो यस्य महेन्द्रपालनृपति: शिष्यों रघुग्रामणी:(बालभारत,१/११)
तेन(महिपालदेवेन)च रघुवंश मुक्तामणिना(बालभारत)
बालभारत में भी महिपालदेव को रघुवंशी कहा है।
९)ओसिया के महावीर मंदिर का लेख जो विक्रम संवत १०१३(ईस्वी ९५६) का है तथा संस्कृत और देवनागरी लिपि में है,उसमे उल्लेख किया गया है कि-
तस्या कार्षात्कल प्रेम्णालक्ष्मण: प्रतिहारताम ततो अभवत प्रतिहार वंशो राम समुव:।।६।।
तदुंदभशे सबशी वशीकृत रिपु: श्री वत्स राजोडsभवत।
अर्थात लक्ष्मण ने प्रेमपूर्वक उनके प्रतिहारी का कार्य किया,अनन्तर श्री राम से प्रतिहार वंश की उत्पत्ति हुई। उस प्रतिहार वंश में वत्सराज हुआ।
१०) गौडेंद्रवंगपतिनिर्ज्जयदुर्व्विदग्धसदगुर्ज्जरेश्वरदिगर्ग्गलतां च यस्य।
नीत्वा भुजं विहतमालवरक्षणार्त्थ स्वामी तथान्यमपि राज्यछ(फ) लानि भुंक्ते।।
-बडोदे का दानपत्र,Indian Antiquary,Vol 12,Page 160
उक्त ताम्रपत्र के 'गुजरेश्वर' एद का अर्थ 'गुर्जर देश(गुजरात) का राजा' स्पष्ट है,जिसे खिंच तानकर गुर्जर जाती या वंश का राजा मानना सर्वथा असंगत है। संस्कृत साहित्य में कई ऐसे उदाहरण मिलते है।
ये लेख गुजरेश्वर,गुर्जरात्र,गुज्जुर इन संज्ञाओ का सही मायने में अर्थ कर इसे जाती सूचक नहीं स्थान सूचक सिद्ध करता है जिससे भगवान्लाल इन्द्रजी,देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर,जैक्सन तथा अन्य सभी विद्वानों के मतों को खारिज करता है जो इस सज्ञा के उपयोग से प्रतिहारो को गुर्जर मानते है।
११) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
१२)३६ राजवंशो की किसी भी सूची में इस वंश के साथ "गुर्जर" एद का प्रयोग नहीं किया गया है। यह तथ्य भी गुर्जर एद को स्थानसूचक सिद्धकर सम्बंधित एद का कोइ विशेष महत्व नही दर्शाता।
१३)ब्राह्मण उत्पत्ति के विषय में इस वंश के साथ द्विज,विप्र यह दो संज्ञाए प्रयुक्त की गई है,तो द्विज का अर्थ ब्राह्मण न होकर द्विजातिय(जनेउ) संस्कार से है न की ब्राह्मण से। ठीक इसी तरह विप्र का अर्थ भी विद्वान पंडित अर्थात "जिसने विद्वत्ता में पांडित्य हासिल किया हो" ही है।
१४) कुशनवंशी राजा कनिष्क के समय में गुर्जरों का भारतवर्ष में आना प्रमाणशून्य बात है,जिसे स्वयं डॉ.भगवानलाल इन्द्रजी ने स्वीकार किया है,और गुप्तवंशियों के समय में गुजरो को राजपूताना,गुजरात और मालवे में जागीर मिलने के विषय में कोई प्रमाण नहीं दिया है। न तो गुप्त राजाओं के लेखो और भडौच से मिले दानपत्रों में इसका कही उल्लेख है।
उपरोक्त सभी प्रमाणों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है की,प्रतिहार वंश निस्संदेह भारतीय मूल का है तथा शुद्ध क्षत्रिय राजपूत वंश है।
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प्रतिहार वंश
संस्थापक- हरिषचन्द्र
वास्तविक - नागभट्ट प्रथम (वत्सराज)
पाल -धर्मपाल
राष्ट्रकूट-ध्रव
प्रतिहार-वत्सराज
राजस्थान के दक्षिण पष्चिम में गुर्जरात्रा प्रदेष में प्रतिहार वंष की स्थापना हुई। ये अपनी उत्पति लक्ष्मण से मानते है। लक्षमण राम के प्रतिहार (द्वारपाल) थे। अतः यह वंष प्रतिहार वंष कहलाया। नगभट्ट प्रथम पष्चिम से होने वाले अरब आक्रमणों को विफल किया। नागभट्ट प्रथम के बाद वत्सराज षासक बना। वह प्रतिहार वंष का प्रथम षासक था जिसने त्रिपक्षीप संघर्ष त्रिदलीय संघर्ष/त्रिराष्ट्रीय संघर्ष में भाग लिया।
त्रिपक्षीय संघर्ष:- 8 वीं से 10 वीं सदी के मध्य लगभग 200 वर्षो तक पष्चिम के प्रतिहार पूर्व के पाल और दक्षिणी भारत के राष्ट्रकूट वंष ने कन्नौज की प्राप्ति के लिए जो संघर्ष किया उसे ही त्रिपक्षीय संघर्ष कहा जाता है।
नागभट्ट द्वितीय:- वत्सराज के पष्चात् षक्तिषाली षासक हुआ उसने भी अरबों को पराजित किया किन्तु कालान्तर में उसने गंगा में डूब आत्महत्या कर ली।
मिहिर भोज प्रथम - इस वंष का सर्वाधिक षक्तिषाली षासक इसने त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लेकर कन्नौज पर अपना अधिकार किया और प्रतिहार वंष की राजधानी बनाया। मिहिर भोज की उपब्धियों की जानकारी उसके ग्वालियर लेख से प्राप्त होती है।
- आदिवराह व प्रीाास की उपाधी धारण की।
-आदिवराह नामक सिक्के जारी किये।

