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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, May 8, 2016

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप, महानतम स्वतंत्रता सेनानी क्यों? Why maharana pratap, the greatest ever freedom fighter?



वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप , राष्ट्रभक्तो  के आदर्श
maharana pratap, the greatest ever freedom fighter

आजकल कुछ लोग महाराणा प्रताप की लोकप्रियता पर सवाल उठाते हैं, उनको नायक बताए जाने पर सवाल उठाते हैं, उनको भारत का प्रथम स्वतंत्रता सेनानी कहने पर सवाल करते हैं, उनकी वीरता पर सवाल करते हैं, वो कहते हैं कि एक छोटे से राज्य के छोटे से राजा को इतना सम्मान क्यों? एक छोटा से राज्य का राजा अकबर से महान क्यों? जिनको भी इस तरह की शंकाए हैँ उन्हें यह पोस्ट  जरूर पढ़ाएं--

भारत के अंग्रेजो से स्वतंत्रता के आंदोलन में क्रान्तिकारियो के लिये मेवाड़ की धरती, चित्तौड़गढ़ और हल्दीघाटी तीर्थस्थल बन चुके थे। क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के हर सदस्य के लिये मेवाड़ की तीर्थ यात्रा कर चित्तोड़ के विजय स्तम्भ के नीचे शपथ लेना अनिवार्य था। भारतवर्ष से देशभक्त, क्रन्तिकारी हल्दीघाटी की मिट्टी का तिलक करने आते थे। वस्तुतः अंग्रेज़ो की दासता से मुक्ति दिलाने के लिये महाराणा प्रताप के नाम ने जादू का काम किया। महाराणा प्रताप विशाल ब्रितानी साम्राज्य से जूझते राष्ट्रभक्तो के लिये आदर्श और प्रेरणापुंज थे।

कर्नल टॉड ने ही लिखा है कि "अरावली पर्वत श्रृंखला का कोई पथ ऐसा नही है जो प्रताप के किसी कार्य से पवित्र ना हुआ हो- किसी शानदार विजय या उससे भी शानदार पराजय से। हल्दीघाटी मेवाड़ की थर्मोपल्ली है और दिवेर का मैदान उसकी मैराथन है।"

महाराणा प्रताप के सबसे बड़े प्रशंसक और अनुयायी, महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी ने अपनी पत्रिका 'प्रताप' का पहला अंक महाराणा प्रताप को समर्पित करते हुए लिखा था की "महान् पुरुष, निस्‍संदेह महान्, पुरुष। क्या भारतीय इतिहास के किसी खून में इतनी चमक है? स्‍वतंत्रता के लिए किसी ने इतनी कठिन परीक्षा दी? जननी जन्‍मभूमि के लिए किसने इतनी तपस्‍या की? देशभक्‍त, लेकिन देश पर अहसान जताने वाला नहीं, पूरा राजा, लेकिन स्‍वेच्‍छाचारी नहीं। उसकी उदारता और दृढ़ता का सिक्‍का शत्रुओं तक ने माना। शत्रु से मिले भाई शक्तिसिंह पर उसकी दृढ़ता का जादू चल गया। अकबर का दरबारी पृथ्‍वीराज उसकी कीर्ति गाता था। भील उसके इशारे के बंदे थे। भामाशाह ने उसके पैरों पर सब कुछ रख दिया। मानसिंह उससे नजर नहीं मिला सकता था। अकबर उसका लोहा मानता था। अकबर का दरबारी खानखाना उसकी तारीफ में पद्य रचना करना अपना पुण्‍य कार्य समझता था। जानवर भी उसे प्‍यार करते थे और घोड़े चेतक ने उसके ऊपर अपनी जान न्‍यौछावर कर दी थी। स्‍वतंत्रता देवी का वह प्‍यारा था और वह उसे प्‍यारी थी। चित्‍तौड़ का वह दुलारा था और चित्‍तौड़ की भूमि उसे दुलारी थी। उदार इतना कि बेगमें पकड़ी गयीं और शान-सहित वापस भेज दी गयीं। सेनापति फरीद खाँ ने कसम खायी कि प्रताप के खून से मेरी तलवार नहायेगी। प्रताप ने उस सेनापति को पकड़ कर छोड़ दिया। अपने से कहीँ विशाल और ताकतवर साम्राज्य को ना केवल चुनौती देकर बल्कि सफलतापूर्वक अपना राज्य वापिस जीतकर देश के सबसे ताकतवर बादशाह का घमंड चूर चूर कर दिया"

