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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Saturday, April 16, 2016

पूर्व प्रधानमन्त्री चन्द्रशेखर जी भारतीय राजनीति के "युवा तुर्क" Ex PM Chandrashekhar singh

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आज दिनांक 17 अप्रैल महान समाजवादी नेता पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय ठाकुर चंद्रशेखर सिंह जी का जन्मदिवस मनाया जा रहा है,उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दिन सार्वजनिक छुट्टी घोषित की है,

हालाँकि चंद्रशेखर सिंह जी और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप सर्वसमाज के लिए पूजनीय हैं उन्हें किसी एक जाति से जोड़कर नहीं देखा चाहिए.
चंद्रशेखर सिंह जी के जन्मदिवस पर सार्वजनिक अवकाश घोषित करने पर यूपी की सपा सरकार को धन्यवाद और आशा करते हैं कि सपा सरकार सिर्फ वोटबैंक की राजनीति न करके चंद्रशेखर जी की विचारधारा पर भी अमल करेगी,

गौरतलब है कि चंद्रशेखर सिंह जी वी पी सिंह की मंडल जाति आधारित आरक्षण नीति के कटटर खिलाफ थे और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने मंडल ओबीसी आरक्षण रद्द करके आर्थिक आधार पर आरक्षण का अध्यादेश जारी कर दिया था,जिसे उनकी सरकार गिरने के बाद कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से रद्द कराकर जाति आधारित कर दिया,
हमे अपेक्षा है कि यूपी की सपा सरकार और केंद्र सरकार आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की चंद्रशेखर सिंह जी की नीति पर चलकर दिखाए तब जाकर चंद्रशेखर सिंह जी को सच्ची श्रधांजलि होगी।
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जीवन परिचय --------
चन्द्र शेखर सिंह (अंग्रेज़ी: Chandra Shekhar Sing)------
भारत के आठवें प्रधानमंत्री थे। इन्हें युवा तुर्क का सम्बोधन इनकी निष्पक्षता के कारण प्राप्त हुआ था। वह मेधा प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जिन्हें विधाता कई योग्यता देकर पृथ्वी पर भेजता है और चंद्रशेखर का शुमार उन्हीं व्यक्तियों में करना चाहिए। विश्वनाथ प्रताप सिंह के बाद चंद्रशेखर ने ही प्रधानमंत्री का पदभार सम्भाला था। वह आचार्य नरेंद्र देव के काफ़ी समीप माने जाते थे। उनके व्यक्तित्व एवं चरित्र से इन्होंने बहुत कुछ आत्मसात किया था। एक सांसद के रूप में चंद्रशेखर का वक्तव्य पक्ष और विपक्ष दोनों बेहद ध्यान से सुनते थे। इनके लिए प्रचलित था कि यह राजनीति के लिए नहीं बल्कि देश की उन्नति की राजनीति हेतु कार्य करने में विश्वास रखते हैं। चंद्रशेखर आत्मा की आवाज़ पर प्रशंसा और आलोचना करते थे। तब यह नहीं देखते थे कि वह ऐसा पक्ष के प्रति कर रहे हैं अथवा विपक्ष के प्रति। लेकिन देश को इस सुयोग्य व्यक्ति से अधिकाधिक उम्मीदें थीं जो निश्चय ही राजनीतिक व्यवस्था के कारण प्राप्त नहीं की जा सकीं।

जन्म एवं परिवार-------

चंद्रशेखर का जन्म 17 अप्रैल,(कुछ संदर्भो में 1 जुलाई ) 1927 को उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले के ग्राम इब्राहीमपुर में हुआ था। इनका कृषक परिवार था। ये सम्भवत सोलंकी राजपूत की ताँतिया शाखा में जन्मे थे,चंद्रशेखर का राजनीति के प्रति रुझान विद्यार्थी जीवन में ही हो गया था। इन्हें आग उग़लते क्रान्तिकारी विचारों के कारण जाना जाता था। चंद्रशेखर ने 1950-1951 में राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर उपाधि इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। इनका विवाह दूजा देवी के साथ सम्पन्न हुआ था। इनके दो पुत्र पंकज और नीरज हैं।जिनमे नीरज शेखर उनकी मृत्यु के बाद बलिया से सांसद रहे हैं।

