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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, May 29, 2016

मुरैना जिला की तंवरघार का एक ऐतिहासिक कुआँ जिसका पानी पीने से ही इन ग्रामीणों के अंदर आत्मसम्मान स्वाभिमान का भाव पैदा हो जाता है।


 मुरैना जिला की तंवरघार का एक ऐतिहासिक कुआँ जिसका पानी पीने से ही इन ग्रामीणों के अंदर आत्मसम्मान स्वाभिमान का भाव पैदा हो जाता है।


**साधारण नहीं था 100 साल पुराने इस कुएं का पानी, 2 महीने अंग्रेज थे परेशान**



मुरैना जिले की पोरसा के तहसील के ग्राम कौंथर का नाम आते ही उस प्राचीन कुएं की यादें दिमाग में उभर आती हैं, जिसके बारे में अभी तक यह कहा जाता था कि जो भी इस कुएं का पानी पीता है, उसके अंदर आक्रोश उत्तेजना पैदा हो जाती है और लोग एक-दूसरे को मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। मगर हकीकत इसके विपरीत है। कौंथर के प्राचीन कुएं का पानी उत्तेजित करने वाला नहीं बल्कि स्वाभिमान आत्मसम्मान का भाव पैदा करने वाला था।
कौंथर गांव में स्थित माता मंदिर के पुजारी आशाराम (70) बताते हैं कि तकरीबन 100 वर्ष पूर्व कौंथर गांव के तीन बागी भाइयों भूपसिंह तोमर, जिमीपाल तोमर और मोहन सिंह तोमर ने नागाजी धाम के महाराज कंधरदास के प्रयासों से बीहड़ों का रास्ता छोड़कर गौ हत्या रोकने का संकल्प लिया।
इसी संकल्प के साथ तीनों भाइयों ने ग्वालियर मुरार के कसाईखाने पर हमला बोल दिया, जहां गौवंश को काटकर मांस का निर्यात किया जाता था।

कसाईखाने को तहस-नहस करने के बाद तीनों भाइयों ने कौंथर गांव में शरण ले ली। इससे नाराज होकर यंग साहब नामक अंग्रेजी अफसर ने इलिंग बर्थ नाम की पूरी रेजिमेंट ही कौंथर गांव को तहस-नहस करने के लिए भेज दी। लेकिन कौंथर के मुठ्ठीभर ग्रामीणों ने पूरे दो महीने तक अंग्रेजी सेना को गांव के अंदर नहीं घुसने दिया। इससे घबराए अंग्रेज अफसरों ने गांव के ही भेदियों को यह पता लगाने भेजा था कि आखिर ऐसा क्या है, जिससे गांव के लोग अंग्रेजी सेना को टक्कर दे रहे हैं। भेदियों ने अंग्रेजी अफसरों को बताया कि गांव में एक प्राचीन कुआं है, जिसका पानी पीने से ही इन ग्रामीणों के अंदर आत्मसम्मान स्वाभिमान का भाव पैदा हो जाता है। बाद में अंग्रेजी अफसरों ने भेदियों की मदद से गांव के प्राचीन कुएं अन्य कुओं को पटवा दिया। इसके बाद ही सेना गांव में घुस सकी थी।
यह सत्य है कि अंग्रेज अफसर यंग साहब के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज की पूरी एक रेजिमेंट ने कौंथर गांव पर हमला किया था। कई पुरानी लोकगाथाएं भी इस क्षेत्र के बारे में प्रचलित है। लेकिन यहां की गौभक्त भाइयों की घटना सत्य है। प्रो.‌ डाॅ. शंकर सिंह तोमर, इतिहासकार - साहित्यकार
कौंथर गांव के प्राचीन कुए का पानी पीकर लोग स्वाभिमानी हो जाते थे, इसका उल्लेख ब्रिटिश गजेटियर में भी है। इसमें उल्लेख है कि सन् 1914 में गर्मियों के दिनों में मुरार के कसाईखाने पर हमला किया गया था। तब ई. इलिंग बर्थ रेजिमेंट ने बागियों की घेराबंदी की, लेकिन उन्होंने सरेंडर करते हुए अंग्रेजी सेना को दो माह तक टक्कर दी, इसलिए रेजीडेंट ने गांव के तीनों कुएं ही पाट दिए। कुछ समय पूर्व सबसे पुराने कुएं को खोला भी गया लेकिन अब उसका जलस्तर काफी नीचे चला गया है।

सन्दर्भ और साभार---http://m.bhaskar.com/news/referer/521/MP-OTH-ancient-well-water-which-had-given-self-respect-to-freedom-fighters-4891365-PHO.html?pg=1

NAYAK NEERAJ KUMAR SINGH RAGHAV नायक नीरज कुमार सिंह राघव


NAYAK NEERAJ KUMAR SINGH RAGHAV नायक नीरज कुमार सिंह राघव

 

मित्रों बहुत हर्ष के साथ जानकारी देना चाहेंगे कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय राइफल के नायक नीरज कुमार सिंह राघव को मरणोपरांत शांतिकाल में दिए जाने वाले देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया जाएगा। आइए देश के इस वीर बेटे से जुड़ी पांच बातें जानें-:
1: देश के वीर सपूत नीरज कुमार सिंह का जन्‍म उत्‍तर प्रदेश के बुलंदशहर के देवराला गांव में हुआ था।
2: नीरज 57 राष्ट्रीय रायफल में तैनात थे।
3: शहीद नीरज सामान्‍य परिवार से थे, वो राघव (बडगूजर राजपूत) वंश से थे।उनकी स्‍कूली पढ़ाई गांव के स्‍कूल से ही हुई थी। उनके भाई का नाम सतीश राघव है।
4: 2014 के 24 अगस्त को कुपवाड़ा के गुरदाजी सेक्टर में नायक नीरज सिंह के गश्ती दल पर आतंकियों ने घात लगाकर हमला किया, जिसमें एक जवान बुरी तरह घायल हो गया।

नीरज ने अपनी जान की परवाह न करते हुए ग्रेनेड हमला कर रहे उस आतंकी को मार गिराया, जबकि दूसरे दहशतगर्द ने इस बहादुर जवान के सीने में गोली मार दी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद नीरज सिंह उस आतंकवादी से दौड़ कर भिड़ गए, उसे निहत्था कर दिया और दो-दो हाथ की जंग में उसे मार गिराया।
शहीद नीरज सिंह राघव ने अपनी वीरता से अपनी रेजिमेंट का,अपने कुल का और समूचे क्षत्रिय राजपूत समाज का सर गर्व से ऊँचा कर दिया और राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
अमर शहीद नीरज कुमार सिंह राघव को शत शत नमन और समस्त बन्धुओं को गणतंत्र दिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाऐं।

वीर कान्हड़देव सोनगरा,जिन्होंने अलाउद्दीन ख़िलजी से छीनी सोमनाथ मन्दिर की लूटी हुई मूर्तियां और बनवाया भव्य मन्दिर

=== वीर कान्हड़देव सोनगरा,जिन्होंने अलाउद्दीन ख़िलजी से छीनी सोमनाथ मन्दिर की लूटी हुई मूर्तियां और बनवाया भव्य मन्दिर ===

VEER KANHARDEV SONIGARA

जालौर के वीर कान्हड़देव सोनीगरा जिन्होंने अल्लाउद्दीन ख़िलजी से छीनी सोमनाथ मंदिर से लूटी हुयी मुर्तिया और बनवाया भव्य मंदिर

राजपुताना हमेशा धर्म की रक्षा में आगे रहा है कण कण में वीरो का बलिदान है ऐसा कोई गाव नही जहा राजपूत झुंझार की देवालय छतरिया न हो

वक़्त 12वीं शताब्दी जब भारत तुर्को के जिहादी हमले झेल रहा था उसी समय जालौर में चौहानो 
की शाखा सोनीगरा में महाराजा सामंत सिंह के यहाँ जन्म हुआ वीर कान्हड़देव का जो आगे चल कर जालौर के राजा बने

उनके कुशल नेतृत्व में जालौर की सीमाये सुदृढ़ हुयी और कान्हड़देव जी स्वर्णगिरी दुर्ग से राज्य चलने लगे
राज्य में एक से बढ़ कर एक योद्धा थे

उसी समय अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने गुजरात में आक्रमण किया और बहुत मार काट मचाई उसने हिन्दुओ के 12 ज्योतीर्लिंग में से एक सोमनाथ महादेव के मंदिर को 1298 ईस्वी में पुनः लूटा और हजारो लोगो को गुलाम बना कर अल्लाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने सेनापति उलुग खा के साथ उत्तर की तरफ रुख किया 

 गुजरात के शहरो को तबाह करते हुए अल्लाउद्दीन की सेना 1299 ईस्वी में राजपूताने में प्रविष्ट हुयी और जालोर राज्य में साकरना गाव के पास डेरा लगाया

जब ये बात कान्हड़देव जी पता चली तो उनकी भुजाये फड़कने लगी और अपने 4 राजपूत वीर योद्धा जिनमे कांधल जी और जैता देवड़ा जैसे बाहुबली थे उन्हें दूत बनाकर सकराणे भेजा

 अल्लुद्द्दीन ख़िलजी ने चारो के सामने आते ही ख़िलजी ने कहा जो भी आता है वो हमारे दरबार में शिश झुकाकर आता तब योद्धा राजपूतो ने जवाब दिया और कहा की  हमारा सिर सिर्फ मौत के वक़्त ही झुक सकता है इतना सुनते ही ख़िलजी आग बाबुला हुआ
और ऊपर की और एक तीर छोड़ा जो सीधा जा रही चील लो लगा और सैनिको को आदेश दिया की ये नीचे नही आना चाईए फिर क्या था सैनिको ने एक के बाद एक इतने तीर छोड़े की वो चील नीचे ही नही गिरी

कांधल समझ चुके थे की ख़िलजी शक्ति प्रदर्शन करवा रहा है तब वहा डेरे में पास ही खड़े एक भैंसे को कांधल ने एक ही वार में दो टुकड़े कर डाले तभी वजीर ने बीच बचाव करते हुए कहा की ये राजपूत है अखड़ स्वाभाव के होते है चारो वीर वहा अल्लाउद्दीन को चेतवानी देकर आ गए

किल्ले में पहुचते ही सार बात कान्हड़ देव सोनीगरा को बताई उन्हें पता चला की सोमनाथ शिवलिंग के साथ उन्होंने महिलाओं बच्चों को भी कैद कर रखा है

 इतना सुनते ही कान्हड़ देव ने प्रतिज्ञा की 
'वह जब तक सोमनाथ महादेव शिवलिंग को एवं बंदियों को मुक्त नहीं करवा देगा, तब तक वह अन्न ग्रहण नहीं करेगा' 

किल्ले में विश्वनीय योद्धाओ और तैयार किया गया पूरी सेना को दो भागो में बाटा एक टुकड़ी का नेतृत्व 
जैता/जैत्र देवड़ा कर रहे थे
आधी रात को किले से सेना निकली और 9 कोस दूर सकरने के पास रुकी  सुबह के पहर में अपने से 10 गुणी बडी सेना पर अचानक हमला किया गया अचानक हुए इस हमले से तुर्क हक्के बक्के रह गए एक टुड़की ने औरतो बच्चों को छुड़ाया और लूटी मूर्तियो को अपने कब्जे में लिया वहा दूसरी टुकड़ी ने तब तक तुर्को को उलजाये रखा इसी बीच अल्लाद्दीन भाग निकला वही अल्लाउद्दीन का भतीजा हाथ लग गया जैत्र देवड़ा ने एक वार से उसके दो टुकड़े कर दिए तुर्को की लाशें बीच गयी
कांधल ने आईजुद्दीन व नाहर नाम के दो तुर्क अधिकारीयो को मार गिराया
राजपूतो के अद्वितिय पराक्रम दिखाया

