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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Friday, April 29, 2016

मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri?????
मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था?
सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??

आधुनिक इतिहासकारो ने मुस्लिम इतिहासकारो के हवाले से लिखा है कि मौहम्मद गौरी को खोखर जनजाति ने पंजाब के झेलम क्षेत्र में मारा था।।।इतिहासकारो के अनुसार गौरी ने पृथ्वीराज को तराईन के दूसरे युद्ध में हराकर बन्दी बना लिया था और अजमेर में उनकी हत्या करवा दी थी।।

वहीँ पृथ्वीराज रासो और भारतीय मान्यताओ के अनुसार सुल्तान मौहम्मद गौरी पृथ्वीराज को बन्दी बनाकर गजनी ले गया था,जहाँ उसने पृथ्वीराज चौहान को अँधा करवा दिया था,वही अवसर देखकर पृथ्वीराज चौहान ने गजनी में गौरी को शब्दभेदी बाण से मारा था!!!!जिसके बाद पृथ्वीराज चौहान भी वहीँ गजनी में वीरगति को प्राप्त हुए थे।।

जहाँ आधुनिक इतिहासकार मौहम्मद गौरी की कब्र पाकिस्तान के झेलम में होना मानते हैं
वहीँ गजनी में गौरी की कब्र होने की प्रबल मान्यता खुद अफगानिस्तान वासियों में है,
गजनी में मौहम्मद गौरी की कब्र आज भी मौजूद है जिसके बाहर सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कच्ची समाधि है,जिसको गजनीवासी जूते से मारकर अपमानित किया करते थे।।

ब्रिटिश सेना में भारतीय मूल के राजपूत सैनिक जब अफगानिस्तान गए थे तो उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की समाधि ढूँढने का प्रयत्न किया था।।
जब कंधार विमान हाइजैक मामले में तत्कालीन विदेश मंत्री जसवंत सिंह अफगानिस्तान गए थे तो उस समय उन्हें गजनी में पृथ्वीराज चौहान की समाधि होने की जानकारी खुद तालिबान सरकार के अधिकारियो ने दी थी,

यह जानकारी फूलन देवी हत्याकांड में जेल में बन्द शेरसिंह राणा को मिली तो उन्होंने सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि के अवशेष भारत वापस लाने का प्रण लिया और जेल से फरार होकर वो तमाम खतरों को को पार करते हुए अफगानिस्तान जा पहुंचे।।
वहां से मौका पाकर पृथ्वीराज की समाधि के अवशेष वो भारत वापस ले आए।
भारत आकर उन्होंने पृथ्वीराज की समाधि के अवशेष मैनपुरी की एक राजपूत संस्था को पृथ्वीराज स्मारक बनाने के लिए सौंप दिए।।
इस प्रकार गजनी में सम्राट पृथ्वीराज चौहान का सांकेतिक अपमान बन्द हुआ।।

यह भी जानकारी मिली है कि राजस्थान के नीमराणा इलाके के प्रसिद्ध गांव कांटी के ठाकुर दुर्जनसिंह चौहान जी भी ब्रिटिश काल में ही अफगानिस्तान जाकर पृथ्वीराज चौहान की समाधि के अवशेष भारत वापस ले आए थे, लेकिन उस महान उपलब्धि का प्रचार नही हुआ,जिससे गजनी में सम्राट पृथ्वीराज का सांकेतिक अपमान जारी रहा।।।।

चलिए अब लौटते हैं मूल मुद्दे पर कि गौरी को दरअसल किसने,कब और कहाँ मारा ????
सम्राट पृथ्वीराज चौहान कहाँ वीरगति को प्राप्त हुए??
अजमेर में या गजनी में???

इतिहासकारो के अनुसार------

अफगानिस्तान में घुरि राजवंश के दो सगे भाईयो गयासुद्दीन गौरी और शाहबुद्दीन गौरी ने सन् 1173 से 1202 तक संयुक्त रूप से शासन किया।
बड़े भाई गयासुद्दीन की मृत्यु सन् 1202 में होने के बाद शाहबुद्दीन गौरी ने 1202-1206 तक अकेले शासन किया था।सन् 1206 में पंजाब के झेलम के पास खोखर राजपूतो ने शाहबुद्दीन गौरी की हत्या कर दी थी।

यही शाहबुद्दीन गौरी तराईन के दोनों युद्धों में पृथ्वीराज चौहान की सेना से भिड़ा था।।अब सवाल ये है कि अगर बड़ा गौरी सन् 1202 में मरा और छोटा शाहबुद्दीन सन् 1206 में----

तो 1192-1193 में पृथ्वीराज चौहान ने किस गौरी को शब्दभेदी बाण से मारा था??????

=====अंतिम निष्कर्ष====


अगर पृथ्वीराज चौहान की हत्या अजमेर में हुई होती तो अफगानिस्तान (गजनी) में गौरी की कब्र और सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि पास पास नही होती।गजनी में सुल्तान गौरी की हत्या किसी काफिर हिन्दू राजा द्वारा किये जाने की मान्यता अफगानिस्तान में बहुत प्रबल है तभी तालिबानी अधिकारीयों द्वारा भारतीय विदेश मंत्री श्री जसवंत सिंह को जानकारी दी गयी कि गजनी में सुल्तान गौरी की कब्र और सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि पास पास है।।

इससे सम्राट पृथ्वीराज चौहान का अजमेर में मारा जाना पूर्णतया असत्य जान पड़ता है।

किन्तु यहाँ प्रश्न उतपन्न होता है कि पृथ्वीराज द्वारा सुल्तान गौरी का वध कब और कैसे हुआ????