राजनीतिक जीवन---------
स्नातकोत्तर करने के बाद चंद्रशेखर समाजवादी आन्दोलन से जुड़ गए। वह पहले बलिया के ज़िला प्रजा समाजवादी दल के सचिव बने और एक वर्ष के बाद राज्य स्तर पर इसके संयुक्त सचिव बन गए। वह 1962 में राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्य पर तब आए जब उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चयनित हुए।
इस समय तक चंद्रशेखर ने वंचितों और दलितों के कल्याण की पैरवी करते हुए उत्तर प्रदेश सहित कई प्रान्तों में अपनी प्रभावी पहचान बना ली थी। इस समय उनकी उम्र मात्र 35 वर्ष थी। चंद्रशेखर की एक विशेषता यह थी कि वह गम्भीर मुद्दों पर सिंह के समान गर्जना करते हुए बोलते थे। उनकी वाणी में इतनी शक्ति थी कि जब संसद मछली बाज़ार बन रहा होता था तो वहाँ पर सन्नाटा पसर जाता था। चंद्रशेखर को मुद्दों की राजनीति के लिए जाना जाता है। यही कारण है कि विपक्षी नेताओं के साथ उनके मधुर सम्बन्ध रहे। विपक्ष के नेता गतिरोध की स्थिति में उनसे परामर्श और मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
चंद्रशेखर अपने विचारों की अभिव्यक्ति लेखन द्वारा बहुत सशक्त तरीक़े से करते थे। पत्रकारिता का शौक़ पूर्ण करने के लिए उन्होंने 'यंग इंडिया' नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का सम्पादन-प्रकाशन किया। इसका सम्पादकीय स्वयं चंद्रशेखर के द्वारा लिखा जाता था, जो सारगर्भित और मर्मस्पर्शी होता था। वह समस्याओं को उठाते थे तथा उनकी समीक्षा बेबाक़ी के साथ करते थे। वह समस्या के समाधान भी सुझाते थे। ऐसा करते हुए चन्द्रशेखर एक नेता से ज़्यादा चिंतक नज़र आते थे। यही कारण है कि इनके सम्पादकीय बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों में बेहर लोकप्रिय हुए। चंद्रशेखर के लेखन में इनका गहन चिंतन परिलक्षित होता था। उनका विश्लेषणात्मक लेखन पाठकों में गहराई तक उतर जाता था।

मेरी जेल डायरी-------------

जून 1975 में आपातकाल की घोषणा के बाद जिन नेताओं को इंदिरा गांधी ने जेल भेजा, उनमें चंद्रशेखर भी थे। लिखित वैचारिक अभिव्यक्ति पर पहरा लग चुका था, इस कारण 'यंग इंडिया' का प्रकाशन बंद हो गया। लेकिन लेखक हृदय के मालिक चंद्रशेखर का जेल में रहते हुए भी लेखन कर्म से नहीं रोका जा सका। जेल प्रवास के दौरान चंद्रशेखर ने अपना लेखन जारी रखा और बाद में 'मेरी जेल डायरी' के नाम से उनकी पुस्तक प्रकाशित होकर पाठकों के समक्ष आई। इसमें उनके जेल के अनुभवों का लेखा-जोखा है। इन्होंने लिखा है कि राजनीतिक बंदी होते हुए भी उस समय सभी को आवश्यक सुविधाओं से वंचित रखा गया था।
आजादी के बाद इतिहास का यह सबसे काला दौर था। देशभर के सारे बड़े नेता या तो गायब थे या जेलों में डाल दिए गए थे। प्रेस की आजादी पर प्रतिबंध लग गया था। लिखना तो दूर सरकार के खिलाफ बोलने तक से लोग घबराने लगे थे।