गणेश शंकर विद्यार्थी जी आगे लिखते हैँ- "प्रताप! हमारे देश का प्रताप! हमारी जाति का प्रताप! दृढ़ता और उदारता का प्रताप! तू नहीं है, केवल तेरा यश और कीर्ति है। जब तक यह देश है, और जब तक संसार में दृढ़ता, उदारता, स्‍वतंत्रता और तपस्‍या का आदर है, तब तक हम क्षुद्र प्राणी ही नहीं, सारा संसार तुझे आदर की दृष्टि से देखेगा। संसार के किसी भी देश में तू होता, तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्‍योछावर करते। अमरीका में होता तो वाशिंगटन और अब्राहम लिंकन से तेरी किसी तरह कम पूजा न होती। इंग्‍लैंड में होता तो वेलिंगटन और नेल्‍सन को तेरे सामने सिर झुकाना पड़ता। स्‍कॉटलैंड में बलस और रॉबर्ट ब्रूस तेरे साथी होते। फ्रांस में जोन ऑफ आर्क तेरे टक्‍कर की गिनी जाती और इटली तुझे मैजिनी के मुकाबले में रखती। लेकिन हाँ! हम भारतीय निर्बल आत्‍माओं के पास है ही क्‍या, जिससे हम तेरी पूजा करें और तेरे नाम की पवित्रता का अनुभव करें! एक भारतीय युवक, आँखों में आँसू भरे हुए, अपने हृदय को दबाता हुआ लज्‍जा के साथ तेरी कीर्ति गा नहीं-रो नहीं, कह-भर लेने के सिवा और कर ही क्‍या सकता है?"

भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी प्रताप सही में भारत में प्रबल स्वतंत्रता की भावना के प्रतीक हैँ। सैकड़ो सालो से भारत के हर एक स्वतंत्रता प्रेमी एवम् स्वाभिमानी व्यक्ति के आदर्श रहे हैँ। अपने जीवनकाल में ही बिना कोई नया राज्य जीते वो देश भर में जन जन के नायक बन चुके थे। उनकी कीर्ति उनके विरुद्ध लड़ने वाले मुग़ल सैनिको ने ही देश के कोने कोने में फैला दी थी। मेवाड़ का सिसौदिया वंश सैकड़ो साल से भारत के हिन्दुओ को संबल प्रदान करता रहा था, उन्हें नेतृत्व देता रहा था, गया और प्रयाग जैसे तीर्थो की मुक्ति के लिये लड़ता रहा था, उन्हें हिंदुआ सूर्य की उपाधि दी गई थी।  पूरा देश महाराणा प्रताप के संघर्ष को टकटकी लगाए देख रहा था। मुगल सल्तनत सिर्फ इतना चाहती थी की मेवाड़ के राणा सिर्फ एक बार उसकी अधीनता स्वीकार कर ले, इसके  लिए वो इतना प्रलोभन देने और झुकने को तैयार थे जो कभी किसी को नही दिया गया लेकिन प्रताप को पता था की वो पूरे देश के हिन्दुओ के स्वाभिमान के प्रतीक हैं। वो सिर्फ एक छोटे राज्य के राजा नही बल्कि मेवाड़ के महाराणा और हिंदुआ सूर्य होने के नाते उनके उपर बड़ी जिम्मेदारी थी. उन्होंने लाखो कष्ट सहे लेकिन किसी भी कीमत पर झुकना मंजूर नही किया। क्योंकि वो सिर्फ राज्य के लिये नही बल्कि देश के स्वाभिमान के लिये लड़ रहे थे।

स्वाधीनता और स्वाभिमान के इस संघर्ष में मेवाड़ की भूमि ने जो सहा उसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। दशको तक मेवाड़ में अन्न का दाना नही उपजा। पूरा मेवाड़ युद्ध का मैदान बना हुआ था। सब तरफ भुखमरी और मार काट थी, ऐसे में सब साथ छोड़ जाते हैं लेकिन मेवाड़ ने प्रताप का साथ कभी नही छोड़ा। मेवाड़ की जनता प्रताप के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही। कभी कोई शिकवा नही किया। ऐसी स्वामिभक्ति और प्रतिबद्धता सिर्फ प्रताप जैसे अद्वितीय व्यक्तित्व का स्वामी ही कमा सकता है जिसकी आभा से उसके शत्रु भी उसके कायल हो जाते थे।

