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Sunday, April 3, 2016

क्या परशुराम ने किया था धरती को क्षत्रियविहीन??? Parshuram real story

क्या परशुराम ने किया था धरती को क्षत्रियविहीन????


सुनिए सटीक जवाब।
1-परशुराम की शत्रुता सिर्फ महिष्मती के हैहय वंशी अर्जुन से थी जिसने उसके पिता का वध किया था। परशुराम ने हैहय वंश के क्षत्रियो का विनाश किया था न कि सभी क्षत्रियो का।

2-ये घटना भगवान राम से भी पहले की है अगर उससे पहले ही क्षत्रिय खत्म हो गये होते तो अयोध्या का सुर्यवंश जिसमे दशरथ राम लक्ष्मण और मिथिला के जनक जैसे दुसरे क्षत्रिय वंश कैसे बचे रहे?जबकि जब शिव का धनुष टूटा था तो वहां परशुराम के आने और उनके लक्ष्मण से वाद विवाद कैसे होता?

3-उसके बाद महाभारत काल में भी परशुराम का भीष्म और कर्ण को युद्ध की शिक्षा देने का जिक्र आता है। अगर पहले ही सभी क्षत्रिय खत्म हो गये होते तो महाभारत काल में जो अनेक क्षत्रिय वंश थे वो कहाँ से आ गये?

4-उपरोक्त से स्पष्ट है कि परशुराम द्वारा क्षत्रियो के पूर्ण विनाश की कथा ब्राह्मणों द्वारा क्षत्रियो पर श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए गढी है जो सत्य नही है।

5-परशुराम की शत्रुता जिस हैहय वंश से थी उसका भी पूर्ण विनाश नही हुआ था बल्कि सह्स्त्रजुन के पुत्र को महिष्मती की गद्दी पर बिठाया गया था। आज भी हैहय वंश के राजपूत बलिया जीले में मिलते हैं। हैहय वंश की शाखा कलचुरी राजपूत है जो आज भी छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश में मिलते हैं।

आप ही बताओ कि अगर सभी क्षत्रिय को परशुराम ने खत्म कर दिया होता तो रामायण और महाभारत के काल में क्षत्रिय वंश कहाँ से आ गये?

यदि परशुरामजी के अवतार धारण करने का समय निर्धारित किया जाये तो उन्होनें  भगवान राम से बहुत पहले अवतार धारण किया था। और उस समय कार्तवीर्य के अत्याचारों  से प्रजा तंग आ चुकी थी। कार्तवीर्य उस समय अंग आदि 21 बस्तियों का स्वामी था परशुराम ने अवतार धारण करके कार्तवीर्य को मार दिया और इस संघ को जीतकर कश्यप ऋषि को दान में दे दिया। यह अवतारी कार्य पूरा करने के तुरंत बाद ही वे देवलोक सिधार गये।

परशुराम के देवलोक चले जाने के बाद उसके अनुयायियों ने एक परम्परा पीठ स्थापित कर ली जिसके अध्यक्ष को परशुराम जी कहा जाने लगा। यह पीठ रामायण काल से महाभारत काल तक चलती रही। इसलिय़े मूल परशूराम नही बल्कि परशूराम पीठ के अध्यक्ष सीतास्वंयंवर के अवसर पर आये थे। नहीं तो विष्णु के दो अवतार इक्ट्ठे कैसे होते क्योंक परशूरामजी को यह पता नही था कि राम का अवतार हो गया है या नही। किंतु जब राम की पर भृगु चिन्ह देखा तो उन्हे संदेह हुआ और अपने संदेह के निवारण के लिए अपना धनुष- बाण जिसका चिल्ला केवल विष्णु ही चढ़ा सकते थे, राम को दिया।

राम रमापति कर धनु लेहू।

            खेंचत चाप मिटहू संदेहू ।।    रामचरित मानस(अयोध्या काण्ड)

राम ने जब सफलतापूर्वक धनुष का चिल्ला चढ़ा दिया तो परशुराम को भी अपनी स्थिती का पता लगा और वे अपनी गलती की क्षमा मांगकर महेन्द्र पर्वत पर तपस्या के लिए चले गए। इसी प्रकार परशुराम पीठ के अध्यक्ष ही भीष्म के साथ लडे थे। और उनको भी हार का मुँह देखना पडा था। इसी तरह है शंकराचार्य पीठ। आजकल भी शंकराचार्य ने जो चार पीठ स्थापित किये थे, उनके सभी के अध्यक्षों को शंकराचार्य कहा जाता है।

यदि परशुराम इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय से खाली कर देते तो आज इतने क्षत्रिय कहा से आते। आज भी क्षत्रियों की गणना की जायें तो वे अन्य सभी जातियों से अधिक मिलेंगे। दूसरा प्रश्न यह है कि परशुराम ने रामायण काल में अयोध्या और जनकपुर को क्यों समाप्त नही किया। महाभारत काल में क्षत्रियों के अनेक राज्य थे। कौशल नरेश का सूर्यवंश, मगध का ब्रहदर्य वंश, हस्तिनापुर का चंद्र वंश। चंद्रवंशिय क्षत्रियों का राज्य उस समय लगभग समस्त विश्व में था वहां के सभी राजा महाभारत के युद्ध मे और फिर युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सम्मिलित हुए थे । वे सभी परशुराम से कैसे बचे रहे। और महाभारत का युद्ध करने के लिए 18 अक्षोहिणी सेना कहा से आयी। इस मत के समर्थक एक बार फिर तर्क देते है कि परशुराम ने तो केवल मदांध और अत्याचारी कार्तवीर्य के 100 पुत्रों में से 95 तो परशुराम के साथ लड़ते लड़ते मारे गए और बाकी 5 बचे थे। जिनमें जयध्वज ने राज्य की बागडोर संभाली थी। तालजंघ और ताग्रजंध इसी वंश में हुए। मोरध्वज जिन्होने अपने पुत्र को आरे से चीर कर श्रीकृष्ण के शेर को अर्पित किया था, हैहय वंश में ही उत्पन्न हुए थे। यह वंश आज भी विद्यमान है।

रामायण काल में अयोध्या और जनकपूर आदि क्षत्रियों के प्रसिद्ध राज्य थे। असुरों का राजा महा अत्याचारी रावण जिसने सब ऋषि- मुनियों के नाक में दम कर रखा था को परशुराम ने क्यों नही मारा। महाभारत में अनेक अत्याचारी राजा थे जैसे- कंस, शिशुपाल, जरासंध, कौरव आदि सब को परशूराम ने क्यों नही मारा। यदि सभी अत्याचारियों को परशुराम ही मार डालते तो श्रीकृष्ण को अवतार धारण करने की क्या जरूरत थी।।

संदर्भ--
1-ईश्वर सिंह मुंढाड कृत राजपूत वंशावली
2-टीम राजपूताना सोच

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