तो परिस्थितिजनक साक्ष्यो से मालूम होता है कि पृथ्वीराज चौहान को नेत्रहीन करके गजनी में सन् 1192-1202 तक कैद करके रखा गया था,,सन् 1202 में सुल्तान गयासुद्दीन गौरी ने एक समारोह में पृथ्वीराज चौहान को कैद से निकालकर उनसे  तीरंदाजी का हुनर दिखाने को कहा गया।।

वहीँ कुशल धनुर्धर महान राजपूत यौद्धा पृथ्वीराज चौहान ने शब्दभेदी बाण से सुल्तान गयासुद्दीन गौरी का वध कर दिया और खुद भी वीरगति को प्राप्त हो गए!!!!!!

तत्कालीन मुस्लिम इतिहासकारो द्वारा जानबूझकर इस घटना को छुपाने का प्रयास किया और पृथ्वीराज की हत्या अजमेर में किये जाने की फर्जी कहानी गढ़ी गयी,जबकि गजनी में सुल्तान गौरी और सम्राट पृथ्वीराज चौहान की समाधि होना उनके दावे का खण्डन करने के लिए पर्याप्त है।।।

इसके बाद गयासुद्दीन तुगलक का छोटा भाई शाहबुद्दीन मौहम्मद गौरी सन् 1202-1206 तक सुल्तान रहा,किन्तु सन् 1206 ईस्वी में उसे पंजाब के झेलम के पास खोखर राजपूतों (राठौर राजपूतो की शाखा) ने मार गिराया।
शाहबुद्दीन मौहम्मद गौरी की कब्र/मजार आज भी पंजाब(पाकिस्तान) के झेलम में स्थित है।।।

उपरोक्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि दरअसल दो सुल्तान गौरी थे जो मिलकर अफगानिस्तान और भारत में अपने साम्राज्य का शासन चलाते थे।।

बड़े भाई गयासुद्दीन गौरी का वध पृथ्वीराज चौहान द्वारा सन् 1202 ईस्वी में गजनी में किया गया,
वहीँ छोटे भाई शाहबुद्दीन मौहम्मद गौरी का वध झेलम के पास खोखर (राठौर) राजपूतो द्वारा किया गया था।

बाद में जनमानस में मान्यताओं का घालमेल हो गया और भ्रामक मान्यताएं बन गयी जिनसे आधुनिक इतिहासकार भी भ्रमित हो गए और वो वास्तविक तथ्य नही लिख पाए।।

पृथ्वीराज चौहान सर्वकालिक महानतम राजपूत शासको में एक थे,
अगर काशी/कन्नौज के सम्राट जयचन्द्र गहरवार और अजमेर के सम्राट पृथ्वीराज चौहान मिलकर सुल्तान गौरी का मुकाबला करते तो तराईन के दूसरे युद्ध में भी न सिर्फ तुर्को की करारी हार होती, वरन् उन्हें समूल नष्ट किया जा सकता था,अगर ऐसा हो जाता तो भारतवर्ष का इतिहास कुछ और ही होता!!!!!

सम्राट पृथ्वीराज चौहान और उनकी विलक्षण वीरता को कोटि कोटि नमन।

(Note--खोखर(राठौर) राजपूत अब पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त में बड़ी संख्या में मिलते हैं और सभी मुसलमान हैं इनमे से कुछ जाटों में विवाह करके जाट भी बन गए हैं
हरियाणा में निरन्तर जाट मुख्यमंत्री होने के कारण  इतिहास की किताबो में पढ़ाया जाता है कि मौहम्मद गौरी को खोखर जाटों ने मारा जो पूर्णतया निराधार है।खोखर राजपूत राठौर वंश की शाखा है और उस समय तक हिन्दू थे,हरियाणा के राजपूत समुदाय से अपेक्षा है कि इतिहास के इस सरकारी विकृतिकरण के विरुद्ध आवाज उठाए और पाठ्य पुस्तको में सही तथ्य लिखवाने हेतु प्रयास करें।।)


Sunday, April 17, 2016

BATTLE OF MAONDA AND MANDHOLI

=== माऊंडा मंडोली का इतिहासिक युद्ध ===

भारत वर्ष की भूमि वीरों की भूमि है यहाँ का कण कण क्षत्रियों के रक्त से सींचा हुआ है। यह भूमि गवाह है ऐसे सैकड़ो हजारों युद्धों की जिनमें हिन्दू क्षत्रियों ने अपने मान सम्मान और प्रजा के हितों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुतियाँ दी।

आज हम इतिहास के पन्नों से ऐसे ही युद्ध की एक गाथा को दोहरा रहें है जो राजस्थान में सीकर जिले के नीम का थाना शहर के पास स्थित माऊंडा और मंडौली गाँवों में सन् 1767 में लड़ा गया था।

माऊंडा मंडोली का युद्ध भरतपुर के राजा जवाहर सिंह और जयपुर के सूयवंशी क्षत्रिय कछवाहा राजा सवाई माधो सिंह प्रथम के बीच सन 1767 में लड़ा गया जिसमे भरतपुर की फ़ौज और जवाहर सिंह को मूहँ की खानी पड़ी और रण छोड़ कर भागना पड़ा।

इसके बाद कुशवाहों द्वारा भरतपुर को रोंदने का सिलसिला सिर्फ माऊंडा मंडोली तक ही सीमित नहीं रहा। राजा सवाई माधो सिंह के नेतृत्व में जयपुर ने 29 फरवरी 1768 सिर्फ 15000 राजपूतों की फ़ौज के साथ भरतपुर शहर पर कब्ज़ा कर जाट राज जवाहर सिंह को दुबारा हराया। भरतपुर की सेंध के दौरान जयपुर ने जाट राज जवाहर सिंह के सेना पति दान शाह को भी मार गिराया जिसके पश्चात जवाहर सिंह को भाग कर सिखों के यहाँ शरण लेनी पड़ी और सात लाख रुपये चूका कर 20000 सिखों की सेना की मदद से भरतपुर पर दुबारा कब्जे के लिए जयपुर से लड़ना पड़ा।