महाराणा प्रताप की कहानी सैकड़ो सालो तक जन जन में लोकप्रिय रही। मेवाड़ से सुदूर क्षेत्रो में शायद ही कोई होता था जो प्रताप, मेवाड़, चित्तोड़, चेतक, भामाशाह आदि को ना जानता हो। हल्दीघाटी का युद्ध इतिहास के मानको की दृष्टि से बहुत ही छोटा युद्ध था लेकिन उसकी प्रसिद्धि इतनी हुई की भारत में शायद ही कोई हो जिसने हल्दीघाटी के बारे में ना सुना हो। यहां तक की देश में कई जातियां और उपजातिया जिनका प्रताप, राजपूत जाती, चित्तोड़ या मेवाड़ तक से कभी कोई संबंध ना रहा हो वो भी किसी ना किसी तरह अपने को इस संघर्ष से जोड़ने की कोशिश करती रही।

भगवान राम के वंश में जन्मे महाराणा प्रताप ने त्याग, बलिदान, स्वाभिमान, स्वतंत्रता के प्रति असीम आग्रह का जो आदर्श प्रस्तुत किया उसकी मिसाल दुनिया के किसी इतिहास में मिलना मुश्किल है। मेवाड़ कोई सूदूर क्षेत्र नही था और न ही भौगोलिक परिस्थितिया बहुत ज्यादा विषम लेकिन पूरी सल्तनत की फ़ौज लगाकर भी मुगल प्रताप को झुका नहीं पाए और अंत में उनकी जिजीविषा के आगे उन्हें घुटने टेकने पड़े, इसीलिए प्रताप को महान कहा जाता है। जिन लोगो को उनकी महानता पर शंका है उनका ऐतिहासिक ज्ञान निश्चित ही बहुत कम है। गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने ठीक ही लिखा था की प्रताप अगर किसी और देश में होता तो उसे लिंकन, वेलिंगटन, मेजिनी, जोआन ऑफ़ आर्क जैसा सम्मान मिलता लेकिन यह देश शायद प्रताप जैसे वीरो के लायक ही नही है।

देश भक्ति, स्वाभिमान, स्वतंत्रता, बलिदान, शौर्य, पराक्रम, सहिष्णुता के प्रतीक, क्षत्रिय कुलभूषण, हिंदुआ सूरज, एकलिंगजी के दीवान, मेवाड़ के गौरव महाराणा प्रताप को उनके 476वी जयंती  पर एक बार फिर से हमारा शत शत नमन_/\_


2 comments:

  1. प्रमुख रूप से अहीरो के तीन सामाजिक वर्ग है-यदुवंशी, नंदवंशी व ग्वालवंशी। इनमे वंशोत्पत्ति को लेकर बिभाजन है। यदुवंशी स्वयं को राजा नन्द का वंशज बताते है व ग्वालवंशी प्रभु कृष्ण के ग्वाल सखाओ से संबन्धित बताए जाते है।[1] एक अन्य दंतकथा के अनुसार भगवान कृष्ण जब असुरो का वध करने निकलते है तब माता यशोदा उन्हे टोकती है, उत्तर देते देते कृष्ण अपने बालमित्रो सहित यमुना नदी पार कर जाते है। कृष्ण के साथ असुर वध हेतु यमुना पार जाने वाले यह बालसखा कालांतर मे अहीर नंदवंशी कहलाए।[30] आधुनिक साक्ष्यों व इतिहासकारों के अनुसार नंदवंशी व यदुवंशी मौलिक रूप से समानार्थी है,[31] क्योंकि ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार यदु नरेश वासुदेव तथा नन्द बाबा निकट संबंधी या कुटुंबीजन थे व यदुवंशी थे। नन्द की स्वयं की कोई संतान नहीं थी अतः यदु राजकुमार कृष्ण ही नंदवश के पूर्वज हुये। [32][33]