मिहिर भोज के पष्चात् महेन्द्रपाल षासक बना। इस वंष का अन्तिम षासक गुर्जर प्रतिहार वंष के पतन से निम्नलिखित राज्य उदित हुए।
मारवाड़ का राठौड़ वंष
मेवाड़ का सिसोदिया वंष
जैजामुक्ति का चन्देष वंष
ग्वालियर का कच्छपधात वंष

गुर्जर-प्रतिहार

8वीं से 10वीं षताब्दी में उत्तर भारत में प्रसिद्ध राजपुत वंष गुर्जर प्रतिहार था। राजस्थान में प्रतिहारों का मुख्य केन्द्र मारवाड़ था। पृथ्वीराज रासौ के अनुसार प्रतिहारों की उत्पत्ति अग्निकुण्ड से हुई है।
प्रतिहार का अर्थ है द्वारपाल प्रतिहार स्वयं को लक्ष्मण वंषिय सूर्य वंषीय या रधुकुल वंषीय मानते है। प्रतिहारों की मंदिर व स्थापत्य कला निर्माण षैली गुर्जर प्रतिहार षैली या महामारू षैली कहलाती है। प्रतिहारों ने अरब आक्रमण कारीयों से भारत की रक्षा की अतः इन्हें "द्वारपाल"भी कहा जाता है। प्रतिहार गुर्जरात्रा प्रदेष (गुजरात) के पास निवास करते थे। अतः ये गुर्जर - प्रतिहार कहलाएं। गुर्जरात्रा प्रदेष की राजधानी भीनमाल (जालौर) थी।
मुहणौत नैणसी (राजपुताने का अबुल-फजल) के अनुसार गुर्जर प्रतिहारों की कुल 26 शाखाएं थी। जिमें से मण्डोर व भीनमाल शाखा सबसे प्राचीन थी।
मण्डौर शाखा का संस्थापक - हरिचंद्र था।
गुर्जर प्रतिहारों की प्रारम्भिक राजधानी -मण्डौर
भीनमाल शाखा

1. नागभट्ट प्रथम:- नागभट्ट प्रथम ने 730 ई. में भीनमाल में प्रतिहार वंष की स्थापना की तथा भीनमाल को प्रतिहारों की राजधानी बनाया।
2. वत्सराज द्वितीय:- वत्सराज भीनमाल प्रतिहार वंष का वास्तिवक संस्थापक था। वत्सराज को रणहस्तिन की उपाधि प्राप्त थी। वत्सराज ने औसियां के मंदिरों का निर्माण करवाया। औसियां सूर्य व जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इसके समय उद्योतन सूरी ने "कुवलयमाला" की रचना 778 में जालौर में की। औसियां के मंदिर महामारू षैली में बने है। लेकिन औसियां का हरिहर मंदिर पंचायतन षैली में बना है।
-औसियां राजस्थान में प्रतिहारों का प्रमुख केन्द्र था।
-औसिंया (जोधपुर)के मंदिर प्रतिहार कालीन है।
-औसियां को राजस्थान को भुवनेष्वर कहा जाता है।
-औसियां में औसिया माता या सच्चिया माता (ओसवाल जैनों की देवी) का मंदिर है जिसमें महिसासुर मर्दनी की प्रतिमा है।
-जिनसेन ने "हरिवंष पुराण " की रचना की।
वत्सराज ने त्रिपक्षिय संर्घष की षुरूआत की तथा वत्सराज राष्ट्रकूट राजा ध्रुव से पराजित हुआ।
त्रिपक्षिय/त्रिराष्ट्रीय संर्घष
कन्नौज को लेकर उत्तर भारत की गुर्जर प्रतिहार पूर्व में बंगाल का पाल वंष तथा दक्षिणी भारत का राष्ट्रवंष के बीच 100 वर्षो तक के चले संघर्ष को त्रिपक्षिय संघर्ष कहा जाता है।
3. नागभट्ट द्वितीय:- वत्सराज व सुन्दर देवी का पुत्र। नागभट्ट द्वितीय ने अरब आक्रमणकारियों पर पूर्णतयः रोक लगाई। नागभट्ट द्वितीय ने गंगा समाधि ली। नागभट्ट द्वितीय ने त्रिपक्षिय संघर्ष में कन्नौज को जीतकर सर्वप्रथम प्रतिहारों की राजधानी बनाया।

