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मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था??(Did Prithviraj chauhan killed Mohmmad ghauri?)

Did Prithviraj Chauhan killed Mohmmad Ghauri????? मौहम्मद गौरी का वध किसने किया था? सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने अथवा खोखर राजपूतो ने??...

Sunday, September 18, 2016

पृथ्वीराज रासो अथवा पृथ्वीराज विजय में कौन अधिक प्रमाणिक??

कल रात एबीपी न्यूज़ पर उनके धारावाहिक "भारतवर्ष" में सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर प्रसारण हुआ,
इस एपिसोड में साफ़ दिखाई दिया कि पृथ्वीराज चौहान और उनके शासन काल/उत्थान/पतन का प्रमाणिक वर्णन करने में चन्दबरदाई कृत काव्य ग्रन्थ "पृथ्वीराज रासो" पूर्ण सक्षम नही है,
न तो पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित घटनाओं के तिथि संवत का ऐतिहासिक साक्ष्यों से मिलान होता है न ही कई घटनाओं की पुष्टि होती है,हाँ पृथ्वीराज के दरबार में ही एक कश्मीरी ब्राह्मण जयानक थे जिन्होंने पृथ्वीराज के जीवनकाल में ही
"पृथ्वीराज विजय" ग्रन्थ लिखा था जिसमे दर्ज घटनाओं और तिथि संवत का शत प्रतिशत प्रमाणन ऐतिहासिक साक्ष्यों से हो जाता है,यह ग्रन्थ अधिक प्रसिद्ध नही हुआ तथा चौहान साम्राज्य के ढहते ही ओझल सा हो गया,ब्रिटिशकाल में एक अधिकारी बुलर महोदय को कश्मीर यात्रा के समय यह ग्रन्थ जीर्ण शीर्ण अवस्था में मिला तो उसमे उल्लिखित घटनाएं और संवत पूर्णतया सही पाए गए,पर दुर्भाग्य से पृथ्वीराज विजय का एक भाग ही प्राप्त हो पाया है,दूसरा भाग अभी तक अप्राप्य है।

तभी से समस्त इतिहासकार एकमत हैं कि पृथ्वीराज चौहान के विषय में समस्त जानकारी पाने के लिए पृथ्वीराज विजय सर्वाधिक प्रमाणिक हैं ,
हालाँकि कुछ घटनाएं पृथ्वीराज रासो में भी सही हो सकती हैं,

यद्यपि पृथ्वीराज रासो वीर रस का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है किन्तु इसकी ऐतिहासिकता संदेहास्पद है,
कुछ असमंजस जो इस धारावाहिक में दिखाई दिए और आम तौर पर रासो को प्रमाणिक मानने में बाधक हैं ????

1--रासो में तैमूर, चंगेज खान, मेवाड़ के रावल रतनसिंह-पदमावती जौहर,ख़िलजी जैसे बाद की सदियों में जन्म लेने वाले चरित्रों और घटनाओ के नाम/प्रसंग आ गए,जबकि उनका जन्म ही पृथ्वीराज चौहान के सैंकड़ो वर्ष बाद हुआ था।

2--रासों में लिखी काव्य की भाषा में फ़ारसी,तुर्की के बहुत से ऐसे शब्द थे जो बहुत बाद में भारतवर्ष में मुस्लिम शासन काल में प्रचलित हुए।

3--रासो के अनुसार जयचंद के द्वारा डाहल के कर्ण कलचुरी को दो बार पराजित और बंदी किए जाने का उल्लेख मिलता है, किंतु वह जयचंद से लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व हुआ था।

4--पृथ्वीराज रासो ही अकेला और प्रथम ग्रन्थ था जिसमे कन्नौज के सम्राट जयचन्द्र को राठौड़ वंशी लिखा है जबकि कन्नौज के चन्द्रदेव,गोविंदचंद्र, विजयचंद्र तथा जयचन्द्र आदि सम्राटो ने अपने किसी भी ताम्रपत्र शिलालेख में खुद को राठौड़ अथवा राष्ट्रकूट नही लिखा,जबकि उनसे कुछ समय पूर्व ही राष्ट्रकूट बेहद शक्तिशाली वंश के रूप में पुरे देश में प्रसिद्ध थे,समूचे दक्षिण भारत पर राष्ट्रकूट राठौड़ वंश का शासन था और कई बार उन्होंने उत्तर भारत में कन्नौज तक हमला किया था,