=== माऊंडा मंडोली युद्ध: पृष्टभूमि ===


तिथि : 6 नवंबर 1767
स्थान : पुष्कर

उत्तर भारत में मराठों की बढ़ती ताकत को रोकने के लिए जोधपुर के राठौड़ वंश और भरतपुर के जाट ( जादौन वंश) वंश ने पुष्कर में एकजुट होकर लड़ने की रणनीति बनाई।

इस मुलाकात में जोधपुर और भरतपुर राज घराने के सदस्य एक ही कालीन पर समान ऊंचाई पर बैठे और आपसी भाईचारा बढ़ाने की शुरुआत की। इसी बीच पुष्कर की सभा में शामिल होने का न्योता जयपुर के कछवाहा वंश के राजा महाराज सवाई माधो सिंह जी प्रथम को भी भेजा गया। भरतपुर के साथ एक ही कालीन पर बैठ भाईचारा बढ़ाने की बात जयपुर के राजा सवाई माधो सिंह को अपनी शान के खिलाफ तथा नागवांरा लगी। सवाई माधो सिंह इस वाक्य से इतने भड़क गए के उन्होंने तुरन्त बिजय सिंह राठौड़ को पुष्कर अपना सन्देश भिजवाते हुए लिखा कि " बिजय सिंह जी आपने जयपुर राज घराने के नौकरों को अपने साथ बिठा कर उनसे भाईचारे की बातें कर के समग्र राठौड़ वंश और अपने पूर्वजों का मान गिरा दिया।"

यह सुनकर जाट राज जवाहर सिंह आग बबूला हो उठा और उसने भरतपुर लौटते समय जयपुर राज्य के गाँवों में लूट पात और जयपुर की प्रजा से बदसलुखी करनी शुरू कर दी।



=== जाट रानी किशोरी की धूर्तता ===

जाट रानी किशोरी भरतपुर के राजा सूरजमल की दूसरी पत्नी तथा जवाहर सिंह की सौतेली माँ थी। रानी किशोरी जानती थी के अगर जवाहर सिंह को उकसाया जाए और जयपुर के साथ भीड़वा दिया जाए तो भरतपुर की गद्दी उसके मन चाहे पुत्र को मिल सकती थी। रानी किशोरी ने इस कुकर्म को करने के लिए एक युक्ति निकालते हुए जवाहर सिंह के आगे पुष्कर में राजपूत महिलाओं के साथ सरोवर में स्नान की ख्वाइश रखी वह जानती थी इससे जयपुर राजघराने के राजपूत जरूर भड़केंगे जो भरतपुर राज परिवार को अपना खादिम मानते थे और जिनकी शान में भरतपुर राजपरिवार सदा सर झुका कर खड़ा रहा है। और हुआ भी ऐसा ही राठौड़ो के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ा कर जैसे तैसे रानी किशोरी ने स्नान तो कर लिया परंतु यह करतूत आने वाले समय में भरतपुर और जवाहर सिंह को बहोत भारी पड़ी।

=== राजपूतों पर रॉब जमाने के लिए पुष्कर यात्रा ===

18 वीं शताब्दी आते आते आपसी युद्ध , मराठा सेना के उत्तर में छापामार युद्धों और बाहरी ताकतों के लगातार हमलों से झुझने के कारण राजस्थान और उत्तर भारत के राजपूत कमजोर होते जा रहे थे। उधर दिल्ली में बहादुर शाह जफर के नेतृत्व के बाद मुग़ल सत्ता बहोत कमजोर हो चली थी। धीरे धीरे उत्तर में मराठा शक्ति भी शीन होने लगी इसी चीज का फायदा उठा कर सूरजमल और उसका बेटा जवाहर सिंह ने ब्रज चम्बल और दक्षिण हरयाणा के एक बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर लिया। इस सफलता से मिले जोश और होंसले से उत्तेजित हो कर भरतपुर के जाट जो कभी मुग़लों और जयपुर राजघराने के चाटुकार भर थे अपना दम ख़म दिखाने के लिए  करीब 50 हजार सैनिकों की फ़ौज लेकर जिसमेंउ सके साथ समरु के नेतृत्व में फ्रेंच टुकड़ी,भाड़े पर सिक्ख टुकड़ी, गुज्जर डकैत,और भारी तोपखाना बन्दुके थी लेकर पुष्कर की और बढ़ा।

इस यात्रा का मकसद पुष्कर यात्रा के नाम पर जयपुर राज्य और राजपूतो को नीचा दिखाना था|


=== माउंडा के निर्णायक युद्ध का वर्णन ===

अपने अपार बल, तोपखाने और आधुनिक शस्त्रों से लैस सेना के साथ जाट राजा जवाहर सिंह लगभग अपने ही राज्य की सीमा में पहुंच गया था, जब वो नारनौल से केवल 23 मील दक्षिण-पश्चिम में माउंडा मंडोली से गुजर रहा था। तभी तेजी से पीछा कर रही कछवाह सेना के घुड़ स्वरों ने जाटों की सेना को धर दबोचा।