4. मिहिर भोज (835-885 ई.):- मिहिर भोज को आदिवराह व प्रभास की उपाधि प्राप्त थी। मिहिर भोज वेष्णों धर्म का अनुयायी था। मिहिरभोज प्रतिहारों का सबसे अधिक षक्तिषाली राजा था। इस काल चर्माेत्कर्ष का काल था। मिहिर भोज ने चांदी के द्रुम सिक्के चलवाये। मिहिर भोज को भोज प्रथम भी कहा जाता है। ग्वालियर प्रषक्ति मिहिर भोज के समय लिखी गई।851 ई. में अरब यात्री सुलेमान न मिहिर भोज के समय भारत यात्रा की। अरबीयात्री सुलेमान व कल्वण ने अपनी राजतरंगिणी (कष्मीर का इतिहास) में मिहिर भोज के प्रषासन की प्रसंषा की। सुलेमान ने भोज को इस्लाम का षत्रु बताया।

5. महिन्द्रपाल प्रथम:- इसका गुरू व आश्रित कवि राजषेखर था। राजषेखर ने कर्पुर मंजरी, काव्य मिमांसा, प्रबंध कोष हरविलास व बाल रामायण की रचना की। राजषेखर ने महेन्द्रपाल प्रथम को निर्भय नरेष कहा है।

6. महिपाल प्रथम:- राजषेखर महिपाल प्रथम के दरबार में भी रहा। 915 ई. में अरब यात्री अली मसुदी ने गुर्जर व राजा को बोरा कहा है।

7. राज्यपाल:- 1018 ई. में मुहम्मद गजनवी ने प्रतिहार राजा राज्यपाल पर आक्रमण किया।

8. यषपाल:- 1036 ई. में प्रतिहारों का अन्तिम राजा यषपाल था।

भीनमाल:- हेनसांग/युवाचांग न राजस्थान में भीनमाल व बैराठ की यात्रा की तथा अपने ग्रन्थ सियू की मे भीनमाल को पोनोमोल कहा है। गुप्तकाल के समय का प्रसिद्व गणितज्ञ व खगोलज्ञ ब्रहमागुप्त भीनमाल का रहने वाला था जिससे ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति का सिद्धान्त " ब्रहमास्फुट सिद्धान्त (बिग बैन थ्यौरी) का प्रतिपादन किया।
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---प्रतिहार राजपूतो की वर्तमान स्थिति---

भले ही यह विशाल प्रतिहार राजपूत साम्राज्य बाद में खण्डित हो गया हो लेकिन इस वंश के वंशज राजपूत आज भी इसी साम्राज्य की परिधि में मिलते हैँ।
उत्तरी गुजरात और दक्षिणी राजस्थान में भीनमाल के पास जहाँ प्रतिहार वंश की शुरुआत हुई, आज भी वहॉ प्रतिहार राजपूत पड़िहार आदि नामो से अच्छी संख्या में मिलते हैँ।
प्रतिहारों की द्वितीय राजधानी मारवाड़ में मंडोर रही। जहाँ आज भी प्रतिहार राजपूतो की इन्दा शाखा बड़ी संख्या में मिलती है। राठोड़ो के मारवाड़ आगमन से पहले इस क्षेत्र पर प्रतिहारों की इसी शाखा का शासन था जिनसे राठोड़ो ने जीत कर जोधपुर को अपनी राजधानी बनाया। 17वीं सदी में भी जब कुछ समय के लिये मुगलो से लड़ते हुए राठोड़ो को जोधपुर छोड़ना पड़ गया था तो स्थानीय इन्दा प्रतिहार राजपूतो ने अपनी पुरातन राजधानी मंडोर पर कब्जा कर लिया था।
इसके अलावा प्रतिहारों की अन्य राजधानी ग्वालियर और कन्नौज के बीच में प्रतिहार राजपूत परिहार के नाम से बड़ी संख्या में मिलते हैँ।
बुन्देल खंड में भी परिहारों की अच्छी संख्या है। यहाँ परिहारों का एक राज्य नागौद भी है जो मिहिरभोज के सीधे वंशज हैँ।
प्रतिहारों की एक शाखा राघवो का राज्य वर्तमान में उत्तर राजस्थान के अलवर, सीकर, दौसा में था जिन्हें कछवाहों ने हराया। आज भी इस क्षेत्र में राघवो की खडाड शाखा के राजपूत अच्छी संख्या में हैँ। इन्ही की एक शाखा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, अलीगढ़, रोहिलखण्ड और दक्षिणी हरयाणा के गुडगाँव आदि क्षेत्र में बहुसंख्या में है। एक और शाखा मढाढ के नाम से उत्तर हरयाणा में मिलती है। व
उत्तर प्रदेश में सरयूपारीण क्षेत्र में भी प्रतिहार राजपूतो की विशाल कलहंस शाखा मिलती है। इनके अलावा संपूर्ण मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार और उत्तरी महाराष्ट्र आदि में(जहाँ जहाँ प्रतिहार साम्राज्य फैला था) अच्छी संख्या में प्रतिहार/परिहार राजपूत मिलते हैँ