दरअसल जयचन्द्र और उनके पूर्वज पूर्वी भारत के काशी राज्य के शासक थे और गहरवार/गहड़वाल वंशी थे,
काशी नरेश चन्द्रदेव गहरवार ने कन्नौज/बदायूं के शासक गोपाल राष्ट्रकूट (राठौड़) को हराकर उनसे कन्नौज ले लिया था और गोपाल राष्ट्रकूट को बदायूं का सामन्त बना लिया था,

आज के आधुनिक राठौड़ बदायूं के राष्ट्रकूट राजवंश के ही उत्तराधिकारी हैं जिनके पूर्वज दक्षिण के इंद्र/अमोघवर्ष राष्ट्रकूट के नेतृत्व में कन्नौज पर प्रतिहार राजपूतो के शासनकाल में हमला करने आए थे और यही बस गए थे।।

सम्राट जयचंचन्द्र गहरवार को जयचन्द्र राठौड़ कहकर भ्रान्ति फ़ैलाने की शुरुवात पृथ्वीराज रासो से ही प्रारम्भ हुई।
जबकि जयचन्द्र के पूर्वज गोविंदचंद्र गहरवार का विवाह राष्ट्रकूट शासक की पुत्री मथनदेवी से हुआ था,जिससे स्पष्ट है कि दोनों अलग वंश थे।

5--रासो के अनुसार मेवाड़ के रावल समरसिंह को पृथ्वीराज चौहान का बहनोई बताया गया है और उन्हें तराईन के युद्ध में लड़ता दिखाया गया है
जबकि मेवाड़ के रावल समरसिंह का जन्म ही पृथ्वीराज की मृत्यु के 80 वर्ष बाद हुआ था!!

6--रासो के अनुसार------ पृथ्वीराज चौहान की माता कमला देवी दिल्ली के शासक अनंगपाल तोमर की पुत्री थी,और अनंगपाल तोमर ने अपने दौहित्र पृथ्वीराज को दिल्ली उत्तराधिकार में दी थी,पृथ्वीराज चौहान का बाल्यकाल में राज्याभिषेक दिल्ली की गद्दी पर हुआ था,

जबकि सच्चाई यह है कि पृथ्वीराज चौहान के पूर्वज अजमेर के शासक विग्रहराज चतुर्थ बीसलदेव ने दिल्ली के शासक मदनपाल तोमर पर हमला कर दिल्ली को जीत लिया था और मदनपाल तोमर ने अपनी पुत्री देसल देवी का विवाह बीसलदेव से किया था,जिसके बाद बीसलदेव और अजमेर के चौहानो के अधीन ही दिल्ली में पहले की भाँती तोमर वंश के शासक राज करते रहे,

अनंगपाल तोमर प्रथम का शासन काल सन् 736-754 ईस्वी के बीच था जबकि अनंगपाल तोमर द्वित्य का काल सन् 1051-1081 ईस्वी था,इनके अतिरिक्त कोई अनंगपाल हुए ही नही,
फिर दिल्ली नरेश अनंगपाल पृथ्वीराज चौहान के नाना कैसे हो सकते हैं क्योंकि उनके जन्म लेने के लगभग 80-85 वर्ष पूर्व ही अनंगपाल जी स्वर्गवासी हो गए थे??

सच्चाई यह है कि पृथ्वीराज की माता चेदि के हैहयवंशी कलचुरी राजपूत शासक की पुत्री कर्पूरी देवी थी,
पृथ्वीराज का राज्याभिषेक दिल्ली में नही अजमेर में हुआ था,दिल्ली पर पृथ्वीराज चौहान के समय पृथ्वीराज तोमर और बाद में गोविन्दराज तोमर का शासन था जो अजमेर के मित्र और सामन्त थे।।।

7--रासो के अनुसार दिल्ली के राजा अनंगपाल तोमर की एक पुत्री अजमेर के सोमेश्वर (पृथ्वीराज के पिता) से और दूसरी का विवाह कन्नौज नरेश जयचन्द्र से हुआ था,
इस नाते जयचन्द्र पृथ्वीराज के मौसा थे और पृथ्वीराज ने बलपूर्वक अपने मौसा जयचन्द्र की पुत्री संयोगिता से विवाह किया था!!!!