सुबह होने सब वीर किल्ले में लौट आये कान्हड़देव ने अपना वचंन पूरा किया वही कुछ मूर्तिया वीर राजपूत योद्धा और विश्वनीय चारणो और राजपुतोहितो से सोमनाथ भिजवाई वही दूसरी मूर्तियो को जालोर के मकराणे गाव में हवन द्वारा वाला स्थापित कर मंदिर बनवाया

पर कुछ ही वक़्त बाद अल्लाउदीन एक विशाल फ़ौज लेकर जालोर आया किल्ले को कई माह तक संघर्ष चला अल्लाउद्दीन ने किल्ले घेरे रखा पर अंत में एक राशन खत्म होने की वजह हजारो राजपुतानियो ने महारानी केवल दे, जैतल दे,भवल दे जौहर की रस्म पूरी की और अपने सतीत्व की रक्षा के लिए आगे में कूद पड़ी 

"गढरी परधी घेर, बैरी रा घेरा पड़या।
सत्यां काली रात ने, जौहर सूं चनण करी।।"

वही हजारो राजपूत अन्तिम सांस तक लड़े इस बारे में कहा गया


द छूटे जालोर !!"
"आभा फटे धर ऊलटे,कटे बखतरा कोर, फूटे सिर धड फड़फडे, ज
सन्दर्भ : -
कान्हड़ देव् प्रबन्ध
मुहणोत नैणसी भाग 1

Sunday, May 22, 2016

===महान राजपूत व्यक्तित्व स्व. ठाकुर मेघनाथ सिंह शिसौदिया===




मित्रों आज राजपूताने की एक महान हस्ती से आपका परिचय कराएंगे जो आधुनिक युग में राजपूतो के लिये प्रेरणास्त्रोत हैँ। इन हस्ती का नाम है ठाकुर मेघनाथ सिंह शिशोदिया जिन्हें साठा शिरोमणी भी कहा जाता है। साठा पश्चिमी उत्तर प्रदेश का गहलोत/शिशोदिया राजपूत बाहुल्य इलाका है जहाँ इनके 60 गाँव हैँ। ठाकुर मेघनाथ सिंह जी को मशहूर शिक्षाविद् ,समाज सुधारक और अपने समय के बहुत ईमानदार एवं जबरदस्त विकास कराने वाले नेता के रूप में याद किया जाता है। ग्रामीण और सामाजिक विकास में रूचि रखने के कारण उन्होंने साठा क्षेत्र के साथ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजपूत बाहुल्य क्षेत्र में अनेक शिक्षण संस्थाओ की स्थापना करी जिसमे स्कूल, कॉलेज, आई टी आई, डिप्लोमा, वोकेशनल कोर्सेज के संस्थान शामिल हैँ। इनके द्वारा उन्होंने हजारो युवाओ को रोजगार दिया। विधायक रहते हुए साठा क्षेत्र का अद्वितीय विकास कराया जिसके लिये इस क्षेत्र के सबसे बड़े व्यक्तित्व के रूप में आज भी वो याद किये जाते हैँ और उन्हें साठा शिरोमणी कहा जाता है।

ठाकुर साब का जन्म 1 अप्रैल 1913 को जिला गाज़ियाबाद में साठा क्षेत्र के रसूलपुर डासना गाँव में ठाकुर नारायण सिंह के यहाँ हुआ। उन्होंने अपनी शिक्षा काफी संघर्ष करते हुए NREC कॉलेज खुर्जा और सेंट जॉन कॉलेज आगरा से करी। छात्र जीवन के दौरान ही उन्होंने दृढ़ संकल्प ले लिया था की ना तो वो अंग्रेज़ो की कोई नौकरी करेंगे और ना ही अंग्रेज़ियत को अपनाएंगे। उन्होंने संकल्प लिया की वकील या डॉक्टर बनने की जगह इंजीनियर या शिक्षक बनूँगा और साथ ही राजपूत गौरव की हर कीमत पर रक्षा करूँगा। उनमें भारत की स्वतंत्रता, गौरव और प्रतिष्ठा के पोषण करने की भावना भी कूट कूट कर भरी हुई थी।

उन्होंने बीएससी करने के बाद इतिहास और हिंदी से परास्नातक किया और इंजीनियर बनने की जगह शिक्षक बनने में सफल हुए। सर्वप्रथम वो 1938 में मध्यप्रदेश के ग्वालियर के एक स्कूल में शिक्षक तैनात हुए जो उनके लिये हमेशा प्रेरणास्त्रोत रहा। 1940 में वो प्रिंसिपल बने और 1975 तक अपने ही डिग्री कॉलेज में प्रिंसिपल रहे। इस दौरान उन्होंने साठा क्षेत्र में शिक्षण संस्थाओ की बाढ़ ला दी। उन्होंने अपने पूरे जीवन में 75 शिक्षण संस्थाए स्थापित की जिसमे डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज, हाई स्कूल आदि के अलावा आईटीआई, पेशेवर/डिप्लोमा आदि कोर्स के लिये संस्थान शामिल हैँ। यह संस्थाए आज भी शिक्षा के प्रति स्टाफ के समर्पण और छात्रो के सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देने के लिये जानी जाती हैँ।

इन संस्थाओ ने 3 हजार से ऊपर कृषि इंस्पेक्टर पैदा किये, 3 हजार बीटीसी अध्यापक बनाए जिनकी सबकी सरकारी नौकरी लग गई और करीब 4 हजार अध्यापक, कर्मचारी और चपरासी इनके संस्थानों में काम करते हैँ जिनको सरकारी वेतन मिलता है।

ठाकुर साब ने अपने प्रत्येक संस्थान में प्रवेश के लिये जौहर, हल्दीघाटी, महाराणा प्रताप और चित्तोड़ की पढ़ाई अनिवार्य करी हुई थी क्योंकि उनका मानना था की कोई सच्चे मन से तब तक राजपूत नही हो सकता जब तक उसे इनका ज्ञान ना हो।

उनके द्वारा स्थापित किये गए कुछ संस्थान इस प्रकार है--

---डिग्री कॉलेज---
राजपूत शिक्षा शिविर pg कॉलेज(आरएसएस),पिलखुआ, गाज़ियाबाद जिसमे आर्ट्स, साइंस और कॉमर्स तीनो विभाग हैँ।

----इंटर कॉलेज----
1. राणा शिक्षा शिविर इंटर कॉलेज, धौलाना (गाज़ियाबाद)
2. उदय प्रताप इंटर कॉलेज, सपनावत (गाज़ियाबाद)
3. वत्सराज स्वतंत्र भारत इंटर कॉलेज, कलौंदा(गाज़ियाबाद)
4. राणा संग्राम सिंह इंटर कॉलेज, बिसाहदा
5. रघुनाथ सिंह स्मारक इंटर कॉलेज, आँचरु कला(बुलंदशहर)
6. कल्याणकारी इंटर कॉलेज, चाँडोक(बुलंदशहर)
7. विद्या मंदिर इंटर कॉलेज, मऊ, चिरायल(हाथरस)
8. गाँधी स्मारक इंटर कॉलेज, बझेड़ा, भरतपुर(अलीगढ़)
9. राष्ट्र सेवा सदन इंटर कॉलेज, भकरौली(बदायूं)
10. चंपा बालिका इंटर कॉलेज, धौलाना(गाज़ियाबाद)
11. महाराणा कुंभा इंटर कॉलेज, खटाना(गाज़ियाबाद)

----हायर सेकेंडरी स्कूल----
1. बप्पा रावल हायर सेकेंडरी स्कूल, शाहपुर फगोता
2. महाराणा कुंभा सर्वहितकारी हायर सेकेंडरी स्कूल, खटाना दादुपुर
3. हायर सेकेंडरी स्कूल, तलवार(बुलंदशहर)
4. सेवा सदन हायर सेकेंडरी स्कूल, सेहंदा फरीदपुर(बुलंदशहर)
5. गंगा खादर हायर सेकेंडरी स्कूल, चाउपुर, दुपटा कलां(बदायूं)
6. गंगा बांगर स्कूल, इंचोरा, खुशहालगढ़(बुलंदशहर)
7. लीलावती बाबू सिंह हायर सेकेंडरी स्कूल, राणा गढ़, पिलखुआ
8. एन आर के हायर सेकेंडरी स्कूल, रसूलपुर डासना
9. मुकंदी देवी हायर सेकेंडरी स्कूल, पवनावली, मुजफ्फरनगर

---स्थापना के बाद दूसरो के प्रबंध में दे दिए---
1. जूनियर हाई स्कूल, खेड़ा, सरधना
2. राजपूत नेशनल स्कूल, पिलखुवा(अब राजपूताना रेजीमेंट कॉलेज)
3. बी आर हाई स्कूल, समाना
4. कंचन सिंह जूनियर हाई स्कूल, सराय नीम, एटा

इनके अलावा अनेको जूनियर हाई स्कूल, प्राइमरी स्कूल और अन्य शिक्षण संस्थाए उन्होंने स्थापित की जिनका उल्लेख करने की यहाँ जरूरत नही। ना केवल साठा क्षेत्र में बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के और भी राजपूत बाहुल्य क्षेत्रों में उन्होंने संस्थाओ की स्थापना करी।

---राजनैतिक और सामजिक जीवन---
ठाकुर मेघनाथ सिंह जी राजनैतिक और सामाजिक क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। वो दो बार विधायक रहे जिस दौरान उन्होंने साठा क्षेत्र में विकास की गंगा बहा दी। 1948 से लेकर 1958 तक वो जिला परिषद के सदस्य रहे और शिक्षा, चिकित्सा आदि समिती के अध्यक्ष रहे जिस दौरान उन्होंने क्षेत्र में अनेको प्राइमरी स्कूल, भवन तथा पुल बनवाए। साथ ही जूनियर हाई स्कूल स्तर तक संस्कृत की शिक्षा सर्वप्रथम अनिवार्य करवाई जिसके बाद उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने भी उनका अनुसरण किया।

पहली बार 1962 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधायकी का चुनाव लड़े और कांग्रेस प्रत्याशी को 71 हजार के भारी अंतर से हराकर जीते जो की आज के समय भी बहुत बड़ा अंतर होता है। इस काल में उन्होंने अनेक स्थानों पर पहली बार बिजली पहुचाई। चौधरी चरण सिंह से कहकर कृषि डिप्लोमा प्राप्त छात्रो को ग्रुप 3 की नौकरी मिलना अनिवार्य करवा दिया जिससे उनके ही संस्थानों के उस वक्त के हजारो डिप्लोमाधारी युवक आज भी ऐश्वर्य की जिंदगी बिता रहे हैँ। इसके अलावा अपने संस्थानों के 2 हजार जे टी सी पास छात्रो की भी नौकरी लगवाई। इसके अलावा मसूरी-धौलाना-सपनावत मार्ग का निर्माण और रसूलपुर में नहर के पुल का निर्माण करवाया।