    अहीरों का बहू संख्यक कृषक संवर्ग स्वयं को ग्वाल अहीरों से श्रेष्ठ व जाट, राजपूत, गुर्जर आदि कृषक वर्गों के बराबर का मानता है। ग्वाल अहीरों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन व दुग्ध-व्यापार है तथा यह वर्ग उत्तर प्रदेश की सीमाओं व हरियाणा के फ़रीदाबाद व गुड़गाँव जनपदों में पाया जाता है। प्रारम्भ में तीव्र रहा यह विभेद अब कम हो चला है।[34] बनारस के ग्वाल अहीरों को 'सरदार' उपनाम से संबोधित किया जाता है।[35][36]

    मानव वैज्ञानिक कुमार सुरेश सिंह के अनुसार, अहीर समुदाय लगभग 64 बहिर्विवाही उपकुलों मे विभाजित है। कुछ उपकुल इस प्रकार है- जग्दोलिया, चित्तोसिया, सुनारिया, विछवाल, जाजम, ढडवाल, खैरवाल, डीवा, मोटन, फूडोतिया, कोसलिया, खतोड़िया, भकुलान, भाकरिया, अफरेया, काकलीय, तांतला, जाजड़िया, दोधड़, निर्वाण, सतोरिया, लोचुगा, चौरा, कसेरा, लांबा, खोड़ा, खापरीय, टीकला तथा खोसिया। प्रत्येक कुल का एक कुलदेवता है। मजबूत विरासत व मूल रूप से सैन्य पृष्ठभूमि से बाद मे कृषक चरवाहा बनी अहीर जाति स्वयं को सामाजिक पदानुक्रम मे ब्राह्मण व राजपूतो से निकटतम बाद का व जाटो के बराबर का मानती है। अन्य जातियाँ भी इन्हे महत्वपूर्ण समुदाय का मानती है।[1]

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  2. अफरइया (अफरिया) (अन्य उच्चारण- अफ़्फरिया, फरिया या फरइया) यदुवंशी अहीर जाति का एक कुल (गोत्र) है।[1][2] राजपूताना गजेटियर के अनुसार रेवाड़ी के अफरिया अहीर जाति के जादौन वंश से हैं।[3] रेवाड़ी राज्य पर अफरिया कुल ने ही शासन किया है।[4] रेवाड़ी के राजा राव नंदराम इसी गोत्र के थे।[5][6][7]



    अनुक्रम [छुपाएँ]
    1 इतिहास
    2 दिल्ली में
    3 महत्वपूर्ण व्यक्तित्व
    4 इन्हें भी देखें
    5 संदर्भ सूत्र


    इतिहास[स्रोत सम्पादित करें]

    18वीं शताब्दी के प्रारम्भ में, अहीर सेनापति राव नंदराम ने रेवाड़ी राज्य की स्थापना की थी। उन्हें रेवाड़ी के आस पास 360 गावों की यह जागीर व चौधरी का खिताब मुगल सम्राट फारुखसियार (1713-19) से प्राप्त हुये थे। उस समय चौधरी का खिताब सैन्य शक्ति का सूचक हुआ करता था। [8]

    अफरिया राजस्थान राज्य में अलवर के तिजारा नामक स्थान से हरियाणा के रेवाड़ी क्षेत्र में आकार बसे थे। राव तुला राम व उनके वंशजों का गोत्र अफरिया है।[9] हेनरी एम॰ इलियट के वृतांतों के अनुसार- सभी प्रान्तों के अहीर अपनी मूल उत्पत्ति मथुरा या उसके पश्चिम के क्षेत्र से मानते है। अफरिया अहीर जाति का एक महत्वपूर्ण समुदाय है।[10][11] मुगल शासन काल में, अफरिया, कोसलिया, व खोसा राजशाही अहीर वंश थे जिनका मुग़ल दरबार के नुमाइंदों से सीधा संपर्क था।[12] राव नंदराम रेवाड़ी के यदुवंशी अहीरों के अफरिया परिवार में जन्मे थे, जिन्होंने अपनी अपार सैन्य शक्ति व विस्तृत उपजाऊ जमीन के माध्यम से अपनी प्रभुता सिद्ध की थी।[13]

    दिल्ली में[स्रोत सम्पादित करें]

    दिल्ली मे अफरिया गोत्र के 18 गाँव हैं जिन्हे सुरेड़ा सतरा खांप भी कहा जाता है। कुछ गाँव इस प्रकार हैं- खेड़ा डाबर, जफरपुर कलाँ, खदखड़ी नाहर, खदखड़ी जाट्मल, घुमनहेड़ा, खेरा, पंडवाला, झुलझुली आदि।

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