क्या मौसा की पुत्री से विवाह राजपूतो में सम्भव है???
कदापि नही,

हम ऊपर बता चुके हैं कि पृथ्वीराज चौहान और जयचन्द्र के समय अनंगपाल तोमर थे ही नही उनसे बहुत पहले हुए थे,अत जयचन्द्र पृथ्वीराज के मौसा थे यह कथा कपोलकल्पित है,

यही नही संयोगिता हरण की कथा के भी पर्याप्त साक्ष्य नही मिलते,सर्वाधिक प्रमाणिक ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय में मात्र यह लिखा है कि पृथ्वीराज किसी तिलोत्तमा नामक अप्सरा के स्वप्न देखा करते थे,उसमे कहीं कन्नौज नरेश की पुत्री संयोगिता या उसके हरण का कोई उल्लेख ही नही है।।

8--कन्नौज नरेश सम्राट जयचन्द्र गहरवार पर गद्दार और देशद्रोही होने आक्षेप सबसे पहले पृथ्वीराज रासो में ही हुआ है,रासो के अनुसार जयचन्द्र ने ही गौरी को भारत पर हमला करने को आमन्त्रित किया था,
जो कि पूर्णतया निराधार है,
जयचन्द्र के सम्बन्ध पृथ्वीराज से अच्छे नही थे उसने पृथ्वीराज की मदद नही की यह सत्य है।
लेकिन गौरी को उसने बुलाया इस सम्बन्ध में किसी तत्कालीन मुस्लिम ग्रन्थ में भी कहीं नही लिखा,
न ही कोई अन्य साक्ष्य इस सम्बन्ध में मिलता है,

जयचन्द्र गहरवार को देशद्रोही और गद्दार बताने का निराधार आरोप पृथ्वीराज रासो के रचियेता के दिमाग की उपज है जिसकी कल्पनाओ ने इस महान धर्मपरायण शासक को बदनाम कर दिया और जयचन्द्र नाम देशद्रोह और गद्दारी का पर्यायवाची हो गया!!!

9--रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज की पुत्री बेला का विवाह महोबा के चन्देल शासक परमाल के पुत्र ब्रह्मा से होता है और ब्रह्मा की मृत्यु पृथ्वीराज के समय ही हो जाती है जबकि पृथ्वीराज चौहान अपनी मृत्यु के समय मात्र 26/27 वर्ष के थे तो उस समय उनकी पुत्री बेला का विवाह सम्भव ही नही था।

10--रासो में पृथ्वीराज चौहान द्वारा दक्षिण के यादव राजा भाणराय की कन्या से होना, एक विवाह चन्द्रावती के राजा सलख की पुत्री इच्छनी से होना और उन विवाहो की वजह से उसका गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव से संघर्ष होना लिखा है जबकि देवगिरि में कोई भाणराय नामक राजा हुआ ही नही और चन्द्रावती के किसी सलख नामक राजा के होने का भी कोई उल्लेख नही मिलता,
रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज ने गुजरात के शासक भीमदेव का वध किया जबकि उसकी मृत्यु पृथ्वीराज के 7 वर्ष बाद हुई।

रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज ने उज्जैन नरेश भीमदेव की पुत्री इंद्रावती से विवाह किया,जबकि उज्जैन में भीमदेव नाम का कोई शासक हुआ ही नही।

ऐसी ही दर्जनों कपोलकल्पित कथाए पृथ्वीराज रासो में भरी पड़ी हैं।।

12--रासो में गौरी के पिता का नाम सिकन्दर लिख दिया जो उससे 1300 वर्ष पहले हुआ था,इसके अलावा मौहम्मद गौरी के सभी सेनानायकों के नाम गलत लिखे गए हैं।

13--रासो में लिखा है कि पृथ्वीराज के बहनोई मेवाड़ के रावल समरसिंह ने मांडू से मुस्लिम बादशाही को उखाड़ दिया जबकि मांडू(चन्देरी) में मुस्लिम सत्ता ही सन् 1403 में दिलावर गौरी द्वारा स्थापित हुई थी,जिसे राणा सांगा ने 1518 ईस्वी में उखाड फेका था ,
इससे लगता है कि रासो ग्रन्थ कहीं 16 वी सदी में तो किसी ने नही लिखा???