दूसरी बार 1974 में विधायक बने जो 77 तक रहे। इस काल में उन्होंने क्षेत्र का अद्वितीय विकास करवाया। अनेको प्रमुख सड़को का निर्माण उन्होंने करवाया जिसमे धौलाना-पिलखुवा, धौलाना- बसितपुर, शिकारपुर-खुर्जा, छजारसी-मोदीनगर आदि शामिल है। धौलाना, सपनावत, बिसाहदा और जारचा में सिंडिकैट बैंक की ब्रांच खुलवाई और धौलाना में बड़ा डाकघर और टेलीफोन लाइन बिछवाइ।

इस काल में सबसे अहम काम था क्षेत्र में एन टी पी सी की स्थापना कराना जिसने क्षेत्र की कायापलट कर दी और साठे के 10 गाँवों की आर्थिक स्थिति ऊँची कर दी। इससे क्षेत्र के हजारो युवको को रोजगार मिला। इसके लिये बनी रेल और सड़क के लिये ली गई भूमी का मुआवजा उस जमाने में 1 लाख 20 हजार रुपए दिलवाया।

---सामजिक कार्य---
राणा जी ने सामजिक क्षेत्र में भी पहल की और राजपूत समाज में कई समाज सुधारो की शुरुआत करवाई, जिनमे प्रमुख हैँ--
1. 1962 में यह प्रथा चलवाई की बारात वढाकर से ही विदा होगी, इससे पहले बारात 3 दिन तक रूकती थी।
2. सगाई के समय भेंट लेना बन्द करवाया।
3. दहेज का दिखावा बन्द करने का प्रयास किया।
4. यह भी प्रस्तावित किया की लड़की की शादी में घराती खाना ना खाएं।
5. रसूलपुर गांव की चकबंदी के समय कृषि के अयोग्य बेकार पड़ी बंजर भूमी की भी चकबन्दी करा दी जिससे कृषको को एन टी पी सी का मुआवजा मिल सका।
6. विभिन्न जातियों के सैकड़ो युवको को अपने खर्चे पर शिक्षा दिलवाई और उनकी अच्छी नौकरी लगवाई।
7. अपने संस्थानों के द्वारा क्षेत्र के हजारो लोगो को सरकारी रोजगार दिया और दिलवाया।
8. 1857 में शहीद हुए साठा चौरासी क्षेत्र के क्रान्तिकारियो के इतिहास का संकलन और प्रचार किया और उनकी याद में शहीद स्मारक का निर्माण करवाया।

---व्यक्तित्व---
निजी जीवन में भी राणा जी बहुत अनुशाषित और संयमित जिंदगी जीने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने जीवन में कभी मांस, मदिरा, पान, तंबाकू, गुटखा आदी किसी तरह का सेवन नही किया। देशी वेश भूषा और खान पान के प्रबल समर्थक थे। खान पान में दही और मठ्ठे का प्रयोग ही करते थे। वो आयुर्वेद प्रेमी और एलोपैथी से घृणा करने वाले थे। पैदल ही चलने के अभ्यासी थे, साइकिल तक पर कभी चलकर नही देखा।

निर्भीक वक्ता, अनुशाशनप्रिय, अध्यात्मवादी और चापलूसी से हमेशा घृणा करते थे। छात्रावास में गरीबी का जीवन बिताया था इसलिये गरीबी की इज्जत करते थे।

उर्दू, हिंदी और संस्कृत तीनो के ज्ञाता होने के साथ ही गीता, रामायण, महाभारत, भागवत, कुरान, सत्यार्थ प्रकाश, बाइबिल जैसे ग्रंथो के ज्ञाता या अध्ययनशील थे। गीता के अंतिम श्लोक को मनुष्य, समाज तथा देश के उत्थान के लिये मूलमंत्र मानते थे।

राणा जी राजपूत साहित्य के बहुत अच्छे जानकार थे और कट्टर देश प्रेमी थे। उनकी मान्यता थी कि देशभक्त, बलिदानी और स्वाभिमानी बनने के लिये जीवन में कम से कम एक बार चित्तोड़ और हल्दीघाटी के दर्शन जरूर करने चाहिये। इसके बिना देश धर्म से प्रेम नही हो सकता।

सुबह 4 बजे से शाम 6 बजे तक दफ्तर का काम करते थे। दफ्तर और शिक्षा के सभी कामो में पारंगत थे। अपने अंतिम समय तक भी अपने हर एक संस्थान की जानकारी उन्हें रहती थी।

अंकगणित के एक नवीन नियम की खोज भी उन्होंने की थी।

किसी लड़की की शादी में भोजन नही करते थे, लेकिन आशीर्वाद देने के लिये प्रत्येक शादी में जाते थे।

इनके इकलौते पुत्र श्री वत्सराज सिंह शिशोदिया की 1992 में मृत्यु हो गई, तभी से ये चिंतित और दुःखी रहने लगे। अंत में 6 अक्टूबर 2006 को राणा जी का स्वर्गवास हो गया।

राणा जी के अनुसार दृढ़ निश्चय, अडिग विश्वास, सतत प्रयास और मृदु व्यव्हार ही जीवन संघर्ष के अचूक हथियार हैँ और ये ही उनकी सफलता की कुंजी है।

ठाकुर मेघनाथ सिंह शिशोदिया जी ने जीवन भर प्रयत्नशील रहते हुए साठा क्षेत्र का सर्वांगीण विकास करवाया। ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैँ जब एक व्यक्ति ने अपने दम पर किसी क्षेत्र का कायापलट कर दिया हो। साठा क्षेत्र जो की एक पिछड़ा क्षेत्र माना जाता था, उसे उन्होंने अपने सतत प्रयासो से विकास की मुख्यधारा में ला खड़ा किया। शिक्षा को उन्होंने विकास का साधन बनाया और अकेले ही साठे में शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाकर विकास का पहिया घुमा दिया, ऐसा शायद ही कहीँ और हुआ हो। इसी वजह से उन्हें महामना भी कहा जाता है। क्षेत्र और समाज के विकास के लिये उनका प्रेम और उनकी प्रतिबद्धता हम सबके लिये प्रेरणास्त्रोत हैँ। खासकर आजकल के समाज के नेता उनके जीवन और कार्यो से यह सीख ले सकते हैँ कि समाज और क्षेत्र का नेतृत्व और विकास कैसे किया जाता है।

एक बार फिर से महान देशप्रेमी और समाज प्रेमी, लघु मेवाड़ के पथ प्रदर्शक , महाराणा प्रताप के परम अनुयायी, साठा शिरोमणि, स्वाभिमानी, महान शिक्षाविद् , पूर्व विधायक स्व. ठाकुर मेघनाथ सिंह शिशौदिया जी को शत शत नमन_/\_

जय राजपूताना
जय क्षात्र धर्म

राजपूताना की बेटियां सबसे आगे Girls From Rajputana.... Baisa's Lobby (Army,Sports and Politics)




🔫Sneha Shekhawat - Pilot,Indian Air Force
(Create History on date 26 jan 2012 by becoming  the 1st Indian Lady Officer who lead Indian Air Force contingent in Republic day parade)
स्नेहा शेखावत - पायलट, भारतीय वायु सेना
(26 जनवरी 2012 को इतिहास रचा. गणतंत्र दिवस परेड में भारतीय वायु सेना दल का नेतृत्व करनी वाली पहली महिला अफसर बनी )
🔫Deepika Rathore - Major,Indian Army
(Captain Deepika Rathore, 26(2012), became the Rajasthans first girl to scale Mount Everest. )
दीपिका राठौड़ - मेजर, भारतीय सेना
(भारतीय सेना की कैप्टन दीपिका राठौड़, माउंट एवरेस्ट को फ़तेह किया. ऐसा करने वाली राजस्थान राज्य की पहली लड़की बन गयी। जहा 100 में से 90 लोग वापस आ जाते है उसे रेगिस्तान से निकली एक राजपूतानी मात्र 26 वर्ष की आयु में पूरा कर आई )
🔫Swati Rathore - Captain,Indian Army
(Only woman officer in entire brigade guarding china front)
स्वाति राठौड़ - कैप्टन भारतीय सेना
(भारतीय सेना की एक मात्र महिला अफसर जो सर्वाधिक उचाई पर तैनात है. भारत चीन बॉर्डर पर दिन रात रखवाली करने वाली एक मात्र अफसर)
🔫Pooja Thakur - Wing Commandor,Indian Air Force
(Wing Commander Pooja Thakur who led the Guard of Honour US Prsdnt Barack Obama )
पूजा ठाकुर - विंग कमांडर, भारतीय वायु सेना
(राजस्थान के जयपुर के रिटायर्ड कर्नल की बेटी पूजा ने अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को गार्ड ऑफ़ ऑनर देकर इतिहास रचा. देश की प्रथम महिला जिन्होंने किसी विदेशी नेता को गार्ड ऑफ़ ऑनर दिया)
🔫Rajshree Rathore - Pilot,Indian Army
(Rajasthan’s 1st Lady Pilot)
राजश्री राठौड़ - पायलट, भारतीय सेना
(राजस्थान की प्रथम महिला पायलट ,आज देश के सर्वोच्च पायलट की श्रेणी में )
🔫Late Kiran Shekhawat, Lieutenant,Navy
(1st Indian Lady Officer who died on Duty)
स्वर्गीय किरण शेखावत - लेफ्टिनेंट, नौसेना
( भारत के इतिहास में पहली महिला अधिकारी जो ओन ड्यूटी वीरगति को प्राप्त हुयी)
🔫 Swati Shekhawat - Major,Indian Army
(Recived More than 10 Army Medal)
स्वाति शेखावत - मेजर, भारतीय सेना
(भारतीय सेना में मेजर पद पर तैनात स्वाति शेखावत ने 10 से अधिक सेना मेडल प्राप्त किये है)
🔫Captain Aniket Gaur - Indian Army(ASC) d/o Police Inspector Vijay Singh Gaur from Th. Rajgarh, Distt- Ajmer
( All India rank 7th in recruitment of Indian Army, Once Posted in Jaswantgarh at India-China border,
First position at all India boating camp,
Represented Rajasthan at Delhi RDC camp)
कैप्टन अनिकेत गौड़- भारतीय सेना(ASC)
(साधारण मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी अनिकेत गौड़ बहुत मेहनती, बुद्धिमान और दिलेर हैँ और अपनी मेहनत के बल पर आर्मी ऑफिसर की भर्ती में पूरे देश में 7वा स्थान हासिल किया और परिवार और समाज का नाम रोशन किया। इसके अलावा भारत-चीन बॉर्डर पर भी तैनात रह चुकी हैँ, अखिल भारतीय बोटिंग कैंप में प्रथम स्थान और ऐसे अनेको कीर्तिमान स्थापित कर चुकी हैँ)
🔫 Apurvi Chandela – Shooter ,Indian Team
(She won the gold medal for India in the Commonwealth Games in Glasgow)
अपूर्वी चंदेला - निशानेबाज भारतीय टीम
(देश की बेहतरीन महिला शूटर इन्होने ग्लासगो में हुए वाले राष्ट्रमंडल खेलों में भारत के लिए स्वर्ण पदक जीता)
🔫 Kanika Shekhawat - DUSU secretary,Delhi
कनिका शेखावत - डूसू सचिव, दिल्ली
(दिल्ली विश्व विधालय में सचिव राजनीती में उभरता हुआ नाम )
🔫 Girja Rathore – Pradhan Sojat,Pali
(Gold Medlist and Youngest Pradhan)
गिरजा राठौड़ - प्रधान सोजत,पाली
(साइंस में गोल्ड मेडलिस्ट और
कम उम्र में प्रधान बनने का गौरव )
🔫 Bindu Sonigara – Sarpanch ,Latada/Sadra Gram Panchyat,Pali
(Youngest Sarpanch is Rajasthan 21 yr 5 month(april 2015) and Gold Medlist also )
बिंदु सोनीगरा - सरपंच, लाटाडा/ सादड़ा ग्राम पंचायत , पाली
(राजस्थान की सबसे कम उम्र सरपंच भी 21 वर्ष 5 माह (अप्रैल 2015)राजस्थान और कॉमर्स में गोल्ड मेडलिस्ट। ।एक नया इतिहास )
🔫 Kushum Rathore – Sarpanch ,Guda Ram Singh,Pali
(Awarded from Gargi Award and she also played National Cricket)
कुसुम राठौड़ - सरपंच, गुड़ा राम सिंह, पाली
(गार्गी पुरस्कार से सम्मानित और क्रिकेट नेशनल लेवल पर खेल चुकी है और युवा सरपंच )
🔫 Chavi Rajawat – EX Sarpnach,Soda Gram Panchyat,Tonk
(that time she was India’s 1st MBA holder sapranch ,she represent india in UN )
छवि राजावत - पूर्व सरपंच , सोडा ग्राम पंचायत, टोंक
(संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी भारत के प्रथम एमबीए धारक सरपंच ,भारत की युवा नेत्री का ख़िताब से नवाजी जा चुकी दुनिया भर के मीडिया में छा चुकी छवि राजावत काई बार भारत का प्रतिनधित्व कर चुकी है )