कछवाहों ने 14 नवम्बर 1967 को जाटों पर पहला हमला बोला। कछवाह घुड़सवारों का पहले हमला जाटों द्वारा नकाम कर दिया क्योकि इस समय तक पूरी कछवाह सेना और तोप एवं बंदूक माउंडा पहुँच नहीं पाई थी। इस कामयाबी का फायदा उठाते हुए जाट सेना ने युद्ध के मैदान से आगे भागने की सोची परंतु जयपुर के घुड़सवारों ने उन्हें फिर से धर दबोचा और जाटों को दुबारा मुड़ कर मजबूरन युद्ध करना पड़ा।

जाट सेना के तोप के गोलों और बन्दूको की गोलियों का मजबूती से सामना करने के बाद जयपुर के घुड़सवारों ने अपनी तलवारों के साथ जाटों पर दुबारा हमला बोला। दुश्मन जो अपनी हार का आंकलन कर के मात्र चन्द सैकड़ो की तादाद वाली सेना से पहले ही आक्रमण के बाद भाग रहा था वह कछवाहों की तलवारों के आगे दुबारा टिक नहीं पाया।

चारो तरफ जाट सेना में हाहाकार मच गया उधर चन्द कछवाहा घुड़सवार दुश्मन के सैकड़ों सर धड़ से अलग कर अपने राज्य की पावन मिट्टी पर झुकाते रहे। इसी बीच जाट सेना दुबारा भागना शुरू किया और ऐसे भागे के पीछे अपने तोप बन्दुक और स्वयं महाराजा जवाहर सिंह को दुश्मन की दया के मोहताजगी छोड़ आये। राजा जवाहर सिंह की इज्जत इसी जाट सेना में मजूद फ़्रांसिसी सेना द्वारा प्रशिक्षित दो वीरों समरू और मेढक ने बचाई और किसी तरह रात में  अँधेरे तक लड़ते हुए जाट राजा जवाहर सिंह को युद्ध के मैदान से भगा कर सुरक्षित भरतपुर ले गए। राजा जवाहर सिंह डर के मारे भाग गया था परन्तु अपने पीछे अपनी ७० तरह की बंदूकें , तम्बू  एवं सामान जिसमे की उनका शाही छाता भी था छोड़ गया।  कुल मिला के दोनों तरफ का नुक्सान करीब ५००० आदमी थे। इस युद्ध में करीब २००० राजपूत योद्धा वीर गति को प्राप्त हुए, क्षत्रिय सेना को यह नुकसान केवल उस शुरुआती गोलाबारी के कारन हुआ जिसके विरुद्ध वो निहत्ते दृढ़ता से लड़ते रहे और अपने अहम योद्धा गवां दिए। उस दिन जयपुर में ऐसा कोई क्षत्रिय परिवार न रहा होगा जिनका बीटा वीर गति को प्राप्त न हुआ हो। दिलीप सिंह जो की जयपुर के सेनापति थे अपनी तीन पीढ़ियों के साथ युद्ध में उतरे थे तथा इनके परिवार ने तीनों पीढ़ियां युद्ध में अपने राज्य शौर्य मान और रजपूती शान  के लिए न्योछावर कर दी। यह युद्ध इतना भयावह साबित हुआ के जयपुर में केवल १० साल के बालक ही क्षत्रिय वीर बच गए थे।                                                                                                                                                                                  

    === प्रताप सिंह कछवाहा का योगदान ===

प्रताप सिंह कछवाहा जयपुर राजघराने का एक सामंत था। युद्ध से जयपुर के कछवाहा शाशकों से किसी बात पर उसका विवाद हो गया था जिस कारण वह बाग़ी होकर भरतपुर के साथ जा मिला। कुछ समय पश्चात प्रताप सिंह कछवाहा को यह ज्ञात हुआ के भरतपुर और जयपुर के बीच में युद्ध छिड़ गया है तो उसका क्षत्रिय रक्त खोल उठा और अपने वंश का मान बचाने के लिए भरतपुर से बाग़ी हो कर इन्हीं के खिलाफ युद्ध में जयपुर का साथ देने के लिए निकल पड़ा।                                                                                            


   ==== युद्ध में लड़े कुछ जांबाजों के नाम ====                                                                                                                      
जयपुर की तरफ लगभग सभी कच्छावा और शेखावत ठिकाना प्रतिनिधित्व किया था।
मंढोली और मओंडा के ठाकुर - तंवर राजपूत
पाटन के राव - तंवर राजपूत
डुण्डलोद के हनुमंत सिंह - कच्छावा
नवलगढ़ के नवल सिंह - कच्छावा
डुला के अमर सिंह जी राजावत
लसाड्या के नवल सिंह राजावत
चवल्डीङा के डुला  सिंह कच्छावा - रायपुर
रसूलपुरा के शंभू सिंह कच्छावा
मंगलवाडा के सांवल सिंह कच्छावा
तेहतरा के आवाज सिंह कच्छावा    



                      =====References====
1 ^ Tanwar Rajvansh Ka Itihas By Dr. Mahendra Singh Tanwar khetasa                                                                    2^ Annals and Antiquities of Rajasthan by Col. James Todd 332713
3^ The Rajputana gazetteers - 1880
4^ History of Jaipur by Jadunath Sarkar pg. 256
5^ History of Jaipur by Jadunath Sarkar pg. 255
6^ History of Jaipur by Jadunath Sarkar pg. 255
7^ History of Jaipur by Jadunath Sarkar pg. 256
8^ Sir William Wilson Hunter,Imperial gazetteer of India - Vol V 1908, page 257
9^ R.K. Gupta, S.R. Bakshi, Studies In Indian History: Rajasthan Through The Ages The Heritage Of ..., Page 19
10^ R.K. Gupta, S.R. Bakshi, Studies In Indian History: Rajasthan Through The Ages The Heritage Of ..., Page 19
Jump up ^ Dr RK Gupta & Dr SR Bakshi:Rajasthan Through the Ages Vol 4 Page 207