ऐसे में एक महिला दिल्ली की सड़क पर उतरती है और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के घर के बाहर खड़ी होकर चिल्ला-चिल्ला कर चुनौती देती है
गार्ड्स ने उन्हें समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन, वह मानी नहीं। इस तरह की हिम्मत दिखाने वाली यह महिला कोई और नहीं बल्कि उस शख्स चंद्रशेखर सिंह की पत्नी थी जो एक दिन भारत का प्रधानमंत्री बना।

प्रधानमंत्री के पद पर---------

जनता दल सरकार में वी पी सिंह के साथ ही चंद्रशेखर जी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे,ऐसे में दो राजपूतो में जोर आजमाइश हुई और जाट नेता चौधरी देवीलाल के सहयोग से वी पी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने,पर ये घटना देश के इतिहास में काला अध्याय सिद्ध हुई,वीपी सिंह को कांग्रेस के भ्र्ष्टाचार के विरोध में सत्ता मिली थी,सभी राजपूतो ने जमकर पुरे देश में उसका समर्थन किया पर पद पर बैठते हुए ही उसने मंडल आयोग की ओबीसी आरक्षण नीति लागूकर राजपूतो समेत सभी स्वर्णो का गला घोंट दिया।।।

विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद चंद्रशेखर ही जनता दल से अलग होकर समाजवादी जनता पार्टी बनाकर काँग्रेस के समर्थन से सत्तारूढ़ हुए। इन्हें 10 नवम्बर, 1990 को राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरामण ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। प्रधानमंत्री बनने के बाद चंद्रशेखर ने बेहद संयमित रूप से अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वह जानते थे कि काँग्रेस के समर्थन से ही इनकी सरकार टिकी हुई है। यह भी सच है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह जिस प्रकार के प्रधानमंत्री साबित हो रहे थे, उसे देखते हुए उन्होंने कांग्रेस की बात पर विश्वास किया कि वह उसके समर्थन से सरकार बना सकते हैं।

लेकिन चंद्रशेखर कभी इस भुलावे में नहीं थे कि राजीव गांधी लम्बे समय तक उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने देंगे। देश को मध्यावधि चुनाव से बचाने के लिए भी वह प्रधानमंत्री बने थे।
विदेशी मुद्रा संकट होने पर चंद्रशेखर ने स्वर्ण के रिजर्व भण्डारों से यह समस्या सुलझाई। कुछ ही समय में स्वर्ण के रिजर्व भण्डार भर गए और विदेशीU मुद्रा का संतुलन भी बेहतर हो गया।

जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ -----

चंद्रशेखर सिंह जी वी पी सिंह की मंडल जाति आधारित आरक्षण नीति के कटटर खिलाफ थे और प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने मंडल ओबीसी आरक्षण रद्द करके आर्थिक आधार पर आरक्षण का अध्यादेश जारी कर दिया था,जिसे उनकी सरकार गिरने के बाद कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से रद्द कराकर जाति आधारित कर दिया,उनकी वीपी सिंह की मंडल आरक्षण नीति के खिलाफ देश भर में आंदोलित हो रहे युवाओं से पूरी सहानुभूति थी.
काश वी पी सिंह के बजाय चंद्रशेखर सिंह ही शुरू में प्रधानमंत्री बनते तो आज देश जातिवाद की आग में न जल रहा होता।।।।।।।

कांग्रेस का विश्वासघात------

काँग्रेस यह जानती थी कि जनता का जनता पार्टी से मोहभंग हो चुका है। लेकिन चंद्रशेखर अच्छा काम कर रहे थे। समर्थन वापस लेने के लिए उपयुक्त बहाना भी होना चाहिए। तब यह बहाना बनाया गया कि चंद्रशेखर सरकार के द्वारा राजीव गांधी की गुप्तचरी की जा रही है। इस आरोप के अगले ही दिन 5 मार्च, 1991 को कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। ऐसे में चंद्रशेखर ने संसद भंग करके नए चुनाव सम्पन्न कराने की अनुशंसा राष्ट्रपति को प्रेषित कर दी। वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार ही कार्य करना चाहते थे। इस प्रकार चंद्रशेखर लगभग 4 माह प्रधानमंत्री के पद पर आसीन हुए। इन सभी स्थितियों के मद्देनज़र राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरामण ने चंद्रशेखर से नया प्रधानमंत्री चुने जाने तक अपने पद पर कार्य करने को कहा। इस प्रकार उन्होंने 21 जून, 1991 तक प्रधानमंत्री का कार्यभार देखा। इस दौरान वह किसी भी विवाद में नहीं आए और निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों को अंजाम दिया। इनके कार्यवाहक प्रधानमंत्रित्व काल में निष्पक्ष चुनाव भी हुए।