Friday, May 20, 2016

भारतीय क्रिकेट के पितामहः महाराजा जाम साहेब रणजीत सिंह जी जाडेजा

     ===टेस्ट क्रिकेट और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने वाले प्रथम भारतीय===                      

आज हम आपका परिचय उस हस्ती से करवाएंगे जिसे भारतीय क्रिकेट का पितामहः कहलाने का गौरव प्राप्त है और साथ ही भारत के घरेलू क्रिकेट सत्र के सबसे बड़े टूर्नामेंट रणजी ट्रॉफी का नामकरण भी उनके नाम पर किया गया है। गुजरात में नवानगर रियासत के महाराजा रहे जाम साहेब रणजीत सिंह जी जाडेजा पहले भारतीय थे जिन्होंने प्रोफेशनल टेस्ट मैच और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेला। उन्हें अब तक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाजो में से एक माना जाता है। क्रिकेट की दुनिया में कई नए शॉट लाने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है। क्रिकेट की दुनिया में लेग ग्लांस शॉट का आविष्कार और उसे लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। साथ ही बैकफुट पर रहकर अटैक और डिफेन्स, दोनों तरह के शॉट लगाने का कारनामा भी दुनिया के सामने सर्वप्रथम वो ही लेकर आए।
रणजीत सिंह जी का जन्म 10 सितम्बर 1872 को नवानगर राज्य के सदोदर नामक गाँव में जाडेजा राजपूत परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम जीवन सिंह जी और दादा का नाम झालम सिंह जी था जो नवानगर के महाराजा जाम साहेब विभाजी जाडेजा के परिवार में से थे। जाम विभाजी की कोई योग्य संतान ना होने की वजह से उन्होंने कुमार रणजीत सिंह जी को गोद ले लिया और अपना उत्तराधिकारी बना दिया। लेकिन बाद में विभाजी के एक संतान होने की वजह से उत्तराधिकार को लेकर विवाद उतपन्न हो गया जिसकी वजह रणजीत सिंह जी को कई साल संघर्ष करना पड़ा।
कुमार श्री रणजीत सिंह जी को राजकोट के राजकुमार कॉलेज में शिक्षा लेने के लिये भेजा गया। वहां स्कूली शिक्षा के साथ उनका क्रिकेट से परिचय हुआ। वो कई साल कॉलेज की क्रिकेट टीम के कप्तान रहे। उनकी पढाई में योग्यता से प्रभावित होकर उन्हें आगे की पढ़ाई के लिये इंग्लैंड की कैम्ब्रिज़ यूनिवर्सिटी में पढ़ने भेजा गया। वहॉ पर रणजीत सिंह जी की रूचि क्रिकेट खेलने में बढ़ने लगी जिसकी वजह से वो शिक्षा पर ध्यान नही दे पाए। उन्होंने पूरी तरह क्रिकेट को अपना कैरियर बनाने का निर्णय लिया। पहले वो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की ओर से खेला करते थे। इसके बाद वे ससेक्स से जुड़ गए और लॉर्डस में पहले ही मैच में 77 और 150 रन की पारियां खेली। काउंटी क्रिकेट में बल्ले से धमाल के बाद उन्हें इंग्लैंड की राष्ट्रीय टीम में चुन लिया गया और 1896 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ रणजीत सिंह ने पहला टेस्ट खेला। इस मैच में उन्होंने 62 और 154 नाबाद की पारी खेली। उल्लेखनीय बात है कि इस टेस्ट की दूसरी पारी में रणजीत सिंह के बाद दूसरा सर्वाधिक स्कोर 19 रन था। बल्ले से उनके इस प्रदर्शन की न केवल इंग्लैण्ड बल्कि ऑस्ट्रेलिया में भी जमकर तारीफें हुई। उन्होंने लगभग चार साल क्रिकेट खेला। इसमें उन्होंने 15 टेस्ट में 44.95 की औसत से 989 रन बनाए। इसमें दो शतक और छह अर्धशतक भी शामिल है। प्रथम श्रेणी क्रिकेट में रणजीत सिंह ने 307 मैच में 72 शतकों और 109 अर्धशतकों की मदद से 56.37 की औसत से 24692 रन बनाए। उनकी बल्लेबाजी औसत 1986 तक भी इंग्लैंड में खेलने वाले किसी बल्लेबाज की सबसे बढ़िया औसत थी।
हालांकि इस दौरान उन्हें नस्लभेद का भी शिकार होना पड़ा। लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के बाद भी उन्हें भारतीय होने के कारण राष्ट्रीय टीम में शामिल नही किया जाता था। उस वक्त अन्तर्राष्टीय क्रिकेट सिर्फ इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच में खेला जाता था। एक भारतीय को अंग्रेज़ो के साथ क्रिकेट खेलने के लायक नही समझा जाता था। लेकिन रणजीत सिंह जी अपने अच्छे खेल की वजह से दर्शको में इतने लोकप्रिय हो गए थे की अंग्रेज खेल प्रशासक उन्हें ज्यादा दिन अनदेखा नही कर सके।
नवानगर में घरेलू जिम्मदारियों और उत्तराधिकार में विवाद के चलते उन्हें भारत लौटना पड़ा। इसके कारण उनका क्रिकेट कॅरियर प्रभावित हुआ और लगभग खत्म सा हो गया। उन्होंने अंतिम बार 1920 में 48 साल की उम्र में क्रिकेट खेला। लेकिन बढ़े हुए वजन और एक आंख में चोट के चलते वे केवल 39 रन बना सके। निशानेबाजी के दौरान उनकी एक आंख की रोशनी चली गई थी।
रणजीत सिंह जी को अब तक के विश्व के सर्वकालिक महान बल्लेबाज में से एक माना जाता है। विस्डन पत्रिका ने भी उन्हें 5 सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ियो में जगह दी थी। नेविल्ले कार्डस ने उन्हें "midsummer night's dream of cricket" कहा है। उन्होंने यह भी कहा है कि जब रणजीत सिंह खेलने के लिये आए तो जैसे पूर्व दिशा से किसी अनजाने प्रकाश ने इंग्लैंड के आकाश को चमत्कृत कर दिया। अंग्रेजी क्रिकेट में वो एक नई शैली लेकर आए। उन्होंने बिलकुल अपरंपरागत बैटिंग तकनीक और तेज रिएक्शन से एक बिलकुल नई बल्लेबाजी शैली विकसित कर के क्रिकेट में क्रांति ला दी। पहले बल्लेबाज फ्रंट फुट पर ही खेलते थे, उन्होंने बैकफुट पर रहकर सब तरह के शॉट लगाने का कारनामा सबसे पहली बार कर के दिखाया। उनको अब तक क्रिकेट खेलने वाले सबसे मौलिक stylist में से एक के रूप में जाना जाता है। उनके समय के क्रिकेटर CB Fry ने उनकी विशिष्टता के लिये उनके जबरदस्त संतुलन और तेजी जो एक राजपूत की खासियत है को श्रेय दिया है।
टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में एक ही दिन में दो शतक मारने का उनका 118 साल पुराना रिकॉर्ड अब तक कोई नही तोड़ पाया है।
शुरुआत के नस्लवाद के बावजूद रणजीत सिंह जी इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के दर्शको में अत्यधिक लोकप्रिय क्रिकेटर बन गए थे।
1933 में उनका जामनगर में देहांत हो गया। उनके बारे में सर नेविले कार्डस ने ही लिखा कि,"जब रणजी ने क्रिकेट को अलविदा कहा तो खेल से यश और चमत्कार हमेशा के लिए चला गया।"
क्रिकेट में उनके योगदान को देखते हुए पटियाला के महाराजा भूपिन्दर सिंह ने उनके नाम पर 1935 रणजी ट्रॉफी की शुरूआत की। जो बाद में भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता बन गई। उनके भतीजे कुमार श्री दलीपसिंहजी ने भी इंग्लैण्ड की ओर से क्रिकेट खेला। उनके नाम पर दलीप ट्रॉफी की शुरूआत हुई।
नवानगर के शाशक के रूप में भी उनको राज्य का विकास करने, पहली बार रेल लाइन बिछाने, सड़के बनवाने, आधुनिक सुविधाओ वाला एक बंदरगाह बनवाने और राजधानी को विकसित करवाने का श्रेय दिया जाता है।
महाराजा जाम साहेब रणजीत सिंह जी जाडेजा को हमारा नमन_/\_

नकली यदुवंशियो की असलियत

                                             