Saturday, April 16, 2016

पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी भारतीय राजनीति के "युवा तुर्क" Ex PM Chandrashekhar singh

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आज दिनांक 17 अप्रैल महान समाजवादी नेता पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय ठाकुर चंद्रशेखर सिंह जी का जन्मदिवस मनाया जा रहा है,उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दिन सार्वजनिक छुट्टी घोषित की है,

हालाँकि चंद्रशेखर सिंह जी और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सर्वसमाज के लिए पूजनीय हैं उन्हें किसी एक जाति से जोड़कर नहीं देखा चाहिए.
चंद्रशेखर सिंह जी के जन्मदिवस पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने पर यूपी की सपा सरकार को धन्यवाद और आशा करते हैं कि सपा सरकार सिर्फ वोटबैंक की राजनीति न करके चंद्रशेखर जी की विचारधारा पर भी अमल करेगी,

गौरतलब है कि चंद्रशेखर सिंह जी वी पी सिंह की मंडल जाति आधारित आरक्षण नीति के कटटर खिलाफ थे और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने मंडल ओबीसी आरक्षण रद्द करके आर्थिक आधार पर आरक्षण का अध्यादेश जारी कर दिया था,जिसे उनकी सरकार गिरने के बाद कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से रद्द कराकर जाति आधारित कर दिया,
हमे अपेक्षा है कि यूपी की सपा सरकार और केंद्र सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की चंद्रशेखर सिंह जी की नीति पर चलकर दिखाए तब जाकर चंद्रशेखर सिंह जी को सच्ची श्रधांजलि होगी।
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जीवन परिचय --------
चन्द्र शेखर सिंह (अंग्रेज़ी: Chandra Shekhar Sing)------
भारत के आठवें प्रधानमंत्री थे। इन्हें युवा तुर्क का सम्बोधन इनकी निष्पक्षता के कारण प्राप्त हुआ था। वह मेधा प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जिन्हें विधाता कई योग्यता देकर पृथ्वी पर भेजता है और चंद्रशेखर का शुमार उन्हीं व्यक्तियों में करना चाहिए। विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद चंद्रशेखर ने ही प्रधानमंत्री का पदभार सम्भाला था। वह आचार्य नरेंद्र देव के काफ़ी समीप माने जाते थे। उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र से इन्होंने बहुत कुछ आत्मसात किया था। एक सांसद के रूप में चंद्रशेखर का वक्तव्य पक्ष और विपक्ष दोनों बेहद ध्यान से सुनते थे। इनके लिए प्रचलित था कि यह राजनीति के लिए नहीं बल्कि देश की उन्नति की राजनीति हेतु कार्य करने में विश्वास रखते हैं। चंद्रशेखर आत्मा की आवाज़ पर प्रशंसा और आलोचना करते थे। तब यह नहीं देखते थे कि वह ऐसा पक्ष के प्रति कर रहे हैं अथवा विपक्ष के प्रति। लेकिन देश को इस सुयोग्य व्यक्ति से अधिकाधिक उम्मीदें थीं जो निश्चय ही राजनीतिक व्यवस्था के कारण प्राप्त नहीं की जा सकीं।

जन्म एवं परिवार-------

चंद्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल,(कुछ संदर्भो में 1 जुलाई ) 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के ग्राम इब्राहीमपुर में हुआ था। इनका कृषक परिवार था। ये सम्भवत सोलंकी राजपूत की ताँतिया शाखा में जन्मे थे,चंद्रशेखर का राजनीति के प्रति रुझान विद्यार्थी जीवन में ही हो गया था। इन्हें आग उग़लते क्रान्तिकारी विचारों के कारण जाना जाता था। चंद्रशेखर ने 1950-1951 में राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इनका विवाह दूजा देवी के साथ सम्पन्न हुआ था। इनके दो पुत्र पंकज और नीरज हैं।जिनमे नीरज शेखर उनकी मृत्यु के बाद बलिया से सांसद रहे हैं।

राजनीतिक जीवन---------
स्नातकोत्तर करने के बाद चंद्रशेखर समाजवादी आन्दोलन से जुड़ गए। वह पहले बलिया के ज़िला प्रजा समाजवादी दल के सचिव बने और एक वर्ष के बाद राज्य स्तर पर इसके संयुक्त सचिव बन गए। वह 1962 में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर तब आए जब उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चयनित हुए।
इस समय तक चंद्रशेखर ने वंचितों और दलितों के कल्याण की पैरवी करते हुए उत्तर प्रदेश सहित कई प्रान्तों में अपनी प्रभावी पहचान बना ली थी। इस समय उनकी उम्र मात्र 35 वर्ष थी। चंद्रशेखर की एक विशेषता यह थी कि वह गम्भीर मुद्दों पर सिंह के समान गर्जना करते हुए बोलते थे। उनकी वाणी में इतनी शक्ति थी कि जब संसद मछली बाज़ार बन रहा होता था तो वहाँ पर सन्नाटा पसर जाता था। चंद्रशेखर को मुद्दों की राजनीति के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि विपक्षी नेताओं के साथ उनके मधुर सम्बन्ध रहे। विपक्ष के नेता गतिरोध की स्थिति में उनसे परामर्श और मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
चंद्रशेखर अपने विचारों की अभिव्यक्ति लेखन द्वारा बहुत सशक्त तरीक़े से करते थे। पत्रकारिता का शौक़ पूर्ण करने के लिए उन्होंने 'यंग इंडिया' नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन-प्रकाशन किया। इसका सम्पादकीय स्वयं चंद्रशेखर के द्वारा लिखा जाता था, जो सारगर्भित और मर्मस्पर्शी होता था। वह समस्याओं को उठाते थे तथा उनकी समीक्षा बेबाक़ी के साथ करते थे। वह समस्या के समाधान भी सुझाते थे। ऐसा करते हुए चन्द्रशेखर एक नेता से ज़्यादा चिंतक नज़र आते थे। यही कारण है कि इनके सम्पादकीय बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों में बेहर लोकप्रिय हुए। चंद्रशेखर के लेखन में इनका गहन चिंतन परिलक्षित होता था। उनका विश्लेषणात्मक लेखन पाठकों में गहराई तक उतर जाता था।