14--और अंत में,पृथ्वीराज रासो में उल्लिखित घटनाओं के तिथि संवत ऐतिहासिक साक्ष्यो से कतई मेल नही खाते,पृथ्वीराज रासो के अनुसार यह घटनाएं 11 वी सदी में हुई जबकि मौहम्मद गौरी और समकालीन मुस्लिम शासको का 12 वी सदी के अंतिम दशक में होना प्रमाणित है और पृथ्वीराज विजय में उल्लिखित घटनाओ का तिथि क्रम एकदम मेल खाता है।।
रासो में पृथ्वीराज की मृत्यु 1101 ईस्वी में लिखी है जबकि उनकी मृत्यु 1192 ईस्वी में हुई,
यदि चन्दबरदाई पृथ्वीराज के समकालीन होते तो इतनी बड़ी भूल कैसे करते??

इस प्रकार स्पष्ट है कि जिस प्रकार महाऋषि वेदव्यास कृत जय नामक ग्रन्थ जो मूल रूप से 8800 श्लोक में लिखा गया था,वो आज कपोलकल्पित कथाए जोड़कर 1 लाख से अधिक श्लोक का हो गया है जिसमे क्या सही क्या मनगढंत पता नही लगता।

इसी प्रकार या तो पृथ्वीराज रासो को किसी ने 1400 ईस्वी या उसके भी बाद लिखकर मशहूर कर दिया जिसमे बाद में होने वाली घटनाएं भी जोड़ दी या यह ग्रन्थ मूल रूप में सही हो पर बाद में इसमें नई नई फर्जी कपोलकल्पित घटनाए जोड़कर इसकी ऐतिहासिकता और प्रमाणिकता को नष्ट कर दिया।।

रासो की वजह से ही राजपूत समाज में कई गलत मान्यताओ का प्रचार हो गया और यह मान्यताए समाज में भीतर तक स्थान बना चुकी हैं,जिन्हें झुठलाना लगभग असम्भव हो गया है।

पृथ्वीराज चौहान गत 1000 वर्षो में हुए महानतम यौद्धाओं में एक हैं जो दुर्भाग्यपूर्वक मात्र 26 वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हो गए अन्यथा वो पुरे भारत के एकछत्र सम्राट होते,
उनके विषय में सम्पूर्ण प्रमाणिक जानकारी कश्मीरी कवि जयानक कृत पृथ्वीराज विजय नामक ग्रन्थ से ली जा सकती हा,किन्तु दुर्भाग्य से उसका एक भाग अभी तक अप्राप्य है।

लेखक---धीरसिंह पुण्डीर जी से साभार

Sunday, September 11, 2016

सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम के योद्धा क्रांतिवीर बरजीरसिंह,तांत्या टोपे के दाहिने हाथ

जय क्षात्र धर्म की मित्रों , आज हमने कुछ समय पहले एक पोस्ट श्रृंखला शुरू की थी जिसमे आपको पोस्ट के माध्यम 1857 की क्रांति में महान राजपूत नायकों द्वारा दिए गए योगदानो से अवगत कराना था। आज उसी श्रृंखला में आगे बढ़ते हुये बुंदेलखंड के महान नायक क्रांतिवीर योद्धा बरजीर सिंह के बारे में बताएँगे। कृपया इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा पढ़ें और शेयर करें।