असली यदुवंशी जादोन क्षत्रियो की एक रियासत है करौली। करौली रियासत के चिह्न् पर गाय का चित्र बना हुआ है। करौली के यदुवंशी क्षत्रिय अपने नाम के साथ सिंह की जगह पाल लगाते हैँ सिर्फ इसलिये की यदुवंशी क्षत्रिय श्री कृष्ण की परंपरा का पालन करते हुए गौ पालक और गौ संरक्षक होते हैँ। उनमे गौ रक्षा के लिये इतना आग्रह होता है की वो गौ भक्षक सिंह की जगह पाल का उपयोग करते हैँ। पूरे ब्रज क्षेत्र में जादौन यदुवंशी राजपूत कृष्ण के समय से आज तक हजारो साल से राज कर रहे हैँ और आज भी इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा मिलते हैँ। यदुवंशियो की दूसरी राजधानी द्वारका के नजदीक भी आज भी सबसे ज्यादा यदुवंशी राजपूतो की ही जाडेजा, चुडासमा, सरवैया, रायजादा आदि शाखाओ के राजपूत हैँ जिनके जामनगर, कच्छ, राजकोट आदि अनेक रियासते हैँ। राजस्थान के जैसलमेर में यदुवंशी भाटी राजपूतो की रियासत है जिनके पास श्री कृष्ण का छत्र है। यदुवंशी भाटी राजपूत देश भर में मिलते हैँ। इनके अलावा जाधव, हैहय, कलचुरी, छोंकर, बरेसरी, बनाफर, पोर्च आदि यदुवंशी राजपूतो की देश भर में अनेक शाखाए है। इन सब यदुवंशी क्षत्रियो के लिये गौ रक्षा आज भी बहुत महत्वपूर्ण है। अनेको यदुवंशी राजपूतो ने मध्यकाल में गौ रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति दी है। इसके अलावा हरयाणा में यदुवंशी अहीर नाम की जाती मिलती है जिन्हें पहले से ही यदुवंशी कहा जाता रहा है। इनमे भाटी, जादोन के अलावा क्षत्रियो के तंवर, सोलंकी, सिसोदिया, मडाढ़ आदि वंश भी वैवाहिक संबंधो के कारण मिल गए हैँ। ये शारीरिक और मानसिक रूप से क्षत्रिय राजपूतो के करीब हैँ और हिंदुत्व वादी हैँ। दूसरी तरफ 1920 के दशक से उत्तर प्रदेश और बिहार में कुछ ग्वाला जातियो के लोग अपने को जबरदस्ती यदुवंशी बताकर यादव लिखने लगे हैँ। उससे पहले इन्हें सिर्फ ग्वाला, घोसी, कम्हरिया आदि नामो से जाना जाता था। इनका काम भी सिर्फ वो ही था। लेकिन जिस तरह लोमड़ी शेर की खाल पहनने से शेर नही बन जाती उसी तरह ये लोग नाम के पीछे यादव लगा के कितना भी अपने को यदुवंशी कहे, इनकी हरकतों, सोच और विचारधारा से इनकी असलियत सामने आ ही जाती है। बिहार में इनका एक नेता लल्लू यादव है जिसने आज तक सिर्फ हिन्दू विरोध की राजनीति की है। ये खुलेआम अपनी जाती की सभा में कहता है की इनके यहां गौ मास खाना आम बात है, गौ मास खाने में कोई दिक्कत नही। इस हिन्दू विरोधी और गौ मास खाने वाले नेता का उसकी जाती के लोग अंध समर्थन करते हैँ। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में इसी जाती का दूसरा नेता जिसे मुल्ला मुलायम कहा जाता है, घोर मुल्ला वाद के बावजूद इसकी अपनी जाती भी इसका अंध समर्थन करती है। इसके राज में उत्तर प्रदेश गायो का सबसे बड़ा क़त्ल खाना बना हुआ है। शहर शहर गाँव गाँव में सरकार के समर्थन से गाय काटी जाती हैँ। गौ हत्या के विरुद्ध कार्यवाई करने के बजाए जो गौ हत्या का विरोध करे उस पर मुकदमा कर दिया जाता है। उत्तर प्रदेश में गौ पालको के आज सबसे बुरे हालात है जितने कभी मुगल शासन में भी नही रहे। जबकि कसाई आज सबसे ज्यादा मालामाल है। ये सिर्फ इन फर्जी यदुवंशियो के राज का नतीजा है। दोनों राज्यो में ही, भागवद का उपदेश देने वाले भगवान कृष्ण के वंशज होने का दावा करने वाले इन फर्जी यादवो की सरकारे जंगलराज के लिये जानी जाती हैँ। अभी बिसाहड़ा कांड में गौ हत्या के आरोपियों को इसी उत्तर प्रदेश की सरकार ने लखनऊ बुलाकर 5 स्टार ट्रीटमेंट दिया, 45 लाख रुपए देने, पूरे कुनबे को 5-5 लाख रुपए देने, नौकरी देने की घोषणा की जाती है और दूसरी तरफ गोली लगने से घायल गौपालक राहुल यादव को मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। इसी जाती के छात्र नेता जेएनयू में बीफ पार्टी का आयोजन करते हैँ, दुर्गा माँ को गाली देकर अपने को महिषासुर का वंशज बताते हैँ ये कहकर की ये लोग महिष(भैंसा) चराते हैँ और दशहरा के दिन जेएनयू में महिषासुर की पूजा करते हैँ लेकिन फिर भी अपने नाम के पीछे यादव लगाते हैँ। जो ग्वाला कहलाने लायक भी नही हैँ वो आज यदुवंशी बने हुए हैँ। यहां तक की जातिवाद के विरोध की बात करने वाले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी इनके वोट के लिये इन्हें यदुवंशी बनाने से पीछे नही हटते। उनकी हर दूसरी सभा में इन लोगो के लिये यदुवंशी का जुमला उछल जाता है। यहां तक की दिग्विजय सिंह जैसा नेता तो सब जानते हुए भी वोट के लिये इन्हें यदुवंशी बता देता है। लेकिन ये कौन से यदुवंशी हैँ जो गौ मास खाते हैँ? ये कौन से यदुवंशी हैँ जो गौ रक्षा की जगह गाय को कटवाने में यकीन रखते हैँ? ये कौन से यदुवंशी है जो मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और अयोध्या में राम जन्मभूमि आंदोलन के समर्थन की जगह विरोध में खड़े होते हैँ? ये कौन से यदुवंशी हैे जो कृष्ण की तरह आदर्श शासन करने की बजाए सिर्फ जंगलराज देने के ही लायक हैँ? ये कौन से यदुवंशी हैँ जो एक क्षत्रिय की तरह समाज के सभी वर्गो का एक समान कल्याण करने की बजाए घोर जातिवाद और परिवारवाद में यकीन रखते हैँ जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में मिलना मुश्किल है? ये कौन से यदुवंशी हैँ जिनके लिये हिंदुत्व से बढ़कर जातिवाद है और जिनके वोट के लिये नरेंद्र मोदी को भी जातिवाद पर उतरना पड़ता है? ये कौन से यदुवंशी है जो अपने को यदुवंशीय क्षत्रिय श्री कृष्ण का वंशज कहने के बाद भी पिछड़ो का अगुवा मानते हैँ? इन नकली यदुवंशियो की असलियत दुनिया के सामने लाना बहुत जरुरी है जो यादव लगाकर यदुवंशी क्षत्रियो और श्री कृष्ण को बदनाम कर रहे हैँ। इसके लिये ये पोस्ट ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ।

Tuesday, May 10, 2016

1857 स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत करने वाले राजपूत Rajputs who started freedom struggle of 1857



1857 का स्वाधीनता संग्राम प्रमुखतः एक सैनिक विद्रोह था. सैनिको ने ही इस विद्रोह की शुरुआत की थी और बढ़चढ़कर इसमें भाग लिया था. अपितु सैनिक ही इस विद्रोह की रीड थे और गंभीरता से अंग्रेज हुकूमत को उखाड़ने के लिए प्रयासरत थे. अधिकतर सैनिको ने विद्रोह कर अपने घर जाने के बजाए(जो की वो आसानी से कर सकते थे और ज़िंदा बचे रहते) अंत तक युद्ध करना स्वीकार किया और लड़ते हुए शहीद हुए.

कई जाती समूहों ने इस विद्रोह में सिर्फ लूटपाट की जिन्हें खुद विद्रोही सैनिको ने सजाए भी दी और कइयो ने व्यक्तिगत कारणों से विद्रोह किया और उनके नाम इतिहास में क्रांतिकारियों में अमर हो गए. लेकिन जिन लाखो सैनिको ने बिना किसी प्रलोभन के निस्वार्थ भाव और निडरता से अभावो में भी अंग्रेजो से युद्ध किया उनमे से बहुत ही कम सैनिको के नाम लोगो को पता है. लाखो सैनिक अपने घरो से दूर गुमनाम मौत मरे जिनकी लाशो को भी उचित सम्मान ना मिला. हजारो सैनिको ने लड़ते हुए वीरता की अद्भुत मिसाले पेश करी लेकिन इनके नाम पते कभी इतिहास में जगह नही बना पाए.

इन सैनिको में अधिकतर उत्तर प्रदेश विशेषकर अवध, बिहार के भोजपुर क्षेत्र के राजपूत, ब्राह्मण और मुसलमान थे. बगावत करने वाले सैनिको में सबसे बड़ा धड़ा अवध के बैसवाड़ा, पूर्वांचल, बिहार के शाहाबाद क्षेत्र के राजपूतो का था. 1857 में सबसे भीषण लड़ाई इन्ही क्षेत्रो में लड़ी गई थी. यहा का हर एक सक्षम राजपूत हथियार उठाए हुए था. यहा स्वाधीनता संग्राम का वास्तविक रूप देखने को मिला. अंग्रेजो को विद्रोह कुचलने में सबसे ज्यादा मुश्किलें इन्ही क्षेत्रो में आई. इसका कारण यहा से बड़ी संख्या में भर्ती होने वाले सैनिको का बगावत करना था. जब सैनिको ने बगावत करी तो उनके गाँव में रहने वाले भाई बांधवों ने भी हथियार उठा लिए. वीर कुंवर सिंह जी और राणा बेनी माधव सिंह की सेना में अधिकतर लोग इन क्षेत्रो के बागी सैनिक थे. जगह  जगह जाकर इन सैनिको ने क्रांति की अलख जगाई. राजाओ, जमींदारों को संग्राम में कूदने के लिए प्रेरित किया और उनको नेता बनाकर उनकी सेना में शामिल हुए. अंग्रेजो को सबसे भीषण प्रतिरोध इन्ही सैनिको से युद्धों में झेलना पड़ा जो हार निश्चित होने के बाद भी हथियार डालने की बजाए मरते दम तक लड़े. दिल्ली की घेराबंदी इसका उदाहरण है जिसमे सुदूर पूर्वांचल से आए सैनिक हार निश्चित होने के बाद भी अंतिम सांस तक लड़े. इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरयाणा से भर्ती होने वालो में रांघढ़(मुस्लिम राजपूत) सबसे प्रमुख थे.  इन क्षेत्रो में इन मुस्लिम राजपूतो ने ही सबसे मुखर विद्रोह किया था. 

इन लाखो सैनिको के नाम इतिहास में गुम हो गए. इनके कुछ नेताओ के नाम पता है लेकिन उनका भी पता ठिकाना नही पता. हर साल हर जिले कसबे में सैकड़ो क्रांतिकारियों का नाम लेकर उन्हें श्रद्धांजली दी जाती है लेकिन 1857 के इन वास्तविक नायको को आज तक किसी ने याद नही किया क्यूकी वो सभी गुमनाम शहीद थे. लेकिन संयोग से मेरठ में जिन सैनिको ने सर्वप्रथम विद्रोह कर चिंगारी भड़काई थी, उनके नाम इतिहास में दर्ज हैं.