मेरी जेल डायरी-------------

जून 1975 में आपातकाल की घोषणा के बाद जिन नेताओं को इंदिरा गांधी ने जेल भेजा, उनमें चंद्रशेखर भी थे। लिखित वैचारिक अभिव्यक्ति पर पहरा लग चुका था, इस कारण 'यंग इंडिया' का प्रकाशन बंद हो गया। लेकिन लेखक हृदय के मालिक चंद्रशेखर का जेल में रहते हुए भी लेखन कर्म से नहीं रोका जा सका। जेल प्रवास के दौरान चंद्रशेखर ने अपना लेखन जारी रखा और बाद में 'मेरी जेल डायरी' के नाम से उनकी पुस्तक प्रकाशित होकर पाठकों के समक्ष आई। इसमें उनके जेल के अनुभवों का लेखा-जोखा है। इन्होंने लिखा है कि राजनीतिक बंदी होते हुए भी उस समय सभी को आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा गया था।
आजादी के बाद इतिहास का यह सबसे काला दौर था। देशभर के सारे बड़े नेता या तो गायब थे या जेलों में डाल दिए गए थे। प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लग गया था। लिखना तो दूर सरकार के खिलाफ बोलने तक से लोग घबराने लगे थे।

ऐसे में एक महिला दिल्ली की सड़क पर उतरती है और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर के बाहर खड़ी होकर चिल्ला-चिल्ला कर चुनौती देती है
गार्ड्स ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन, वह मानी नहीं। इस तरह की हिम्मत दिखाने वाली यह महिला कोई और नहीं बल्कि उस शख्स चंद्रशेखर सिंह की पत्नी थी जो एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बना।

प्रधानमंत्री के पद पर---------

जनता दल सरकार में वी पी सिंह के साथ ही चंद्रशेखर जी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे,ऐसे में दो राजपूतो में जोर आजमाइश हुई और जाट नेता चौधरी देवीलाल के सहयोग से वी पी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने,पर ये घटना देश के इतिहास में काला अध्याय सिद्ध हुई,वीपी सिंह को कांग्रेस के भ्र्ष्टाचार के विरोध में सत्ता मिली थी,सभी राजपूतो ने जमकर पुरे देश में उसका समर्थन किया पर पद पर बैठते हुए ही उसने मंडल आयोग की ओबीसी आरक्षण नीति लागूकर राजपूतो समेत सभी स्वर्णो का गला घोंट दिया।।।

विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद चंद्रशेखर ही जनता दल से अलग होकर समाजवादी जनता पार्टी बनाकर काँग्रेस के समर्थन से सत्तारूढ़ हुए। इन्हें 10 नवम्बर, 1990 को राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरामण ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। प्रधानमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर ने बेहद संयमित रूप से अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वह जानते थे कि काँग्रेस के समर्थन से ही इनकी सरकार टिकी हुई है। यह भी सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार के प्रधानमंत्री साबित हो रहे थे, उसे देखते हुए उन्होंने कांग्रेस की बात पर विश्वास किया कि वह उसके समर्थन से सरकार बना सकते हैं।

लेकिन चंद्रशेखर कभी इस भुलावे में नहीं थे कि राजीव गांधी लम्बे समय तक उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने देंगे। देश को मध्यावधि चुनाव से बचाने के लिए भी वह प्रधानमंत्री बने थे।
विदेशी मुद्रा संकट होने पर चंद्रशेखर ने स्वर्ण के रिजर्व भण्डारों से यह समस्या सुलझाई। कुछ ही समय में स्वर्ण के रिजर्व भण्डार भर गए और विदेशीU मुद्रा का संतुलन भी बेहतर हो गया।

जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ -----

चंद्रशेखर सिंह जी वी पी सिंह की मंडल जाति आधारित आरक्षण नीति के कटटर खिलाफ थे और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने मंडल ओबीसी आरक्षण रद्द करके आर्थिक आधार पर आरक्षण का अध्यादेश जारी कर दिया था,जिसे उनकी सरकार गिरने के बाद कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से रद्द कराकर जाति आधारित कर दिया,उनकी वीपी सिंह की मंडल आरक्षण नीति के खिलाफ देश भर में आंदोलित हो रहे युवाओं से पूरी सहानुभूति थी.
काश वी पी सिंह के बजाय चंद्रशेखर सिंह ही शुरू में प्रधानमंत्री बनते तो आज देश जातिवाद की आग में न जल रहा होता।।।।।।।