चुंकि राजीव गांधी चुनाव के माध्यम से प्रधानमंत्री का पद पुन: पाना चाहते थे, अत: उन्होंने चंद्रशेखर सरकार को दिया गया समर्थन वापस ले लिया था। लेकिन भाग्य का खेल तब कौन जानता था? राजीव गांधी तमिलनाडु में एक चुनावी रैली को सम्बोधित करते हुए मानव बम विस्फोट का शिकार हुए और दर्दनाक उनकी मौत हो गई।

प्रधानमंत्री पद से हटने के बाद भी चंद्रशेखर लम्बे समय तक संसद सदस्य के रूप में बलिया का प्रतिनिधित्व करते रहे, वो कई दशको तक बलिया से लगातार अपने दम पर चुनकर आते रहे। बलिया में वो अत्यंत लोकप्रिय थे। बलिया में उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नही हिल सकता था। यहाँ तक की पड़ोस में आजमगढ़, मऊ और ग़ाज़ीपुर जैसे अपराध प्रभावित और नामी गैंगस्टर वाले जिले होने के बावजूद बलिया में अपराध बहुत कम था और पड़ोस के जिलो के देश विदेश में नामी गैंगस्टर बलिया में संचालन करने से कतराते थे। उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद माना जाता था,अनेक नेता उनकी सलाह लेते थे और सभी दलों में उनकी स्वीकार्यता थी।


राजपूत समाज के हितों के रक्षक-------

समाजवादी नेता और महान विचारक होते हुए भी चंद्रशेखर जी राजपूत समाज के प्रबल अभिभावक थे,विभिन्न दलों के राजपूत नेता अक्सर टिकट मांगने के लिए चंद्रशेखर जी से सिफारिश करवाया करते थे,आज सभी दलों में चंद्रशेखर सिंह जी के सहयोग से बने हुए बड़े बड़े नेता हैं,चंद्रशेखर जी हर राज्य में राजपूत सम्मेलनों में भाग लेते थे और राजपूत समाज की उन्नति के लिए उन्होंने भारी सहयोग दिया।।
उन्होंने हरियाणा में भोंडसी में ग्रामवासियो के सहयोग से आश्रम विकसित किया और अक्सर वो वही रहते थे किन्तु बाद में उनके मतभेद ग्रामीणो से हो गए और कोर्ट के आदेश पर उन्होंने भोण्डसी आश्रम खाली कर ग्रामसमाज को सौंप दिया।।।।
राजस्थान के स्वर्गीय कल्याण सिंह कालवी को चंद्रशेखर जी ने अपनी सरकार में मंत्री बनाया,बिहार के शंकर दयाल सिंह,धनबाद के सूर्यदेव सिंह जैसे राजपूत नेता इनकी देन थे.....
उनके मन्त्रीमण्डल में 16 राजपूत मंत्री थे । चित्तौङ जोहर स्मृति संस्थान में भाग लिया तथा चित्तौड़ किले के जिर्णोद्दार हेतु तीन करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की।

निधन-------
चंद्रशेखर जी को प्लाज्मा कैंसर था। इन्हें 3 मई 2007 को नई दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ पर 8 जुलाई, 2007 को इनका निधन हो गया। लेकिन चंद्रशेखर एक कर्मठ एवं ईमानदार राजनीतिज्ञ के रूप में भारववासियों द्वारा सदैव याद किए जाते रहेंगे।।
महान समाजवादी नेता और विचारक,राजपूत समाज के अभिभावक पूर्व प्रधानमंत्री ठाकुर चंद्रशेखर सिंह जी को शत शत नमन....
जय राजपुताना।।।।

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