24 अप्रेल 1857 को मेरठ में 3 लाइट कैवेलरी के 85 जवानों ने परेड में चर्बीयुक्त कारतूसो का इस्तमाल करने से मना कर दिया. बार बार दबाव डालने के बाद भी आज्ञा की अवहेलना करने पर इन जवानो को तुरंत डिसमिस कर के जेल में डाल दिया गया और इनपर कोर्ट मार्शल की कार्यवाई शुरू की गई जिसके बाद इन्हें कठोर सजा दी जानी थी. इनके इस कृत्य से इनके बाकी साथियो में हलचल मच गई और उन्होंने भी अपनी बारी आने पर कारतूस लेने से इनकार कर दिया. अंत में 10 मई 1857 की शाम को भारतीय सैनिको का आक्रोश का लावा फूट गया और 20 नेटिव इन्फेंट्री और 11 नेटिव इन्फेंट्री के जवानों ने अपने अफसरों पर गोली चलाकर खुले विद्रोह की शुरुआत कर दी. 3 लाइट कैवेलरी के जवान भी अपने घोड़ो पर सवार होकर जेल से अपने साथियो को आजाद कराने के लिए निकल पड़े. वहा शहर कोतवाल ने डर कर कोई विरोध नही किया और सैनिको को चाबिया पकड़ा दी. सैनिको ने अपने 85 साथियो के साथ जेल के बाकी 1200 कैदी भी आजाद करा लिए. 11 मई को इन क्रांतिकारी सैनिको ने दिल्ली पहुचने के बाद 12 मई को दिल्ली पर अधिकार कर मुग़ल सम्राट बहादुरशाह द्वितीय को सम्राट घोषित कर दिया और उन्हें अंग्रेजो के विरुद्ध बगावत करने के लिए बाध्य किया. इसकी सूचना मिलते ही शीघ्र ही विद्रोह लखनऊ, इलाहाबाद, कानपुर, बरेली, बनारस, बिहार तथा झांसी में भी फैल गया. 3 लाइट कैवेलरी के जवानों ने अकेले दम पर एक सैन्य विद्रोह को स्वाधीनता आन्दोलन में तब्दील कर दिया.


इस 3 लाइट कैवेलरी में अधिकतर उत्तर प्रदेश के राजपूत और हरयाणा और  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रांगड़(मुस्लिम राजपूत) थे. इनमे से अधिकतर लड़ते हुए शहीद हो गए या फिर नेपाल की तराई में बिमारी और भूख से मारे गए. जो कुछ लोग वापिस अपने गाँव पहुचे उन्हें स्वीकार नही किया गया. जिन 85 जवानों ने सर्वप्रथम चर्बीयुक्त कारतूस लेने से मना कर इस स्वाधीनता संग्राम की शुरुआत की, उन सभी के नाम उपलब्ध हैं.

इन 85 सैनिको में 36 हिन्दू थे जिनमे 34 राजपूत थे बाकी मुसलमान थे जिनमे अधिकतर रांगड़ थे. इन सैनिको के नाम इस प्रकार हैं--

शीतल सिंह
मथुरा सिंह
नारायण सिंह
लाल सिंह
शिवदीन सिंह
बिशन सिंह
बलदेव सिंह
माखन सिंह
दुर्गा सिंह प्रथम
दुर्गा सिंह द्वितीय
जुराखन सिंह प्रथम
जुराखन सिंह द्वितीय
बरजौर सिंह
द्वारका सिंह
कालका सिंह
रघुबीर सिंह
बलदेव सिंह
दर्शन सिंह
मोती सिंह
हीरा सिंह
सेवा सिंह
काशी सिंह
भगवान् सिंह
शिवबक्स सिंह
लक्ष्मण सिंह
रामसहाय सिंह
रामसवरण सिंह
शिव सिंह
शीतल सिंह
मोहन सिंह
इन्दर सिंह
मैकू सिंह
रामचरण सिंह
दरियाव सिंह
मातादीन
लक्षमन दुबे
शेख पीर अली
अमीर कुदरत अली
शैख़ हुस्सुनूदीन
शैख़ नूर मोहम्मद
जहाँगीर खान
मीर मोसिम अली
अली नूर खान
मीर हुसैन बक्स
शैख़ हुसैन बक्स
साहिबदाद खान
शैख़ नंदू
नवाब खान
शैख़ रमजान अली
अली मुहम्मद खान
नसरुल्लाह बेग
मीराहिब खान
नबीबक्स खान
नद्जू खान
अब्दुल्लाह खान
इयासैन खान
जबरदस्त खान
मुर्तजा खान
अजीमुल्लाह खान
कल्ला खान
शैख़ सदूलाह
सलारबक्स खान
शैख़ राहत अली
इमदाद हुसैन
पीर खान
शैख़ फजल इमाम
मुराद शेर खान
शैख़ आराम अली
अशरफ अली खान
खादुर्दाद खान
शैख़ रुस्तम
मीर इमदाद अली
शैख़ इमामबक्स
उस्मान खान
मक़सूद अली खान
शैख़ घसीबक्स
शैख़ उमेद अली
अब्दुल वहाब खान
पनाह अली खान
शैख़ इजाद अली
विलायत अली खान
शैख़ मुहम्मद एवाज़
फ़तेह खान
शैख़ कासिम अली




सन्दर्भ - 
1. उत्तर प्रदेश में स्वतंत्रता संग्राम, ए ए रिजवी
2.A History of British Cavalry 1816-1919: Volume 2: 1851-1871
3. http://www.defencejournal.com/2001/may/forgotten.htm

Sunday, May 8, 2016

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप, महानतम स्वतंत्रता सेनानी क्यों? Why maharana pratap, the greatest ever freedom fighter?



वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप , राष्ट्रभक्तो  के आदर्श
maharana pratap, the greatest ever freedom fighter

आजकल कुछ लोग महाराणा प्रताप की लोकप्रियता पर सवाल उठाते हैं, उनको नायक बताए जाने पर सवाल उठाते हैं, उनको भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कहने पर सवाल करते हैं, उनकी वीरता पर सवाल करते हैं, वो कहते हैं कि एक छोटे से राज्य के छोटे से राजा को इतना सम्मान क्यों? एक छोटा से राज्य का राजा अकबर से महान क्यों? जिनको भी इस तरह की शंकाए हैँ उन्हें यह पोस्ट  जरूर पढ़ाएं--

भारत के अंग्रेजो से स्वतंत्रता के आंदोलन में क्रान्तिकारियो के लिये मेवाड़ की धरती, चित्तौड़गढ़ और हल्दीघाटी तीर्थस्थल बन चुके थे। क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के हर सदस्य के लिये मेवाड़ की तीर्थ यात्रा कर चित्तोड़ के विजय स्तम्भ के नीचे शपथ लेना अनिवार्य था। भारतवर्ष से देशभक्त, क्रन्तिकारी हल्दीघाटी की मिट्टी का तिलक करने आते थे। वस्तुतः अंग्रेज़ो की दासता से मुक्ति दिलाने के लिये महाराणा प्रताप के नाम ने जादू का काम किया। महाराणा प्रताप विशाल ब्रितानी साम्राज्य से जूझते राष्ट्रभक्तो के लिये आदर्श और प्रेरणापुंज थे।

कर्नल टॉड ने ही लिखा है कि "अरावली पर्वत श्रृंखला का कोई पथ ऐसा नही है जो प्रताप के किसी कार्य से पवित्र ना हुआ हो- किसी शानदार विजय या उससे भी शानदार पराजय से। हल्दीघाटी मेवाड़ की थर्मोपल्ली है और दिवेर का मैदान उसकी मैराथन है।"

महाराणा प्रताप के सबसे बड़े प्रशंसक और अनुयायी, महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी पत्रिका 'प्रताप' का पहला अंक महाराणा प्रताप को समर्पित करते हुए लिखा था की "महान् पुरुष, निस्‍संदेह महान्, पुरुष। क्या भारतीय इतिहास के किसी खून में इतनी चमक है? स्‍वतंत्रता के लिए किसी ने इतनी कठिन परीक्षा दी? जननी जन्‍मभूमि के लिए किसने इतनी तपस्‍या की? देशभक्‍त, लेकिन देश पर अहसान जताने वाला नहीं, पूरा राजा, लेकिन स्‍वेच्‍छाचारी नहीं। उसकी उदारता और दृढ़ता का सिक्‍का शत्रुओं तक ने माना। शत्रु से मिले भाई शक्तिसिंह पर उसकी दृढ़ता का जादू चल गया। अकबर का दरबारी पृथ्‍वीराज उसकी कीर्ति गाता था। भील उसके इशारे के बंदे थे। भामाशाह ने उसके पैरों पर सब कुछ रख दिया। मानसिंह उससे नजर नहीं मिला सकता था। अकबर उसका लोहा मानता था। अकबर का दरबारी खानखाना उसकी तारीफ में पद्य रचना करना अपना पुण्‍य कार्य समझता था। जानवर भी उसे प्‍यार करते थे और घोड़े चेतक ने उसके ऊपर अपनी जान न्‍यौछावर कर दी थी। स्‍वतंत्रता देवी का वह प्‍यारा था और वह उसे प्‍यारी थी। चित्‍तौड़ का वह दुलारा था और चित्‍तौड़ की भूमि उसे दुलारी थी। उदार इतना कि बेगमें पकड़ी गयीं और शान-सहित वापस भेज दी गयीं। सेनापति फरीद खाँ ने कसम खायी कि प्रताप के खून से मेरी तलवार नहायेगी। प्रताप ने उस सेनापति को पकड़ कर छोड़ दिया। अपने से कहीँ विशाल और ताकतवर साम्राज्य को ना केवल चुनौती देकर बल्कि सफलतापूर्वक अपना राज्य वापिस जीतकर देश के सबसे ताकतवर बादशाह का घमंड चूर चूर कर दिया"

गणेश शंकर विद्यार्थी जी आगे लिखते हैँ- "प्रताप! हमारे देश का प्रताप! हमारी जाति का प्रताप! दृढ़ता और उदारता का प्रताप! तू नहीं है, केवल तेरा यश और कीर्ति है। जब तक यह देश है, और जब तक संसार में दृढ़ता, उदारता, स्‍वतंत्रता और तपस्‍या का आदर है, तब तक हम क्षुद्र प्राणी ही नहीं, सारा संसार तुझे आदर की दृष्टि से देखेगा। संसार के किसी भी देश में तू होता, तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्‍योछावर करते। अमरीका में होता तो वाशिंगटन और अब्राहम लिंकन से तेरी किसी तरह कम पूजा न होती। इंग्‍लैंड में होता तो वेलिंगटन और नेल्‍सन को तेरे सामने सिर झुकाना पड़ता। स्‍कॉटलैंड में बलस और रॉबर्ट ब्रूस तेरे साथी होते। फ्रांस में जोन ऑफ आर्क तेरे टक्‍कर की गिनी जाती और इटली तुझे मैजिनी के मुकाबले में रखती। लेकिन हाँ! हम भारतीय निर्बल आत्‍माओं के पास है ही क्‍या, जिससे हम तेरी पूजा करें और तेरे नाम की पवित्रता का अनुभव करें! एक भारतीय युवक, आँखों में आँसू भरे हुए, अपने हृदय को दबाता हुआ लज्‍जा के साथ तेरी कीर्ति गा नहीं-रो नहीं, कह-भर लेने के सिवा और कर ही क्‍या सकता है?"

भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी प्रताप सही में भारत में प्रबल स्वतंत्रता की भावना के प्रतीक हैँ। सैकड़ो सालो से भारत के हर एक स्वतंत्रता प्रेमी एवम् स्वाभिमानी व्यक्ति के आदर्श रहे हैँ। अपने जीवनकाल में ही बिना कोई नया राज्य जीते वो देश भर में जन जन के नायक बन चुके थे। उनकी कीर्ति उनके विरुद्ध लड़ने वाले मुग़ल सैनिको ने ही देश के कोने कोने में फैला दी थी। मेवाड़ का सिसौदिया वंश सैकड़ो साल से भारत के हिन्दुओ को संबल प्रदान करता रहा था, उन्हें नेतृत्व देता रहा था, गया और प्रयाग जैसे तीर्थो की मुक्ति के लिये लड़ता रहा था, उन्हें हिंदुआ सूर्य की उपाधि दी गई थी।  पूरा देश महाराणा प्रताप के संघर्ष को टकटकी लगाए देख रहा था। मुगल सल्तनत सिर्फ इतना चाहती थी की मेवाड़ के राणा सिर्फ एक बार उसकी अधीनता स्वीकार कर ले, इसके  लिए वो इतना प्रलोभन देने और झुकने को तैयार थे जो कभी किसी को नही दिया गया लेकिन प्रताप को पता था की वो पूरे देश के हिन्दुओ के स्वाभिमान के प्रतीक हैं। वो सिर्फ एक छोटे राज्य के राजा नही बल्कि मेवाड़ के महाराणा और हिंदुआ सूर्य होने के नाते उनके उपर बड़ी जिम्मेदारी थी. उन्होंने लाखो कष्ट सहे लेकिन किसी भी कीमत पर झुकना मंजूर नही किया। क्योंकि वो सिर्फ राज्य के लिये नही बल्कि देश के स्वाभिमान के लिये लड़ रहे थे।

स्वाधीनता और स्वाभिमान के इस संघर्ष में मेवाड़ की भूमि ने जो सहा उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। दशको तक मेवाड़ में अन्न का दाना नही उपजा। पूरा मेवाड़ युद्ध का मैदान बना हुआ था। सब तरफ भुखमरी और मार काट थी, ऐसे में सब साथ छोड़ जाते हैं लेकिन मेवाड़ ने प्रताप का साथ कभी नही छोड़ा। मेवाड़ की जनता प्रताप के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही। कभी कोई शिकवा नही किया। ऐसी स्वामिभक्ति और प्रतिबद्धता सिर्फ प्रताप जैसे अद्वितीय व्यक्तित्व का स्वामी ही कमा सकता है जिसकी आभा से उसके शत्रु भी उसके कायल हो जाते थे।

महाराणा प्रताप की कहानी सैकड़ो सालो तक जन जन में लोकप्रिय रही। मेवाड़ से सुदूर क्षेत्रो में शायद ही कोई होता था जो प्रताप, मेवाड़, चित्तोड़, चेतक, भामाशाह आदि को ना जानता हो। हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास के मानको की दृष्टि से बहुत ही छोटा युद्ध था लेकिन उसकी प्रसिद्धि इतनी हुई की भारत में शायद ही कोई हो जिसने हल्दीघाटी के बारे में ना सुना हो। यहां तक की देश में कई जातियां और उपजातिया जिनका प्रताप, राजपूत जाती, चित्तोड़ या मेवाड़ तक से कभी कोई संबंध ना रहा हो वो भी किसी ना किसी तरह अपने को इस संघर्ष से जोड़ने की कोशिश करती रही।

भगवान राम के वंश में जन्मे महाराणा प्रताप ने त्याग, बलिदान, स्वाभिमान, स्वतंत्रता के प्रति असीम आग्रह का जो आदर्श प्रस्तुत किया उसकी मिसाल दुनिया के किसी इतिहास में मिलना मुश्किल है। मेवाड़ कोई सूदूर क्षेत्र नही था और न ही भौगोलिक परिस्थितिया बहुत ज्यादा विषम लेकिन पूरी सल्तनत की फ़ौज लगाकर भी मुगल प्रताप को झुका नहीं पाए और अंत में उनकी जिजीविषा के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े, इसीलिए प्रताप को महान कहा जाता है। जिन लोगो को उनकी महानता पर शंका है उनका ऐतिहासिक ज्ञान निश्चित ही बहुत कम है। गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने ठीक ही लिखा था की प्रताप अगर किसी और देश में होता तो उसे लिंकन, वेलिंगटन, मेजिनी, जोआन ऑफ़ आर्क जैसा सम्मान मिलता लेकिन यह देश शायद प्रताप जैसे वीरो के लायक ही नही है।

देश भक्ति, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, बलिदान, शौर्य, पराक्रम, सहिष्णुता के प्रतीक, क्षत्रिय कुलभूषण, हिंदुआ सूरज, एकलिंगजी के दीवान, मेवाड़ के गौरव महाराणा प्रताप को उनके 476वी जयंती  पर एक बार फिर से हमारा शत शत नमन_/\_


अमर स्वतंत्रता सेनानी, शहीद महावीर सिंह राठौर Mahaveer singh rathore, the great freedom fighter

अमर स्वतंत्रता सेनानी, शहीद महावीर सिंह राठौर जी को शत शत नमन _/\_

कृप्या एक बार पूरा पढ़े और शेयर जरूर करें।

16 सितंबर 1904 को उत्तर प्रदेश के एटा जिले के राठौर राजपूतो के ठिकाने राजा का रामपुर के शाहपुर टहला (अब कासगंज जिला) में ठाकुर देवी सिंह जी के यहाँ जन्मे महावीर सिंह ने एटा के राजकीय इंटर कॉलेज से पढाई करने के बाद आगे की पढाई के लिये कानपुर के DAV कॉलेज में दाखिल लिया। महावीर सिंह जी को घर से ही देशभक्ति की शिक्षा मिली थी। कानपुर में इनको क्रान्तिकारियो का सानिध्य मिला और ये पूरी तरह अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष में कूद पड़े। उनके पिता को भी जब इसका पता चला तो उन्होंने कोई विरोध करने की जगह अपने पुत्र को देश के लिये बलिदान होने के लिये आशीर्वाद दिया। भगत सिंह जैसे अनेक क्रांतिकारी अंग्रेज़ो से छिपने के लिये उनके गाँव के घर में ही रुकते थे। भगत सिंह खुद 3 दिन उनके घर रुके थे।

काकोरी कांड और सांडर्स कांड में शामिल होने के बाद वो अंग्रेज़ो के लिये चुनौती बन गए थे। उन्होंने सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से निकालने में सक्रीय भूमिका निभाई थी। अपने खिलाफ अंग्रेज़ो के सक्रिय होने के बाद वो भूमिगत होकर काम करने लगे। अंत में 1929 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें अन्य क्रान्तिकारियो के साथ काला पानी की सजा सुनाई गई।

बलिदान--
जैल में क्रान्तिकारियो के साथ बहुत बुरा बर्ताव होता था। उनको अनेक यातनाऐं दी जाती थीं और बदसलूकी की जाती थी। काफी यातनाए सहने के बाद बन्दियों ने विरोध करने का फैसला लिया और जेल में बदसलूकी और बदइंतेजामी के खिलाफ भूख हड़ताल शुरू की। अंग्रेज़ो ने भूख हड़ताल को तोड़ने की अनेक कोशिशे की लेकिन सब बेकार रहा। बन्दियों को जबरदस्ती खाना खिलाने का प्रयत्न किया, जिसमे अनेको क्रान्तिकारियो की भूख हड़ताल तुड़वाने में सफल रहे। अंग्रेज़ो ने महावीर सिंह जी की भी भूख हड़ताल तुड़वाने की बहुत कोशिश की, अनेको लालच दिए, यातनाए दी लेकिन बलिष्ठ शरीर के स्वामी महावीर सिंह जी की भूख हड़ताल नही तुड़वा पाए। अंग्रेज़ो ने फिर जबरदस्ती करके मुँह में खाना ठूसने की कोशिश की, इसमें भी वो सफल नही हो पाए। इसके बाद अंग्रेजो ने नली को नाक के द्वारा गले में पहुँचाकर उन्हें जबरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की जिसमे उन्हें जमीन पर गिराकर 8 पुलिसवालो ने पकड़ा हुआ था। हठी महावीर सिंह राठौड़ ने पूरी जान लगाकर इसका विरोध किया जिससे दूध उनके फेफड़ो में चला गया जिससे तड़प तड़पकर उनकी 17 मई 1933 को मृत्यु हो गई और उन्होंने शहीदों की श्रेणी में अपना नाम अमर कर दिया। अंग्रेज़ो ने शहीद के घर वालो तक को शव नही ले जाने दिया और शव को पत्थरों से बांधकर समुद्र में फेंक दिया।

दुःख की बात ये है की आज ऐसे बलिदानी महापुरुषो, जिनकी वजह से हमे अंग्रेज़ो से स्वतंत्रता नसीब हुई के बारे में बहुत कम लोग जानते हैँ। महावीर सिंह राठौड़ ऐसे ही एक राजपूत योद्धा थे जिनकी शहादत से बहुत कम लोग परिचित हैँ जबकि ना केवल उन्होंने बल्कि उनके परिवार को भी उनकी राष्ट्रभक्ति की कीमत यातनाओ के साथ चुकानी पड़ी। अंग्रेज़ो की यातनाओ से तंग आकर उनके परिवार को 9 बार घर बदलना पड़ा और आज भी उनके परिवारीजन गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैँ जबकि उस वक्त जेल में मजे से रोटी खाने वाले और अंग्रेज़ो से गलबहियां करने वाले स्वतंत्रता आंदोलन का सारा श्रेय लेकर सांसद, मंत्री और प्रधानमन्त्री तक बन गए और उनके परिवारीजन अब भी मौज कर रहे हैँ। ऐसे लोगो की मुर्तिया चौक, चौराहो पर लगी हैँ, इनके नाम पर हजारो इमारतों का नामकरण किया गया है लेकिन महावीर सिंह राठौड़ जी की उनके गृह जिले एटा में भी कोई मूर्ती नही है....

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Thursday, May 5, 2016

बुलेट चले बिना सवार ओम बन्ना के चमत्कार, Om banna and bullet banna

राजस्थान के लोकदेवता श्री ओम बन्ना-------

बुलेट चले बिना सवार ओम बन्ना के प्रत्यक्ष चमत्कार

राजस्थान वीरो की भूमि ऐसा कोई गाव नही जहा झुंझार के देवालय न हो ऐसी कोई जगह नही जो राजपूतो के रक्त से सिंचित न हो
यहाँ की मिट्टी में हजारो नही लाखो कहानिया दबी पड़ी है पर सन् 1988 में पाली जिले में घटी एक विचित्र घटना ने पुरे देश को एक बार फिर सोचने पर मजबूर कर दिया
एक दिव्य आत्मा जो मारने के बाद भी अमर हो गयी और आज भी करती है राहगिरो की सेवा नाम है '""ओमसिंह राठौड उर्फ़ ओम बन्ना"""

परिचय-----
सदूर राजस्थान के पाली जिले का एक गाव "चोटीला" यहाँ ठाकुर जोग। सिंह जी के घर 5 मई को जन्म हुआ
 ओमसिंह राठौड का .. आप 2 दिसम्बर 1988 को वाहन दुर्घटना में देवलोक गमन हो गये। इसके बाद में ओम बन्ना की बुलेट को पुलिस प्रशासन अपने साथ नजदीक रोहिट थाने (पाली) थाने में ले आई। चमत्कार कहो या अजूबा वो बुलेट थाने से रात को उसी स्थान पहुंच गई जहां दुर्घटना हुई थी। इसी घटना की चार बार पुनरावर्ति हुई। ठाकुर साहब व गाँववालों के निवेदन पर ओम बन्ना की अन्तिम इच्छा समझकर पुलिस प्रशासन ने बुलेट को उसी स्थान पर रख दिया। धीरे-धीरे यह चर्चा सुनकर आस पास के गाँवों व शहरों के लोग उनके दर्शनों के लिए आने लगे। रोहर हाइवे पर कई दुर्घटनाएं घटित होती थी पर बाद में ओम बन्ना उस हाइवे पर दुर्घटनाओं को बचाते दिखाई देते रहते थे। लोगों में आस्था बढती गई और अपनी मन्नते माँगने लगे।