कांग्रेस का विश्वासघात------

काँग्रेस यह जानती थी कि जनता का जनता पार्टी से मोहभंग हो चुका है। लेकिन चंद्रशेखर अच्छा काम कर रहे थे। समर्थन वापस लेने के लिए उपयुक्त बहाना भी होना चाहिए। तब यह बहाना बनाया गया कि चंद्रशेखर सरकार के द्वारा राजीव गांधी की गुप्तचरी की जा रही है। इस आरोप के अगले ही दिन 5 मार्च, 1991 को कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। ऐसे में चंद्रशेखर ने संसद भंग करके नए चुनाव सम्पन्न कराने की अनुशंसा राष्ट्रपति को प्रेषित कर दी। वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार ही कार्य करना चाहते थे। इस प्रकार चंद्रशेखर लगभग 4 माह प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए। इन सभी स्थितियों के मद्देनज़र राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरामण ने चंद्रशेखर से नया प्रधानमंत्री चुने जाने तक अपने पद पर कार्य करने को कहा। इस प्रकार उन्होंने 21 जून, 1991 तक प्रधानमंत्री का कार्यभार देखा। इस दौरान वह किसी भी विवाद में नहीं आए और निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों को अंजाम दिया। इनके कार्यवाहक प्रधानमंत्रित्व काल में निष्पक्ष चुनाव भी हुए।

चुंकि राजीव गांधी चुनाव के माध्यम से प्रधानमंत्री का पद पुन: पाना चाहते थे, अत: उन्होंने चंद्रशेखर सरकार को दिया गया समर्थन वापस ले लिया था। लेकिन भाग्य का खेल तब कौन जानता था? राजीव गांधी तमिलनाडु में एक चुनावी रैली को सम्बोधित करते हुए मानव बम विस्फोट का शिकार हुए और दर्दनाक उनकी मौत हो गई।

प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी चंद्रशेखर लम्बे समय तक संसद सदस्य के रूप में बलिया का प्रतिनिधित्व करते रहे, वो कई दशको तक बलिया से लगातार अपने दम पर चुनकर आते रहे। बलिया में वो अत्यंत लोकप्रिय थे। बलिया में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता था। यहाँ तक की पड़ोस में आजमगढ़, मऊ और ग़ाज़ीपुर जैसे अपराध प्रभावित और नामी गैंगस्टर वाले जिले होने के बावजूद बलिया में अपराध बहुत कम था और पड़ोस के जिलो के देश विदेश में नामी गैंगस्टर बलिया में संचालन करने से कतराते थे। उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद माना जाता था,अनेक नेता उनकी सलाह लेते थे और सभी दलों में उनकी स्वीकार्यता थी।


राजपूत समाज के हितों के रक्षक-------

समाजवादी नेता और महान विचारक होते हुए भी चंद्रशेखर जी राजपूत समाज के प्रबल अभिभावक थे,विभिन्न दलों के राजपूत नेता अक्सर टिकट मांगने के लिए चंद्रशेखर जी से सिफारिश करवाया करते थे,आज सभी दलों में चंद्रशेखर सिंह जी के सहयोग से बने हुए बड़े बड़े नेता हैं,चंद्रशेखर जी हर राज्य में राजपूत सम्मेलनों में भाग लेते थे और राजपूत समाज की उन्नति के लिए उन्होंने भारी सहयोग दिया।।
उन्होंने हरियाणा में भोंडसी में ग्रामवासियो के सहयोग से आश्रम विकसित किया और अक्सर वो वही रहते थे किन्तु बाद में उनके मतभेद ग्रामीणो से हो गए और कोर्ट के आदेश पर उन्होंने भोण्डसी आश्रम खाली कर ग्रामसमाज को सौंप दिया।।।।
राजस्थान के स्वर्गीय कल्याण सिंह कालवी को चंद्रशेखर जी ने अपनी सरकार में मंत्री बनाया,बिहार के शंकर दयाल सिंह,धनबाद के सूर्यदेव सिंह जैसे राजपूत नेता इनकी देन थे.....
उनके मन्त्रीमण्डल में 16 राजपूत मंत्री थे । चित्तौङ जोहर स्मृति संस्थान में भाग लिया तथा चित्तौड़ किले के जिर्णोद्दार हेतु तीन करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की।

निधन-------
चंद्रशेखर जी को प्लाज्मा कैंसर था। इन्हें 3 मई 2007 को नई दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ पर 8 जुलाई, 2007 को इनका निधन हो गया। लेकिन चंद्रशेखर एक कर्मठ एवं ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में भारववासियों द्वारा सदैव याद किए जाते रहेंगे।।
महान समाजवादी नेता और विचारक,राजपूत समाज के अभिभावक पूर्व प्रधानमंत्री ठाकुर चंद्रशेखर सिंह जी को शत शत नमन....
जय राजपुताना।।।।

Sunday, April 3, 2016

क्या परशुराम ने किया था धरती को क्षत्रियविहीन??? Parshuram real story

क्या परशुराम ने किया था धरती को क्षत्रियविहीन????


सुनिए सटीक जवाब।
1-परशुराम की शत्रुता सिर्फ महिष्मती के हैहय वंशी अर्जुन से थी जिसने उसके पिता का वध किया था। परशुराम ने हैहय वंश के क्षत्रियो का विनाश किया था न कि सभी क्षत्रियो का।

2-ये घटना भगवान राम से भी पहले की है अगर उससे पहले ही क्षत्रिय खत्म हो गये होते तो अयोध्या का सुर्यवंश जिसमे दशरथ राम लक्ष्मण और मिथिला के जनक जैसे दुसरे क्षत्रिय वंश कैसे बचे रहे?जबकि जब शिव का धनुष टूटा था तो वहां परशुराम के आने और उनके लक्ष्मण से वाद विवाद कैसे होता?

3-उसके बाद महाभारत काल में भी परशुराम का भीष्म और कर्ण को युद्ध की शिक्षा देने का जिक्र आता है। अगर पहले ही सभी क्षत्रिय खत्म हो गये होते तो महाभारत काल में जो अनेक क्षत्रिय वंश थे वो कहाँ से आ गये?