^^^^^प्रथम स्वातंत्र्य समर के योद्धा क्रांतिवीर बरजीरसिंह^^^^

सन १८५७ के प्रथम स्वातंत्र्य समर में देश के कोने कोने में स्वतंत्रता प्रेमियों ने अंग्रेजो को कड़ी चुनौती दी थी। इस महासंग्राम में देश की जनता ने भी क्रांतिकारियों का पूरा साथ दिया। क्रांति के इस महायज्ञ में अनेक वीरो ने अपने जीवन की आहुतियाँ दी थी। उनमे से कुछ सूरमा ऐसे भी थे,जो जीवन भर अंग्रेजो से संघर्ष करते रहे लेकिन कभी अंग्रेजो की गिरफ्त में नहीं आए। ऐसे ही एक योद्धा थे बरजीर सिंह।झाँसी और कालपी के मध्य में स्थित बिलायाँ गढ़ी के बरजीर सिंह ने अंग्रेजो का सामना करने के साथ साथ क्षेत्र में जनसंपर्क द्वारा जनजागृति का महत्वपूर्ण कार्य किया। जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई झांसी से कालपी जा रही थी तो रास्ते में  बरजीर सिंह ने उनसे भेंट की। रानी के निर्देशानुसार इस वीर ने क्षेत्र के गाँव गाँव में घूम घूमकर जनजागरण कर क्रांतिकारियों की शक्ति को कई गुना बाधा दिया। बरजीरसिंह ने कालपी की लड़ाई में प्राणप्रण से भाग लिया,लेकिन दुर्भाग्यवश २३ मई १८५८ को कालपी भी स्वातंत्र्य सैनिको के हाथ से निकल गई। बरजीरसिंह ने अब झाँसी-कालपी मार्ग के प्रमुख ठिकानो के स्वतंत्रता प्रेमियो को संगठित करके अंग्रेजो की नींद हराम कर दी। उन्होंने अपने साथियों गंभीर सिंह तथा देवीसिंह मोठ के साथ ब्रिटिशों के ठिकानो पर हमले शुरू कर दिए।

उधर झाँसी की रानी ने ग्वालियर पर कब्ज़ा कर अंग्रेजो को करारा तमाचा लगाया तो इधर बरजीरसिंह ने अंग्रेजो के ठिकानो को कब्जे में लेना शुरू कर दिया। कालपी के बाद बिलायाँ गढ़ी क्रांतिकारियों का केंद्र बन गई।झाँसी के क्रन्तिकारी काले खां,बरजीरसिंह,दौलतसिंह,गंभीरसिंह तथा देवीसिंह के साथ साथ सैदनगर,कोंटरा,संवढा,भांडेर आदि अनेक स्थानों के सैंकड़ो स्वतंत्रता प्रेमी बिलायाँ में एकत्रित हो गए।३१ मई १८५८ को मेजर ओर के नेतृत्व में एक बड़ी सेना ने बिलायाँ गढ़ी पर आक्रमण कर दिया। ब्रिटिशो की तोपों ने गढ़ी पर गोलीबारी शुरू की तो बरजीरसिंह घोड़े पर सवार होकर तथा ध्वज लेकर अपने साथियों सहित मैदान में आ डटे।

क्रांतिवीरो ने भीषण युद्ध किया। इस युद्ध में अंग्रेजो को बुरी तरह से रौंदते हुए बरजीर सिंह भी घायल हो गए। तब उनके कुछ साथी उन्हें अश्व से उतारकर वेतवा की ओर ले गए तथा एक साथी मोती गुर्जर ,,बरजीर सिंह के घोड़े पर ध्वज लेकर युद्ध में सन्नध हो गया। अंग्रेजो को बरजीरसिंह के निकलने का पता भी न चला। स्वातंत्र्यवीरो ने गोरो की सेना से जमकर लोहा लिया। अंत में मोती गुजर व अन्य ३४ सैनिको को बंदी बना लिया गया। इस युद्ध में लगभग १५० क्रांतिकारी शहीद हुए। मोती गुर्जर को अंग्रेजो ने फांसी पर लटका दिया। बरजीरसिंह ने कुछ ही दिनों में स्वस्थ होलर अंग्रेजो का पुनः विरोध शुरू कर दिया।