पाली शहर से 17 किलोमीटर दूर जोधपुर-अहमदाबाद राजमार्ग, पाली जिले के बांडाई गांव के पास ओम बन्ना की मोटर साइकिल को भी उन्हीं के साथ पूजा जाता है। यह बात भले ही आपको आश्चर्यजनक लगे मगर यह सच है। मोटर साइकिल की पूजा के पीछे कुछ चमत्कारिक कारण भी है जिसके कई लोगों के साथ पुलिसकर्मी भी प्रत्यक्षदर्शी हैं। बात आज से करीब 27 साल पहले दिंनाक 2 दिसम्बर 1988 की है। राजमार्ग पर बसे पाली से जाते समय बांडाई गांव के पास ओम बन्ना का सड़क दुर्घटना में देहान्त हो गया। जानकार बताते हैं कि घोर अंधेरी रात्रि के समय ओम बन्ना अपनी बुलेट मोटर साईकिल पर गांव लौट रहे थे। चोटिला के पास जब वे पहुंचे तो अचानक उनके सामने दिव्य प्रकाश हुआ यह देखकर उनकी आंखें चौंधिया सी गई और ऐसी स्थिति में उन्हें कुछ न समझ आया तो और उनकी बुलेट एक। पेड़ से जा भीड़ी  और ओम बन्ना का देहावसान हो गया।

1988 में हादसे की खबर पाकर पुलिस वहां पहुंची और शव का पंचनामा कर आवश्यक खानापूर्ति के बाद उसे उनके परिजनों को सौंप दिया। पुलिस बुलेट मोटर साइकिल को लेकर थाने आ गई। इसी के साथ शुरू हो गया चमत्कारों का सिलसिला। अगली सुबह मोटर साइकिल फिर हादसे वाली जगह पर पायी गई। पुलिस ने दुबारा मोटर साइकिल घटनास्थल से उठवाकर थाने के एक कमरे के अन्दर बंद कर दी और बाहर से मजबूत ताला लगवा दिया चाबी थानाधिकारी ने अपने पास रख ली। परन्तु दूसरे दिन जब मोटर साइकिल वाला कमरा देखा गया तो ताला व मोटर साइकिल हादसे वाली जगह पर खड़ी पायी गई।

थाने में चार बार मोटर साइकिल को जंजीर से बांधकर भी रखा गया, लेकिन हर बार वह दुर्घटना स्थल पर ही मिलती। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार कई ग्रामीणों ने मोटर साइकिल को बिना चालक राजमार्ग की ओर दौड़ते हुए भी देखा। अंतत: बन्ना के पिता ठाकुर जोगसिंह और प्रत्यक्षदर्शी ग्रामीणों के भावना की कद्र करते हुए पुलिस ने मोटर साइकिल को हादसे वाली जगह पर रखने की इजाजत दी। कुछ दिन पश्चात ओम बन्ना ने अपनी दादीसा श्रीमती समंदर कंवर को सपने में दर्शन दिए और कहा कि जहां पर मेरी दुर्घटना हुई, वहां पर मुझे स्थान दिया जाए, इसके लिए वहां मेरा चबूतरे नुमा स्थान बनाया जाए तभी मुझे शांति मिलेगी। उसके बाद वहां पर एक चबूतरा बनवाया गया और ओम बन्ना की इच्छानुसार मोटर साइकिल को भी उनके स्थान के पास रखवा दिया गया। कहते है कि जिस तारीख व समय पर ओम बन्ना दुर्घटना का शिकार हुए थे उस दिन खडी मोटर साइकिल का इंजन कुछ देर के लिए चालू हो जाता है। अब आराध्यदेव यानि भौमियाजी का दर्जा पा चुकी मोटरसाइकिल को लेकर पेशोपेश थी कि इस अजूबे को फूल माला कहां पहनाई जाये और चंदन टीका कहां लगाया जाए। काफी सलाह मशवरा व आपसी सोच विचार के बाद तय किया गया कि हेडलाइट पर माल्यार्पण हो और पहियों के पास जमीन पर दीया-धूप-बत्ती की जाए। तब से लेकर आज दिन तक यह सिलसिला जारी है। मोटर साइकिल को किसी ने वहां से हिलाया तक नहीं है। हां इतना अवश्य है कि इसकी साफ सफाई नियमित तौर पर की जाती है और नम्बर प्लेट जिस पर आर. एन. जे. 7773 नम्बर पड़ा है। प्रतिवर्ष नए रंग रोगन से मोटर साइकिल सजती है। धार्मिक भावना का यह आलम है कि हर साल हादसे वाली रात को इस स्थान पर भजन कीर्तन के दौरान ओम बन्ना भी वहां अदृश्य होते हुए भी अपनी मौजूदगी का अहसास दिलाते हैं।
ये क्षेत्र पहले राजस्थान के दुर्घटना संभावित क्षेत्र था पर ॐ बन्ना के मंदिर के बाद यहाँ दुर्घटंना न के बराबर हुयी है
एक नही सैकड़ो चालको को दावा है की ओम बन्ना ने उनको बहुत से दुर्घटनाओ से बचाया है
कहा यह भी जाता है कि उस दिन बुलेट मोटर साइकिल बिना सवारी के थाने के चारों और चक्कर काटकर अपनी श्रद्धा ‘ओम बन्ना’ को अर्पित करती है।

ओम बन्ना आज भी अपने अनुयायियों के दिलों में इस कदर जगह बनाए हुए है कि मानों अब भी उनके साथ ही रहते हो, ओम बन्ना के देहावसान के बाद ज्यों-ज्यों उनके चमत्कार सामने आने लगे तो दुर्घटनास्थल पर ही उनका स्थान देवालय का सा दर्जा पा गया, जो आज तक जारी है। वर्तमान में यह स्थान काफी विकसित हो गया है। यहां दो तीन धर्मशालाएं बनी हुई है व छोटी बड़ी घुमटियों में जोत जलती रहती है और पूजा अर्चना के लिए पुजारी की नियुक्ति की गई है।दिन रात गाव के ढोली जी यहाँ रहते है मारवाड क्षेत्र ही नहीं ओम बन्ना के भक्त अन्य कई स्थानों से यहां प्रसाद चढ़ाने आते हैं खासतौर से जोधपुर मार्ग पर यहां से गुजरने वालों में से शायद ही कोई ऐसा होगा जो यहां रूककर ओम बन्ना के दर्शन किये बिना चला जाये। कई लोगों की ओम बन्ना के प्रति ऐसी श्रद्वा व आस्था है। यहां रोजाना ही भीड लगी रहती है लेकिन हर वर्ष उनके दिवस पर बहुत बडे मेले का आयोजन किया जाता है।

बडाई गांव के लोग भी मोटर साइकिल वाले ‘ओम बन्ना की वजह से गांव को मिल रही पहचान से खुश है। वजह साफ है इससे पहले सैकड़ों मीटर लम्बे राजमार्ग पर सन्न सन्न निकलते वाहनों के लिए इसकी अहमियत रास्ते में पडऩे वाले दूसरे गांवों से ज्यादा न थी, और अब यह ऐसा आस्था स्थल बन चुका है जहां दिन हो या रात हमेशा काफी भीड़ लगी रहती है। एक गुमनाम मील के पत्थर की जगह यह स्थान इस राजमार्ग पर अपनी एक पहचान बना चुका है।

बचपन में ही भविष्यवाणी हो गई थी उनके चमत्कारी होने की

ओम बन्ना राठौड वंश से जुडे राजपूत है ओम बन्ना का जन्म विक्रम सम्वत २०२१ में वैशाख सुदी अष्ठमी का चमकी चांदनी रात में हुआ था। कहते है जब ओम बन्ना की जन्म कुंडली बनवाने ज्योतिषी आए तो उन्होंने ओम बन्ना की ठुड्डी व ललाट देखकर भविष्यवाणी की कि यह एक चमत्कारी बालक है, यह बडा होकर दशों दिशाओं में राठौड़ वंश का नाम उज्ज्वल करेगा। ठाकुर जोग सिंह व मां सरूप कंवर के पुत्र ओम बन्ना को मोटर गाडी चलाने का काफी शौक था बचपन में जब भी वह गांव में स्कूटर या मोटर साइकिल देखते थे तो वह अपने माता-पिता या दादी सा की गोद से कूदकर अपने छोटे-छोटे हाथों से मोटर साइकिल की आकृति बनाते और मुंह से गाडी की आवाज निकालकर सडक पर तेजी से दौडऩे लग जाते थे। शायद यही कारण है कि मोटर साइकिल से उनका नाता आज भी जुड़ा हुआ है।

* जोधपुर के राजकुमार शिवराज सिंह की पोलो खेलते वक़्त घोड़े पर गिरने से चोट लगी थी सभी डॉक्टर ने मना कर दिया था तभी महारानी हेमलता राजे के यहा की मन्नत मांगी और अगले ही क्षण अमेरिका से खबर आती की अब हालात खतरे से बहार है मन्नत पूरी होने पर जोधपुर महारानी हेमलता राजे यहाँ दर्शन को आई थी

*प्रवासी सिद्धान्त और उनकी पत्नी का एक्सीडेंट ओम बन्ना के समीप जोधपुर मार्ग पर होता है सिंद्धांत सीरियस होता है हालात खतरे में होती है उनकी पत्नी में बहुत मदद मांगी पर एक भी गाडी नही रुकी ओर जैसा की उनकी पत्नी खुद Mano ya na mano Star Tv को बताया की तभी एक बुलेट सवार वहा आता है और उन्हें जोधपुर ले जाता और अपना नाम ओमसिंह बातके जाते है वापसी में जब ये लौट रहे थे तभी वो ओम बन्ना के दर्शन को रुके वहा लगी तस्वीर और बुलेट को देख वो सकते में आ जाते है तस्वीर होती है उस बुलेट सवार की जिन्होंने उन्हें बचाया और बुलेट भी वही RNJ7773
तब से हर अंतराल के बाद ये बड़े शहर में पढ़ा लिखा जैन दंपति यहाँ माथा टेकने आते है

* वक़्त 2011 पाली से जोधपुर शहर के बीच चलने वाली प्राइवेट बस गर्मियों की भरी दोपहर शहर से एक चारण महिला चढ़ती है और ओम बन्ना स्थान के जाने के लिये पूछती है बस चलती है तभी कंडेक्टर। मनमाने किराये लेता है ओम बन्ना के लिए और ये कहता है की। इतने रूपये नही दिया तो बस वहा नही रुकेगी
वहा यात्रियों चारण महिला और कन्डेक्टर की तू तू मै मै होती है महिला ने सबके सामने बस ईतना ही कहा की ओम बन्ना की मर्जी के बिना तुम आगे नही जा सकते आज ही चमत्कार मिल जायेगा तभी बस आगे बड़ी और ओम बन्ना के मंदिर से कुछ 20 मीटर पहले चलती बस के आगे वाले दोनो कांच वही मन्दिर के सामने फुट जाते है इस घटना का प्रत्यक्ष दर्शी में खुद रहा था

* जाखड़ ट्रैवल की बस का ओम बन्ना के थान के सामने ही 3 बार पलटना और चमत्कारिक रूप से एक भी यात्री का घायाल न होना सभी को 3 घंटे के भीतर प्राथमिक उपचार के बाद छुट्टी

ऐसे ही हजारो चमत्कार जिसके हजारो प्रत्यक्षदर्शी है