4-उपरोक्त से स्पष्ट है कि परशुराम द्वारा क्षत्रियो के पूर्ण विनाश की कथा ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रियो पर श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए गढी है जो सत्य नही है।

5-परशुराम की शत्रुता जिस हैहय वंश से थी उसका भी पूर्ण विनाश नही हुआ था बल्कि सह्स्त्रजुन के पुत्र को महिष्मती की गद्दी पर बिठाया गया था। आज भी हैहय वंश के राजपूत बलिया जीले में मिलते हैं। हैहय वंश की शाखा कलचुरी राजपूत है जो आज भी छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मिलते हैं।

आप ही बताओ कि अगर सभी क्षत्रिय को परशुराम ने खत्म कर दिया होता तो रामायण और महाभारत के काल में क्षत्रिय वंश कहाँ से आ गये?

यदि परशुरामजी के अवतार धारण करने का समय निर्धारित किया जाये तो उन्होनें  भगवान राम से बहुत पहले अवतार धारण किया था। और उस समय कार्तवीर्य के अत्याचारों  से प्रजा तंग आ चुकी थी। कार्तवीर्य उस समय अंग आदि 21 बस्तियों का स्वामी था परशुराम ने अवतार धारण करके कार्तवीर्य को मार दिया और इस संघ को जीतकर कश्यप ऋषि को दान में दे दिया। यह अवतारी कार्य पूरा करने के तुरंत बाद ही वे देवलोक सिधार गये।

परशुराम के देवलोक चले जाने के बाद उसके अनुयायियों ने एक परम्परा पीठ स्थापित कर ली जिसके अध्यक्ष को परशुराम जी कहा जाने लगा। यह पीठ रामायण काल से महाभारत काल तक चलती रही। इसलिय़े मूल परशूराम नही बल्कि परशूराम पीठ के अध्यक्ष सीतास्वंयंवर के अवसर पर आये थे। नहीं तो विष्णु के दो अवतार इक्ट्ठे कैसे होते क्योंक परशूरामजी को यह पता नही था कि राम का अवतार हो गया है या नही। किंतु जब राम की पर भृगु चिन्ह देखा तो उन्हे संदेह हुआ और अपने संदेह के निवारण के लिए अपना धनुष- बाण जिसका चिल्ला केवल विष्णु ही चढ़ा सकते थे, राम को दिया।

राम रमापति कर धनु लेहू।

            खेंचत चाप मिटहू संदेहू ।।    रामचरित मानस(अयोध्या काण्ड)

राम ने जब सफलतापूर्वक धनुष का चिल्ला चढ़ा दिया तो परशुराम को भी अपनी स्थिती का पता लगा और वे अपनी गलती की क्षमा मांगकर महेन्द्र पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए। इसी प्रकार परशुराम पीठ के अध्यक्ष ही भीष्म के साथ लडे थे। और उनको भी हार का मुँह देखना पडा था। इसी तरह है शंकराचार्य पीठ। आजकल भी शंकराचार्य ने जो चार पीठ स्थापित किये थे, उनके सभी के अध्यक्षों को शंकराचार्य कहा जाता है।

यदि परशुराम इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय से खाली कर देते तो आज इतने क्षत्रिय कहा से आते। आज भी क्षत्रियों की गणना की जायें तो वे अन्य सभी जातियों से अधिक मिलेंगे। दूसरा प्रश्न यह है कि परशुराम ने रामायण काल में अयोध्या और जनकपुर को क्यों समाप्त नही किया। महाभारत काल में क्षत्रियों के अनेक राज्य थे। कौशल नरेश का सूर्यवंश, मगध का ब्रहदर्य वंश, हस्तिनापुर का चंद्र वंश। चंद्रवंशिय क्षत्रियों का राज्य उस समय लगभग समस्त विश्व में था वहां के सभी राजा महाभारत के युद्ध मे और फिर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सम्मिलित हुए थे । वे सभी परशुराम से कैसे बचे रहे। और महाभारत का युद्ध करने के लिए 18 अक्षोहिणी सेना कहा से आयी। इस मत के समर्थक एक बार फिर तर्क देते है कि परशुराम ने तो केवल मदांध और अत्याचारी कार्तवीर्य के 100 पुत्रों में से 95 तो परशुराम के साथ लड़ते लड़ते मारे गए और बाकी 5 बचे थे। जिनमें जयध्वज ने राज्य की बागडोर संभाली थी। तालजंघ और ताग्रजंध इसी वंश में हुए। मोरध्वज जिन्होने अपने पुत्र को आरे से चीर कर श्रीकृष्ण के शेर को अर्पित किया था, हैहय वंश में ही उत्पन्न हुए थे। यह वंश आज भी विद्यमान है।

रामायण काल में अयोध्या और जनकपूर आदि क्षत्रियों के प्रसिद्ध राज्य थे। असुरों का राजा महा अत्याचारी रावण जिसने सब ऋषि- मुनियों के नाक में दम कर रखा था को परशुराम ने क्यों नही मारा। महाभारत में अनेक अत्याचारी राजा थे जैसे- कंस, शिशुपाल, जरासंध, कौरव आदि सब को परशूराम ने क्यों नही मारा। यदि सभी अत्याचारियों को परशुराम ही मार डालते तो श्रीकृष्ण को अवतार धारण करने की क्या जरूरत थी।।

संदर्भ--
1-ईश्वर सिंह मुंढाड कृत राजपूत वंशावली
2-टीम राजपूताना सोच