बरजीरसिंह अब तात्या तोपे के दाहिने हाथ बन गए।तात्या के उस क्षेत्र से दूर जाने के बाद उस क्षेत्र में क्रांति की गतिविधियों की बाग़डोर अब बरजीरसिंह ने संभाल ली। उन्होंने अंग्रेजो के साथ छुटपुट लड़ाईयाँ लड़ते हुए संघर्ष जारी रखा। २ अगस्ट १८५८ को क्रांति सेना ने उनके नेतृत्व में जालौन ले अंग्रेज समर्थक शासक को हटाकर जालौन पर अधिकार कर लिया। बरजीरसिंह की सेना और अंग्रेजो के युद्ध में ४ सितम्बर १८५८ को महू-मिहौनी तथा ५ सितम्बर को सरावन-सहाव की लड़ाई विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन लड़ाईयो में स्वतंत्रता प्रेमियों ने अंग्रेजो के दांत खट्टे कर दिए।अंग्रेजी शासको ने उन्हें मारने या पकड़ने के अनेक प्रयास किए लेकिन वे जीवनभर विदेशियों की पकड़ में नहीं आये। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वे अपनी बहन के पास पालेरा(जिला टिकमगढ़,म.प्र.)चले गए जहाँ १८६९ में उनका निधन हो गया।बरजीरसिंह की स्मृति में बिलायाँ में १९७२ में एक स्मारक बनाया गया जो आज भी मौजूद है।

सन्दर्भ-

१)सदर लेख सनावद,मध्य प्रदेश से प्रकाशित मासिक पत्रिका "#प्रतापवाणी" के मई-जून २०१० के महाराणा प्रताप विशेषांक से लिया गया है।

नोट:credits to anonymous writer.

अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल शांति स्वरूप राणा Shanti swaroop rana,Ashok chakra winner soldier

====अशोक चक्र विजेता लेफ्टिनेंट कर्नल शांति स्वरूप् राणा====
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जीवन परिचय----
स्वर्गीय Col शांति स्वरुप राणा जी का जन्म 17 सितम्बर 1949 में होशियपुर पंजाब के baila नामक गाँव में हुआ था।वे चार भाइयो और तीन बहनो में सबसे छोटे थे।उनके पिता जी बड़े प्रभावशाली जमीदार थे।
11 जून 1977 को उन्हें भारतीय सेना में कमीशन मिला था।

वीरता और सर्वोच्च बलिदान----------

शुरुआत में शांति स्वरुप राणा जी की नियुक्ति सेना में सिग्नल सैनिक के पद पर हुआ था लेकिन प्रतिभा के बल पर बाद में ये आर्मी कैडेट कॉलेज देहरादून में अधिकारी की ट्रेनिंग के लिए सेना की तरफ से चुने गए। ट्रेनिंग पूरी हो जाने के बाद इन्हें 3 बिहार रेजिमेंट में 11 जुलाई 1977 को नियुक्त किया गया। ऑपरेशन राइनो , ऑपरेशन पवन , ऑपरेशन रक्षक जैसे बड़े सैन्य अभियानो में अपना जौहर दिखाने के कारण इन्हें 13 राष्ट्रिय राइफल में 2 IC के स्थान पर पदोन्नत किया गया। सन् 1994 को Lt COL के पद पर नियुक्त किया गया। 2 नवंबर 1996 को Lt Col राणा को जम्मू कश्मीर के कुपवाड़ा के हफरुदा जंगलों में दो आंतकवादी ठिकानों को ध्वस्त करने की चुनोती मिली।

Lt. Col राणा वहाँ आतंकवादियों की छोटी छावनियों के समान चार छुपे हुए ठिकाने देखे जिनमे भारी असला और 800 kg विस्फोटक जमा था। lt.col राणा और उनके सैनिकों ने फुर्ती दिखाते हुए सीधे दुश्मनों की तरफ धावा बोला और ग्रेनेड से हमला करते हुये आतंकवादी बंकरों को एक एक कर ध्वस्त करने लगे।

तभी उनकी नजर एक और छुपे हुए आतंकवादी ठिकानों पर पड़ी , इसी समय अपने छावनी सामान बंकरों से आतंकवादियों ने दुबारा जवाबदारी देते हुए भारी गोला बारी की। Lt. Col. राणा ने अपने सैन्य दस्ते की कमान संभाली और उन बंकरों की तरफ कूच शुरू की और तीन हैण्ड ग्रेनेड उनमें फेंक दिए। तभी दो विदेशी भाड़े के आतंकी भारी गोली बारी करते हुए बंकर से बाहर निकले। Lt Col राणा ने उन्हें तुरन्त ही जवाबी हमले में मार गिराया तभी दूसरी तरफ से आतंकवादियों ने राणा को पीछे से गोली बारी कर बुरी तरह से घायल कर डाला।

बुरी तरह घायल होने के बावजूद col राणा अपनी टुकड़ी की होंसला अफजाही करते रहे और दुश्मनों पर भारी पड़े। तभी एक आतंकवादी उनकी टुकड़ी की तरफ भारी गोला बारी करते हुए लपका, कर्नल राणा ने बिना अपनी जान की परवाह करते हुए अपनी टुकड़ी की रक्षा के लिए उस आतंकवादी पर आमने सामने का धावा बोल दिया और उसे मार गिराया।
कर्नल राणा का शरीर गोलियों से बुरी तरह छलनी हो गया तथा वे और बुरी तरह से घायल हो गए और अंत में इस देह को त्याग कर शहीद हो गए।
राणा के सफल नेतृत्व और बलिदान के कारण वह भारतीय सैन्य अभियान सफल रहा और ना जाने कितने मासूम देश वासियों तथा सैनिकों का जीवन सुरक्षित हुआ।

समस्त भारतीय कर्नल शांति स्वरूप् राणा के इस योगदान को भुला नहीं सकता और समस्त राजपुत समाज उनके इस शौर्य पर गर्वान्वित महसूस करता है और अपनी श्रधांजलि अर्पित करता है। कर्नल राणा को उनके बलिदान के लिए भारत सरकार की तरफ से अशोक चक्र से नवाजा गया।
कर्नल शांति स्वरूप् राणा जी को शत शत नमन।
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Lieutenant Colonel Shanti Swarup Rana was commissioned on 11 June 1977 in the Bihar Regiment.

On 02 November 1996, Lt Col Swarup Rana while serving with 13 RR was entrusted with the task of destroying two terrorist camps in the Hephrude forest of Kupwara District in Jammu & Kashmir. He spotted four well fortified hideouts stocked heavily with arms and ammunition including tonnes of explosives. In a gallant and swift strike, he destroyed these hideouts. One more well concealed hideout came to his notice. During the action that followed, the terrorists resorted to heavy firing from their well fortified bunker. Lt Col Rana organised his troops, crawled towards the bunker and threw hand grenades inside. Two foreign mercenaries came out firing heavily. He killed both of them instantaneously.

Meanwhile, the terrorists seriously injured Lt Col Rana in heavy firing from another location. In spite of this, the gallant officer kept on boosting the morale of his soldiers. When one more terrorist advanced towards the soldiers, Lt Col Rana without caring for this own life, charged and killed him in a hand-to-hand encounter. In this action, this gallant officer sustained fatal bullet injuries and made the supreme sacrifice. Lt Col Rana displayed indomitable courage, patriotism and gallantry of the highest order. For this act of indomitable courage, Lt Col SS Rana was awarded the ASHOKA CHAKRA posthumously

Biodata

1. Rank & Name - Lt Col Shanti Swarup Rana, AC (Posthumously)

2. Unit/Regt - 13 RR Bn/BIHAR REGT

3. Name of Award - Ashok Chakra

4. Theatre of Ops - OP RAKSHAK

5. Year of Awards - 26 Jan 1997

6. City/ State of which belonged - Panchkula / Haryana

Reference----
1- http://en.m.wikipedia.org/wiki/Rashtriya_Rifles
2- http://en.m.wikipedia.org/wiki/Shanti_Swaroop_Rana
3-http://indian-martyr.blogspot.in/2011/11/lt-col-shanti-swarup-rana.html?m=1
4- https://books.google.co.in/books?id=MlAi5sWYOe8C&pg=PA113&lpg=PA113&dq=shanti+swarup+rana&source=bl&ots=8tuVq2ElBK&sig=0ggqq5oZvTucn9qfnAKgpAyAWSE